सोमवार, 20 मई 2019

समय की एजेंसी-13

समय की बचत और निवेश


हम समय को प्राप्त नहीं कर सकते, वरन् प्राप्त समय का सदुपयोग कर सकते हैं। प्राप्त समय का उपयोग किस प्रकार करना है? यह हमारे ऊपर ही निर्भर है और इसी पर सफलता और असफलता की नींव भी टिकी है। समय को प्राप्त करना संभव नहीं है, ठीक उसी प्रकार समय की बचत करना भी संभव नहीं है। यहाँ पर बचत करने से मेरा आशय समय को बचाकर सुरक्षित रखने से है। समय को बचाकर नहीं रखा जा सकता। जिस प्रकार हम अन्य संसाधनों को बचाकर भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकते हैं, उस प्रकार समय के साथ संभव नहीं हैं क्योंकि समय चक्र को रोकना किसी के वश की बात नहीं। सफल वही हो सकता है, जो समय चक्र को रोकने के व्यर्थ प्रयास करने के फेर में न पड़कर समय के साथ-साथ दौड़ लगाकर उसका सदुपयोग करने की क्षमता व विवेक रखता है और समय के सन्दर्भ में सही चयन कर सही गतिविधियों में समय का निवेश करता है।
             जी हाँ, समय को प्राप्त नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार समय को बचाकर नहीं रखा जा सकता। हाँ! हम समय को एक कार्य से बचाकर दूसरे में लगा सकते हैं। यही चयन की समस्या या चयन करने का अधिकार है। समय एक ऐसा संसाधन है जिसका निवेश करने के लिए उसे बचाकर रखने की आवश्यकता नहीं होती, समय का तो सीधा निवेश किया जाता है। जो व्यक्ति सीधा निवेश करना जानता है, वही समय का सही प्रयोग करके सफलता के झण्डे गाड़ता है।

              समय के उपयोग के लिए यह समझना आवश्यक है कि हम किसी विशिष्ट कार्य से समय बचा सकते हैं किंतु उस समय को संरक्षित नहीं कर सकते। समय को सुरक्षित रखने का कोई भण्डारगृह आज तक नहीं बना है और इस प्रकार का भण्डारगृह बन सकने की भविष्य में भी कोई उम्मीद नहीं है। हाँ, एक गतिविधि से समय की बचत करके उसे दूसरी गतिविधि में प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार एक गतिविधि से दूसरी गतिविधि में समय का निवेश करना ही व्यक्ति के प्रबंध कौशल का परिचायक है। जो व्यक्ति समय के सन्दर्भ में अपनी गतिविधियों को जितनी कुशलता के साथ प्रबंधन करना जानता है, वह व्यक्ति सफलता का उतना ही अधिक अधिकारी है।
पाठको! एडस् के बारे कहा जाता है कि बचाव ही उपचार है। इसी प्रकार समय के सन्दर्भ में समझना होगा कि प्रयोग ही निवेश है। हमारे जीवन का हर पल हमारे जीवन में नवीन अवसर लेकर आता है, किंतु सदैव स्मरण रखें, ‘मृत्यु और अवसर कभी प्रतीक्षा नहीं करते।’ समय के जिस पल का उपयोग हमने नहीं किया, उस पल को हमने खो दिया अर्थात् बर्बाद कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि समय का मतलब जीवन है अर्थात् समय बर्बाद करने का मतलब जीवन को बर्बाद करने से है क्योंकि अर्थपूर्ण उपयोगी समय ही तो जीवन है।
   अतः हमें इस बात को गांठ बांध लेना चाहिए कि हमारे जीवन का हर पल हमारे लिए अवसरों का भण्डार है, हमारे लिए प्रगति के अनेक रास्ते खोलता है किंतु प्रगति के उन रास्तों में से किसी एक का चुनाव हमें करना है। केवल चुनाव ही नहीं करना, चुनाव करने के बाद हमें अविरल आनन्द लेते हुए उस प्रगति पथ पर चलकर पूर्व-निर्धारित गंतव्य पर पहुँचना है। 
            मित्रों! हमें स्मरण रखना होगा कि इस गंतव्य का चुनाव हमने स्वयं ही किया है, उस गंतव्य पर पहुँचने का मतलब आपके चुनाव व प्रयासों की सफलता है। गंतव्य पर पहुँचने के बाद आपको पुनः नये रास्तों का विकल्प मिलेगा, जहाँ पुनः चुनाव का अवसर मिलेगा और फिर नये गंतव्य की ओर चलना है। यही तो जीवन यात्रा है और जीवन यात्रा के प्रत्येक पल और प्रत्येक कदम का आनन्द लेते हुए आगे बढ़ना है। आनन्द गंतव्य की प्राप्ति पर निर्भर नहीं, आनन्द गंतव्य की यात्रा में लगने वाले समय का सदुपयोग करने पर निर्भर है। किसी निर्धारित स्थल पर पहुँचने पर आनंदित होने का मतलब है कि केवल कुछ क्षणों का आनंद क्योंकि वहाँ से फिर एक नवीन यात्रा के लिए निकल जाना है। अतः जीवन का आनंद किसी विशेष स्थल पर नहीं, सदैव पथ पर पथिक बनकर चलते रहने में है। पथिक को गंतव्य की ओर चलना अवश्य है किंतु उसे यात्रा का आनंद लेना है; पथ में पर्यटन का आनंद लेते हुए चलना है क्योंकि हम जीवन भर चलने वाले पथिक हैं। पथिक का आनंद गंतव्य पर नहीं रखा है, वरन्् पथ में बिखरा पड़ा है जिसे प्रति पल अपने नयनों से निहारते चलना है। इसके लिए हमें केवल कार्य की सफलता पर ही नहीं, प्रक्रिया की सफलता पर भी आनंद लेने की प्रवृत्ति का विकास करना होगा। 

रविवार, 19 मई 2019

समय की एजेंसी - 12

गलती करके नहीं, दूसरों की गलतियों से सीखें


कोई भी व्यक्ति समय को खरीद या बेच नहीं सकता। समय का उपयोग किया जा सकता है या उसे बर्बाद किया जा सकता है। हम समय का उपयोग, समाजोपयोगी गतिविधियों में कर सकते हैं या असामाजिक गतिविधियों में कर सकते हैं। हम कर्मरत रहते हुए अपने जीवन को आनन्ददायक बना सकते हैं या आलस्य में रहकर जीवन के महत्त्वपूर्ण भाग को बर्बाद भी कर सकते हैं। बहुत से लोग अपने जीवन को अर्थहीन तरीके से आलस, तंद्रा, टीवी देखने, इंटरनेट पर चैटिंग करने, अपने तथाकथित दोस्तों के साथ गप्पें लगाने या खेल के नाम पर अनुपयोगी क्रियाओं में घण्टों बर्बाद करते हुए जीवन के बहुत बड़े भाग को बर्बाद कर देते हैं। उसके बाद अपने जीवन का उपयोग कर सफल हुए व्यक्तित्वों से तुलना करते हुए व्यवस्था को गालियाँ देते हैं कि इस प्रकार का भेदभाव क्यों है? अधिकांश व्यक्ति अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी भी स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार वे कभी गलती करते ही नहीं हैं। उनकी असफलता की जिम्मेदारी सदैव किसी न किसी अन्य की ही होती है। उनको अपने नाकारापन के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए कोई और नहीं मिले तो दुर्भाग्य और भगवान तो सदैव दोषारोपण के लिए तैयार हैं ही। वे बेचारे अपने बचाव में तर्क देने भी नहीं आ सकते।

               सामान्य व्यक्ति यह नहीं सोचते कि उनके जीवन को कोई अन्य व्यक्ति या व्यवस्था नहीं, वे स्वयं बर्बाद कर रहे हैं। वे यह विचार नहीं करते कि वे क्या कर रहे हैं? और किस ढंग से कर रहे हैं? यहाँ तक कि उनमें इतनी समझ भी नहीं होती कि अपने अमूल्य जीवन को स्वयं ही बर्बाद करने पर पश्चाताप भी कर सकें अर्थात  दूसरों की आलोचनाएं करने या व्यवस्था को कोसने में और भी अधिक समय को बर्बाद करते रहते हैं और अपने द्वारा स्वयं ही अपना जीवन बर्बाद करने पर अफसोस भी नहीं करते। इस प्रकार वे अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा खो देते हैं, जिसे वे कभी वापस नहीं पा सकते। 
                जीवन के बड़े भाग को बर्बाद करने के बाद, कई बार कहने लगते हैं, ‘गलती हो गयी।’ बचाव में तर्क भी तैयार होता है, मानव गलतियों को पुतला है; गलती करके ही सीखा जाता है। निःसन्देह गलतियाँ सीख दे जाती हैं किंतु यह आवश्यक नहीं कि हम गलती करके ही सीखें। हम दूसरों की गलतियों को और उनके परिणामों को देखकर भी सीख सकते हैं। वास्तव में चतुर व्यक्ति वह है जो स्वयं गलती न करके दूसरों की गलतियों से सीख ले। हमें दूसरों की सफलता से ईष्र्या न करके उससे प्रेरणा ग्रहण कर आगे बढ़ना चाहिए। दूसरों की गलतियों को उनकी आलोचना का आधार बनाने की अपेक्षा हमें उनकी गलतियों से सीख लेकर अपने समय को उस प्रकार की गलतियों से बचाकर उपयोगी कार्याे में लगाकर सफलता की राह पर बढ़ते रहना चाहिए।

समय का प्रयोग करने वाला ही शक्तिशाली


पारंपरिक रूप से समय को सबसे शक्तिशाली कहा जाता रहा है। कहा जाता है कि समय-समय की बात है, समय-समय का खेल। सफलता के गिरि चढ़े, अगले क्षण हो फेल। समय को भाग्य का पर्यायवाची भी माना जाता रहा है। समय को शक्तिशाली कहने वाले लोग समय को ही सब कुछ मानकर मनुष्य को कमजोर मान बैठते हैं। उनका कहना होता है कि समय ही सबसे शक्तिशाली है, मनुष्य को इसके सामने घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मनुष्य इसकी क्षमता को मापने में सक्षम नहीं है। समय को ही ऐसे मनुष्य जीत हार का कारण मान लेते हैं। समय के साथ अच्छा और बुरा होने का विशेषण लगा कर अपनी अकर्मण्यता की जिम्मेदारी समय के गले मढ़ देते हैं। इस प्रकार वे आत्मसंतुष्टि भले ही प्राप्त कर लें। अपनी असफलताओं से सीख लेने से भी वंचित रह जाते हैं। 
            भाग्यवादियों का मानना होता है कि समय के फेर से कोई व्यक्ति एक ही पल रंक से राजा और एक ही पल में राजा से रंक हो सकता है। उनका मानना होता है कि सफलता या जीत के लिए एक ही पल काफी होता है। कोई व्यक्ति एक ही पल में अमीर और एक ही पल में गरीब हो सकता है। व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के बीच में भी एक ही पल का अन्तर होता है। 
            निःसन्देह एक ही पल में व्यक्ति राजा से रंक और रंक से राजा हो सकता है। ऐसे स्वर्णावसर आते हैं किंतु इसका श्रेय समय को देना उचित नहीं समय तो सम है। सदैव एक जैसा रहता है। समय अच्छा या बुरा नहीं होता। अच्छा या बुरा होता है, समय का उपयोग। निःसन्देह प्रतिपल हमें नवीन अवसर प्राप्त होते हैं किंतु अवसरों को उपयोग तो हमारे अपने कर्मों के ऊपर निर्भर करता है। ऐसे अवसर ही हमारी निर्णय क्षमता और प्रत्युत्पन्न मति की परीक्षा होते हैं। निर्णय लेने के क्षण हमारे लिए चुनौती के रूप में सामने आते हैं। कई बार हमारा एक निर्णय हमारे भविष्य का आधार बन जाता है। ऐसे अवसर भी कर्मशील व समयनिष्ठ व्यक्तियों को ही प्राप्त होते हैं। ऐसे अवसरों का उपयोग अपनी जागरूकता के ऊपर निर्भर करता है। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और तुरंत निर्णय करने की शक्ति पर निर्भर करता है। 
              समय रूपी अवसर प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध हैं, यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह समयनिष्ठ होकर उपलब्ध समय का योजनाबद्ध व विवेकपूर्ण उपयोग करके समय पर अच्छा होने का ठप्पा लगा दे या आलस्य, अकर्मण्यता का शिकार होकर अवसाद में जाकर आत्महत्या कर समय के रूप में प्रकृति-प्रदत्त जीवन रूपी अमूल्य भेंट को बर्बाद कर दे। समय निःसन्देह सर्वाधिक अमूल्य भेंट है, क्योंकि समय ही जीवन है और जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण इस भौतिक संसार में कुछ भी नहीं होता। हम जितनी भी गतिविधियों में भाग लेते हैं। जो भी लम्बी चैड़ी योजनाएँ बनाते हैं। सभी जीवन को केंद्र में रखकर ही तैयार की जाती हैं। इस तथ्य से पाठक भी सहमत होंगे।

समय रूपी संसाधन की प्राप्ति


यह स्पष्ट हो चुका है कि समय एक अमूल्य व दुर्लभ संसाधन है। पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि संसाधन सीमित होते हैं, संसाधनों का वैकल्पिक प्रयोग किया जा सकता है। विभिन्न विकल्पों में से किस विकल्प पर और कितना किसी संसाधन को प्रयोग किया जाय? अर्थशास्त्र में इसे चयन की समस्या कहकर संबोधित किया गया है। किस विकल्प का चयन करके संसाधन को उस विकल्प के लिए आबंटित करना है? इसका निर्णय व्यक्ति को करना होता है और फिर उस निर्णय को लागू करना होता है क्योंकि केवल निर्णय करना पर्याप्त नहीं होता। 
            सुविचारित निर्णय लेना और सुविचारित योजना बनाकर उस निर्णय को लागू करना ही सफलता का मूलमंत्र है। यह सभी संसाधनों के सन्दर्भ में सही है। समय भी एक संसाधन है। अतः समय के भी वैकल्पिक प्रयोग हैं। समय का उपयोग करते समय भी चयन की समस्या सामने आती है। अपने उपलब्ध समय को किस गतिविधि में लगाना है? इसका चयन करना ही हमारे लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय होता है। हम अपने सीमित समय को किन गतिविधियों में लगा रहे हैं, यह हमारी प्राथमिकताएँ ही इसका आधार बनती हैं। हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर ही तय करते हैं कि हमें अपने अमूल्य समय का निवेश कहाँ करना है।
     समय के सन्दर्भ में सर्वप्रथम यह स्मरण रखना आवश्यक है कि अन्य संसाधनों की तरह हमें यह नहीं मालूम कि हमारे पास कितना समय है? अन्य संसाधनों को मापन के विभिन्न तरीके हैं, विभिन्न मापन पैमाने हैं किंतु समय के सन्दर्भ में यह लागू नहीं होता। किसी को भी नहीं मालूम कि उसे कितना जीवन प्राप्त है। जीवन अर्थात् ‘समय’ जो प्रकृति-प्रदत्त है। प्रकृति ने ही हमें जीवन जीने का अवसर दिया है किंतु यह अवसर कब तक है, इसे कोई भी नहीं जानता और न ही आज तक ऐसा कोई तरीका विकसित हुआ है कि हम जान सकें कि हमारे पास कितना समय है? समय की प्राप्ति प्रकृति जिसे हम ईश्वर भी कह सकते हैं, पर ही निर्भर है। समय प्रदान करना तो प्रकृति, ईश्वर या अन्य किसी अदृश्य शक्ति पर निर्भर है, यह माना जा सकता है किंतु उस समय को स्वीकार करके उसका उपयोग करना तो हमारे और केवल हमारे ऊपर ही निर्भर है। 

             हम अपने प्रयासों से एक भी अतिरिक्त पल प्राप्त नहीं कर सकते। विशेषकर कार्यकारी उपयोगी पल, जिसे उपयोगी जीवन कहा जा सकता है; हमारे पास बहुत कम होते हैं। जब हम यह जानते हैं कि अतिरिक्त समय की प्राप्ति संभव नहीं है तो आओ हम समय के दूसरे पहलू पर विचार करते हैं। दूसरा पहलू यह है कि निःसन्देह गुजरे हुए समय को प्राप्त नहीं किया जा सकता किंतु अपने सहयोगियों के समय को प्राप्त करके अपने कार्य में सहयोग लिया जा सकता है। हम कर्मचारियों को काम पर रखते हैं, वे हमारी योजना के अनुसार काम करते हैं, तब वास्तव में हम उनसे समय ही प्राप्त करते हैं। समय को प्राप्त करना, समय को बचाना और समय का निवेश करना बड़े ही भ्रम पैदा करने वाले शब्द हैं। क्या समय को बचाया जा सकता है? इस प्रश्न पर अगले अध्याय में चर्चा करेंगे।

गुरुवार, 16 मई 2019

समय की एजेंसी-११

मितव्ययिता के साथ सदुपयोगः


जिस प्रकार लेखाकार (Accountant) एक-एक पैसे का हिसाब रखता है, ठीक उसी प्रकार हमें समय की छोटी से छोटी इकाई का ख्याल रखना होगा। समय की छोटी से छोटी इकाई का लेखा-जोखा रखना होगा। जिस प्रकार आर्थिक प्रबंधन में मितव्ययिता आवश्यक गुण है, उसी प्रकार समय का उपयोग करते समय भी एक-एक पल को बचाकर उसका उपयोगी कार्यों में मितव्ययिता के साथ सदुपयोग करना ही समय की आराधना है। समय भी एक आर्थिक संसाधन है। समय का प्रयोग करके ही तो हम पैसा कमाते हैं। समय को ही पैसा कहा जाता है। समय का संसाधन होना ही हमें इसके मितव्ययितापूर्ण उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। 
            समय का मितव्ययितापूर्ण प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए हमें सही समय पर जागना होगा। सही समय पर अपने नैत्यिक कार्यो अर्थात् उषापान अर्थात् सुबह सुबह उठकर कम से कम दो गिलास जल का सेवन, शौचादि से निवृत्ति, स्नान आदि क्रियाओं के बाद योग, व्यायाम आदि सभी क्रियाओं को नियत समय पर ही करना होगा। अपनी सभी आवश्यक नैत्यिक क्रियाओं के संपादन के पश्चात् नियत समय पर अपने पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए तैयार हो जाना समयनिष्ठता के अन्तर्गत ही आता है। 
               समयनिष्ठ हुए बिना मानव संसाधन का सदुपयोग करना संभव नहीं है। वर्तमान गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में जरा सा आलस आपको पीछे ढकेल देगा और फिर पछताने में समय बर्बाद करने से कुछ हासिल नहीं होगा। अतः समय को जीना ही जीवन को जीना है। हमें जीवन में कुछ अच्छा करना है, कुछ उपलब्धियाँ हासिल करनी हैं तो इसके लिए समय के प्रति निष्ठा, प्रतिबद्धता, लगन और कर्मरत रहने की श्रेष्ठ आदत का विकास करना होगा।

समय पृथ्वी पर उपलब्ध अमूल्य संसाधनः



समय पृथ्वी पर उपलब्ध सबसे कीमती संसाधन है। इस संसाधन को कीमती कहना भी शायद उचित नहीं होगा, इसके लिए तो अमूल्य शब्द ही उचित प्रतीत हो रहा है। समय की तुलना अन्य किसी संसाधन से नहीं की जा सकती। मानव के समय का आशय मानव जीवन से है और अनादि काल से मानव जीवन को दुर्लभ कहा जाता रहा है। अन्य समस्त संसाधनों पर किसी न किसी सीमा तक मानव का नियंत्रण हो गया है किंतु मानव जीवन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है। अंत समय पर बड़े से बड़े डाक्टर भी ‘ईश्वर ही कुछ कर सकता है,’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। एक बार जीवन चला जाय तो वह वापस नहीं आता। यह अलग बात है कि पुनर्जीवन में विश्वास करने वाले व्यक्ति पुनः जन्म लेने की बात करते हैं किंतु ऐसा होने पर भी नया जीवन होगा; किंतु जो समय बीत गया है, उसे पुनः पाना संभव नहीं होता। 
           समय चक्र सदैव गतिमान रहता है। हम समय चक्र को रोक नहीं सकते और न ही इसकी गति को धीमी कर सकते हैं। हाँ! हम समय चक्र के साथ-साथ अपनी गतिविधियों का नियोजन करके समय चक्र के साथ-साथ चलकर अपने जीवन को उपयोगी बनाकर संसार में एक छाप छोड़ सकते हैं। समय सदैव अग्रगामी होता है। यह पीछे नहीं चलता। इस संसार में सब कुछ समय पर निर्भर करता है, समय से पहले कुछ नहीं हासिल होता ऐसा माना जाता है। निःसन्देह समय से पहले कुछ हासिल नहीं होता, किंतु समय के साथ चलकर ही कुछ हासिल किया जा सकता है। समय की बर्बादी हमारे जीवन को ही बर्बाद कर देती है। वर्तमान समय के सदुपयोग पर ही हमारे भावी जीवन की नींव रखी जाती है। हम यदि वर्तमान समय को बर्बाद कर रहे हैं, तो वर्तमान को ही बर्बाद नहीं कर रहे भविष्य को भी बर्बाद करने की तैयारी कर रहे हैं। 

धन नहीं, समय आनन्द प्रदाता


देखने में आता है कि सामान्य व्यक्ति समय से अधिक धन को महत्त्व देते हैं। वे धन को ही सब कुछ मानते हैं। वे समय के महत्त्व को नहीं समझते। समय के महत्त्व को न समझने के कारण वे धन भी नहीं कमा पाते धन कमा भी लें तो समय व धन दोनों का ही आनन्द नहीं ले पाते। हमें इस बात को समझना होगा कि व्यक्ति धन के लिए नहीं, धन व्यक्ति के लिए होता है। यही बात समय के सन्दर्भ में नहीं है। समय के सन्दर्भ में तो समय ही मानव जीवन है। अतः हम यह भी कह सकते हैं कि समय ही व्यक्ति है। 
            धन अन्य वस्तुओं को प्राप्त करने का साधन मात्र होता है। सामान्य व्यक्ति को प्रतीत होता है कि धन, समृद्धि और आनन्द प्रदान करता है, किंतु यह सत्य नहीं है। धन का संयम व विवेकपूर्ण उपयोग न किया जाय तो यह कष्ट का कारण भी बन जाता है। कई बार तो धन के कारण अपने पराये हो जाते हैं, यहाँ तक कि निकटस्थ संबन्धी ही प्राणों का हरण कर लेते हैं। वास्तव में धन अपने आप में कुछ भी नहीं है। धन प्राप्त करने का आधार समय है और धन से अन्य भौतिक वस्तुओं को खरीदा जा सकता है किंतु धन से न तो जीवन को खरीदा जा सकता और न ही आनन्द को खरीदा जा सकता है। वास्तविक रूप से समय ही हमें धन, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और आनन्द प्रदान करता है।

बुधवार, 15 मई 2019

समय की एजेंसी-10

चयन का सिद्धांत

जब संसाधनों की बात आती है, तब अर्थशास्त्र याद आता है। अर्थशास्त्र के कुछ आधारभूत नियम हैं, जिनमें से एक यह है कि संसाधन सीमित हैं और संसाधनों का वैकल्पिक प्रयोग संभव है। कहने का अर्थ यह है कि कोई भी संसाधन असीमित नहीं है। प्रत्येक संसाधन सीमित है। संसाधनों का प्रयोग करने के लिए अनेक क्षेत्र या विकल्प होते हैं। अतः मनुष्य को संसाधनों का प्रयोग करते समय चयन करना पड़ता है। 
समय भी एक संसाधन है। अतः अर्थशास्त्र के ये नियम समय पर भी लागू होते हैं। हम धन खर्च करके वस्तुओं और व्यक्तियों के समय को खरीद तो सकते हैं किंतु अपने जीवन अर्थात् अपने पास उपलब्ध समय में वृद्धि नहीं कर सकते अर्थात् हम केवल अपने वर्तमान समय का प्रयोग अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कर सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम यह चयन कर सकते हैं कि हम अपने समय को किस प्रकार प्रयोग करें। हमें किसी गतिविधि के लिए अधिक समय की आवश्यकता है तो किसी अन्य गतिविधि में से समय की बचत करनी होगी। क्योंकि समय की बचत ही समय की प्राप्ति है।
हमें प्रगति पथ पर चलना है तो समयनिष्ठ बनना होगा। समयनिष्ठ का आशय समय के महत्त्व को समझकर समय का पूर्व-योजनानुसार सदुपयोग करना होगा। हमें अपने सभी कार्यो के लिए प्राथमिकताओं के आधार पर समय का आवंटन करना होगा।
मोटे तौर पर हम विचार करें तो हमारे कुछ मौलिक कत्र्तव्य होते हैं, जो स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति हो सकते हैं। हमें गुणवत्तापूर्ण मानव जीवन जीने के लिए अपने समय का सदुपयोग अपने सभी कत्र्तव्यों में संतुलन बनाकर करना होगा। यह संतुलन मानवीय समय को संसाधन स्वीकार कर, उसकी सीमितता को स्वीकार कर, उसके वैकल्पिक प्रयोगों को स्वीकार कर चयन प्रणाली को लागू करके ही स्थापित किया जा सकता है। चयन प्रणाली का आशय अपनी प्राथमिकताओं के निर्धारण से है। उपलब्ध संसाधन का विभिन्न विकल्पों में अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर आवंटन ही चयन करना है। विभिन्न विकल्पों में से किसी एक का चयन प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है। यह चयन करना ही निर्णयन कहलाता है। प्रबंधक व प्रशासक का मुख्य कार्य निर्णय लेना और उसे लागू करवाना ही है।

मानव संसाधन का सदुपयोग

मानव संसाधन के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के लिए सर्वप्रथम हमें यह स्वीकार करना होगा कि मानव का मतलब उसे उपलब्ध समय से है। मानव अपने आप में संसाधन नहीं है, उसको प्राप्त कार्यकारी समय ही संसाधन है। अतः मानव संसाधन के सदुपयोग का अर्थ मानव के पास उपलब्ध समय के सदुपयोग से है।
मानव संसाधन के उचित प्रयोग के लिए हमें समयनिष्ठ होना होगा। हमें समझना होगा। समय ईश्वर प्रदत्त है। समय का पर्यायवाची काल भी है, ईश्वर को महाकाल भी कहा जाता है। कुछ चिंतक समय और ईश्वर को एक ही रूप में देखते हैं। इस प्रकार ईश्वरनिष्ठ और समयनिष्ठ होना एक ही बात है। समयनिष्ठ होना ही वास्तव में ईश्वरनिष्ठ होना है। समय की आराधना ही ईश्वर की आराधना है। नियत समय पर नियत कर्म का अनासक्त भाव से संपादन करना ही समय की आराधना है। इस प्रकार समयनिष्ठ होने का आशय समय की प्रत्येक इकाई का सम्मान करना है। समय को महाकाल भी कहा जाता है। महाकाल को शिव के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार समय ही ईश्वर है। समय की आराधना ईश्वर की आराधना है।

सोमवार, 13 मई 2019

समय की एजेंसी-9

मानव संसाधन का जीवन

प्रत्येक संसाधन का एक उपयोगी जीवन काल होता है। हम प्रत्येक संसाधन की परिभाषा ही उसकी उपयोगिता के आधार पर कर रहे हैं। अतः प्रत्येक संसाधन के उपयोगी जीवन काल पर ध्यान देना होगा। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति मानव समुदाय के लिए उपयोगी नहीं रहता तो वह संसाधन भी नहीं रहता। अतः मानव को संसाधन के रूप में देखते समय उसके उपयोगी जीवन काल पर विचार करना होगा। कहने का आशय यह है कि मनुष्य का उपयोगी जीवन काल ही संसाधन के रूप में माना जा सकता है अर्थात् मनुष्य को जो कार्य करने के लिए समय मिलता है; वह समय ही मानव के लिए संसाधन है। यदि किसी कारणवश मानव का समय समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाता तो वह संसाधन भी नहीं रह जाता। मानव संसाधन के संदर्भ में इसलिए कहा गया है कि समय ही जीवन है। जो व्यक्ति समय बर्बाद करता है वह  जीवन बर्बाद करता है। इसे इस प्रकार भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति टाइम पास करता है, वास्तव में टाइम उसके जीवन को पास कर देता है।
मानव अपने आप में एक संसाधन है, जो अन्य संसाधनों का उपयोग करता है। मानव संसाधन का अर्थ मानव के गुणवत्तापूर्ण समय के उपयोगी जीवन काल से है। मानव संसाधन की उपयोगिता उसकी सक्षमता, योग्यता व कौशल से निर्धारित होती है। जो व्यक्ति जितना अधिक सक्षम, योग्य व कुशल होगा उसका समाज में उतना ही महत्त्व होगा। ऐसे व्यक्तियों का एक-एक क्षण कीमती होता है। वास्तविक बात यह है कि समय ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। यदि हम धन को प्रगति का आधार मानते हैं तो समय ही है जो धन कमाने का आधारभूत संसाधन है। अतः वास्तव में समय ही सबसे बड़ा धन है। हम समय लगाकर धन कमा सकते हैं किंतु धन खर्च करके अपने समय में वृद्धि नहीं कर सकते। हाँ! धन के माध्यम से अन्य व्यक्तियों का समय खरीद सकते हैं। दूसरे व्यक्तियों के समय को खरीद कर उसका प्रयोग करना ही तो रोजगार या नौकरी देना कहलाता है।

रविवार, 12 मई 2019

समय की एजेंसी-8

समय एक संसाधन


जब हम विकास की बात करते हैं, तब उद्यमिता और उद्यमी की बात चलती है। उद्यमी का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार उद्यम होता है, किंतु उद्यम मात्र से विकास की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती। उद्यमी को उद्यम लगाने के लिए विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। व्यवसाय व उद्योग के क्षेत्र में विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। उद्यमियों के संदर्भ में बात करें तो उनके लिए पूँजी प्रथम संसाधन होता है। पूँजी, सामग्री, श्रम, तकनीक व प्रबंधन को संसाधनों के रूप में माना जा सकता है। उद्यमी पूँजी के द्वारा ही अन्य संसाधनों को प्राप्त करते हैं। इस तरह के सभी संसाधनों में श्रम और प्रबंधन मानवीय संसाधन हैं जो अन्य अमानवीय संसाधनों का प्रयोग करते हैं। अतः मानवीय संसाधन अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। संसाधनों की आवश्यकता व्यवसाय व उद्योगों के क्षेत्र में ही नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पड़ती है। संसाधनों की आवश्यकता केवल उद्यमी को ही नहीं, संसार के प्रत्येक व्यक्ति को पड़ती है। 
     विकिपीडिया के अनुसार, ‘प्रकृति का कोई भी तत्त्व तभी संसाधन बनता है, जब वह मानवीय सेवा करता है। इस सन्दर्भ में 1933 में जिम्मरमैन का कथन था, ‘न तो पर्यावरण उसी रूप में और न ही उसके अंग संसाधन हैं, जब तक वह मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सक्षम न हो।’ संसाधन को और भी अधिक स्पष्ट करना चाहें तो किसी वस्तु का संसाधन होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा सकता है या नहीं? इस प्रकार हमारे आसपास उपलब्ध हर वस्तु संसाधन कहलाती है जिसका इस्तेमाल हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकते हैं, जिसे बनाने या जिसकी उपयोगिता में वृ़िद्ध करने के लिए हमारे पास प्रौद्योगिकी है और जिसका इस्तेमाल सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से मान्य है। कहने का आशय यह है कि वह प्रत्येक वस्तु या पदार्थ संसाधन है जो मानवीय जीवन को सुगम बनाता है, या अन्य संसाधनों पर प्रक्रिया करके उन्हें अधिक उपयोगी बनाकर मानव समुदाय की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 

संसाधनों के प्रकार


संसाधनों की गिनती करवाने में विभिन्न दृष्टिकोण सामने आते हैं। संसाधनों की उपयोगितावादी दृष्टिकोण के अनुसार प्रकृति प्रदत्त व मानव निर्मित सभी वस्तुएं संसाधनों के अन्तर्गत आ जाती हैं। सभी वस्तुएँ किसी न किसी रूप में, किसी न किसी प्रकार से मनुष्य के काम आती ही हैं और उसके जीवन को सुविधाजनक बनाती हैं। व्यापक अर्थ में व्यापक दृष्टिकोण से देखेंगे तो दुनिया में शायद ही ऐसी कोई वस्तु मिले, जो मानव के उपयोग में न आती हो, मानव के जीवन को आरामदायक या सुविधाजनक न बनाती हो। अतः हम सभी संसाधनों के नामों का उल्लेख यहाँ नहीं कर सकते। हमें सभी संसाधनों की चर्चा करने व समझने की यहाँ आवश्यकता भी नहीं है। हमारे लिए संसाधनों के वर्गीकरण की चर्चा करना पर्याप्त है। उत्पत्ति के आधार पर संसाधन सामान्यतः दो वर्गो में रखे जाते हैं-
1. जैविक संसाधन
2. अजैविक संसाधन
जैविक संसाधन वे संसाधन कहे जाते हैं जिनकी प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन व्याप्त होता है या जीवन रहा होता है। जबकि अजैविक संसाधन वे संसाधन होते हैं जिनमें जीवन नहीं होता अर्थात्् निर्जीव वस्तुएं अजैविक संसाधन के अन्तर्गत आती हैं।
                  संसाधन की परिभाषा की कसौटी पर कसने पर स्पष्ट होता है कि मानव स्वयं में एक संसाधन है। मानव, मानव के इस्तेमाल में आता है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में मानवीय सहयोग की आवश्यकता पड़ती ही है। इसी आवश्यकता के कारण तो समाज में विभिन्न रिश्तों का जन्म हुआ है। मानव की तो उपयोगिता है ही; मानव विभिन्न प्रक्रियाओं के द्वारा अन्य सभी संसाधनों की उपयोगिता में वृद्धि भी करता है। उपयोगिता में वृद्धि करना अपने आपमें उत्पादन कहलाता है। इस प्रकार मानव स्वयं संसाधन होते हुए अन्य संसाधनों को अधिक उत्पादक बनाकर मानव समुदाय के जीवन को सुगम बनाता है। इस प्रकार मानव के संसाधन होने में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। यही नहीं अन्य समस्त संसाधनों का प्रयोग भी मानव ही करता है। अतः मानव को संसाधनों का संसाधन कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

गुरुवार, 9 मई 2019

समय की एजेंसी-7

समय अबंधनीय है



जी हाँ! समय अबंधनीय है। इसे बांधा नहीं जा सकता। मूर्धन्य विचारक चाणक्य ने भी लिखा है, ‘जीवन में सबसे कीमती है आपका वर्तमान, जो एक बार चला जाता है तो दुनिया का सारा धन लगा दो, तो भी दुबारा नहीं पा सकते हो।’ समय के इस अबंधनीय स्वरूप के संदर्भ में महाभारत की एक कथा का सन्दर्भ देना उपयोगी रहेगा। 
                एक बार चक्रवर्ती महाराज धर्मराज युधिष्ठर अपने चारों भाइयों सहित अपने दरबार में विराजे थे। संध्याकाल हो चुका था। दरबार से उठने का समय हो चुका था। उसी समय एक गरीब ब्राह्मण सहायतार्थ दरबार में हाजिर हुआ। धर्मराज युधिष्ठर उस दिन का अपना कार्य समाप्त कर चुके थे और अपने आवास के लिए प्रस्थान करने वाले थे। अतः उन्होंने ब्राह्मण को अगले दिन आने का निर्देश दिया। ब्राह्मण अगले दिन की आशा में निश्चिंत होकर वापस चला गया क्योंकि धर्मराज युधिष्ठिर सत्य बोलते थे। यदि उन्होंने कह दिया है कि कल सहायता प्राप्त हो जायेगी तो हो जायेगी। इसमें किसी को कोई सन्देह ही नहीं था।
         यह क्या? धर्मराज जब अपने आवास के लिए निकले तो ढोल-नगाड़ों की आवाज के साथ किसी उत्सव की तरह वाद्ययंत्रों की आवाज उनके कानों में पड़ी। वे आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि राज्य में किसी राज्योत्सव की कोई सूचना राज्य के किसी विभाग से उन्हें नहीं मिली थी। उन्होंने जिज्ञासा को शांत करने के लिए तुरंत कारण जानने का प्रयास किया तो सूचना मिली कि युवराज भीम के आदेश से प्रसन्नतासूचक वाद्ययंत्र बजाये जा रहे हैं। धर्मराज ने तुरंत भीम को बुलाया और पूछा तो भीम ने उत्तर दिया कि आज बड़े ही आनंद का विषय है क्योंकि संसार में जो उपलब्धि आज तक कोई व्यक्ति हासिल नहीं कर पाया, वह आपने हासिल कर ली है। आपने समय को जीत लिया है। युधिष्ठर के कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने भीम से पूछा, ‘यह किसने कहा कि मैंने समय को जीत लिया है? समय को जीतना तो संभव ही नहीं है।’
            अब भीम की बारी थी। उसने कहा, ‘महाराज! अभी-अभी कुछ समय पूर्व ही आपने दरबार में एक ब्राह्मण को कल आने के लिए कहा है। इसका आशय है कि आप अवश्य ही कल तक उसको सहायता देने के लिए जीवित रहेंगे और यही नहीं वह ब्राह्मण भी आपसे सहायता लेने के लिए कल तक अवश्य जीवित रहेगा। आप कभी असत्य भाषण नहीं करते, अतः आपकी किसी बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। आपने कल आने के लिए कहा है तो निःसन्देह आपने समय पर विजय प्राप्त कर ली है, जो संसार में आज तक कोई नहीं कर पाया है। अतः निःसन्देह हम सभी लोगों के लिए प्रसन्नता व उत्सव का विषय है। बताया यह जाता है कि धर्मराज युधिष्ठर को अपनी गलती का अहसास हो गया और उन्होंने तुरंत दूत भेजकर ब्राह्मण देवता को तुरंत बुलाकर सहायता प्रदान की।
                       यह पौराणिक उदाहरण देने का यहाँ केवल यही आशय है कि समय को बांधना किसी के लिए भी संभव नहीं है। अतः किसी भी काम को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। काम को कल पर छोड़ने का आशय यह है कि आज के दिन को जीवन के हाथों से जाने दिया गया। कल क्या होगा? इसे कोई नहीं जानता। अतः आज का मतलब आज, आज और अभी जो पल सामने है, उसे जिंदादिली के साथ जीना है। जीवन का एक पल भी बर्बाद नहीं करना है।
            हम सभी मनुष्य जीवन की दुर्लभता की बात करते हैं। हिंदु धर्म में मान्यता है कि 84 लाख योनियों में से गुजरते हुए मनुष्य योनि में जन्म होता है। मनुष्य योनि में जन्म लेकर श्रेष्ठ कार्य करते हुए हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य आध्यात्म पर चर्चा करना नहीं है। मोक्ष के मार्ग को दिखाना नहीं है। हमारा उद्देश्य जीवन की दुर्लभता पर चर्चा करना है। जीवन दुर्लभ है और अनिश्चित है। कोई नहीं जानता कि उसकी मृत्यु कब आ जाय? आज से कल का पता नहीं। 

                    जब हम जानते हैं कि मृत्यु कभी भी आ सकती है, तो उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? हम युधिष्ठिर की तरह आज का काम कल पर टालने की कोशिश क्यों करते हैं? जीवन दुर्लभ है और समय ही जीवन है। हमें नहीं मालूमकि हमारे पास कितना समय है। अतः हमें जीवन के प्रत्येक पल का उपयोग पूर्णता व प्रभावशीलता के साथ करना है। समाज उन्हीं की अमरता के नारे लगाता है, जो उपलब्ध समय में समाज के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य कर जाते हैं। समय ही जीवन है तो फिर हम समय की एजेंसी का प्रयोग करने में लापरवाही  करके अपने जीवन को छोटा कर लेते हैं? क्यों हम अपने समय को जीकर जीवन का आनंद नहीं लेते?