सोमवार, 20 अप्रैल 2020

पुरातन जीवन पद्धति का स्मरण कराता

                - कोरोना


                                                            -  अर्चना पाठक, होशंगाबाद 


                             
हमारे दादा-दादी के जमाने में हम जल्दी सोते थे और जल्दी ही उठा दिये जाते थे। उठने के बाद जल्दी ही नित्यकर्म से निपटने के लिए डाँट पड़ती थी। आश्चर्य इस बात का था कि हमने माँ को नहाकर स्नानागार से निकलते हुए कभी नहीं देखा। हाँ! बाथरूम तो उस जमाने में कम ही हुआ करते थे। सामान्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाओं की मजबूरी भी थी कि वे जल्दी उठकर प्रकाश होने से पूर्व ही अपनी नैत्यिक क्रियाओं से निपट लें। प्रकाश हो जाने के बाद वे कहाँ और कैसे जातीं?
          खुले में शौचादि के लिए जाते समय सामाजिक दूरी का पालन अपने आप ही हो जाया करता था। साफ-सफाई की आदत भी तो विरासत में ही विकसित हो जाती थी। प्रातःकाल जलाहार के बाद निवृत्त होने जाना। पूरी साफ-सफाई, लघुशंका और शौच के बाद ही नहीं बाहर से आने के बाद हाथ-मुँह धुलने की परंपरा को स्मरण करें। कई परिवारों में तो बाहर से आने के बाद स्नान की ही व्यवस्था थी। स्नान से पूर्व कुछ खाने को मिल जाय, यह दादा और दादी की नजरों में कैसे संभव था?
           भोजन से पूर्व हाथ-पैर धोकर भूमि पर आसन लगाकर बैठे बिना थाली कैसे मिल सकती थी? भोजन करते समय बोलना नहीं है। इस नियम का पालन भी काफी लोग करते थे। अन्न देवता का सेवन करना भी तो आराधना ही थी। एक ग्रास ले लेने मात्र से थाली झूठी मान ली जाती थी। दाँत से कटी हुई वस्तु किसी को न देना, भोजन के समय परिवार के एक सदस्य को परोसने के कार्य में ही लगना, उपवास के दौरान साफ-सफाई के ही नहीं पवित्रता के भी अतिरिक्त मानकों का पालन करने की मजबूरी आज सब परंपराएँ दकियानूसी कही जाने लगी हैं। इन्हें छोड़कर आज हम पाश्चात्य संस्कृति के नाम पर विकृत आदतों के शिकार होने लगे हैं क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति को भी उसके मूल रूप में तो हम अपना नहीं सकते। उसका केवल बाहरी दिखावा भर हमें आकर्षित करता है। उस विकृत पाश्चात्य संस्कृति के दुष्परिणामों को आज हम कोरोना वायरस के प्रभाव में महसूस कर पा रहे हैं।
           कोरोना वायरस फैलने से हमें जो बार-बार साबुन से हाथ धोने की हिदायतें दी जा रही हैं। वे पहले से ही हमारी जीवन शैली का भाग थीं। कोरोना वायरस के कारण हमें घर में मिली कैद कुछ सभ्य ढंग से कहें तो एकान्तवास ने हमें आत्मचिंतन का अवसर देकर भूले विसरे पन्नों को हमारे सामने रख दिया है। इन पन्नों से ये अहसास हुआ है कि हमने कहाँ गलती कर दी! क्या हम अपने पूर्वजों की अपेक्षा अधिक शिक्षित हो गये हैं। हमारे पास डिग्रियाँ भले ही कुछ अधिक हों किंतु एक छोटे से वायरस ने हमें यह अहसास करा दिया है कि प्राचीन साफ-सफाई और पवित्रता की जीवन शैली ही उचित थी। हम विज्ञान के विकास के नाम पर कितना भी भौतिक विकास कर लिए हों किंतु विश्व में विकसित देशों में गिना जाने वाला अमेरिका अपने नागरिकों की जान की रक्षा नहीं कर पा रहा है। हम लोगों में अभी भी अपने पूर्वजों का प्रभाव है जिसके कारण कुछ लोगों के द्वारा मूर्खतापूर्ण ढंग से स्वयं और समाज की जान जोखिम में डालने के बावजूद हमाने यहाँ कोरोना वायरस अभी भी सीमित है। हाँ! कब तक सीमित रहेगा? यह कहना मुश्किल है क्योंकि हमारा दुर्भाग्य है कि कुछ तथाकथित धर्मांध लोग इस वायरस के प्रसार को भी हिंदू-मूस्लिम के चश्मे से देखने का प्रयत्न कर रहे हैं।
           जबकि वास्तविकता यह है कि हमें कोरोना नाम के इस वायरस से डरने की बिल्कुल की आवश्यकता नहीं है। हम अपनी प्राचीन जीवन शैली की साफ-सफाई की आदतों को पुनः अपनाकर पवित्रता की अपनी धारणा को पुनः आत्मसात करके न केवल इस पर नियंत्रण कर सकते हैं वरन अपनी स्वस्थ्य आदतो के बल पर हमारी प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करके इस कोरोना वायरस को मात देने की क्षमता विकसित कर सकते हैं। अतः आओ हम अपनी प्राचीन जीवन शैली के पन्नों को पुनः निकालकर अपनी जीवन शैली में शामिल करें।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

समय की एजेंसी-30

7. अपने आप पर विजयः योजना बनाकर कार्य करने से हम कार्य करने में होने वाले भटकाव से बच जाते हैं। कार्य प्रबंधन के द्वारा योजनाबद्ध कार्य करने से हमारा कार्य के ऊपर नियंत्रण रहता है। अपने समय पर अर्थात् अपने आप पर नियंत्रण रहता है। अपने उपलब्ध समय के पल-पल का उपयोग करते हुए हम अपने आप का पूरा उपयोग करते हैं। एक प्रकार से हम अपने आपको जीत लेते हैं। महात्मा बुद्ध के अनुसार, ’‘जिसने खुद को जीत लिया, उसने जग को जीत लिया।’’ इस प्रकार कार्य प्रबंधन तकनीकों की सहायता से हम अपने आप पर विजय प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते हैं।
8. योजना का सफल क्रियान्वयनः कार्य प्रबंधन केवल समय के संदर्भ में कार्यों की योजना बनाना ही नहीं सिखाता, वरन् उपलब्ध समय की प्रत्येक इकाई का सदुपयोग करके योजना का सफल क्रियान्वयन भी प्रबंधन की तकनीकों के आधार पर ही संभव होता है। नियोजन में कोरी कल्पनाएँ नहीं होतीं, उनके क्रियान्वयन का पूरा खाका होता है। नियोजन के अन्तर्गत ही आवश्यक संगठन, कर्मचारीकरण या सहयोगीकरण, निर्देशन व नियंत्रण की योजना भी बनाई जाती है। इस रोडमैप पर कार्य करके सफलता व्यक्ति की प्रतीक्षा ही कर रही होती है। इस प्रकार व्यक्ति कार्य प्रबंधन के साथ न केवल योजना बनाता है वरन् उसका सफल क्रियान्वयन भी करता है।
9. आवश्यकतानुसार तुरंत फैसलेः समय के सन्दर्भ में अपने कार्यों का प्रबंधन करते समय हम स्पष्टता के साथ फैसले करते हैं। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, ‘आपके फैसले आपके भविष्य के परिचायक हैं।’ प्रबंधन की नियोजन तकनीक के अन्तर्गत हम अपने कार्यों के बारे में पूर्व से ही निर्धारित कर लेते हैं। क्रियान्वयन के समय देरी होने की संभावना समाप्त हो जाती है। हमारी गतिविधियों के योजनाबद्ध हो जाने पर हम तत्काल निर्णय करने में सक्षम होते हैं। अपने समय का प्रभावी प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए तुरंत फैसले आवश्यक होते हैं। फैसले लेने में देरी कार्यों को अटकाती है और समय की बर्बादी का कारण बनती है। कहावत भी है, ’‘दाता से सूम भलो जो तुरत ही देत जबाब।’’ समय के संदर्भ में कार्य प्रबंधन नियोजन की सहायता से तुरंत फैसले लेने में सहायता करता है।
10. हड़बड़ी और उतावलेपन से बचाव: कहावत है, ‘जल्दी का काम शैतान का’ अर्थात् जल्दबाजी या उतावलेपन या हड़बड़ी में किए गये निर्णयों के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। कार्यों में गुणवत्ता का स्तर सही नहीं रह पाता। हड़बड़ी में किए गए कार्यों में अक्सर गलतियाँ होने की संभावनाएं अधिक होती हैं। जब हम समय के सन्दर्भ में अपने कार्यों या गतिविधियों का नियोजन कर रहे होते हैं, तब नियोजन के कारण समय की कोई समस्या ही नहीं रहती। नियोजन प्रक्रिया के अन्तर्गत भली प्रकार से कार्य और उसके अंगो पर विचार कर समय का निर्धारण किया जाता है। इसके लिए समय अध्ययन व गति अध्ययन जैसी तकनीकों का प्रयोग भी आवश्यकतानुसार किया जाता है। अतः कार्य प्रबंधन को अपनाने के बाद हड़बड़ी, उतावलेपन या जल्दबाजी का प्रश्न ही नहीं उठता और कार्य की गुणवत्ता भी श्रेष्ठ रहती है।

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

"अध्यापक बने-जग गढ़ें"-16

व्यवसाय- व्यवसाय का अग्रेजी शब्द ^Businessहै जिसका अर्थ व्यस्त रहने से लिया जाता है। इस प्रकार उदार अर्थ लेने से आजीविका और व्यवसाय में कोई अन्तर नहीं रह जाता, किन्तु वास्तव में व्यवसाय का अर्थ उन आर्थिक गतिविधियों से लिया जाता है, जिनके अन्तर्गत वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन करके या उनका क्रय-विक्रय करके आजीविका कमाई जाती है। व्यवसाय किसी भी देश के आर्थिक विकास का आधार होता है। अरबों रूपये लगाकर बड़़े-बड़े उद्योग स्थापित करने वाले उद्योगपति भी व्यवसायी हैं और गली-गली घूम-घूम कर छोटी मोटी वस्तुएं बेचने वाले भी व्यवसायी हैं। व्यवसाय और व्यापार में अंतर है। सामान्य व्यक्ति व्यवसाय और व्यापार को समानार्थी समझ लेते हैं किंतु दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। व्यवसाय एक व्यापक शब्द है। व्यापार खरीदने और बेचने की क्रियाओं तक सीमित होता है। प्रत्येक व्यापार व्यवसाय भी है किंतु प्रत्येक व्यवसाय व्यापार नहीं होता।
व्यवसाय के अन्तर्गत उद्योग और व्यापार दोनों को ही सम्मिलित किया जाता है। इनका विस्तृत अध्ययन इस पुस्तक में अपेक्षित नहीं है। संक्षेप में यह समझ लेना ही पर्याप्त होगा कि वस्तुओं का उत्पादन उद्योग के अन्तर्गत आता है, तो उन वस्तुओं के क्रय-विक्रय के द्वारा लाभ कमाना व्यापार कहलाता है। 

समय की एजेंसी-29

3. मनोबल में वृद्धिः किसी भी कार्य के लिए केवल समय और संसाधनों की ही आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् कितने भी संसाधनों के उपलब्ध होते हुए भी व्यक्ति कार्य का प्रारंभ भी नहीं कर पाता, यदि उसका मनोबल निम्न स्तर पर है। वह सोच ही नहीं पाता कि वह उस कार्य को कर भी पायेगा। मनोबल के अभाव में व्यक्ति अपने समय और अन्य संसाधनों को बर्बाद करता रहता है। प्रबंधन की तकनीक व्यक्ति को यह विश्वास दिलाकर कि वह अमुक कार्य को प्रभावशीलता के साथ पूर्ण करने में सक्षम है। उसके मनोबल में वृद्धि करती है। मनोबल ही वह तत्व है, जो व्यक्ति से गुणवत्तापूर्ण कार्य संपन्न करवाता है। वास्तव में व्यक्ति नहीं उसका मनोबल ही कार्य करता है और मनोबल में वृद्धि के लिए प्रबंधन एक सहज तकनीक है।
4. स्व-अभिप्रेरणः प्रेरणा और अभिप्रेरणा की चर्चा मनोविज्ञान के क्षेत्र में सामान्यतः की जाती रही है। प्रेरणा की चर्चा इतनी होती है कि जन सामान्य इसे किसी विषय विशेष से जोड़कर नहीं देखता। प्रेरणा को एक बाहरी तत्व माना जाता है, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए मजबूर करती है। एक प्रकार से यह एक बाहरी लालच है जिसके लिए व्यक्ति कार्य करने के लिए मजबूर होता है। सामान्य व्यक्ति से कार्य करवाने के लिए उसे कोई वस्तु या सुविधा प्रदान करने का आश्वासन दिया जाता है। बाहरी प्रेरणा से कार्य तो होता है किंतु समय और कार्य दोनों की ही गुणवत्ता उच्च स्तर की नहीं होती अर्थात् कार्य भी निम्न श्रेणी का होता है और समय भी अधिक लगता है। अभिप्रेरणा एक आन्तरिक तत्व है, जो व्यक्ति के अन्दर ही होता है और उसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय की गुणवत्ता में भी वृद्धि होती है और कार्य भी गुणवत्ता के साथ संपन्न होता है। व्यक्ति स्व-अभिप्रेरित होने की स्थिति में कार्य प्रबंधन की तकनीकों के माध्यम से ही पहुँचता है।
5. तनाव रहित जीवनः व्यक्ति कार्य प्रबंधन तकनीकों के माध्यम से न्यूनतम समय में अधिकतम गुणवत्तापूर्ण कार्य करके अपने जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। यही नहीं वह उपलब्ध समय की प्रत्येक इकाई का उचित नियोजन के साथ सदुपयोग करता है। अतः उसके जीवन में उतावलापन, हड़बड़ी व भाग-दौड़ नहीं रहती। इस प्रकार वह तनावों से भी कोसों दूर रहकर तनावरहित जीवन जी सकता है। तनावरहित, सफल व प्रभावी जीवन जीने से अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के लिए क्या हो सकता है? यह तनाव रहित जीवन केवल कार्य प्रबंधन के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
6. सुविचारित योजनाः प्रबंधन का प्रारंभ ही नियोजन अर्थात् योजना निमार्ण से होता है। प्रबंधन की पाँच प्रमुख तकनीकें हैं- नियोजन, संगठन, कर्मचारीकरण या सहयोगीकरण, निर्देशन व नियंत्रण। इनमें से नियोजन से ही प्रबंधन का प्रारंभ होता है। जब हम समय के सन्दर्भ में कार्यों या अपनी गतिविधियों का प्रबंधन करते हैं तो प्रारंभ सुविचारित योजना से ही होता है। सुविचारित योजना के कारण समय की बर्बादी रुकती है और हमारे पास उपलब्ध समय की प्रत्येक इकाई का सदुपयोग होता है। कार्यों को सुविचारित योजना के अनुरूप समयबद्ध तरीके से करने के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता है।

रविवार, 12 अप्रैल 2020

"अध्यापक बनें-जग गढ़ें"-15

कैरियर के क्षेत्र-

   प्रत्येक देश व समाज में आजीविका के विभिन्न अवसर उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक देश में संसाधनों की उपलब्धता और उनकी प्रयोगशीलता और देश के कौशल विकास के आधार पर विभिन्न कार्य उपलब्ध होते हैं। व्यक्तियों के लिए उपलब्ध कार्यो की अन्तिम सूची बनाना लगभग असंभव है। हाँ! विभिन्न प्रकार के कार्यो को व्यवस्थित रूप से निम्न प्रकार वर्गीकृत अवश्य किया जा सकता है-


               


उपरोेक्त चार्ट में दिखाये गये आजीविका के क्षेत्रों पर संक्षिप्त में नजर डाल लेना उपयोगी रहेगा। आजीविका के प्रत्येक क्षेत्र में विशेष व्यक्तियों और संसाधनों की आवश्यकता होती है। अभिरूचि, अभिक्षमता, योग्यता, कुशलता और संसाधनों का आकलन करके चुनाव करने से सफलता की संभावना प्रबल होती है। आइये हम एक-एक कर विचार करें-

आजीविका, रोजगार या वृत्ति- अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अर्थाजन करना ही होता है। मूलभूत आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान के बिना जीवन जीना ही संभव नहीं है। इनकी पूर्ति के लिए संतोषी से संतोषी व्यक्ति को भी कुछ न कुछ मात्रा में धन की आवश्यकता पड़ती ही है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया गया प्रत्येक कार्य आजीविका के अन्तर्गत आता है, भले ही वह अरबों रूपये के विनियोग के साथ स्थापित किये गये बड़े-बड़े उद्योग हों या फिर अपना पेट भरने के लिए की गई मजदूरी, कुलीगीरी या रिक्शा चलाना। प्रत्येक कार्य आजीविका के अन्तर्गत आ जाता है। इस प्रकार आजीविका, रोजगार या वृत्ति अत्यन्त वृहद शब्द है जिसके अन्तर्गत समस्त आर्थिक क्रियाएं आ जाती हैं।

समय की एजेंसी-28

कार्य प्रबंधन किस प्रकार एक सामान्य जन को एक सफल व्यक्तित्व में परिणत कर देता है या महापुरूष बना देता है? आओ इस पर विचार करें। प्रबंधन संसार का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी संसाधन है। प्रबंधन एकमात्र ऐसा तत्व है जो सभी संसाधनों का श्रेष्ठतम उपयोग सुनिश्चित करता है। समय का उपयोग कार्य प्रबंधन के साथ करने से समय का गुणवत्तापूर्ण उपयोग संभव होता है। कार्य प्रबंधन के द्वारा   जीवन का सदुपयोग करते हुए जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। आइए विचार करें! कार्य प्रबंधन किस प्रकार किया जा सकता है? और कार्य प्रबंधन क्यों आवश्यक है-
1. समय की प्रत्येक इकाई का प्रयोगः व्यक्ति के पास सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन समय है। समय ही एक ऐसा संसाधन है जिसका उत्पादन संभव नहीं है। समय का संरक्षण भी संभव नहीं है। समय ही जीवन है। समय के बर्बाद होने का मतलब जीवन का बर्बाद होना होता है। अतः समय बर्बाद करना किसी भी विचारवान व्यक्ति के लिए उचित नहीं रहेगा। जीवन का संपूर्णता के साथ सदुपयोग करने का मतलब अपने पास उपलब्ध समय की प्रत्येक इकाई का सदुपयोग करना है। यह कार्य समय के सन्दर्भ में अपने कार्यों का प्रबंधन करके ही किया जा सकता है। सामान्य अर्थ में इसी कार्य प्रबंधन को सामान्यतः कार्य प्रबंधन कहा जाता रहा है। अतः जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता है। 
2. समय की उत्पादकता में वृद्धिः सभी के पास समय की सभी इकाइयों में बराबर समय होता है। एक वर्ष का आशय 365 आपवादिक रूप से 366 दिन से होता है। एक वर्ष में सभी के लिए 12 माह ही होते हैं। सभी के माह में 30 या 31 दिन ही होते हैं। आपवादिक रूप से फरवरी माह में 28 या 29 दिन भी हो जाते हैं किंतु होते सभी के लिए समान हैं। एक दिन में सभी के पास 24 घण्टे ही उपलब्ध रहते हैं। विश्व का धनी से धनी व्यक्ति भी अपने पास उपलब्ध समय में वृद्धि नहीं कर सकता। कोई भी व्यक्ति कितना भी धन व्यय करके अपने समय में इजाफ़ा नहीं कर सकता। संसार में किसी भी व्यक्ति के पास समय की एजेंसी नहीं है, जो दूसरे व्यक्तियों को समय की बिक्री करके उनके समय अर्थात् जीवन में वृद्धि कर सके। प्रत्येक व्यक्ति के पास केवल अपने लिए समय की एजेंसी है। वह केवल अपने समय का गुणवत्ता पूर्ण उपयोग कर अपने जीवन को महत्त्वपूर्ण बना सकता है।
               कार्य की गुणवत्ता में वृद्धि की बात तो अक्सर की ही जाती है। हमने समय की गुणवत्ता में वृद्धि की बात की है। समय की गुणवत्ता और कार्य की गुणवत्ता में बहुत ही महीन अंतर है। कई बार तो यह समान ही प्रतीत होते हैं। किए जाने वाले कार्य को उच्च गुणवत्ता के साथ संपन्न करके हम अपनी प्रभावशीलता में वृद्धि कर सकते हैं। हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता हमारे जीवन को भी प्रभावशाली बनाकर गुणवत्तापूर्ण बनाती है। हम ऐसे अनेक महापुरूषों को जानते हैं, जिन्होंने अपने गुणवत्तापूर्ण व प्रभावी कार्यों के द्वारा अपने लघु जीवन में ही बहुत बड़े-बड़े और प्रभावशाली कार्य किये। स्वामी विवेकानन्द अपने 39 वर्षों के जीवन काल में ही सैकड़ों वर्षाें का मार्गदर्शन प्रदान कर गये। हमारे आविष्कारक, वैज्ञानिक, तत्त्ववेत्ता जिन्होंने समाज के स्तर व चिंतन को ही बदलने में सफलता हासिल की, ने अपने लघु जीवन को गुणवत्तापूर्ण कार्यों में लगाया और अमर हो गये। ये सभी अपने समय का प्रयोग प्रबंधन के साथ करके ही उन उपलब्धियों को हासिल कर पाये।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

"अध्यापक बनें-जग गढ़ें"-14

आजीविका का चुनाव


जिस प्रकार जीना और जीवनयापन के लिए कोई न कोई आजीविका को अपनाना व्यक्ति की मजबूरी होती है, उस प्रकार की मजबूरी कौन सी आजीविका अपनानी है? इसमें नहीं होती। व्यक्ति को जन्म लेने का चुनाव करने का अधिकार नहीं है। व्यक्ति को जन्म दाता माता-पिता, परिवार या समाज का चुनाव करने का भी अधिकार भी नहीं है। किन्तु सबसे अच्छी बात है कि यह है कि वह आजीविका अपनाये या न अपनाये इसका विकल्प तो नहीं होता किन्तु कौन सी आजीविका अपनाये? इसका चुनाव करने का विकल्प उसके पास अवश्य होता है। 
             आजीविका का चयन करने का अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास का अवसर भी प्रदान करता है। आजीविका का चयन व उसमें सफलता का स्तर व्यक्ति की प्रतिष्ठा का निर्धारक होता है। श्री मोहन राकेश  ने अपने नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ में लिखा है, ‘योग्यता एक चैथाई व्यक्तित्व का निर्माण करती है, शेष की पूर्ति प्रतिष्ठा द्वारा होती है।’ व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी आजीविका और उसमें सफलता के स्तर पर आधारित होती है। इस प्रकार व्यक्ति की योग्यता के साथ ही उसके व्यक्तित्व के निर्माण में उसकी आजीविका का महत्वपूर्ण योगदान होता है अर्थात् व्यक्ति आजीविका चुनाव करते समय केवल आजीविका का चुनाव ही नहीं कर रहा होता। अपनी प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व का भी चुनाव कर रहा होता है। अतः आजीविका या कैरियर का चुनाव करना व्यक्ति के कठिन व जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक होता है।
         निश्चित रूप से जीविका का चुनाव हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। निसन्देह हमें जीविका का चुनाव करने का अधिकार प्राप्त होता है। यद्यपि कुछ सामाजिक परंपरायें या कानूनी पहलू इसे विनियमित कर सकते हैं। हम जो चाहे वह काम नहीं कर सकते। प्रत्येक कार्य के लिए कुछ पूर्वापेक्षा होती हैं। हम अपनी योग्यता के अनुसार ही अपनी आजीविका या कैरियर का चुनाव कर सकते हैं। यहाँ पर एक और पहलू है कि किसी भी कार्य के लिए कुछ विशिष्ट योग्यताओं की आवश्यकता पड़ती है। 
हमारे सामने दो विकल्प हो सकते हैं कि या तो हम अपनी योग्यता के अनुसार अपने कैरियर का चुनाव करें या कैरियर का चुनाव करने के बाद हम उसके अनुरूप योग्यता और सक्षमता अर्जित करें। यह ठीक उसी प्रकार है कि हम जिसे प्यार करते हैं, उससे शादी करें या जिससे शादी की है उससे प्यार करने लगें। हाँ! प्यार के बिना शादी की सफलता की अधिक संभावना नहीं होती। उसी प्रकार वांछित योग्यता, सक्षमता के बिना हमें किसी कैरियर में सफलता नहीं मिल सकती। किसी भी कार्य को करने के लिए उसमें कुशलता होना आवश्यक है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि या तो हम अपनी कुशलता के अनुरूप कार्य का चुनाव करें या कार्य के अनुरूप योग्यता और सक्षमता विकसित करें। किसी भी सामाजिक व्यवस्था की सफलता भी इसी पर निर्भर करती है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की कुशलता, योग्यता और अभिरूचि के अनुसार कार्य और प्रत्येक कार्य को वांछित अभिरूचि, योग्यता और कुशलता वाला व्यक्ति उपलब्ध करा सके। कार्य और व्यक्ति के समायोजन की कमी के कारण ही बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी का जन्म होता है, जो वर्तमान समय की बहुत बड़ी सामाजिक समस्या बनी हुई है। 
बेरोजगारी की समस्या न केवल व्यक्ति के जीवन को समस्या से ढक देती है, वरन् सम्पूर्ण व्यवस्था को ही समस्याओं का पिटारा बना देती है। इसके कारण वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में बाधाएं तो आती ही है, साथ ही विभिन्न प्रकार के अपराधों का आधार भी निर्मित होता है। अतः किसी भी देश के विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा के साथ साथ व्यक्ति और कार्य में समन्वय पर भी पर्याप्त ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।