गुरुवार, 17 जुलाई 2014

कर्म का परिणाम ही सफलताः

कर्म का परिणाम ही सफलताः


कर्म जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है, उस उद्देश्य की प्राप्ति ही सफलता का द्योतक होता है। कर्म निरुद्देश्य नहीं हो सकता। मानव के समस्त कर्म ध्येय आधारित होते हैं। इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि मानव एक विवेकवान प्राणी है। अतः उसके समस्त कर्म ध्यये आधारित होने चाहिए। मानव का ध्येय ही स्पष्ट नहीं होगा तो वह कर्म करेगा किसके लिए। जब गंतव्य ही निर्धारित नहीं होगा तो हम यात्रा का प्रारंभ ही क्यों करेंगे और किस दिशा की ओर? निःसन्देह हम यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व गंतव्य का निर्धारण करते हैं। ठीक उसी प्रकार कोई भी कार्य करने से पूर्व उसका उद्देश्य भी स्पष्ट कर लेना चाहिए। ध्येय, उद्देश्य और लक्ष्य ही हैं जो हमें आगे बढ़ने व निरंतर कर्मरत रहने की अभिप्रेरणा देते हैं। ध्येय, उद्देश्य या लक्ष्य के बिना मानव दीर्घकाल तक कर्मरत नहीं रह सकता।
सफलता तो तब है, जब हमने कोई लक्ष्य निर्धारित किया हो, परिस्थितियों का अध्ययन किया हो, पूर्वानुमान लगाया हो, उसके लिए योजना बनाई हो, उसके लिए संसाधन जुटाये हों, उन संसाधनों का तकनीकी के साथ कुशलतापूर्वक प्रयोग किया हो। इस प्रकार मानवीय व भौतिक संसाधनों का प्रबंधन करने के साथ किए गये प्रयासों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाला संतुष्टिदायक परिणाम ही उस कार्य का फल है। कार्य का फल प्राप्त होना ही तो सफलता है। सफलता का आधार कर्म है, तभी तो कर्म के महत्व को इस प्रकार स्पष्ट किया गया है-
कर्म जिनके अच्छे है, किस्मत उनकी दासी है।
नीयत जिनकी अच्छी है, घर ही मथुरा काशी है।।


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