कदम-कदम पर सफलता
डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
सफलता इस संसार सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द
है। सभी जगह, सभी के मुँह से सफलता को लेकर चर्चा
सुनी जा सकती है। जो काम कर रहा है, उसके लिए तो सफलता की बात करना समझ आता है, किंतु जो कुछ भी काम नहीं कर रहा, उसके द्वारा भी सफलता की कामना और
कल्पना की जाती हैं। अधिकांश व्यक्ति सफलता के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं। बच्चे
के जन्म से लेकर उसके किशोर, युवा, वृद्ध होते हुए मृत्यु तक माता-पिता और
अभिभावक ही नहीं, आस-पास के पड़ोसी भी पीछे पड़े रहते हैं
कि तुझे सफल ही होना है। हाँ, सफलता
वास्तव में है क्या? इसके बारे में कोई भी नहीं जानता।
व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राजनीतिक जीवन ही नहीं आध्यात्मिक जीवन
में भी सफलता की ही चर्चा की जाती है। ईमानदारी की चर्चा करते समय या बेईमानी की
चर्चा करते समय सभी संदर्भ में सफलता अवश्य ही संदर्भित होती है। विद्यार्थी, अध्यापक, व्यवसायी, पेशेवर यहाँ तक कि चोर और तस्कर भी सफल
ही होना चाहते हैं। कुछ लोगों के लिए सत्कर्म सफलता के आधार होते हैं तो कुछ के
लिए दुष्कर्म सफलता का आधार होते हैं। कुछ लोग तो निष्क्रिय रहकर ही सफलता की
कामना करते हैं।
सफलता
के मानक भी सभी के अपने-अपने होते हैं। उनके मानकों को लिखित में लेकर तुलनात्मक
विवरण बनाया जाय तो सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। इस सफलता के शोर में व्यक्ति
की अपनी इच्छा, आकांक्षा, चाहत, योग्यता, सक्षमता, साधनसंपन्नता का शायद ही किसी के द्वारा विचार किया जाता हो। इन सबसे
हटकर उनके पास असंभव कार्य को भी करने में संभव करने वाले मोटीवेशनल वाक्य होते
हैं। जो स्वयं जिस कार्य को नहीं कर सका, वह उसी कार्य के लिए दूसरे को प्रेरित करता हुआ, मिल जाएगा।
प्रेरित
करने वाले व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है। घर के अन्दर और बाहर सभी जगह मोटीवेशनल
स्पीकरों की बाढ़ आई हुई है। प्रेरित करना अपने आपमें अलग व्यवसाय बन चुका है। जो व्यक्ति
जिस क्षेत्र में स्वयं उल्लेखनीय काम नहीं कर सके, वे दूसरों को उसी क्षेत्र में प्रेरित करते हुए दिखाई देेते हैं। यह
भी रोजगार का एक अच्छा खासा क्षेत्र विकसित हो रहा है।
मेरे
एक मित्र हैं, श्री विजय जी मेरे साथ वाणिज्य के
अध्येता रहे। विभिन्न प्रयासों के बाद जब वे कोई व्यवस्थित रोेजगार हासिल नहीं कर
सके, तब उन्होंने एक कोचिंग सेन्टर खोला; वह भी प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए तैयारी
कराने के लिए उदाहरणार्थ;
सी.ए., आई.सी.डब्ल्यू.(
At present CMA), सी.एस. आदि। मैं जब उनसे मिला तो मैंने
प्रश्न उठाया, जो कोर्स आपने स्वयं नहीं किए उनकी
तैयारी कैसे करायेंगे? उन्होंने कहा, ‘ऐसी कोई आवश्यक शर्त नहीं कि जो हमने नहीं किया, उसकी तैयारी दूसरों को नहीं करा सकते।
मजबूरी में एक बार मैंने भी कोचिंग सेन्टर चलाने का प्रयास किया था किन्तु मेरा
प्रयास केवल उन कक्षाओं के लिए था, जिन्हें मैंने उत्तीर्ण किया था। ये दोनों प्रयास भले ही सफल नहीं
हुए किन्तु हम लोगों को अच्छा अनुभव मिला। वर्तमान समय में कोचिंग सेन्टर लाखों
लोगों को सफलता के अवसर दिखा कर सफलता के झण्डे गाड़ रहे हैं।
एक
कहावत है, ‘चलती का नाम गाड़ी है’। यह ही वास्तव में जीवन के लिए
महत्वपूर्ण है। एक गतिविधि में सफलता को अन्त में सफलता नहीं कहा जा सकता। कोई भी
एक गतिविधि हमें सफलता की अनुभूति नहीं करा सकती। एक गतिविधि की सफलता दूसरी
गतिविधि का रास्ता खोलती है। गतिविधियों की क्रमबद्ध श्रंखला प्रक्रिया कहलाती है।
हमारा जीवन अपने आपमें प्रकृति की एक प्रक्रिया है। प्रक्रिया की पूर्णता पर ही उस
विशिष्ट प्रक्रिया की सफलता या असफलता का आकलन किया जा सकता है।
वास्तविक
बात यह है कि प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक कारण का एक परिणाम होता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक कार्य के मूल में कोई न कोई कारण होता है। कारण
कार्य संबन्ध अविवादित है। यह सभी क्षेत्रों में स्वीकार है।
कार्य
कारण संबन्ध के आधार पर प्रत्येक कर्म कारण है और उसका परिणाम कार्य के रूप में
सामने आता है। कारण कार्य संबन्ध के आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक
कर्म का परिणाम मिलता है और उस परिणाम को सफलता कहा जाता है।
प्रत्येक
क्रिया का परिणाम होता ही है। इस प्रकार कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। कहने का
आशय यह है कि कर्म करने पर सफलता भी अनिवार्य है। कर्म की सफलता परिणाम में होती
है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि तेरा कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। इसका आशय है कि फल देने का
काम प्रकृति का है। प्रकृति के नियमानुसार फल मिलेग। अतः हमें कर्म पर ही फोकस
करना है, फल पर नहीं। क्योंकि फल देना तो
प्रकृति का कर्म है। उस पर ध्यान देकर हम अपने कर्तव्य से क्यों डिगें? अपने कर्तव्य पथ पर अविचल चहलते रहना
भी सफलता है। इसके लिए निरंतरता आवश्यक है।
प्रकृति कर्म के अनुसार फल देती है।
कर्म की प्रबलता व निरंतरता हमारे लिए फल की मात्रा और गुणवत्ता को निर्धारित करती
है। कोई भी कर्म निष्फल नहीं रहता। परिणाम कर्म की प्रबलता के अनुसार ही मिलेगा।
यदि हमारे कर्म में प्रबंलता नहीं है या हम अपने कर्म में निरंतरता नहीं रख पाए हैं।
तदनुसार मिलने वाला परिणाम भी प्रभावित होगा। कर्म की प्रबलता में कमी और निरंतरता
टूटने पर परिणाम में भी प्रभावशीलता और स्थायित्व की कमी देखी जाती है, जिसे लोग असफलता कहने लगते हैं।
वास्तविकता यह है कि असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती। कर्म के परिणाम स्वरूप या
तो सफलता प्राप्त होती है या प्रभावहीन
परिणाम के कारण अनुभव मिलता है। अनुभव अपने आपमें सफलता है।
असफलता
कहे जाने वाले परिणाम यह इंगित करते हैं कि कर्म की प्रबलता को बढ़ाने की आवश्यकता
है। उसको और अधिक प्रयासों और निरंतरता की आवश्यकता है। सफलता के निरंतर काम करते
रहने के लिए एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका
उल्लेख अक्सर हमारे वृद्धजनों द्वारा किया जाता रहा है-
करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निशान।।
उनका कहना होता है कि प्रयास करने से
सबकुछ हो सकता है। बहुत सारी कविताएँ, श्लोक, महापुरूषों के आप्त वचन उनके द्वारा
सुनाए जाते हैं। उनके अनुसार प्रयास करने से तो पत्थर से भी दूध निकाला जा सकता
है। अब जिसको उपदेश सुनने पड़ रहे हैं, उसको इतना साहस तो नहीं होता कि पूछ सकें, ‘आपने कितनी बार पत्थर से दूध निकाला है?
पत्थर से दूध निकालने की बात करना ही
प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। प्रकृति कभी असफल नहीं होती। प्रकृति के
नियमानुसार हमारे द्वारा की गई प्रत्येक गतिविधि भी अनिवार्यतः समानुपातिक परिणाम
लेकर आती है। प्रकृति में असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती।
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जी हाँ! सफलता कोई मुश्किल या अप्राप्य
वस्तु नहीं है। यह सभी को प्राप्त होती है। हम जीवन के कदम-कदम पर सफलता प्राप्त
करते हैं। प्रति क्षण कुछ न कुछ करते हैं। उसका परिणाम योजना और अपेक्षा के अनुरूप
प्राप्त होना ही तो सफलता है। सफलता इतनी बड़ी चीज नहीं है, जितनी बड़ी चीज इसको बना दिया जाता है।
सफलता जीवन का आधार नहीं है बल्कि जीवन सफलता का आधार है। जीवन का लक्ष्य सफलता
नहीं है, कर्म का लक्ष्य सफलता है। गीता के
संदर्भ में बात करें तो कर्म अपने आपमें सफलता है। सफलता की अनुभूति के लिए परिणाम
की आवश्यकता नहीं है। कर्म की पूर्णता ही सफलता है। सफलता को जीवन का लक्ष्य बना
देने का परिणाम होता है कि लोग अपने जीवन को ही असफल मानकर आत्महत्या जैसे खतरनाक
कदम उठा लेते हैं। कई बार तो आत्महत्या में भी असफलता हाथ लगती है। जबकि जीना सरल
है और जीने के लक्ष्य में हम हर क्षण सफल हो ही रहे हैं। स्वाभिमान पूर्वक जीने का
हर क्षण अपने आपमें सफलता है।
वास्तविकता यह नहीं है कि सफलता जीवन
का लक्ष्य है। सामान्यतः प्रत्येक विद्यार्थी से यह पूछा जाता है कि आपके जीवन का
लक्ष्य क्या है? प्रथम दृष्टया वह प्रश्न ही गलत है।
जीवन और जीवन का लक्ष्य ही अपरिभाषित हैं। जीवन का लक्ष्य क्या है? इस प्रकार का भारी भरकम व गूढ़ प्रश्न
को वह क्या जाने? लक्ष्य तो किसी गतिविधि का होता है।
किसी कदम का होता है। किसी प्रयास का होता है। कारण के विश्लेषण के नहीं, कारण के कारण कार्य संपन्न होता है।
हमें कहना यह चाहिए कि आपके इस प्रयास का लक्ष्य क्या है? आपके इस कदम का लक्ष्य क्या है? आपके इस प्रयास, कदम, गतिविधि का लक्ष्य क्या है? आप इस प्रकार के प्रयासों से क्या परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं?
असफलता नहीं, केवल सफलता-
जी हाँ! असफलता प्रकृति के नियम के
विरुद्ध है। असफलता नाम की कोई वस्तु होती ही नहीं है। प्रकृति के नियम के अनुसार
कारण होने पर कार्य अवश्य होता है। इसका कोई अपवाद नहीं होता। अध्यात्म और विज्ञान
दोनों ही इस बात को स्वीकार करते हैं। हमें या तो अपेक्षित परिणाम मिलता है या सीख
मिलती है, जिसके आधार पर अपेक्षित परिणाम के लिए
पुनः प्रयास किया जा सकता है। परिणाम को या तो हम सफलता के रूप में स्वीकार करें
या आकड़ों के रूप में यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
कोई
भी कर्म असफल नहीं होता। यह केवल मोटीवेशनल वाक्य नहीं है। गीता और विज्ञान दोनों
का सार है। हमें या तो सफलता मिलती है या अनुभव मिलता है। हम या तो जीतेंगे या
सीखेंगे। प्रकृति फल निर्धारित नहीं करती। फल का निर्धारण हमारी गतिविधियों से
होता है। इसी लिए कहा गया है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं है। हम अपने कर्म को
निर्धारित कर सकते हैं किंतु उससे मिलने वाले फल को निर्धारित करने का काम हम नहीं
कर सकते। यह अधिकार तो प्रकृति का है। प्रकृति असे स्वचालित रूप से करती है।
असफल
या फेल होता ही नहीं है। यह शब्द अप्राकृतिक व असत्य है। वास्तविकता यह है कि असफल
शब्द समाज द्वारा निर्मित लेबल है, जो व्यक्ति के ऊपर लगा दिया जाता है। समाज कहता है परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक नहीं मिले। असफल हो। समाज
कहता है आईआईटी/नीट में चयन नहीं हुआ असफल हो। समाज कहता है नौकरी नहीं लगी। असफल
हो। समाज कहता है तीस की उम्र तक शादी नहीं हुई। असफल हो। वास्तव में फेल होना
स्वीकार करना परिणाम को अपनी पहचान बना लेना है। परिणाम तो आकड़ें हैं जो हमें अगली
गतिविधि की योजना बनाने में मदद करते हैं। कोई भी परिणाम असफलता केवल उन लोगों के
लिए है, जो यह मानते हैं कि उनका यह प्रयास
जीवन का अन्तिम प्रयास था।
हमारा
प्रत्येक प्रयास सुविचारित व सुनियोजित होना चाहिए। मानव विचारशाील प्राणी है।
मस्तिष्क का कार्य विचार करना है। हमारा प्रत्येक कार्य मस्तिष्क के प्रयोग से
प्रारंभ होना चाहिए। सामान्यतः ऐसा होता भी है, किंतु हम ऐसा अनजाने में करते हैं। मस्तिष्क का प्रयोग जानबूझकर
सोच-विचारकर करने से ही सुविचारित विचार निकलकर आएगा। आकड़ों व तथ्यों का विश्लेषण
करके, विकल्पों की खोज करके, विकल्पों का आकलन करके, सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करके, उस सर्वश्रेष्ठ विकल्प पर काम करके ही
तो हम सुविचारित कार्य को संपन्न करने की और बढ़ सकते हैं। सुविचारित कार्य को
संपन्न करना ही तो सफलता है। पूर्व-निर्धारित कार्य को पूर्व निर्धारित
प्रक्रियानुसार करते हुए अपेक्षित परिणामों
तक पहुँचना ही तो सफलता है।
सफलता न धन में हैं, न पद में है, न संबन्धों का सृजन करने में है और न
ही यश में है। ये व्यक्ति को मजबूत नहीं कमजोर बनाते हैं। सफलता तो कर्म में है।
हमारे द्वारा किए गए कर्म ही सफल होते हैं। हमारे द्वारा गिए गए कर्माे का परिणाम
ही धन, पद, संबन्ध और यश के रूप में हमें प्राप्त होते हैं। कर्म और कर्म का फल
दोनों मिलकर ही सफलता हैं।
वास्तविकता यही है कि सफलता प्रति क्षण
का सदुपयोग करने में है। सफलता जीवन को संपूर्णता से जीने में है और सफलता का मूल
जीवन जीने की कला में है। आजीविका के साधन तो असंख्यों भरे पड़े हैं। हम केवल रोटी, कपड़ा और मकान से आगे धन, पद, संबन्ध और यश के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं किन्तु क्या इस सबमें भी
हम वास्तविक संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर पाते हैं?
कर्म
के बिना किसी भी प्रकार का फल नहीं हो सकता। किए गए कर्म का प्रकृति के नियमानुसार
फल प्राप्त होना ही सफलता है। सफलता आसमान का तारा नहीं, सफलता हमारे द्वारा किए गए कर्मो का
परिणाम है। किए गए कर्मो का परिणाम अवश्य ही प्राप्त होता है। हमें उसे समझने और
स्वीकार करने की आवश्यकता है। जो कर्मशील व्यक्ति सफलता को समझ कर उसे स्वीकार कर
लेते हैं, वे उसका जश्न मनाकर दूसरी सफलता की ओर
बढ़ जाते हैं। जो सफलता का समझने और स्वीकार करने में असफल रहते हैं, वे अपनी सफलता को असफलता मानकर दुखी
होते हैं और समय बर्बाद कर दूसरी असफलता के लिए काम करते हैं।
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प्राचार्य, जवाहर
नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा,
मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169,
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