सोमवार, 29 जून 2026

तनाव का मूल-लोग क्या कहेंगे?

 

लोग क्या कहेंगे?’

                                                                    ©डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

Rounded Rectangle: जन सामान्य कानून से नहीं ‘लोग क्या कहेंगे?’ से संचालित होता है। कानून टूटने पर सजा मिले यह आवश्यक नहीं, किन्तु लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही, यह अनिवार्य है। लोगों से अच्छा सुनने की आकांक्षा ही, हमें तथाकथित अच्छाई करने के लिए प्रेरित करती है।
 

 

 

 

 


सफलता के मानक बड़े ही विचित्र और विविधतापूर्ण होते हैं। एक व्यक्ति की सफलता दूसरे व्यक्ति के लिए असफलता हो सकती है। एक विद्यार्थी उत्तीर्ण होने के अंक अर्थात् 33 प्रतिशत प्राप्त कर अपने आपको सफल मान सकता है, जबकि दूसरा 70 प्रतिशत अंक पाकर अपने आपको असफल मान सकता है। ग्राहक की सफलता इस बात में है कि वह अच्छी से अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तु कम से कम मूल्य पर प्राप्त कर ले, जबकि दूसरी ओर विक्रेता की सफलता इस बात में है कि वह अपने समस्त सामान(जिसमें खराब गुणवत्ता और औसत गुणवत्ता का सामान भी सम्मिलित है) को अधिकतम मूल्य पर बेच दे। यह सफलता का मापदण्ड व्यक्तिगत व व्यावसायिक दृष्टि से हो सकता है, किन्तु यह वास्तविक सफलता नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर संतुष्टि और प्रसन्नता होती है, सफलता के लिए सामाजिक स्वीकृति या मान्यता की आवश्यकता होती है।

                जन सामान्य कानून से नहीं लोग क्या कहेंगे?’ से संचालित होता है। कानून टूटने पर सजा मिले यह आवश्यक नहीं, किन्तु लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही, यह अनिवार्य है। लोगों से अच्छा सुनना ही हमें तथाकथित अच्छाई करने को प्रेरित करता है। कानून का पालन करने की आदत सामान्यतः नहीं पाई जाती। हम सामान्यतः अपने आसपास रहने वाले जन समुदाय को असंतुष्ट नहीं करना चाहते। विश्व के बहुत बड़े भाग में आज भी स्थानीय समुदाय, पंचायत या अन्य किसी भी नाम से जाना जाता हो; कानून से अधिक प्रभावी होता है। जन जातियों व खाप पंचायतों का दबदबा आज भी कम नहीं हुआ है।

                एक बार मैं अपनी पत्नी के साथ बातचीत कर रहा था। आम महिलाओं का बातचीत का सबसे पसंदीदा विषय वस्त्राभूषण रहता है। वह आभूषणों की बात कर रही थी। आभूषणों के लिए उसकी ललक को देखकर, मैंने उसकी माँग से भी अधिक आभूषणों का सशर्त प्रस्ताव रखा। शर्त यह थी कि वह उन आभूषणों की स्वामिनी होगी किन्तु न किसी को उन आभूषणों के बारे में बताएगी और न ही किसी के सामने पहनेगी। आभूषणों की स्वीकृति से उसके चेहरे पर जो प्रसन्नता की चमक आई थी, वह शर्तो को सुनकर गायब हो गई और स्पष्ट रूप से बोली, ‘ऐसे आभूषणों का मैं क्या करूँगी?’ महिलाएँ दूसरों को दिखाने के लिए ही वस्त्राभूषण लेती हैं। जब दूसरी महिलाएँ उन्हें देखकर ईर्ष्या महसूस करती हैं, तभी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। जब तक दूसरे लोग सराहना न करें, तब तक उन आभूषणों का क्या मतलब?

                यही बात सफलता के ऊपर लागू होती है। सफलता का निर्धारण भी लोगों के कहने से ही होता है। जितने अधिक लोग सराहना करें, उतनी बड़ी सफलता। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जितने अधिक लोग हमारी सफलता से ईर्ष्या करेंगे, वह उतनी महत्वपूर्ण सफलता। हम लोगों को जलन पैदा करने के लिए ही प्रदर्शन करने का काम करते हैं। यही कारण है कि हम लोगों को दिखाने के लिए अपनी सफलता का जश्न बड़े स्तर पर मनाते हैं, भले ही उन्हें उस जश्न के लिए कर्ज क्यों न लेना पड़े। लोग सफलता को इज्जत से जोड़ते हैं और इज्जत के लिए लोग क्या-क्या नहीं कर गुजरते!

                कहने का आशय यह है कि सफलता व्यक्ति की उपलब्धियों से अधिक इस बात पर निर्भर है कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे, यही महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के काम, उपलब्धियाँ और परिणाम की सफलता लोगों के कहने पर निर्भर करती है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि व्यक्ति की सफलता या असफलता का आकलन सामाजिक संदर्भ में किया जाता है।

समाज जिसे सफल समझता है, उसे हम सफल स्वीकार कर लेते हैं। समाज जिसे असफल कहता है, उसे हम असफल मान लेते हैं। समाज क्या है? भीड़ जिसका एक मत हो ही नहीं सकता। अतः उनमें से कुछ प्रभावशाली व्यक्ति अपने मत को समाज के मत रूप में आरोपित कर देते हैं। व्यक्ति मान लेता है कि जब समाज ही इस पक्ष में है तो मैं क्या कर सकता हूँ? ऑनर किलिंग जैसे अपराध समाज के नाम पर ही किए जाते हैं। ऐसे में गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श की आवश्यकता है कि कहीं हम समाज के नाम पर असामाजिक तत्वों के चंगुल में तो नहीं फंस रहे हैं।

व्यक्ति को स्पष्ट रूप से समझना होगा कि समाज का प्रतिनिधित्व असामाजिक लोग नहीं करते। जो व्यक्ति व परिवार के हित में नहीं है, वह कभी भी सामाजिक नहीं हो सकता। अतः निःसन्देह सफलता का जश्न मनाने के लिए अपने आस-पास के लोगों की आवश्यकता है किन्तु वे लोग ऐसे ही होने चाहिए जिनको वास्तव में आपकी सफलता से प्रसन्नता हो रही है तथा जिन्होंने आपकी सफलता में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया है। जिन लोगों को आपकी सफलता से ईर्ष्या होती है या हो सकती है, ऐसे लोगों से दूरी बनाकर चलने में ही सुरक्षा है। ऐसे लोगों को जलाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में आमंत्रित करना तथाकथित सफलता के लिए खतरनाक हो सकता है।

सामाजिक संदर्भ में सफलता-

सफलता के संदर्भ में सामाजिक संदर्भ महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्य जन सफलता की समाज की दी हुई परिभाषा को ही स्वीकार करता है। उसी के आधार पर टिप्पणी आती हैं कि फलां व्यक्ति ने सफलता हासिल कर ली है। समाज की दृष्टि से पद, पैसा, संपत्ति और प्रसिद्धि सफलता का मापदण्ड होती है। इस प्रकार की सफलता में भी नारीवाद के दृष्टिकोण से भेद होता है। पुरुष के लिए जहाँ सफलता के मानक पद, पैसा, संपत्ति और प्रसिद्धि होते हैं, वहीं महिला के लिए सफलता शादी और बच्चों से मानी जाती है। हालांकि वर्तमान समय में इन मानकों में अंतर आ रहा है। इस प्रकार के सफलता के मानक बाह्य होते हैं। अतः तुलना सरल है। सफलता की इस रेस में अधिकांश लोग दोड़ सकते हैं। किंतु सफलता की इस चूहों की दौड़ में जीतकर भी खालीपन ही हाथ लगता है। आंकड़े भले ही दिखाए जा सकते हों। आंतरिक अनुभूति का पक्ष अर्थात क्वालिया(व्यक्तिगत स्तर पर आंतरिक सचेतन अनुभूति) नहीं होता।

सामान्यतः सफलता की चूहा दौड़ में व्यक्ति सफलता पाकर भी असफल ही रहता है। उसके सामने एक यक्ष प्रश्न सदैव बना रहता है-

लोग क्या कहेंगे?’

व्यक्ति की समस्त चिंताएं इसी वाक्य के अधीन होती हैं कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे की चिंता के कारण, व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग नहीं कर पाता। इसके कारण वह चिंतित रहता है। इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह तनाव में जीता है।  इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह अवसाद में जाते हुए आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम भी उठा लेता है। लोग क्या कहेंगे? के कारण व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से लाभान्वित नहीं हो पाता। वह दूसरों से मान्यता के चक्कर में अपने सुखों को भी दुखों में परिवर्तित कर लेता है।

लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। राम फंस गए लोग क्या कहेंगे?’ के जाल में, अब राज्य सुखी रहा या नहीं बाद की बात है। व्यक्तिगत सुख और परिवार की शांति तो समाप्त हो ही गई। यह सफलता तो नहीं ही कही जा सकती। यदि वास्तविक रूप से सफलता की अनुभूति करनी है। क्वालिया, (क्वालिया दर्शन में प्रयुक्त एक शब्द है, जो अहसास या अनुभूति के अर्थ में प्रयुक्त होता है। लाल रंग का क्वालिया, आंख बन्द करके भी लाल दिखना है। गीता के अनुसार अनासक्त कर्म शांति का क्वालिया देता है।) चाहिए तो लोग क्या कहंेगे के जाल को तोड़ना होगा।

लोगों का कहना कभी रोका नहीं जा सकता। वे कुछ ना कुछ कहेंगे ही किन्तु यदि उनकी सुनने लगे तो हम अपने कर्म में समर्पित नहीं हो पाएंगे। प्राप्त परिणाम की भी सफलता की अनुभूति नहीं कर पाएंगे।

जब हम लोग क्या कहेंगे?’ के सामाजिक संदर्भ में सफल होना चाहते हैं। हम प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत स्तर पर असफल हो जाते हैं। हम स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अपने अस्तित्व को नकारते हैं और अपनी प्रामाणिकता को खो देते हैं। हम व्यक्तिगत आकांक्षा और सोच को समाज को अर्पित कर देते हैं। हमारी व्यक्तिगत आवश्यकताओं का निर्धारण समाज नामक अनिश्चित, अनियोजित, असीमित व निर्दय जन भावना की आकांक्षाओं से होने लगता है, तो व्यक्ति दो पाटों के बीच में पिसने लगता है।

दो पाटों के बीच में साबुत बचा न कोय।

कबीरदास जी ने बहुत पहले लिख दिया कि दो पाटों के बीच में आज तक कोई साबुत बचा है, जो हम बचेंगे। व्यष्टि और समष्टि दोंनो के बीच में फंसकर किसी भी व्यक्ति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। अस्तित्व ही नहीं रहेगा, तो हम अपना जीवन कैसे बनाएंगे? जीवन का सार कहाँ रहेगा? आप कितना भी अच्छा कर लीजिए, समाज को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे। अपने आपको संतुष्ट करना और समाज को संतुष्ट करना दोंनो ही विरोधाभासी लक्ष्य हैं। इनमें समन्वय बनाकर अपने आपको जीवंत बनाए रखने वाला व्यक्ति ही जीवित, सक्रिय व विकसित अवस्था में रह सकता है। व्यक्ति न तो समाज के बिना अपने आपमें अकेला जी सकता है और न ही अपने आपको समाप्त कर केवल समाज के असीमित निर्देशों, अनिश्चित आकांक्षाओ और निर्दय आलोचनाओं के कारण अपने आपको मारकर जी सकता है।

व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या भूख नहीं है। व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या कपड़ा भी नहीं है। व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या आवास की समस्या नहीं है। रोटी, कपड़ा और मकान भले ही मूलभूत समस्या मानी जाती हों किन्तु इनका समाधान व्यक्ति अपने स्तर पर अपने आप कर ही सकता है। ये तनाव, अवसाद और आत्महत्या के कारण नहीं होते। व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी समस्या समाज में सम्मान की समस्या है, जिसका कोई निर्धारित मानक, पैमाना या मापदण्ड नहीं है। कानून का सम्मान करते हुए किसी देश का अच्छा नागरिक बनकर जीवनयापन करते हुए अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए अपना सार निर्मित व सिद्ध किया जा सकता है किन्तु लोग क्या कहेंगे?’ के यक्ष प्रश्न को झेलते हुए जीना अत्यन्त मुश्किल कार्य है।

Rounded Rectangle: ‘लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। उसकी बात सुनकर पारिवारिक जीवन असफल।लोग क्या कहेंगे? सार्वकालिक प्रभावशाली शक्ति है। यह सभी समुदायों में कमोबेश प्रभाव रखता है। लोगों को ध्यान में रखकर ही हमारी अधिकांश गतिविधि प्रभावित होती हैं। दूसरों से तुलना करके व्यवहार को प्रभावित करने की कला को आपवादिक रूप से कुछ लोग ही अस्वीकार कर पायेंगे। उन्हंे भी लोगों की मानसिकता को नजर अंदाज करने के लिए अपने आपसे जूझना पड़ता है।

 

 

 

 

 

 

लोग क्या कहेंगे?’ प्रश्न को छोड़कर समाज में जीना असंभव जैसा होता है। इस प्रश्न के साथ तनाव, अवसाद और आत्महत्या की श्रंखला होती है। व्यक्ति आत्महत्या रोटी, कपड़ा और मकान की कमी के कारण नहीं करता है; वह आत्महत्या लोग क्या कहेंगे? यक्ष प्रश्न के डर से करता है। यदि हम लोग क्या कहेंगे?’ प्रश्न से अपने आपको मुक्त करने की स्थिति में आ सकें, तो जीवित रहते हुए ही हम मोक्ष के आनंद की अनुभूति कर सकेंगे। वास्तविकता यही है कि मुक्ति की आकांक्षा से ही मुक्त हो जाना वास्तविक जीवन मुक्ति है और इसकी उपलब्धि अपने व्यक्तित्व का इतना विकास कर लेने में है कि हम लोग क्या कहेंगे? प्रश्न से मुक्त होकर अपने जीवन का निर्माण व उपभोग कर सकें।

हमारी व्यक्तिगत व्यक्तित्व विकास की आवश्यकताएं और समाज की आवश्यकताएँ सामान्यतः भिन्न-भिन्न ही नहीं, विरोधाभासी होती हैं। व्यक्तिगत जीवन में सफलता के शिखर पर काम करता व्यक्ति लोग क्या कहेंगे के चक्कर में आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। व्यक्ति धन, पद और संबन्धों के स्तर पर शिखर पर पहुँच सकता है किंतु लोग क्या कहेंगे? के कारण अपने सामने कोई भी मार्ग न पाकर आत्महत्या करने को विवश हो सकता है। जब तक व्यक्ति लोग क्या कहेंगे के यक्ष प्रश्न से निकल कर अपने विचार और चिंतन को महत्व नहीं देता, तब तक वह कर्म पर फोकस नहीं कर पाएगा। कर्म के बिना सफलता की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

विचारशील व्यक्ति अपनी सफलता का आकलन समाज के दृष्टिकोण से करे या अपने दृष्टिकोण से यह सदैव ही विमर्श का विषय रहा है। इस पर कोई भी सर्व-सम्मत दृष्टिकोण न अभी तक बन पाया है और शायद नहीं बन पाएगा। व्यक्ति का जीवन इस प्रश्न का उत्तर न तो खोज पाया है और न ही खोज पाएगा।

तनाव का मूल आधार-

लोग क्या कहेंगे?

दुनिया में तनाव, अवसाद या आत्महत्याओं का मूल कारण हमारे अभावों में जीना नहीं है। जीवन के लिए वास्तविक आवश्यकताएँ तो अत्यन्त न्यून होती हैं। उन्हें अर्जित करने में विशेष कठिनाई नहीं होती है। हमारे अधिकांश तनाव केवल दूसरों के दृष्टिकोण को लेकर ही होते हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। हमारे जीवन में तनाव हमारे कर्मो के कारण नहीं, हमारे द्वारा दूसरों की नजरों से अपना मूल्यांकन करने देने व उसे स्वीकार करने के कारण होता है। हमें ग्लानि दूसरों की उपलब्धियों के आगे अपने आपको छोटा समझने के कारण होती है। हम निम्न हैं, इस कारण हम में हीन भावना नहीं आती, दूसरों से तुलना करने के कारण हमारे अन्दर हीन भावना उत्पन्न होती है। दूसरों के दृष्टिकोण के बारे मे सोचकर ही हम व्यर्थ में चिंतित होते है, चिंताएँ हमारे अपने दृष्टिकोण के कारण नहीं होती हैं।

व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी या अभावों के कारण चिंता नहीं करता। व्यक्ति को यह तनाव नहीं होता कि वह किसी कार्य में असफल हो गया है। व्यक्ति को सबसे अधिक चिंता व तनाव होता है, तो वह इस बात का कि लोग उसको देखकर क्या सोच रहे होंगे? अरे भाई! किसके पास समय है, तुम्हारे बारे में सोचने का। अपने आपको इतना महत्वपूर्ण क्यों समझते हो कि लोग आपके बारे में ही सोचते रहेंगे। उनके पास और कोई काम नहीं है क्या?

                आप भी लोग क्या कहेंगे की चिंता त्याग करके अपने काम पर फोकस क्यों नहीं करते? लोग क्या कहेंगे? इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है किन्तु अपने कर्मो पर आपका नियंत्रण है। लोगों के कहने से बाहर निकलकर, अपने कर्मो पर ध्यान केन्द्रित करके आप ऐसा कर सकते हैं कि आप अपने आपको संतुष्ट और आनंदित महसूस कर सकें।

अतः यदि आप जीवित रहना चाहते हैं। आप अपने अस्तित्व की रक्षा करना चाहते हैं। अपना विकास करना चाहते हैं। अपने जीवन का सार गढ़ना चाहते हैं तो आपको इस प्रश्न से बाहर निकलना होगा-

लोग क्या कहेंगे?’

इस प्रश्न से बाहर निकलते ही आप संसार के सफल व्यक्तियों में से एक होंगे और आप जीत-हार के चक्र से बाहर निकल कर आनंद की अनुभूति करते हुए सफलता का जश्न मना सकेंगे। इससे बड़ी सफलता कोई हो ही नहीं सकती। अपने आपको स्वीकार करने और अपने अनुसार जीते हुए विकसित करने से महत्वपूर्ण सफलता और क्या हो सकती है?

 

Rounded Rectangle: लोग क्या कहेंगे? इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है किन्तु अपने कर्मो पर आपका नियंत्रण है। लोगों के कहने से बाहर निकलकर, अपने कर्मो पर ध्यान केन्द्रित करके आप ऐसा कर सकते हैं कि आप अपने आपको संतुष्ट और आनंदित महसूस कर सकें। 

 

 

 


व्यक्ति के संदर्भ में सफलता-

विचारशील व्यक्ति के दृष्टिकोण से सफलता के मापदण्ड अलग ही हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर सफलता के मापदण्ड भी व्यक्ति के स्तर पर ही निर्धारित होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत आकांक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, उसी के अनुसार सफलता के उनके मापदण्ड भी भिन्न-भिन्न ही होंगे।

व्यक्ति के मापदण्ड, मानक व प्रतिमान समाज के संदर्भ में ही होते हैं। व्यक्ति उनका आधार व तर्क समाज से ही ग्रहण करता है। किन्तु वैयक्तिक स्तर पर उनके निश्चितता और स्पष्टता देखी जा सकती है। व्यक्तिगत स्तर पर असंदिग्ध मानक हो सकते हैं, जो सामाजिक स्तर पर सर्व सहमति के साथ संभव नहीं हैं। आप कितना भी अच्छा काम कर लीजिए, उनकी आलोचना करने के लिए एक धोबी तो मिल ही जाएगा। अधिकांश लोग या लोगों का बहुमत उन मानकों के आधार पर सहमत हो सकता है, किंतु सभी सहमत नहीं हो सकते।

एक व्यक्ति सफलता के मायने केवल आर्थिक समृद्धि से ले सकता है। दूसरा सामाजिक इमेज को सफलता मान सकता है। कोई व्यक्ति प्रतिष्ठित नौकरी को महत्व दे सकता है, तो किसी अन्य के लिए व्यवसाय महत्वपूर्ण हो सकता है। किसी व्यक्ति के लिए किसी परीक्षा में असफलता भी सफलता हो सकती है। इसका सुंदर उदाहरण मेरा अपना है। मैं विधि स्नातक की परीक्षा में सम्मिलित हो रहा था। परीक्षा कक्ष में प्रवेश किया। परीक्षा कक्ष में सभी औपचारिकताओं के बाद मेरे हाथ में उत्तर पुस्तिका आ गई। उत्तर पुस्तिका के सारे आवश्यक खाने भरे जा चुके थे। उपस्थिति पत्रक पर उपस्थिति दर्ज की जा चुकी थी। प्रश्न पत्र हाथ में आ गया। ध्यानपूर्वक प्रश्न पत्र पढ़ने लगा। प्रश्न पत्र पढ़ने के बाद थोड़ी सी निराशा हुई प्रश्न पत्र अपेक्षा के अनुरूप नहीं था या कहा जाय मेरी तैयारी प्रश्न पत्र के अनुरूप नहीं थी। ऐसा भी नहीं था कि अनुत्तीर्ण होने की स्थिति बनने वाली थी, किन्तु मैं जिस प्रकार के अंक चाहता था; उस प्रकार के अंक आने की संभावना नहीं थी।

प्रश्न पत्र पढ़ने के बाद तुरंत विचारकर निर्णय लिया कि आज परीक्षा देना, उचित नहीं रहेगा। आज के प्रश्न पत्र में पुनः परीक्षा देनी है। विश्वविद्यालय के नियमानुसार उत्तीर्ण प्रश्न पत्र में अंक सुधार के लिए पुनः परीक्षा का प्रावधान नहीं था। केवल अनुत्तीर्ण विद्यार्थी ही पुनः परीक्षा में सम्मिलित हो सकते थे। यदि प्रश्न पत्र के उत्तर लिखना प्रारंभ किया, तो अनुत्तीर्ण होने की कोई संभावना नहीं थी।

अतः मैंने निर्णय किया कि परीक्षा में उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं लिखूँगा, ताकि उत्तीर्ण होने की कोई संभावना न रहे। मैं प्रश्न पत्र को पढ़कर उत्तर पुस्तिका बंद कर आराम से बैठ गया। उत्तर पुस्तिका में लिखना प्रारंभ नहीं किया। मैं इसी प्रकार खाली बैठकर झपकी लेने लगा। कक्ष निरीक्षक महोदय ने इस पर ध्यान दिया। उन्होंने मेरे पास से कई चक्कर लगाए। अन्त में पूछ बैठे, ‘लिख क्यों नहीं रहे हो?’

मैंने कहा, ‘सर! तैयारी नहीं है। अतः मैं लिखने की स्थित में नहीं हूँ।

कक्ष निरीक्षक महोदय चले गए। पुनः अगली बार चलकर आए और सुझाव देने लगे, ‘खाली बैठने से तो अच्छा है कि अपने विचार ही लिख दीजिए।

मेरे सामने यही तो समस्या थी। एक बार लिखना प्रारंभ किया तो उत्तीर्ण हो सकता था और मैं पुनः परीक्षा में सम्मिलित होने के अपने उद्देश्य में असफल हो सकता था। उत्तीर्ण होना मेरे लिए असफलता थी। मैंने कक्ष निरीक्षक महोदय से कहा, ‘श्रीमान मेरे बैठे रहने से आपको कोई समस्या है तो मुझे बाहर जाने की अनुमति दे दीजिए। प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका दोनों जमा कर लीजिए। मुझे कुछ भी नहीं लिखना है। उत्तर पुस्तिका में क्या लिखना है या क्या नहीं लिखना है या कुछ भी नहीं लिखना है। इसका निर्णय मुझे करना है और मैं निर्णय कर चुका हूँ कि मुझे कुछ भी नहीं लिखना है।

उसके बाद कक्ष निरीक्षक महोदय शांत हो गए। मैं पूरी अवधि तक परीक्षा कक्ष में बैठा और बिना कुछ लिखे बाहर आ गया। जब परीक्षा परिणाम घोषित हो गया और मैं अंक पत्र लेने कालेज गया। अंक पत्र वितरित करने वाले लिपिक महोदय मेरे अंक पत्र को देखकर पूछ बैठे, इस प्रश्न पत्र मैं अनुपस्थित रहे। मैंने कहा, ‘नहीं! मैं उपस्थित था।

उनका कहना था, ‘ऐसा कैसे संभव है कि सभी प्रश्नों में इतने अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी के एक प्रश्न पत्र में शून्य अंक हों।

ऐसा ही है श्रीमान जी, ‘मैंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।उस समय उस प्रश्न पत्र में अनुत्तीर्ण होना मेरी योजना थी और वे शून्य अंक ही मेरी सफलता थी।

सामान्यतः व्यक्तिगत सफलता का आकलन दूसरों की उपलब्धियों से तुलना करके नहीं, अपनी तुलना अपने आपसे करके ही किया जा सकता है। व्यक्तिगत सफलता का आकलन निम्न प्रश्नों के आधार पर किया जा सकता है-

1.            क्या मैं अपने द्वारा किए जाने वाले काम को करने के लिए स्वतंत्र हूँ?

2.            क्या मैं अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए अपने चुनाव स्वयं करता हूँ?

3.            क्या मैं अपने द्वारा चुने हुए कामों को करता हूँ?

4.            क्या मैं अपने कामों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करता हूँ?

5.            क्या मैं कल से बेहतर हूँ?

6.            क्या मैं तनाव मुक्त, शांत व आनंदित हूँ?

व्यक्तिगत स्तर पर सफलता चूहा दौड़ से बाहर निकलकर अपनी रेस स्वयं तय करने में है। नीत्शे के अनुसार अपने मूल्य स्वयं गढ़ो। अरस्तू व्यक्तिगत सफलता के लिए सद्गुणों के अभ्यास का निर्देश करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर कर्म करके ही व्यक्ति उपलब्धियाँ हासिल करता है। कर्म व्यक्ति करता है, समाज नहीं। समाज व्यक्ति के मन, वचन और कर्म को नियमित करने के प्रयत्न करता है। कई बार ये प्रयत्न व्यक्ति के काम को नियमित ही नहीं करते प्रतिबंधित भी कर देते हैं।

                किसी भी वस्तु, पद, धन या संबन्ध प्राप्त करने की इच्छा को बाह्य प्रेरणा कहा जा सकता है। कुछ पाने का विचार, व्यक्ति की अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की अपेक्षा से ही उद्भूत होता है। कोई भी विचार, इच्छा, अभिलाषा या आकांक्षा व्यक्ति के अंतर्मन में जन्म लेती है, समाज के नहीं। वही आकांक्षा व्यक्ति के लिए अभिप्रेरणा का स्रोत बनती है। व्यक्ति अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिए दूसरों के साथ मिलकर या अकेले ही काम करने को तत्पर होता है। जब वही आकांक्षा अन्य व्यक्तियों के अंतर्मन में होती है और वे आपस में विचार-विमर्श करके उसकी सामूहिक अभिव्यक्ति करते हैं, तब वह सामाजिक आकांक्षा में परिवर्तित हो सकती है। किन्तु ऐसा ही हो, यह सदैव आवश्यक नहीं है।

                हमें स्मरण रखना होगा कि भले ही किसी विचार, इच्छा, अभिलाषा या आकांक्षा को सामूहिक अभिव्यक्ति मिल गई हो। मूल रूप से उसका जन्म किसी एक ही व्यक्ति के अन्तर्मन में होता है। यह अलग बात है कि वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करके अपनी उस आकांक्षा को सामूहिक या सामाजिक आकांक्षा में परिवर्तित कर देता है। अपनी व्यक्तिगत आकांक्षा को सामूहिक आकांक्षा में परिवर्तित कर देना भी उस व्यक्ति की उपलब्धि ही है।

                वास्तविक रूप से सफलता व्यक्ति की ही उपलब्धि है। कोई भी काम व्यक्ति के स्तर पर होता है। कोई भी प्रयास व्यक्ति के द्वारा किया जाता है और सफलता तो प्रयास को ही मिलती है। परिवार या समाज तो व्यक्तियों का समूह मात्र है। व्यक्ति की उपलब्धियों पर समाज ताली बजाकर उसको स्वीकार करता है, उसे मान्यता देता है किंतु योजना, क्रियान्वयन और परिणाम व्यक्ति के ही होते हैं। जो व्यक्ति समाज की तालियों को नजरंदाज कर अपने काम में लगा रहता है, वही सफलता के सौपानों पर आगे बढ़ता है। समाज की प्रशंसा और आत्ममुग्धता दोनों ही व्यक्ति के कर्म को मंद करते हुए उसे नाकारा बना देते हैं।

                कांट का कथन, ‘कर्तव्य के लिए कर्तव्यव्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शक वाक्यों में से एक है। जो बिना किसी लालच के, बिना समाज के स्वीकार करने या समाज से मान्यता की अपेक्षा किए बिना स्वतःस्फूर्त अपने कर्म को करता है। वह ही सफल है। काम को करना या न करने का उसका निर्णय और खुलकर अपने काम की जिम्मेदारी स्वीकार करना, व्यक्तिगत स्तर पर अपने आपमें सफलता है। 

Rounded Rectangle: सफलता का आशय है कुछ सामान्य आदतों का निरंतर अभ्यास; और असफलता है निर्णय करने में कुछ सामान्य गलतियों का निरंतर दुहराते जाना।                                                                                                                                  -जिम रोह्न
 

 

 

 

 


वास्तव में सफलता के अर्थ पर सर्वस्वीकृति बनाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है। एक व्यक्ति की सफलता की परिभाषा दूसरे से भिन्न हो सकती है। एक समाज की सफलता की परिभाषा दूसरे समाज से भिन्न हो सकती है। यह सब व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताओं पर निर्भर है। उसके दर्शन पर निर्भर है। उसके जीवन मूल्यों पर निर्भर है। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताओं और जीवन मूल्यों पर ही समाज के प्रतिमानों का विकास होता है। नैतिक मानदण्ड भी उसी का अनुकरण करते हैं।

व्यक्ति, परिवार व समाज की सफलता के मापदण्ड भले ही भिन्न-भिन्न होेते हों, किन्तु लोग क्या कहेंगे के महत्व को न तो व्यक्ति नजर अन्दाज कर सकता है और न ही परिवार; समाज का तो आधार ही लोग क्या कहेंगे? है। जन सामान्य की अवधारणा ही समाज नाम की इकाई के अस्तित्व को बनाए रखती है।

                नीत्शे और सार्त्र जैसे दार्शनिक कुछ भी कहें। समाज दार्शनिकों के अनुसार नहीं चलता। समाज के दर्शन का आधार तो लोग क्या कहेंगे? से ही निर्धारित होता है। समाज की स्वीकृति के बिना महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण कानून भी निष्प्रभावी व असफल रह जाते हैं।

Rounded Rectangle: नीत्शे और सार्त्र जैसे दार्शनिक कुछ भी कहें। समाज दार्शनिकों के अनुसार नहीं चलता। समाज के दर्शन का आधार तो लोग क्या कहेंगे? से ही निर्धारित होता है।
 

 

 

 


@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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शुक्रवार, 12 जून 2026

सबसे बड़ी सफ़लता पुस्तक से

कदम-कदम पर सफलता

                                     डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी           

 

सफलता इस संसार सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द है। सभी जगह, सभी के मुँह से सफलता को लेकर चर्चा सुनी जा सकती है। जो काम कर रहा है, उसके लिए तो सफलता की बात करना समझ आता है, किंतु जो कुछ भी काम नहीं कर रहा, उसके द्वारा भी सफलता की कामना और कल्पना की जाती हैं। अधिकांश व्यक्ति सफलता के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं। बच्चे के जन्म से लेकर उसके किशोर, युवा, वृद्ध होते हुए मृत्यु तक माता-पिता और अभिभावक ही नहीं, आस-पास के पड़ोसी भी पीछे पड़े रहते हैं कि तुझे सफल ही होना है। हाँ, सफलता वास्तव में है क्या? इसके बारे में कोई भी नहीं जानता।

जो स्वयं जिस कार्य को नहीं कर सका, वह उसी कार्य के लिए दूसरे को प्रेरित करता हुआ, मिल जाएगा।            व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राजनीतिक जीवन ही नहीं आध्यात्मिक जीवन में भी सफलता की ही चर्चा की जाती है। ईमानदारी की चर्चा करते समय या बेईमानी की चर्चा करते समय सभी संदर्भ में सफलता अवश्य ही संदर्भित होती है। विद्यार्थी, अध्यापक, व्यवसायी, पेशेवर यहाँ तक कि चोर और तस्कर भी सफल ही होना चाहते हैं। कुछ लोगों के लिए सत्कर्म सफलता के आधार होते हैं तो कुछ के लिए दुष्कर्म सफलता का आधार होते हैं। कुछ लोग तो निष्क्रिय रहकर ही सफलता की कामना करते हैं।

 

 

 


सफलता के मानक भी सभी के अपने-अपने होते हैं। उनके मानकों को लिखित में लेकर तुलनात्मक विवरण बनाया जाय तो सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। इस सफलता के शोर में व्यक्ति की अपनी इच्छा, आकांक्षा, चाहत, योग्यता, सक्षमता, साधनसंपन्नता का शायद ही किसी के द्वारा विचार किया जाता हो। इन सबसे हटकर उनके पास असंभव कार्य को भी करने में संभव करने वाले मोटीवेशनल वाक्य होते हैं। जो स्वयं जिस कार्य को नहीं कर सका, वह उसी कार्य के लिए दूसरे को प्रेरित करता हुआ, मिल जाएगा।

प्रेरित करने वाले व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है। घर के अन्दर और बाहर सभी जगह मोटीवेशनल स्पीकरों की बाढ़ आई हुई है। प्रेरित करना अपने आपमें अलग व्यवसाय बन चुका है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में स्वयं उल्लेखनीय काम नहीं कर सके, वे दूसरों को उसी क्षेत्र में प्रेरित करते हुए दिखाई देेते हैं। यह भी रोजगार का एक अच्छा खासा क्षेत्र विकसित हो रहा है।

मेरे एक मित्र हैं, श्री विजय जी मेरे साथ वाणिज्य के अध्येता रहे। विभिन्न प्रयासों के बाद जब वे कोई व्यवस्थित रोेजगार हासिल नहीं कर सके, तब उन्होंने एक कोचिंग सेन्टर खोला; वह भी प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए तैयारी कराने के लिए उदाहरणार्थ; सी.ए., आई.सी.डब्ल्यू.( At present CMA), सी.एस. आदि। मैं जब उनसे मिला तो मैंने प्रश्न उठाया, जो कोर्स आपने स्वयं नहीं किए उनकी तैयारी कैसे करायेंगे? उन्होंने कहा, ‘ऐसी कोई आवश्यक शर्त  नहीं कि जो हमने नहीं किया, उसकी तैयारी दूसरों को नहीं करा सकते। मजबूरी में एक बार मैंने भी कोचिंग सेन्टर चलाने का प्रयास किया था किन्तु मेरा प्रयास केवल उन कक्षाओं के लिए था, जिन्हें मैंने उत्तीर्ण किया था। ये दोनों प्रयास भले ही सफल नहीं हुए किन्तु हम लोगों को अच्छा अनुभव मिला। वर्तमान समय में कोचिंग सेन्टर लाखों लोगों को सफलता के अवसर दिखा कर सफलता के झण्डे गाड़ रहे हैं।

एक कहावत है, ‘चलती का नाम गाड़ी है। यह ही वास्तव में जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। एक गतिविधि में सफलता को अन्त में सफलता नहीं कहा जा सकता। कोई भी एक गतिविधि हमें सफलता की अनुभूति नहीं करा सकती। एक गतिविधि की सफलता दूसरी गतिविधि का रास्ता खोलती है। गतिविधियों की क्रमबद्ध श्रंखला प्रक्रिया कहलाती है। हमारा जीवन अपने आपमें प्रकृति की एक प्रक्रिया है। प्रक्रिया की पूर्णता पर ही उस विशिष्ट प्रक्रिया की सफलता या असफलता का आकलन किया जा सकता है।

वास्तविक बात यह है कि प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक कारण का एक परिणाम होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक कार्य के मूल में कोई न कोई कारण होता है। कारण कार्य संबन्ध अविवादित है। यह सभी क्षेत्रों में स्वीकार है।

कार्य कारण संबन्ध के आधार पर प्रत्येक कर्म कारण है और उसका परिणाम कार्य के रूप में सामने आता है। कारण कार्य संबन्ध के आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक कर्म का परिणाम मिलता है और उस परिणाम को सफलता कहा जाता है।

प्रत्येक क्रिया का परिणाम होता ही है। इस प्रकार कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। कहने का आशय यह है कि कर्म करने पर सफलता भी अनिवार्य है। कर्म की सफलता परिणाम में होती है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि तेरा कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। इसका आशय है कि फल देने का काम प्रकृति का है। प्रकृति के नियमानुसार फल मिलेग। अतः हमें कर्म पर ही फोकस करना है, फल पर नहीं। क्योंकि फल देना तो प्रकृति का कर्म है। उस पर ध्यान देकर हम अपने कर्तव्य से क्यों डिगें? अपने कर्तव्य पथ पर अविचल चहलते रहना भी सफलता है। इसके लिए निरंतरता आवश्यक है।

असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती। कर्म के परिणाम स्वरूप या तो सफलता  प्राप्त होती है या प्रभावहीन परिणाम के कारण अनुभव मिलता है। अनुभव अपने आपमें सफलता है। 

 

 

 


प्रकृति कर्म के अनुसार फल देती है। कर्म की प्रबलता व निरंतरता हमारे लिए फल की मात्रा और गुणवत्ता को निर्धारित करती है। कोई भी कर्म निष्फल नहीं रहता। परिणाम कर्म की प्रबलता के अनुसार ही मिलेगा। यदि हमारे कर्म में प्रबंलता नहीं है या हम अपने कर्म में निरंतरता नहीं रख पाए हैं। तदनुसार मिलने वाला परिणाम भी प्रभावित होगा। कर्म की प्रबलता में कमी और निरंतरता टूटने पर परिणाम में भी प्रभावशीलता और स्थायित्व की कमी देखी जाती है, जिसे लोग असफलता कहने लगते हैं। वास्तविकता यह है कि असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती। कर्म के परिणाम स्वरूप या तो सफलता  प्राप्त होती है या प्रभावहीन परिणाम के कारण अनुभव मिलता है। अनुभव अपने आपमें सफलता है।

असफलता कहे जाने वाले परिणाम यह इंगित करते हैं कि कर्म की प्रबलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। उसको और अधिक प्रयासों और निरंतरता की आवश्यकता है। सफलता के निरंतर काम करते रहने के लिए एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका उल्लेख अक्सर हमारे वृद्धजनों द्वारा किया जाता रहा है-

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निशान।।

          उनका कहना होता है कि प्रयास करने से सबकुछ हो सकता है। बहुत सारी कविताएँ, श्लोक, महापुरूषों के आप्त वचन उनके द्वारा सुनाए जाते हैं। उनके अनुसार प्रयास करने से तो पत्थर से भी दूध निकाला जा सकता है। अब जिसको उपदेश सुनने पड़ रहे हैं, उसको इतना साहस तो नहीं होता कि पूछ सकें, ‘आपने कितनी बार पत्थर से दूध निकाला है?

पत्थर से दूध निकालने की बात करना ही प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। प्रकृति कभी असफल नहीं होती। प्रकृति के नियमानुसार हमारे द्वारा की गई प्रत्येक गतिविधि भी अनिवार्यतः समानुपातिक परिणाम लेकर आती है। प्रकृति में असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती।

सफलता को प्राप्त करना नहीं, सफलता को समझना व स्वीकार करना अपने आपमें सफलता है।

 

 

 


जी हाँ! सफलता कोई मुश्किल या अप्राप्य वस्तु नहीं है। यह सभी को प्राप्त होती है। हम जीवन के कदम-कदम पर सफलता प्राप्त करते हैं। प्रति क्षण कुछ न कुछ करते हैं। उसका परिणाम योजना और अपेक्षा के अनुरूप प्राप्त होना ही तो सफलता है। सफलता इतनी बड़ी चीज नहीं है, जितनी बड़ी चीज इसको बना दिया जाता है। सफलता जीवन का आधार नहीं है बल्कि जीवन सफलता का आधार है। जीवन का लक्ष्य सफलता नहीं है, कर्म का लक्ष्य सफलता है। गीता के संदर्भ में बात करें तो कर्म अपने आपमें सफलता है। सफलता की अनुभूति के लिए परिणाम की आवश्यकता नहीं है। कर्म की पूर्णता ही सफलता है। सफलता को जीवन का लक्ष्य बना देने का परिणाम होता है कि लोग अपने जीवन को ही असफल मानकर आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठा लेते हैं। कई बार तो आत्महत्या में भी असफलता हाथ लगती है। जबकि जीना सरल है और जीने के लक्ष्य में हम हर क्षण सफल हो ही रहे हैं। स्वाभिमान पूर्वक जीने का हर क्षण अपने आपमें सफलता है।

            वास्तविकता यह नहीं है कि सफलता जीवन का लक्ष्य है। सामान्यतः प्रत्येक विद्यार्थी से यह पूछा जाता है कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है? प्रथम दृष्टया वह प्रश्न ही गलत है। जीवन और जीवन का लक्ष्य ही अपरिभाषित हैं। जीवन का लक्ष्य क्या है? इस प्रकार का भारी भरकम व गूढ़ प्रश्न को वह क्या जाने? लक्ष्य तो किसी गतिविधि का होता है। किसी कदम का होता है। किसी प्रयास का होता है। कारण के विश्लेषण के नहीं, कारण के कारण कार्य संपन्न होता है। हमें कहना यह चाहिए कि आपके इस प्रयास का लक्ष्य क्या है? आपके इस कदम का लक्ष्य क्या है? आपके इस प्रयास, कदम, गतिविधि का लक्ष्य क्या है? आप इस प्रकार के प्रयासों से क्या परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं?

 

 

सफलता निश्चित है| हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे।                             -स्वामी विवेकानन्द- 

 

 

 

 


असफलता नहीं, केवल सफलता-   

जी हाँ! असफलता प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। असफलता नाम की कोई वस्तु होती ही नहीं है। प्रकृति के नियम के अनुसार कारण होने पर कार्य अवश्य होता है। इसका कोई अपवाद नहीं होता। अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही इस बात को स्वीकार करते हैं। हमें या तो अपेक्षित परिणाम मिलता है या सीख मिलती है, जिसके आधार पर अपेक्षित परिणाम के लिए पुनः प्रयास किया जा सकता है। परिणाम को या तो हम सफलता के रूप में स्वीकार करें या आकड़ों के रूप में यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

एडिसन ने कहा- ‘मैं 1000 बार फेल नहीं हुआ। मैंने एक हजार तरीके खोजे जो अपेक्षित परिणाम नहीं देते।’                                 श्री कृष्ण ने ज्ञान के 1000 तरीके बताए। ज्ञान ही सफलता है। 

 

 

 


कोई भी कर्म असफल नहीं होता। यह केवल मोटीवेशनल वाक्य नहीं है। गीता और विज्ञान दोनों का सार है। हमें या तो सफलता मिलती है या अनुभव मिलता है। हम या तो जीतेंगे या सीखेंगे। प्रकृति फल निर्धारित नहीं करती। फल का निर्धारण हमारी गतिविधियों से होता है। इसी लिए कहा गया है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं है। हम अपने कर्म को निर्धारित कर सकते हैं किंतु उससे मिलने वाले फल को निर्धारित करने का काम हम नहीं कर सकते। यह अधिकार तो प्रकृति का है। प्रकृति असे स्वचालित रूप से करती है।

असफल या फेल होता ही नहीं है। यह शब्द अप्राकृतिक व असत्य है। वास्तविकता यह है कि असफल शब्द समाज द्वारा निर्मित लेबल है, जो व्यक्ति के ऊपर लगा दिया जाता है। समाज कहता है परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक नहीं मिले। असफल हो। समाज कहता है आईआईटी/नीट में चयन नहीं हुआ असफल हो। समाज कहता है नौकरी नहीं लगी। असफल हो। समाज कहता है तीस की उम्र तक शादी नहीं हुई। असफल हो। वास्तव में फेल होना स्वीकार करना परिणाम को अपनी पहचान बना लेना है। परिणाम तो आकड़ें हैं जो हमें अगली गतिविधि की योजना बनाने में मदद करते हैं। कोई भी परिणाम असफलता केवल उन लोगों के लिए है, जो यह मानते हैं कि उनका यह प्रयास जीवन का अन्तिम प्रयास था।

हमारा प्रत्येक प्रयास सुविचारित व सुनियोजित होना चाहिए। मानव विचारशाील प्राणी है। मस्तिष्क का कार्य विचार करना है। हमारा प्रत्येक कार्य मस्तिष्क के प्रयोग से प्रारंभ होना चाहिए। सामान्यतः ऐसा होता भी है, किंतु हम ऐसा अनजाने में करते हैं। मस्तिष्क का प्रयोग जानबूझकर सोच-विचारकर करने से ही सुविचारित विचार निकलकर आएगा। आकड़ों व तथ्यों का विश्लेषण करके, विकल्पों की खोज करके, विकल्पों का आकलन करके, सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करके, उस सर्वश्रेष्ठ विकल्प पर काम करके ही तो हम सुविचारित कार्य को संपन्न करने की और बढ़ सकते हैं। सुविचारित कार्य को संपन्न करना ही तो सफलता है। पूर्व-निर्धारित कार्य को पूर्व निर्धारित प्रक्रियानुसार  करते हुए अपेक्षित परिणामों तक पहुँचना ही तो सफलता है।

            सफलता न धन में हैं, न पद में है, न संबन्धों का सृजन करने में है और न ही यश में है। ये व्यक्ति को मजबूत नहीं कमजोर बनाते हैं। सफलता तो कर्म में है। हमारे द्वारा किए गए कर्म ही सफल होते हैं। हमारे द्वारा गिए गए कर्माे का परिणाम ही धन, पद, संबन्ध और यश के रूप में हमें प्राप्त होते हैं। कर्म और कर्म का फल दोनों मिलकर ही सफलता हैं।

            वास्तविकता यही है कि सफलता प्रति क्षण का सदुपयोग करने में है। सफलता जीवन को संपूर्णता से जीने में है और सफलता का मूल जीवन जीने की कला में है। आजीविका के साधन तो असंख्यों भरे पड़े हैं। हम केवल रोटी, कपड़ा और मकान से आगे धन, पद, संबन्ध और यश के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं किन्तु क्या इस सबमें भी हम वास्तविक संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर पाते हैं?

कर्म के बिना किसी भी प्रकार का फल नहीं हो सकता। किए गए कर्म का प्रकृति के नियमानुसार फल प्राप्त होना ही सफलता है। सफलता आसमान का तारा नहीं, सफलता हमारे द्वारा किए गए कर्मो का परिणाम है। किए गए कर्मो का परिणाम अवश्य ही प्राप्त होता है। हमें उसे समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता है। जो कर्मशील व्यक्ति सफलता को समझ कर उसे स्वीकार कर लेते हैं, वे उसका जश्न मनाकर दूसरी सफलता की ओर बढ़ जाते हैं। जो सफलता का समझने और स्वीकार करने में असफल रहते हैं, वे अपनी सफलता को असफलता मानकर दुखी होते हैं और समय बर्बाद कर दूसरी असफलता के लिए काम करते हैं।

कोई भी परिणाम असफलता केवल उन लोगों के लिए है, जो यह मानते हैं, कि उनका यह प्रयास जीवन का अन्तिम प्रयास था।

  


प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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