शुक्रवार, 12 जून 2026

सबसे बड़ी सफ़लता पुस्तक से

कदम-कदम पर सफलता

                                     डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी           

 

सफलता इस संसार सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द है। सभी जगह, सभी के मुँह से सफलता को लेकर चर्चा सुनी जा सकती है। जो काम कर रहा है, उसके लिए तो सफलता की बात करना समझ आता है, किंतु जो कुछ भी काम नहीं कर रहा, उसके द्वारा भी सफलता की कामना और कल्पना की जाती हैं। अधिकांश व्यक्ति सफलता के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं। बच्चे के जन्म से लेकर उसके किशोर, युवा, वृद्ध होते हुए मृत्यु तक माता-पिता और अभिभावक ही नहीं, आस-पास के पड़ोसी भी पीछे पड़े रहते हैं कि तुझे सफल ही होना है। हाँ, सफलता वास्तव में है क्या? इसके बारे में कोई भी नहीं जानता।

जो स्वयं जिस कार्य को नहीं कर सका, वह उसी कार्य के लिए दूसरे को प्रेरित करता हुआ, मिल जाएगा।            व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राजनीतिक जीवन ही नहीं आध्यात्मिक जीवन में भी सफलता की ही चर्चा की जाती है। ईमानदारी की चर्चा करते समय या बेईमानी की चर्चा करते समय सभी संदर्भ में सफलता अवश्य ही संदर्भित होती है। विद्यार्थी, अध्यापक, व्यवसायी, पेशेवर यहाँ तक कि चोर और तस्कर भी सफल ही होना चाहते हैं। कुछ लोगों के लिए सत्कर्म सफलता के आधार होते हैं तो कुछ के लिए दुष्कर्म सफलता का आधार होते हैं। कुछ लोग तो निष्क्रिय रहकर ही सफलता की कामना करते हैं।

 

 

 


सफलता के मानक भी सभी के अपने-अपने होते हैं। उनके मानकों को लिखित में लेकर तुलनात्मक विवरण बनाया जाय तो सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। इस सफलता के शोर में व्यक्ति की अपनी इच्छा, आकांक्षा, चाहत, योग्यता, सक्षमता, साधनसंपन्नता का शायद ही किसी के द्वारा विचार किया जाता हो। इन सबसे हटकर उनके पास असंभव कार्य को भी करने में संभव करने वाले मोटीवेशनल वाक्य होते हैं। जो स्वयं जिस कार्य को नहीं कर सका, वह उसी कार्य के लिए दूसरे को प्रेरित करता हुआ, मिल जाएगा।

प्रेरित करने वाले व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है। घर के अन्दर और बाहर सभी जगह मोटीवेशनल स्पीकरों की बाढ़ आई हुई है। प्रेरित करना अपने आपमें अलग व्यवसाय बन चुका है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में स्वयं उल्लेखनीय काम नहीं कर सके, वे दूसरों को उसी क्षेत्र में प्रेरित करते हुए दिखाई देेते हैं। यह भी रोजगार का एक अच्छा खासा क्षेत्र विकसित हो रहा है।

मेरे एक मित्र हैं, श्री विजय जी मेरे साथ वाणिज्य के अध्येता रहे। विभिन्न प्रयासों के बाद जब वे कोई व्यवस्थित रोेजगार हासिल नहीं कर सके, तब उन्होंने एक कोचिंग सेन्टर खोला; वह भी प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए तैयारी कराने के लिए उदाहरणार्थ; सी.ए., आई.सी.डब्ल्यू.( At present CMA), सी.एस. आदि। मैं जब उनसे मिला तो मैंने प्रश्न उठाया, जो कोर्स आपने स्वयं नहीं किए उनकी तैयारी कैसे करायेंगे? उन्होंने कहा, ‘ऐसी कोई आवश्यक शर्त  नहीं कि जो हमने नहीं किया, उसकी तैयारी दूसरों को नहीं करा सकते। मजबूरी में एक बार मैंने भी कोचिंग सेन्टर चलाने का प्रयास किया था किन्तु मेरा प्रयास केवल उन कक्षाओं के लिए था, जिन्हें मैंने उत्तीर्ण किया था। ये दोनों प्रयास भले ही सफल नहीं हुए किन्तु हम लोगों को अच्छा अनुभव मिला। वर्तमान समय में कोचिंग सेन्टर लाखों लोगों को सफलता के अवसर दिखा कर सफलता के झण्डे गाड़ रहे हैं।

एक कहावत है, ‘चलती का नाम गाड़ी है। यह ही वास्तव में जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। एक गतिविधि में सफलता को अन्त में सफलता नहीं कहा जा सकता। कोई भी एक गतिविधि हमें सफलता की अनुभूति नहीं करा सकती। एक गतिविधि की सफलता दूसरी गतिविधि का रास्ता खोलती है। गतिविधियों की क्रमबद्ध श्रंखला प्रक्रिया कहलाती है। हमारा जीवन अपने आपमें प्रकृति की एक प्रक्रिया है। प्रक्रिया की पूर्णता पर ही उस विशिष्ट प्रक्रिया की सफलता या असफलता का आकलन किया जा सकता है।

वास्तविक बात यह है कि प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक कारण का एक परिणाम होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक कार्य के मूल में कोई न कोई कारण होता है। कारण कार्य संबन्ध अविवादित है। यह सभी क्षेत्रों में स्वीकार है।

कार्य कारण संबन्ध के आधार पर प्रत्येक कर्म कारण है और उसका परिणाम कार्य के रूप में सामने आता है। कारण कार्य संबन्ध के आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक कर्म का परिणाम मिलता है और उस परिणाम को सफलता कहा जाता है।

प्रत्येक क्रिया का परिणाम होता ही है। इस प्रकार कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। कहने का आशय यह है कि कर्म करने पर सफलता भी अनिवार्य है। कर्म की सफलता परिणाम में होती है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि तेरा कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। इसका आशय है कि फल देने का काम प्रकृति का है। प्रकृति के नियमानुसार फल मिलेग। अतः हमें कर्म पर ही फोकस करना है, फल पर नहीं। क्योंकि फल देना तो प्रकृति का कर्म है। उस पर ध्यान देकर हम अपने कर्तव्य से क्यों डिगें? अपने कर्तव्य पथ पर अविचल चहलते रहना भी सफलता है। इसके लिए निरंतरता आवश्यक है।

असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती। कर्म के परिणाम स्वरूप या तो सफलता  प्राप्त होती है या प्रभावहीन परिणाम के कारण अनुभव मिलता है। अनुभव अपने आपमें सफलता है। 

 

 

 


प्रकृति कर्म के अनुसार फल देती है। कर्म की प्रबलता व निरंतरता हमारे लिए फल की मात्रा और गुणवत्ता को निर्धारित करती है। कोई भी कर्म निष्फल नहीं रहता। परिणाम कर्म की प्रबलता के अनुसार ही मिलेगा। यदि हमारे कर्म में प्रबंलता नहीं है या हम अपने कर्म में निरंतरता नहीं रख पाए हैं। तदनुसार मिलने वाला परिणाम भी प्रभावित होगा। कर्म की प्रबलता में कमी और निरंतरता टूटने पर परिणाम में भी प्रभावशीलता और स्थायित्व की कमी देखी जाती है, जिसे लोग असफलता कहने लगते हैं। वास्तविकता यह है कि असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती। कर्म के परिणाम स्वरूप या तो सफलता  प्राप्त होती है या प्रभावहीन परिणाम के कारण अनुभव मिलता है। अनुभव अपने आपमें सफलता है।

असफलता कहे जाने वाले परिणाम यह इंगित करते हैं कि कर्म की प्रबलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। उसको और अधिक प्रयासों और निरंतरता की आवश्यकता है। सफलता के निरंतर काम करते रहने के लिए एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका उल्लेख अक्सर हमारे वृद्धजनों द्वारा किया जाता रहा है-

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निशान।।

          उनका कहना होता है कि प्रयास करने से सबकुछ हो सकता है। बहुत सारी कविताएँ, श्लोक, महापुरूषों के आप्त वचन उनके द्वारा सुनाए जाते हैं। उनके अनुसार प्रयास करने से तो पत्थर से भी दूध निकाला जा सकता है। अब जिसको उपदेश सुनने पड़ रहे हैं, उसको इतना साहस तो नहीं होता कि पूछ सकें, ‘आपने कितनी बार पत्थर से दूध निकाला है?

पत्थर से दूध निकालने की बात करना ही प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। प्रकृति कभी असफल नहीं होती। प्रकृति के नियमानुसार हमारे द्वारा की गई प्रत्येक गतिविधि भी अनिवार्यतः समानुपातिक परिणाम लेकर आती है। प्रकृति में असफलता नाम की कोई चीज नहीं होती।

सफलता को प्राप्त करना नहीं, सफलता को समझना व स्वीकार करना अपने आपमें सफलता है।

 

 

 


जी हाँ! सफलता कोई मुश्किल या अप्राप्य वस्तु नहीं है। यह सभी को प्राप्त होती है। हम जीवन के कदम-कदम पर सफलता प्राप्त करते हैं। प्रति क्षण कुछ न कुछ करते हैं। उसका परिणाम योजना और अपेक्षा के अनुरूप प्राप्त होना ही तो सफलता है। सफलता इतनी बड़ी चीज नहीं है, जितनी बड़ी चीज इसको बना दिया जाता है। सफलता जीवन का आधार नहीं है बल्कि जीवन सफलता का आधार है। जीवन का लक्ष्य सफलता नहीं है, कर्म का लक्ष्य सफलता है। गीता के संदर्भ में बात करें तो कर्म अपने आपमें सफलता है। सफलता की अनुभूति के लिए परिणाम की आवश्यकता नहीं है। कर्म की पूर्णता ही सफलता है। सफलता को जीवन का लक्ष्य बना देने का परिणाम होता है कि लोग अपने जीवन को ही असफल मानकर आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठा लेते हैं। कई बार तो आत्महत्या में भी असफलता हाथ लगती है। जबकि जीना सरल है और जीने के लक्ष्य में हम हर क्षण सफल हो ही रहे हैं। स्वाभिमान पूर्वक जीने का हर क्षण अपने आपमें सफलता है।

            वास्तविकता यह नहीं है कि सफलता जीवन का लक्ष्य है। सामान्यतः प्रत्येक विद्यार्थी से यह पूछा जाता है कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है? प्रथम दृष्टया वह प्रश्न ही गलत है। जीवन और जीवन का लक्ष्य ही अपरिभाषित हैं। जीवन का लक्ष्य क्या है? इस प्रकार का भारी भरकम व गूढ़ प्रश्न को वह क्या जाने? लक्ष्य तो किसी गतिविधि का होता है। किसी कदम का होता है। किसी प्रयास का होता है। कारण के विश्लेषण के नहीं, कारण के कारण कार्य संपन्न होता है। हमें कहना यह चाहिए कि आपके इस प्रयास का लक्ष्य क्या है? आपके इस कदम का लक्ष्य क्या है? आपके इस प्रयास, कदम, गतिविधि का लक्ष्य क्या है? आप इस प्रकार के प्रयासों से क्या परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं?

 

 

सफलता निश्चित है| हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे।                             -स्वामी विवेकानन्द- 

 

 

 

 


असफलता नहीं, केवल सफलता-   

जी हाँ! असफलता प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। असफलता नाम की कोई वस्तु होती ही नहीं है। प्रकृति के नियम के अनुसार कारण होने पर कार्य अवश्य होता है। इसका कोई अपवाद नहीं होता। अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही इस बात को स्वीकार करते हैं। हमें या तो अपेक्षित परिणाम मिलता है या सीख मिलती है, जिसके आधार पर अपेक्षित परिणाम के लिए पुनः प्रयास किया जा सकता है। परिणाम को या तो हम सफलता के रूप में स्वीकार करें या आकड़ों के रूप में यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

एडिसन ने कहा- ‘मैं 1000 बार फेल नहीं हुआ। मैंने एक हजार तरीके खोजे जो अपेक्षित परिणाम नहीं देते।’                                 श्री कृष्ण ने ज्ञान के 1000 तरीके बताए। ज्ञान ही सफलता है। 

 

 

 


कोई भी कर्म असफल नहीं होता। यह केवल मोटीवेशनल वाक्य नहीं है। गीता और विज्ञान दोनों का सार है। हमें या तो सफलता मिलती है या अनुभव मिलता है। हम या तो जीतेंगे या सीखेंगे। प्रकृति फल निर्धारित नहीं करती। फल का निर्धारण हमारी गतिविधियों से होता है। इसी लिए कहा गया है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं है। हम अपने कर्म को निर्धारित कर सकते हैं किंतु उससे मिलने वाले फल को निर्धारित करने का काम हम नहीं कर सकते। यह अधिकार तो प्रकृति का है। प्रकृति असे स्वचालित रूप से करती है।

असफल या फेल होता ही नहीं है। यह शब्द अप्राकृतिक व असत्य है। वास्तविकता यह है कि असफल शब्द समाज द्वारा निर्मित लेबल है, जो व्यक्ति के ऊपर लगा दिया जाता है। समाज कहता है परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक नहीं मिले। असफल हो। समाज कहता है आईआईटी/नीट में चयन नहीं हुआ असफल हो। समाज कहता है नौकरी नहीं लगी। असफल हो। समाज कहता है तीस की उम्र तक शादी नहीं हुई। असफल हो। वास्तव में फेल होना स्वीकार करना परिणाम को अपनी पहचान बना लेना है। परिणाम तो आकड़ें हैं जो हमें अगली गतिविधि की योजना बनाने में मदद करते हैं। कोई भी परिणाम असफलता केवल उन लोगों के लिए है, जो यह मानते हैं कि उनका यह प्रयास जीवन का अन्तिम प्रयास था।

हमारा प्रत्येक प्रयास सुविचारित व सुनियोजित होना चाहिए। मानव विचारशाील प्राणी है। मस्तिष्क का कार्य विचार करना है। हमारा प्रत्येक कार्य मस्तिष्क के प्रयोग से प्रारंभ होना चाहिए। सामान्यतः ऐसा होता भी है, किंतु हम ऐसा अनजाने में करते हैं। मस्तिष्क का प्रयोग जानबूझकर सोच-विचारकर करने से ही सुविचारित विचार निकलकर आएगा। आकड़ों व तथ्यों का विश्लेषण करके, विकल्पों की खोज करके, विकल्पों का आकलन करके, सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करके, उस सर्वश्रेष्ठ विकल्प पर काम करके ही तो हम सुविचारित कार्य को संपन्न करने की और बढ़ सकते हैं। सुविचारित कार्य को संपन्न करना ही तो सफलता है। पूर्व-निर्धारित कार्य को पूर्व निर्धारित प्रक्रियानुसार  करते हुए अपेक्षित परिणामों तक पहुँचना ही तो सफलता है।

            सफलता न धन में हैं, न पद में है, न संबन्धों का सृजन करने में है और न ही यश में है। ये व्यक्ति को मजबूत नहीं कमजोर बनाते हैं। सफलता तो कर्म में है। हमारे द्वारा किए गए कर्म ही सफल होते हैं। हमारे द्वारा गिए गए कर्माे का परिणाम ही धन, पद, संबन्ध और यश के रूप में हमें प्राप्त होते हैं। कर्म और कर्म का फल दोनों मिलकर ही सफलता हैं।

            वास्तविकता यही है कि सफलता प्रति क्षण का सदुपयोग करने में है। सफलता जीवन को संपूर्णता से जीने में है और सफलता का मूल जीवन जीने की कला में है। आजीविका के साधन तो असंख्यों भरे पड़े हैं। हम केवल रोटी, कपड़ा और मकान से आगे धन, पद, संबन्ध और यश के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं किन्तु क्या इस सबमें भी हम वास्तविक संतुष्टि और आनंद प्राप्त कर पाते हैं?

कर्म के बिना किसी भी प्रकार का फल नहीं हो सकता। किए गए कर्म का प्रकृति के नियमानुसार फल प्राप्त होना ही सफलता है। सफलता आसमान का तारा नहीं, सफलता हमारे द्वारा किए गए कर्मो का परिणाम है। किए गए कर्मो का परिणाम अवश्य ही प्राप्त होता है। हमें उसे समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता है। जो कर्मशील व्यक्ति सफलता को समझ कर उसे स्वीकार कर लेते हैं, वे उसका जश्न मनाकर दूसरी सफलता की ओर बढ़ जाते हैं। जो सफलता का समझने और स्वीकार करने में असफल रहते हैं, वे अपनी सफलता को असफलता मानकर दुखी होते हैं और समय बर्बाद कर दूसरी असफलता के लिए काम करते हैं।

कोई भी परिणाम असफलता केवल उन लोगों के लिए है, जो यह मानते हैं, कि उनका यह प्रयास जीवन का अन्तिम प्रयास था।

  


प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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शुक्रवार, 15 मई 2026

‘लोग क्या कहेंगे?’

 सामान्यतः सफलता की चूहा दौड़ में व्यक्ति सफलता पाकर भी असफल ही रहता है। उसके सामने एक यक्ष प्रश्न सदैव बना रहता है-

‘लोग क्या कहेंगे?’

व्यक्ति की समस्त चिंताए इसी वाक्य के अधीन होती हैं कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे की चिंता के कारण, व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग नहीं कर पाता। इसके कारण वह चिंतित रहता है। इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह तनाव में जीता है।  इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह अवसाद में जाते हुए आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम भी उठा लेता है। लोग क्या कहेंगे? के कारण व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से लाभान्वित नहीं हो पाता। वह दूसरों से मान्यता के चक्कर में अपने सुखों को भी दुखों में परिवर्तित कर लेता है।

‘लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। राम फंस गए ‘लोग क्या कहेंगे?’ के जाल में, अब राज्य सुखी रहा या नहीं बाद की बात है। व्यक्तिगत सुख और परिवार की शांति तो समाप्त हो ही गई। यह सफलता तो नहीं ही कही जा सकती। यदि वास्तविक रूप से सफलता की अनुभूति करनी है। क्वालिया चाहिए तो लोग क्या कहेंगे? के जाल को तोड़ना होगा। लोगों का कहना कभी रोका नहीं जा सकता। वे कुछ ना कुछ कहेंगे ही किन्तु यदि उनकी सुनने लगे तो हम अपने कर्म में समर्पित नहीं हो पाएंगे। प्राप्त परिणाम की भी सफलता की अनुभूति नहीं कर पाएंगे।

जब हम ‘लोग क्या कहेंगे?’ के सामाजिक संदर्भ में सफल होना चाहते हैं। हम प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत स्तर पर असफल हो जाते हैं। हम व्यक्तिगत आकांक्षा और सोच को समाज को अर्पित कर देते हैं। हमारी आवश्यकताएं, विचारशील व्यक्ति अपनी सफलता का आकलन समाज के दृष्टिकोण से करे या अपने दृष्टिकोण से यह सदैव ही विमर्श का विषय रहा है।


बुधवार, 19 नवंबर 2025

गुरु तेग बहादुर शहीद दिवस पर विशेष

 गुरु तेग बहादुर के बलिदान की याद

                                       

शहीद दिवस एक ऐसा दिन है जब हम उन वीरों को याद करते हैं जिन्होंने देश की आजादी और संप्रभुता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह दिन हमें उनके बलिदान और त्याग की याद दिलाता है और हमें देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। इस अवसर पर हम गुरु तेग बहादुर के बलिदान को भी याद करते हैं, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की कुर्बानी दी। इस सन्दर्भ में पशोरा सिंह का कथन, ’अगर गुरु अर्जुन की शहादत ने सिख पन्थ को एक साथ लाने में मदद की थी, तो गुरु तेग बहादुर की शहादत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा को सिख पहचान बनाने में मदद की। वास्तव में गुरुजी का बलिदान केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए था। धर्म व मानवता के शाश्वत मूल्यों के लिए बलिदान सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में परम साहसिक कृत्य था।

गुरु तेग बहादुर का बलिदान केवल सिख धर्म के लिए नहीं था, बलिदान सम्पूर्ण मानवता के लिए था। उनके बलिदान के मूल में निम्नलिखित उद्देश्य माने जाते हैं-

१.      धर्म की रक्षा: गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब के इस्लाम धर्म अपनाने के दबाव को ठुकरा दिया और अपने धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया।

२.      मानवता के रक्षक: उनका बलिदान मानवता के लिए था, न कि केवल सिख धर्म के लिए। अपनी इच्छानुसार धार्मिक विश्वास का पालन करने के मानव अधिकार की स्थापना के पक्ष में बलिदान देकर, उन्होंने लोगों को प्रेम, एकता और भाईचारे का संदेश दिया।

३.      निर्भय आचरण: गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब के अत्याचारों के सामने कभी घुटने नहीं टेके और अपने र्म के प्रति अडिग रहे।

४.     आदर्श स्थापित: उनके बलिदान ने लोगों को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित किया और एक आदर्श स्थापित किया।

आओ आज उनके बलिदान दिवस पर उनसे प्रेरणा लेकर अपने आचरण में समाहित करें। गुरु तेग बहादुर का बलिदान आज भी प्रासंगिक है। आज भी लोगों को प्रेरित करता है और उनके आदर्शों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है 

गुरु तेग बहादुर का बलिदान सिख धर्म और मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी। उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनका बलिदान मानवता के लिए था, न कि केवल सिख धर्म के लिए। उन्होंने लोगों को प्रेम, एकता और भाईचारे का संदेश दिया।

शहीदी दिवस हमें उन शहीदों की याद दिलाता है जिन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी और अपने प्राणों की कुर्बानी दी। यह दिन हमें उनके बलिदान और त्याग की याद दिलाता है और हमें देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। गुरु तेग बहादुर का बलिदान भी इसी श्रृंखला में आता है, जिसने लोगों को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित किया।

शहीदी दिवस पर हम शहीदों को श्रद्धांजलि दे सकते हैं और उनके बलिदान को याद कर सकते हैं। स्मरण रहे श्रद्धांजलि देने और बलिदान को याद रखने मात्र से हमारे कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। हम देश के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करने का संकल्प ले सकते हैं और देश की उन्नति और समृद्धि के लिए काम कर सकते हैं। हम गुरु तेग बहादुर के आदर्शों को भी अपनाने का प्रयास कर सकते हैं और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प ले सकते हैं। इस प्रकार संकल्प लेकर अपने जीवन को समाज, देश और धर्म के लिए समर्पित कर अपने आचरण का भाग बनाकर पल-पल जीवन के लिए जीने की आवश्यकता है। हमें समझने की आवश्यकता है कि केवल देश व समाज के लिए मर जाना ही नहीं, देश व समाज के लिए प्रति क्षण जीना भी महत्वपूर्ण होता है। देश के विकास के लिए निजी हितों को परे रखते हुए सार्वजनिक हित के लिए जीने की प्रेरणा शहीद दिवस से लेनी चाहिए।

शहीदी दिवस एक ऐसा दिन है जब हम उन वीरों को याद करते हैं जिन्होंने देश की आजादी और संप्रभुता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह दिन हमें उनके बलिदान और त्याग की याद दिलाता है और हमें देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। आइए, हम शहीदों को श्रद्धांजलि दें और देश के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करने का संकल्प लें। 

* प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद&244601 (उत्तर प्रदेश),

 चलवार्ता 09996388169 -मेल : santoshgaurrashtrapremi@gmail.com , 

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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

दीपावली और पर्यावरण संरक्षण

 

दीपावली और पर्यावरण संरक्षण

 

दीपावली का त्योहार प्रकाश, सुख और समृद्धि का प्रतीक है, जो हमारे जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह भरता है। यह त्योहार हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है और हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। दीपावली की परंपराएं हमें तात्कालिक खुशियों की अनुभूति तो कराती हैं, लेकिन दीपावली की वर्तमान परंपराओं के साथ ही पर्यावरण पर भी काफी प्रभाव पड़ता है, जो हमारे लिए चिंता का विषय है। व्यक्ति और समाज दोनों पर ही हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि हम दीपावली का त्योहार मना रहे हैं तो पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखें और इसके लिए हमें कुछ विशेष प्रयास करने होंगे। आवश्यकतानुसार हमें अपनी परंपराओं का पुनरावलोकन करना होगा।

दीपावली के दौरान पटाखों के जलने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। पटाखों से निकलने वाले हानिकारक रसायन और ध्वनि प्रदूषण भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, पटाखों के अवशेष और अन्य कचरा भी पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। दीपावली के दौरान बढ़ते प्रदूषण के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में भी गिरावट आती है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है। खुशियों के लिए मनाए जाने वाले उत्सवों की परंपरा ही जब हमारे लिए खतरनाक बन जाएं, तब हमें अपनी खुशियां मनाने के तरीकों अर्थात परंपराओं के पुनरावलोकन और सुधार करने की आवश्यकता पड़ती है। स्वयं और समाज के हित में हमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन के लिए तैयार रहना ही होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और अनिवार्य भी है। परंपराएं भी परिवर्तन से अछूती नहीं रह सकतीं।

हमें स्मरण रखना होगा कि समाज के लिए परंपराएं महत्वापूर्ण तो हैं किन्तु सब कुछ नहीं हैं। हमें स्मरण रखना होगा, ’युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है। पुरूषार्थ ही युग का निर्माण करता है। एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही लकीरों व परंपराओं को बदलने की सामर्थ्य होती है। एफ़.डब्ल्यू.राबर्टसन के अनुसार, ’स्थिति एवं दशा मनुष्य का निर्माण नहीं करतीं, यह मनुष्य है जो स्थिति का निर्माण करता है। एक गुलाम स्वतन्त्र हो सकता है और सम्राट गुलाम बन सकता है।’(It is not the situation which makes the man, but the man makes the situation. The slave may be a free man. The monarch may be a slave.) अर्थात हम केवल परंपराओं के गुलाम बनकर अपने आप को और समाज को हानि नहीं पहुंचा सकते। आवश्यकतानुसार परंपराएं बदल सकते हैं। परिस्थितियों के अनुसार पर्यावरण के अनुकूल परंपराएं विकसित करने में ही हमारे पुरूषार्थ की सिद्धि है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या करें? इस पर गंभीरता पूर्वक विचार कर व्यक्तिगत व सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। केवल विचार-विमर्श से काम नहीं चलेगा, प्रभावी कार्य योजना, क्रियान्वयन और निरन्तरता बनाए रखकर, अपने आपको और पर्यावरण को सुरक्षित और स्वस्थ बनाएं रखने पर काम करते रहने की आवश्यकता है।  दीपावली के दौरान पर्यावरण संरक्षण के लिए हम कुछ आसान कदम उठा सकते हैं जो हमारे त्योहार को और भी अर्थपूर्ण बना सकते हैं:

 

पटाखों का कम उपयोग करें या पटाखों का उपयोग न करें-

दीपावली पर हम पटाखों का प्रयोग न करें और अपने साथियों को भी इसके लिए तैयार करें। यही नहीं, इनकी मात्रा कम करने और ग्रीन पटाखों का प्रयोग करने से भी नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। दीपावली के दौरान पटाखों का उपयोग कम करने से वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है। इसके बजाय, हम दीये जलाकर और रंगोली बनाकर त्योहार का आनंद ले सकते हैं। एक-दूसरे को अभिवादन करके एक-दूसरे के गले लगकर भी हम अपनी खुशियों को साझा कर सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सकेगा, बल्कि यह हमारे मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होगा।

दीये जलाएं, बिजली की लाइट्स का उपयोग करें

दीये जलाने से जहां एक ओर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता। दीए स्थानीय कलाकारों के लिए रोजगार का सृजन भी करते हैं, जो स्वदेशी को बढ़ावा देकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम भी करते हैं। देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना ही सही अर्थों में लक्ष्मी पूजन है। वहीं बिजली की लाइट्स का उपयोग भी ऊर्जा की बचत करने में मदद करता है, अगर हम एलईडी लाइट्स का उपयोग करें। इससे हमारे बिजली के बिल में भी कमी आएगी और पर्यावरण को भी लाभ होगा।

          पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग करें। हमें परिस्थितियों के परिवर्तन का ध्यान रखने की आवश्यकता है। हमें जीवन के लिए पर्यावरण के अनुकूलन पर काम करना होगा अन्यथा हम दीपावली मनाने के लिए स्वस्थ नहीं रह सकेंगे। दीपावली के दौरान गिफ्ट्स और सजावट के लिए पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग करने से पर्यावरण को नुकसान कम होता है। हम प्राकृतिक सामग्री जैसे कि फूल, पत्तियां, और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करके सजावट कर सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि हमारी सजावट भी आकर्षक और अनोखी लगेगी।

दीपावली के अवसर पर वृक्षारोपण करें। अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने और उसे स्मरणीय बनाने का अच्छा तरीका वृक्षारोपण हो सकता है। इससे आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति होगी। प्रसन्नता की अभिव्यक्ति के लिए दीपावली के अवसर पर वृक्षारोपण करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिससे पर्यावरण को लाभ पहुंच सकता है। वृक्ष वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं और हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। इससे हमारे आसपास की वायु शुद्ध होगी और पर्यावरण भी स्वस्थ रहेगा।

दीपावली प्रसन्नता का त्योहार है। यह हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने का सन्देश देता है। दीप जलाना प्रतीकात्मक रूप से अन्धकार से संघर्ष करने का सन्देश देता है। दीपावली अज्ञान रूपी अन्धकार पर ज्ञान रूपी प्रकाश की विजय की घोषणा करने का दिन है। आसुरी प्रवृत्तियों पर मानवीय मूल्यों की जीत का सन्देश देकर मार्गदर्शन करने का अवसर है। दीपावली का त्योहार हमें प्रकाश और सुख की ओर ले जाता है, लेकिन इसके साथ ही हमें पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखना चाहिए। आइए, दीपावली के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए हम सब मिलकर प्रयास करें और एक स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का सतत विकास करें। हमें अपने छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण को बचाने की कोशिश करनी चाहिए, जिससे हमारा भविष्य सुरक्षित हो सके। इस दीपावली पर, आइए हम पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें और उसके अनुसार कार्य करें।

बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

शिकारपुर की चौधराइन

 शिकारपुर की चौधराइन

चौधराइन अनूठी और अप्रतिम व्यक्तित्व की धनी महिला थीं। जो है, सो है; उन्हें कहने में कोई संकोच न होता। वे स्पष्टवादी अवश्य थीं, किंतु मुँहफट नहीं थीं। ईमानदार लोगों से संसार डरता है। उनके साथ भी मौहल्ले में ऐसा ही व्यवहार था। मैं उनको चौधराइन ही कहूँगा, हाँलांकि उनके सामने मैंने ऐसा कभी संबोधन नहीं किया था। हाँ, उनको चौधराइन और उनके पति को चौधरी जी के उपनाम से संबोधित करने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं है, क्योंकि मैंने उन पति और पत्नी दोनों के नाम जानने की कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी, समझने के लिए मैंने कभी अपने दिमाग का प्रयोग किया ही नहीं। परिस्थितियों के अधीन जो भी उपयुक्त लगा, कदम उठाया और आगे बढ़ता गया। खाई और पर्वत की कभी चिंता की ही नहीं।
चौधरी साहब का छोटा परिवार था। वे स्वयं, चौधराइन और उनके दो बच्चे सुमित और चंचल। सुमित जिसके नाम के प्रति मैं अपनी स्मरण शक्ति से पूरी तरह से निश्चित नहीं हूँ। सुमित मेरे विद्यालय में कक्षा 6 अ का विद्यार्थी था, जिस कक्षा का मैं कक्षाध्यापक भी था। उसी विद्यार्थी के कारण मेरी व्यवस्था उस घर में हुई थी। चंचल उसकी छोटी बहिन संभवतः तीसरी, चौथी या पाँचवी कक्षा की छात्रा रही होगी। चौधरी जी संभवतः एफसीआई के गोदाम में चौकीदार थे और उनकी ड्यूटी रात को रहती थी। मैं दिन में अपने विद्यालय में रहता था और वे दिन में सोते थे और रात को अपनी ड्यूटी पर रहते थे। उनको मैंने एक-दो बार ही देखा होगा। कभी किसी भी प्रकार की बातचीत भी हुई थी, मुझे स्मरण नहीं।
शैक्षणिक सत्र 97-98 में बेरोजगारी के उस दौर में भटकते हुए सरस्वती विद्या मन्दिर, शिकारपुर, उत्तर प्रदेश में टीजीटी हिंदी के रूप में कार्य करने का अवसर मिला था। शिकारपुर, जी हाँ, वही शिकारपुर जिसको लेकर मजाक उड़ाया जाता है। वैसे निजी विद्यालयों में सामान्यतः ग्रेड का कोई अधिक मतलब नहीं होता है, फिर भी उस विद्यालय में मेरी एक अनूठी स्थिति थी; साक्षात्कार के समय ही प्रबंधन ने स्पष्ट कर दिया था कि हम आपको टीजीटी का ग्रेड देंगे किंतु कक्षाएँ 12 वीं तक की पढ़वाएंगे। शिकारपुर से और क्या अपेक्षा की जा सकती थी? यथा नाम तथा गुण।
उसी विद्यालय में मेरे मित्र श्री विजय कुमार सारस्वत पहले से ही वाणिज्य पढ़ा रहे थे। उनके साथ भी यही हुआ था। प्रसन्नता के साथ स्वीकार करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। बेरोजगार व्यक्ति के समक्ष अस्वीकार करने का विकल्प कहाँ होता है? उस विद्यालय में अगस्त 97 में काम करना प्रारंभ कर दिया था और अप्रैल 98 में छोड़ दिया था। इस दौरान श्री विजय जी के द्वारा सदैव ही सहयोग किया गया। वे वहाँ पहले से ही थे। अतः किराए पर कमरा दिलवाने का काम उन्होंने ही किया। सबसे पहले उन्होंने अपने मकान मालिक से कहकर अपने वाले मकान में ही कमरा दिलवाया। विजय जी की पत्नी उनके साथ रहती थीं। विजय जी के माता-पिता ने उन्हें स्पष्ट रूप से निर्देशित किया था कि खाने की व्यवस्था वे अपने आप ही करेंगे और मुझे खाना नहीं बनाने देंगे। विजय जी की पत्नी ने खाना बनाने की जिम्मेदारी स्वयं पर ही रखी। वहाँ ठीक ठाक ही चल रहा था किन्तु उस मकान मालिक को अकेले व्यक्ति का अपने यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता था। अपने अध्ययन को ध्यान में रखकर मैं विद्यालय से अवकाश अधिक लेता था। यह मकान मालिक महोदय को ठीक नहीं लगा और शीघ्र ही दूसरे मुहल्ले में दूसरा कमरा लिया गया और अपने आप खाना बनाने की व्यवस्था की।
नए कमरे पर आए हुए कुछ ही दिन हुए होंगे कि एक दिन कक्षा 6 के एक विद्यार्थी ने संपर्क किया कि आचार्य जी मम्मी ने भेजा है। उन्होंने पुछवाया है कि क्या आप मुझे ट्यूशन पढ़ा देंगे? उस विद्यालय में अध्यापक को आचार्य कहने की ही परंपरा थी। ट्यूशन पढ़ाना मेरी प्रवृत्ति में नहीं रहा। मैंने मना कर दिया कि मैं ट्यूशन नहीं पढ़ाया करता। टालने के लिए सदभावना प्रकट करते हुए उससे कह दिया, ‘तुम्हें जरूरत हो तो वैसे ही शाम को आ जाया करो, तुम्हें बता दिया करूंगा।’
उस विद्यार्थी का नाम संभवतः सुमित था। पक्के तौर पर स्मरण नहीं। लगभग 27 वर्ष हो गए स्मृति धुँधली हो चुकी है। सुमित ने उसी शाम से आना प्रारंभ कर दिया। न चाहते हुए भी उसे पढ़ाना प्रारंभ करना पड़ा।
सुमित शाम को पढ़ने आता था। मेरा कमरा अत्यंत छोटा था और मेरा बिस्तर नीचे जमीन पर ही लगा होता था। बैठने के लिए चटाई व स्टूल कुछ भी नहीं था, कुर्सी की तो उस समय मैं, कल्पना ही नहीं कर सकता था। अतः रात को सोने और दिन में बैठने के लिए उसी बिस्तर का ही प्रयोग किया करता था। खाना बनाते समय ही उसे समेटा जाता था। एक-दिन कुछ रोटियाँ बच गईं थीं। मैंने सुमित को दे दीं कि वह अपनी भैंस को खिला दे। अगले दिन जब सुमित मेरे पास पढ़ने आया तो एक टिफिन में मेरे लिए खाना भी लेकर आया। मैंने चैककर पूछा, ‘खाना क्यों लाए हो?’
’मम्मी ने कहा है कि ऐसी रोटी खाकर तो आचार्य जी बीमार पड जाएंगे। आचार्य जी को खाना बनाना नहीं आता। उन्हें तू खाना खिलाकर आया कर।’ सुमित ने जबाब दिया। यह मेरे लिए अकल्पनीय था। बार-बार मना करने के बाबजूद वह नहीं माना और प्रतिदिन दोनों समय खाना लेकर आने लगा। ऐसे बार-बार आने से मुझे लगने लगा कि बच्चे का काफी समय बर्बाद होता है। अतः मैंने कहा, ‘बेटा! ऐसे बार-बार आने से समय खराब होता है। अपनी मम्मी से कहना कि यदि तुम्हारे घर में जगह हो तो मेरे लिए वहीं रहने की व्यवस्था कर लें। मैं यह कमरा छोड़कर तुम लोगों के यहाँ ही रह लूँगा।’
दूसरे दिन सुमित ने आकर बताया, ‘मम्मी ने कहा है, हम कमरा किराये पर नहीं उठाते। हमारे पास अच्छी व्यवस्था भी नहीं है। फिर भी आचार्य जी आकर हमारे मकान को देख लें। उन्हें ठीक लगेगा तो उनकी रहने की व्यवस्था अपने यहाँ कर लेंगे।’
मैंने उसके साथ जाकर देखा तो उनके मकान पर सीमेण्ट नहीं करवाया गया था। मकान ईंटों का था और नीचे कच्चा था। हाँ, बाहर वाले कमरे का एक दरवाजा बाहर खुलता था और एक अन्दर की और गैलरी में अंदर वे रहते थे और भैंस भी रखते थे। भैंस का दूध अपने लिए ही था, बेचने के लिए नहीं। संतोषी प्रवृत्ति का निष्कपट, निश्छल परिवार प्रतीत हुआ। ताम-झाम और प्रदर्शन से दूर। दो बच्चे थे- एक सुमित जो मेरी कक्षा में पढ़ता था और दूसरी उससे छोटी लड़की चंचल।
जब विजय जी से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि आप जिस घर में जाने की बात कर रहे हो। उस चौधराइन से मुहल्ले में सभी लोग डरते हैं उसका व्यवहार अक्खड़ है। उनसे बचकर रहना ही उचित है। मैंने उनकी जाति तो पूछी ही नहीं थी। जाति-विरादरी पर मेरा कभी भी ध्यान नहीं जाता। मैं जाति भेदभाव को मानता ही नहीं। विजय जी की इस बात ने मुझे और भी स्पष्ट कर दिया। मैंने विजय जी से कहा, ’जो लोग ईमानदार प्रकृति के होते हैं। उनमें बनावटीपन और विनम्रता की कमी पाई जाती है। वे जैसा है, वैसा बोल देते हैं। उनके साथ सामान्यतः ऐसा ही व्यवहार होता है। लोग उनके साथ बैठने-उठने से डरते हैं। सच्चाई से सबको डर लगता है। आपके सिवा मेरा भी कोई मित्र नहीं है ना। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि वह परिवार अच्छा है।   
’मैंने अपनी बात कह दी है, आगे आपकी इच्छा। सोच-समझकर निर्णय करना।’ कहकर विजय जी चले गए। मेरे लिए कमरा बदलने का निर्णय थोड़ा मुश्किल हो गया।
जिस कमरे में मैं रह रहा था, उसके मकान मालिक एक डाक्टर थे। डिग्री का तो पता नहीं किंतु वे वहीं कहीं स्थानीय प्रैक्टिस करते थे। ऐसा मेरी जानकारी में था। मुझे भी कुछ अस्वस्थता थी। मेरे सीने में दर्द की शिकायत हो रही थी। मैंने उनसे चर्चा की तो उन्होंने कहा। रविवार को मैं अपनी पत्नी को लेकर खुर्जा जा रहा हूँ। आप भी साथ चले चलना। ऐक्सरे करवा लेना। उनकी पत्नी अस्वस्थ भी हैं, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं था। मैं रविवार को उनके साथ चल पड़ा। उनकी बातचीत से उनका व्यवहार अजीब सा लग रहा था। किसी भी प्रकार की बीमारी की बातचीत नहीं हुई।
खुर्जा जाकर डाक्टर साहब के कहने पर मैंने अपना एक्सरा कराया। वहाँ जाकर पता चला कि उन्होंने अपनी पत्नी का अल्ट्रासाउंड कराया था। रास्ते में उन्होंने मुझे कहा कि किसी को बताना मत कि मैंने अपनी पत्नी का अल्ट्रासाउंड करवाया है। अगले सप्ताह ही वे अपनी पत्नी को गर्भपात के लिए लेकर गए। मुझे यह सब अनुचित व गैर कानूनी लग रहा था। किंतु मैं कुछ भी करने की स्थिति में नहीं था। अतः मुझे कमरा बदलने का निर्णय तुरंत करना पड़ा और मैं उस कमरे को छोड़कर चौधराइन के घर में आ गया। चौधराइन के घर मेरा कोई कमरा नहीं था। बाहरी कमरे में मेरे और सुमित के सोने की व्यवस्था की गई थी। मैं खाट पर सोना पसंद नहीं करता था। अतः मेरी वजह से दो तख्त खरीदे गए। एक मेरे लिए और एक सुमित के लिए। बिस्तर लगाने से लेकर, कपड़े धोने सहित खाना खिलाने तक की समस्त जिम्मेदारियाँ चौधराइन ने अपने ऊपर ले लीं थीं।
चौधराइन का मकान भले ही छोटा था, तामझाम और प्रदर्शन की भावना न होने के कारण आकर्षक भी न था किंतु उनका निश्छल, पवित्र प्रेम, निष्कपटता व सहयोग आज तक मुझे और कहीं देखने को नहीं मिला। जिस तरह सुविधापूर्वक वहाँ रहा, उस तरह सुविधापूर्वक आवास मेरी माताजी और पत्नी के साथ भी नसीब नहीं हुआ। चौधराइन की प्रत्येक माँ की तरह केवल अपने बेटे की पढ़ाई की अपेक्षा थी, जो मेरे लिए विशेष बात न थी। कितना किराया, खाने के कितने रुपए, दूध का हिसाब किताब वहाँ चर्चा का विषय कभी न बना। खर्चे सदैव मेरी अपेक्षा से कम ही रहे। परिवार की तरह ही नहीं परवार के सदस्य के रुप में सही अर्थो में मैं वहाँ रहा। कोई जिम्मेदारी नहीं, सभी प्रकार की देखभाल। इस तरह की कल्पना भी करना मेरे लिए संभव नहीं था।
व्यक्तिगत रूप से खान-पान में मेरी कोई विशेष माँग नहीं रहती। चौधराइन के द्वारा स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही भोजन बनाया जाता था। हम भले ही शिकारपुर कस्बे रह रहे थे, किंतु चौधराइन के यहाँ ग्रामीण रहन-सहन था। जो मुझे अत्यन्त प्रिय था। अपनापन था। हरी सब्जी अक्सर रहती थी। हरी सब्जी में घी डालना वे कभी नहीं भूलतीं थीं। घी के बिना हरी सब्जी खाना उनके लिए अशुभ था। वे दूध नहीं बेचतीं थीं किंतु मुझे दूध पिलाने की व्यवस्था उन्होंने स्वयं ही स्वीकार कर ली थी। उस समय मैं संभवतः आधा लीटर दूध की कीमत दिया करता था। मैं अक्सर पढ़ने-लिखने में दूध पीना भूल जाया करता था। वे कई-कई बार दूध गरम करके लाया करतीं थीं, क्योंकि ठण्डा दूध पिलाना उनको स्वीकार नहीं था, और मैंने अपने खान-पान पर कभी ध्यान दिया ही नहीं, उस समय दूध पर ही क्या देता?
मेरे और अपने बेटे के पढ़ने के लिए उन्होंने गैस का छोटा पेट्रोमेक्स खरीदवाया था। बाद में  दूध ठण्डा न हो जाय, इसे ध्यान में रखकर वे कई बार दूध के बर्तन को भी पेट्रोमेक्स के ऊपर रख दिया करतीं थीं। मुझे ध्यान नहीं देना था, नहीं दिया और अक्सर दूध की रबड़ी बन जाया करती थी। वे इतने पर भी कभी गुस्सा नहीं हुईं। पानी के बिना दूध केवल और केवल वहीं पीने को मिला। मेरी माताजी ने भी कभी मुझे बिना पानी का दूध नहीं पिलाया होगा। दूध बेचने वालों के यहाँ तो शायद भैंस और गाय ही दूध में पानी मिला दिया करती हैं अर्थात् बिना पानी का दूध मिलना लगभग असंभव है। रहीं सही कसर घर की महिलाएँ माँ, बहिन, पत्नी कोई भी हों, पूरी कर देती हैं। चौधराइन के लिए दूध का मतलब दूध था। पानी मिलाने का कोई मतलब ही नहीं।
चौधराइन लोभ-लालच से पूर्णतः मुक्त थीं। मैंने कभी उन्हें किसी प्रकार की शिकायत करते नहीं सुना। एक बार की बात है। उनके पति ने एक नई साइकिल खरीदी। वे शाम को नई साइकिल को लेकर अपनी ड्यूटी करने गए। सुबह जब आए जो उनका मुँह लटका हुआ था। उनके चेहरे से ही चिंता व निराशा झलक रही थी। चौधराइन ने मुस्कराकर पूछा, ‘क्या हुआ? इस प्रकार चेहरे पर बारह क्यों बजे हुए हैं?’
‘किसी ने मेरी साइकिल चुरा ली। चौधरी साहब ने डरते हुए बताया।’ ऐसी स्थिति में कोई भी पत्नी अपने पति पर आग-बबूला हो उठती, किंतु चौधराइन तो चौधराइन थीं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘इसमें सुस्त होने की क्या बात है? साइकिल एक दिन पुरानी हो गई थी। अब नई साईकिल खरीद लेना।’
इस तरह प्रसन्नता बिखेरने वाली महिला अपवाद स्वरूप हीं कहीं मिलेंगीं। सामान्यतः पति-पत्नी एक-दूसरे पर ताना कसने, व्यंग्य करने के अवसर ढूढ़ते हैं। सामान्यतः स्त्रियाँ खाना परोसकर खिलाने के लिए सामने बैठ जाती हैं और दिनभर की समस्याएँ सुनाना प्रारंभ कर देती हैं। अनजाने में ही वे पूरे प्रयास करती हैं कि सामने वाला खाना खा नहीं ले। उसे इतने तनाव देने की कोशिश करती हैं कि या तो वह खाना खाए ही नहीं, खा भी ले तो उसका पाचन तंत्र तनाव के कारण उसे पचा नहीं पाए।
चौधराइन बिल्कुल इसके उलट थीं। वे बड़े ही प्रेम से प्रसन्नतापूर्ण वातावरण बनाकर खाना खिलाया करती थीं। दोपहर को विद्यालय से वापस होते-होते मैं अक्सर तनाव में होता था। जवान खून था। तभी-तभी काम करना शुरू किया था। विद्यालय में विद्यार्थियों से अपेक्षित व्यवहार न पाकर मैं तनाव में ही वापस लौटता था। मेरी आदत रही है कि तनाव की स्थिति में मैं खाना नहीं खाता। वे मेरे और अपने बेटे के विद्यालय से वापसी की प्रतीक्षा कर रही होती थीं। उनका बेटा मुझसे पहले घर पहुँच जाया करता था। उसे मेरे पहुँचने से पूर्व ही खाना खिला चुकी होती थीं। मेरे पहुँचने पर उनका कहना होता, ‘आचार्य जी, मुँह-हाथ धो लीजिए। मैं खाना लगा देती हूँ।’
तनाव में रहने के कारण मेरा जबाब अक्सर यही रहता था, ‘मुझे खाना नहीं खाना।’
‘ठीक है कोई बात नहीं। आप मुँह हाथ धोकर बैठिए तो सही।’ यह कहकर वे मेरे पास ही बैठ जाया करतीं और सामान्य बातचीत करते हुए ऐसी बातें करतीं कि मुझे हँसी आ जाती। हँसी आने का मतलब तनाव का गायब होना। इसके बाद मुझसे कहतीं कि अब तो खाना खा लीजिए। मेरे पास खाना खाने के सिवाय और कोई विकल्प बचता ही कहाँ था। इस तरह प्रसन्नता और खाना दोनों एक साथ परोसने वाली देने वाली चौधराइन को भूलाया जाना संभव नहीं है।
चौधराइन अत्यंत लगलशील व परिश्रमी थीं। जो ठान लिया, उसे पूरा करके ही छोड़ना है। एक बार मेरे लिए स्वेटर बनाने का काम हाथ में लिया। स्वेटर के लिए ऊन खरीदकर लाईं। बुनना प्रारंभ कर दिया। दीपावली आने वाली थी। मैंने विद्यालय में बात करके दीपावली के लिए अवकाश स्वीकृत करा लिए और उन्हें शाम को बताया कि मैं कल अपने घर जाऊँगा। उनका स्वेटर अभी पूरा नहीं हुआ था। उन्होंने कहा, ‘आप अपनी मम्मी के पास जा रहे हो। यह स्वेटर तो आपको पहनाकर ही भेजूँगी। भले ही मुझे पूरी रात जागकर बुनना पड़े और संकल्प की धनी चौधराइन ने मुझे दूसरे दिन स्वेटर पहनाकर ही घर रवाना किया।’
चौधराइन आज भी मेरी स्मृतियों में हैं। हों भी, क्यों ना? वे थी ही विलक्षण व्यक्तित्व की धनी। वे पढ़ी-लिखी थी या नहीं? मुझे नहीं पता किंतु वे शिक्षित और सुसंस्कृत अवश्य थीं। यह उनके व्यवहार से ही प्रमाणित था। चौधराइन की तरह की विलक्षण व अप्रतिम महिला मैंने कोई दूसरी नहीं देखी। चौधराइन और उनका छोटा सा अनूठा प्रेम भरा वह परिवार मुझे आज भी याद है। उस घर में मैंने कभी चौधरी साहब को भी क्रोध में नहीं सुना। सुमित को भी डाँटने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी। हाँ! चंचल बिटिया में अवश्य ही बालसुलभ चंचलता थी। इच्छा होती है कि सुमित के समाचार लेने वापस शिकारपुर जाकर देखूँ। मैंने कई बार वहाँ जाने की योजना बनाई भी किंतु मेरे मित्र विजय जी ने मुझे बाद में बताया था कि वे अपना मकान बेचकर कहीं और चले गए हैं। बिना नाम पते के उन तक पहुँचना असंभव सा जानकर सुमित के समाचार जानने के प्रयत्न छोड़ने पड़े।