बुधवार, 19 जून 2024

भूतिनी

 मनोरंजक लोक प्रिय लोक कथा


प्राचीन काल की बात है। एक गाँव में एक संयुक्त परिवार रहता था। नई पीढ़ियों के साथ-साथ परदादा, परदादी, दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची से भरा-पूरा परिवार था। परिवार में गरीबी भले ही थी, किन्तु वे सभी आपस में प्रेम से रहते थे। अभाव के बीच भी, प्रेम का भाव उन्हें जोड़े हुए था। 

अन्य बच्चों के साथ-साथ परिवार में पाँच लड़कियाँ भी थीं। जिनके नाम क्रमशः टूटी, फटी, फीकी, मरी व भूतिनी थे। लड़कियों के नाम तो न जाने किसने कैसे रखे? किन्तु वही प्रचलित थे। गरीब परिवारों में नाम के लिए ज्यादा सोच विचार नहीं किया जाता। कहा भी जाता है कि नाम में क्या रखा है? समाज में जिस नाम से जाना जाने लगे। वही नाम महत्वपूर्ण हो जाता है।

जैसा पारंपरिक समाज में होता है। लड़कियों को जिम्मेदारी मानकर जल्दी से जल्दी शादी करके विदा करना होता है। लड़कियों को पराई अमानत माना जाता रहा है। अब पराई अमानत को जितनी जल्दी विदा कर उऋण हो लिया जाय। उतना अच्छा माना जाता है। लड़की की शादी करने के बाद गंगा स्नान की परंपरा भी रही है। इसी कड़ी में बड़ी लड़की भूतनी की शादी के प्रयास किए जाने लगे।

शादी के प्रयासों की श्रृंखला में एक दिन लड़के का परिवार लड़की को देखने आने वाला था। परिवार में पूरी तैयारी थी। गरीब परिवार था। अतः संसाधनों का अभाव ही था। अतः जैसे ही आए, उन्हें पूछा गया कि आप खाट(चारपाई) पर बैठना पसन्द करेंगे या चटाई पर?

लड़के वालों को लगा कि चारपाई ही ठीक रहेगी। अतः उन्होंने कहा, ‘खाट, पर ही बैठ जाएंगे।’

उस समय घर के अधिकांश लोग बाहर काम पर गए थे। घर में केवल लड़कियाँ ही थीं। अतः दादी ने अपनी छोटी लड़की को ही आवाज लगाई।

‘टूटी! खाट लेकर आ।’

लड़के वाले आश्चर्यचकित रह गए। हमको टूटी खाट पर बिठाया जाएगा। वे बोले, ‘नहीं, नहीं, आप खाट रहने दीजिए। हम चटाई पर ही बैठ जाएंगे।’

अब खाट के स्थान पर मेहमानों ने चटाई का चुनाव किया था। अतः दादी ने दूसरी लड़की को आवाज लगाई, ‘फटी! चटाई लेकर तो आ।’

    मेहमान सन्न रह गए। पहले टूटी खाट और अब फटी चटाई। वे बोले आप रहने दीजिए। हम तो जमीन पर ही बैठ जाते हैं, यह कहते हुए वे जमीन पर बैठ ही गए।

  जब मेहमान जमीन पर बैठ गए। उनको पानी पिलाने के बाद पूछा गया कि वे चाय पीना पसन्द करेंगे या दूध?’

 ‘हम चाय ही पी लेंगे।’ उनकी ओर से जवाब आया। 

अब तीसरी लड़की की बारी थी। अतः दादी ने आवाज लगाई, ‘फीकी! चाय लेकर आ।’

फीकी चाय का नाम सुनकर ही लड़के वालों का माथा चकराने लगा। 

‘नहीं, नहीं, आप चाय रहने दीजिए। हम दूध ही पी लेंगे।’ उनमें से एक ने कहा। 

काफी देर हो चुकी थी। अभी तक मेहमानों को जलपान भी नहीं कराया जा सका था। अब दादा ने ऊँचे स्वर में आवाज लगाते हुए कहा, ‘मरी! भेंस का दूध लेकर आ। जल्दी कर।’

‘मरी भेंस का दूध’ वाक्यांश सुनते ही, सभी मेहमानों ने एक स्वर में कहा, ‘नहीं, नहीं, हमें कुछ नहीं पीना। हमें जरूरी काम है और जल्दी जाना है। अतः आप जल्दी से लड़की को दिखा दीजिए।’ 

अब कोई विकल्प नहीं था। होने वाली दुल्हन को ही बुलाया जाना था। अतः पर-दादी ने आवाज लगाई, ‘अरे भाई! जल्दी से भूतनी को बुलाओ।’

भू्तिनी का नाम सुनते ही, सभी मेहमानों ने सरपट दौड़ लगा ली। लड़की के परिवार वाले समझ नहीं पा रहे थे। वे भाग क्यों रहे हैं! वे पीछे से आवाज लगा रहे थे, ‘ रूको! रूको! इतनी भी क्या जल्दी है! आप देखने आए हैं तो कम से कम भूतिनी को देखकर तो जाओ।’

 भागने वाले मेहमान पीछे मुड़कर देखने के लिए भी तैयार नहीं थे। 


प्रेम में मोबाइल

 अपनी-अपनी वजहें


मुरादाबाद जंक्शन का वातानुकूलित उच्च श्रेणी प्रतीक्षालय सामान्य रूप से भरा था। न तो बहुत अधिक भीड़ थी कि नवीन आगंतुकों के लिए स्थान ही न हो और न ही उसे खाली कहा जा सकता था। उसने प्रवेश करते ही प्रतीक्षालय में विहंगम दृष्टि डाली ताकि वह अपने लिए स्थान तलाश सके। चारों दिशाओं में उसके बैठने के लिए स्थान उपलब्ध था। एक यात्री के लिए स्थान ही कितना चाहिए? उसके पास तो सामान भी अधिक नहीं था। केवल एक बैग। उसने ऐसी सीट का चयन किया, जिस पर सीधे एसी की हवा न आ रही हो। वह सीधे एसी में बैठना कभी सुविधाजनक नहीं पाता। एक सीट पर अपना बैग रखा और दूसरी पर बैठ गया।

सामने जमीन पर एक व्यक्ति पड़ा हुआ था। उसके पास कोई सामान नहीं था। कपड़े भी बेतरतीव थे। अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि वह यात्री नहीं था। प्लेटफार्म पर पड़े रहकर समय पास कर रहा था। शायद अस्वस्थ रहा हो। कपड़ों से कुली लग रहा था। चारों तरफ बैठे यात्रियों में उसे कुछ विशेष दिखाई नहीं दिया। सामने की सीट पर जाकर उसकी दृष्टि ठहर गयी।

सामने की सीट पर दो किशोर और किशोरी, नहीं, शायद किशोरावस्था से युवावस्था में सद्य प्रवेशित युवक-युवती बैठे थे। बहुत अधिक सुन्दर नहीं कहा जा सकता था, किन्तु किशारावस्था व युवावस्था दोनों के आकर्षण व सौन्दर्य से परिपूर्ण थे। युवक युवती से लगातार बातें करने के प्रयास में था किन्तु युवती अपने मोबाइल में मशगूल थी। युवक की उपस्थिति उसे सुरक्षित अनुभव करा रही थी, तो युवक की उसे कोई चिन्ता नहीं था। युवक के प्रति उसके व्यवहार में एक लापरवाही प्रदर्शित हो रही थी। युवक के चेहरे पर उससे बातें करने की ललक और बैचेनी दोनों सहजता से देखी जा सकती थीं।

युवक-युवती के कंधे पर हाथ रखता है। युवती कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। काफी देर तक वह युवती के कंधे को सहलाता रहता है। युवक युवती को खींचकर अपनी तरफ करता है और युवती को अपने से सटा लेता है। युवती का सिर युवक के कंधे पर टिक जाता है। युवती की गतिविधियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह पूर्ववत अपने मोबाइल पर लगी रहती है।

युवक युवती के गाल को सहलाता है। युवती पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। युवक युवती के गाल को अपनी उँगलियों से मसलता है। युवती मोबाइल पर व्यस्त है। युवक की बैचेनी उसके चेहरे से स्पष्ट है। ऐसा लगता है कि वह युवती के आगोश में समा जाना चाहता है। वह युवती को जी-जान से चाहता है। युवती युवक की बाँहों में थी। युवती के कपोल युवक के मुँह के अत्यन्त निकट थे। ऐसा लगता था, अगले ही पल युवती के होठों पर अपने होठ रख देगा। सार्वजनिक स्थान के संकोच ने ही शायद उसे रोक रखा था। युवती को उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था, क्योंकि उसका पूरा ध्यान मोबाइल पर था। आसपास के परिवेश को तो क्या वह तो अपने प्रेमी को ही नहीं देख रही थी। वह उसके कपोलों से खेल भी रहा था; किन्तु युवती मोबाइल में ही लगी रही। जैसे उसे युवक की उपस्थिति का अहसास ही न हो।

इस दौरान युवक अपनी बोरियत दूर करने के लिए तीन बार बाहर निकल कर प्लेटफार्म पर जाकर चक्कर लगा आया था। युवती को आकर्षित करने के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे थे। अन्त में युवक ने झुंझलाकर, युवती के चेहरे को दोनों हाथों में लेकर कहा, ‘‘क्या जान! मैं केवल तुम्हारे लिए ही अपने घर को छोड़कर आया हूँ, और तुम हो कि मुझसे बात ही नहीं कर रहीं। केवल मोबाइल में लगी हो, जैसे तुम्हारे लिए मेरा कोई अस्तित्व ही न हो।’ 

इस बार युवती ने युवक को झिड़कते हुए जबाव दिया, ‘मैं मोबाइल की वजह से ही तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हें कुछ भी करने से रोक तो नहीं रही।’ और वह पुनः मोबाइल में मशगूल हो गई।

कथा लेखक को लगातार प्रेमी युगल पर नजर रखना कुछ अशिष्ट लग रहा था। अतः उसने कुछ देर के लिए अपनी दृष्टि दूसरी ओर कर ली। शायद! उसे झपकी आ गयी थी। जब उसने पुनः उन सीटों पर दृष्टि डाली। वे खाली थीं।


शनिवार, 1 जून 2024

बंधन(महासमर) नरेन्द्र कोहली से कुछ महत्वपूर्ण सीख

 ‘‘शारीरिक आकर्षण में एक-दूसरे के साथ बँधे रहना और चाहकर भी संबन्ध विच्छेद न कर पाना तो यातना है।’’

‘‘सुख यदि कहीं मिलता है तो केवल प्रेम में मिलता है। प्रेम भी वह, जिसमें प्रतिदान की कामना न हो, केवल दान ही दान हो।’’

‘‘पिता और पति में भेद होता है। नारी मन कहीं पिता को समर्थन देकर और पति का उल्लंघन कर तुष्टि पाता है। पति ही उसका निकटतम् मित्र है और वही उसका घोरतम शत्रु। पति-विजयिनी नारी ही तो स्वयं को सारे नियमों से मुक्त पाती है।’’

‘‘स्वार्थ तो स्वार्थ ही है, चाहे भौतिक सुख की दृष्टि से हो या आध्यात्मिक उत्थान की दृष्टि से...’’

‘‘न्याय और सत्य का सिद्धांत यह कहता है कि यदि हम अपने धनात्मक कार्य के लिए पुरस्कार की अपेक्षा करते हैं, तो अपने ऋणात्मक कार्य के लिए दण्ड की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। कर्म सिद्धांत को काटकर आधा मत करो। फल तो प्रत्येक कर्म का होगा- ऋणात्मक कर्म का भी और धनात्मक कर्म का भी। तुम एक को पुरस्कार कहते हो और एक को दण्ड। तुम्हें एक की अपेक्षा है, दूसरे की नहीं। प्रकृति के नियम सार्वभौमिक हैं, वे आंषिक सत्य नहीं हैं।’’

‘‘मित्रता भावना से होती है, कर्म से नहीं; और नीति सदा ही शत्रुता  और मित्रता से निरपेक्ष होती है।’’

‘‘निम्न कोटि के लोग अपनी आजीविका से भयभीत रहते हैं, मध्यम कोटि के मृत्यु से; और उत्तम कोटि के लोग केवल अपयष से।’’

‘‘प्रेमी का प्रेम अस्थिर होता है, आवेशपूर्ण होता है, किसी पहाड़ी नदी के समान! और पति का प्रेम धीर, गम्भीर होता है, गहरा और मन्थर- गंगा के समान। उसमें आवेश और उफान चाहे न आये, किन्तु वह सदा भरा पूरा है। वह अकस्मात बहाकर चाहे न ले जाये, किन्तु पार अवश्य उतारता है।’’

‘‘आदर न धन से मिलता है, न ज्ञान से, न यष से, न कुल से- आदर केवल आचरण से मिलता है।’’

‘‘नीति कहती है-‘सत्य बोलो।’ तो इसलिए नहीं कि सत्य बोलने से आकाश से अमृत टपकने लगेगा। वह हम इसलिए कहते हैं कि यदि समाज में सत्य बोलेंगे तो उनका परस्पर विश्वास बना रहेगा, व्यवहार में सुविधा रहेगी, जीवन में संघर्ष सरलता से पार किए जा सकेंगे; किन्तु यदि एक व्यक्ति दूसरे से झूठ बोलेगा, किसी को किसी के शब्द पर विश्वास नहीं रहेगा, तो सामाजिक व्यवहार में असुविधाएँ बढ़ जाएँगी, और यह परस्पर का अविश्वास उस समाज को नष्ट कर देगा।’’

                                                          बंधन(महासमर) नरेन्द्र कोहली 


मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

आओ कुछ पग साथ चलें

 जीवन का कोई नहीं ठिकाना, कैसे जीवन साथ चले?

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥


चन्द पलों को मिलते जग में, फ़िर आगे बढ़ जाते है।

स्वार्थ सबको साथ जोड़ते, झूठे रिश्ते-नाते हैं।

समय के साथ रोते सब यहां, समय मिले तब गाते हैं।

प्राणों से प्रिय कभी बोलते, कभी उन्हें मरवाते हैं।

अविश्वास भी साथ चलेगा, कुछ करते विश्वास चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥


कठिनाई कितनी हों? पथ में, राही को चलना होगा।

जीवन में खुशियां हो कितनी? अन्त समय मरना होगा।

कपट जाल है, पग-पग यहां पर, राही फ़िर भी चलना होगा।

प्रेम नाम पर सौदा करते, लुटेरों से लुटना होगा।

एकल भी तो नहीं रह सकते, पकड़ हाथ में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥


शादी भी धन्धा बन जातीं, मातृत्व बिक जाता है।

शिकार वही जो फ़से जाल में, शिकारी सदैव फ़साता है।

विश्वास बिन जीवन ना चलता, विश्वास ही धोखा खाता है।

मित्र स्वार्थ हित मृत्यु देता, दुश्मन मित्र बन जाता है।

कुछ ही पल का साथ भले हो, डाल गले में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥

शुक्रवार, 29 मार्च 2024

सहयोग की भावना पर हावी होता भय

  आज जसपुर उत्तराखंड से ठाकुरद्वारा बस से आ रहा था। बस में मेरी सीट से आगे की सीट पर बैठी महिला ने एक कागज का टुकड़ा दिखाते हुए मोबाइल नम्बर डायल करने के लिए कहा। मेरा अन्तर्मन सदैव महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए सहयोगी रहा है। लगभग २० वर्ष पूर्व तक आगे बढ़कर सहयोग करने वाला व्यक्ति महिलाओं से इतना भयभीत रहने लगा है कि अपरिचित महिला से तो बात करने में ही भय लगता है। 

व्यक्तिगत अनुभव व चन्द स्वार्थी, शातिर महिलाओं के कपट, षड्यन्त्रों व ब्लेक-मेलिंग की दिन-प्रतिदिन प्रकाशित व प्रसारित होने वाली अपराध कथाओं के कारण वास्तव में जरूरतमन्द महिलाओं की सहायता करना भी जोखिमपूर्ण लगता है। अब अपने आप को जोखिम में डालकर कौन सहायता करेगा?

प्रतिदिन ऐसी घटनाओं के समाचार आम हो गये हैं कि महिलाएं बातों में फ़सातीं हैं। झूठे मुकदमे लगाने की धमकी देती हैं या झूठे मुकदमे लगाकर बड़ी-बड़ी रकम वसूल कर बिना परिश्रम किए लग्जरी लाइफ़ जीने का भ्रम पालती हैं। इस तरह की आदत विकसित हो जाने के बाद ह्त्याएं भी करने लगती हैं। यही नहीं अन्ततः स्वयं भी किसी भयानक संकट में फ़ंसती हैं, यही नहीं मारी भी जाती हैं।

 वर्तमान में प्रेम के नाम पर लड़के को फ़ंसाना, उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना और फ़िर उसके ऊपर जबरदस्ती शादी का दबाव बनाना आम बात हो रही है। कई बार ऐसा भी होता है कि छिपकर मस्ती लेती रहती हैं और जब किसी को पता चल जाता है तो बलात्कार का अरोप लगा देती हैं। दहेज के झूठे मुकदमें तो बहुतायत में हो रहे हैं।अपनी कमियों को छिपाने और लड़कों कों लूटने के लिए दहेज कानून का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। स्थिति ऐसी बन रही हैं कि समझदार व सज्जन लड़के तो लड़्कियों से बात करने में भी डरते हैं। कई बार तो शादी करने से ही डर लगता है। ऐसी ब्लेक मेलिंग में फ़ंसने से तो अच्छा है कि शादी ही न की जाय।

    इस तरह की शातिराना आपराधिक षड्यन्त्र केवल लड़कियां ही नहीं करतीं, उम्र दराज महिलाएं भी करती हैं। कार्यालयों में काम के लिए कहने पर या अवकाश के लिए मना करने पर सेक्सुअल ह्रासमेन्ट की झूठी शिकायतें करते हुए भी देखी जाती हैं। अपने आपको महिला होने के कारण काम से बचने का प्रयास करती हैं। सभी महिलाएं ऐसी नहीं होतीं। कुछ कर्मठ व अपने काम के बल पर आगे बढ़ने वाली भी होती हैं। किन्तु शातिर व कामचोर महिलाओं के कारण उन्हें भी सहयोग करना मुश्किल हो जाता है। 

 कई बार तो पैसे के लालच में उनका परिवार भी ब्लेक मेलिंग के धन्धे में सम्मिलित हो जाता है। शादी के नाम पर किसी को फ़ंसाने और वसूली के लिए झूठे केस करने में परिवार भी सम्मिलित हो जाता है।  लुटेरी दुल्हन बनकर लूट करने का धन्धा अच्छे से फ़लफ़ूल रहा है। लगता है कि यही स्थितियां रहीं तो अगली शताब्दी में लड़के शादियां करना ही बन्द कर देंगे।

रविवार, 3 सितंबर 2023

शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य?

 भारत में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है। परंपरा के पालन में हम भारतवासी अंधभक्त हैं। बिना कारण को जाने परंपरा को निभाते रहने की हमारी फितरत रही है। नई पीढ़ी परंपराओं के प्रति कुछ अधिक श्रद्धावान नजर नहीं आती किंतु वह भी परंपराओं का निर्वाह अपने मनोरंजन के लिए करते हुए परंपरा की खिल्ली उड़ाती हुई दिखाई देती है। बाजारवाद ने भी परंपराओं का बाजारीकरण कर दिया है और परंपरा बाजार में बिकती हुई और व्यक्ति और सामाजिक जीवन से विदा होती हुई दिखाई देती है।

महापुरूषों की जयंतियाँ भी इसी प्रकार मनाई जाने वाली परंपरा मात्र बन गई हैं। बिना यह जाने कि जिस महापुरुष की जयंती हम मना रहे हैं, वह जयंती क्यों मना रहे हैं? समाज के लिए उनका योगदान क्या था? वे समाज को कैसा बनाना चाहते थे? उनकी अपनी भावी पीढ़ियों से क्या अपेक्षाएँ थीं? हम उनका सम्मान नहीं अपमान कर रहे होते हैं। यह ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार पति-पत्नी के समर्पण के लिए पत्नियों द्वारा रखा जाने वाले करवा चौथ का व्रत, व्रत न रहकर एक बाजारू उत्सव बन गया है। वह धनी महिलाओं व पुरूषों के लिए मनोरंजन व महँगे उपहारों के प्रदान करने व दंभ का दिन बन गया है। कुँआरी लड़कियाँ भी आनंद के लिए इस उत्सव में भागीदारी करने लगी हैं। यहाँ तक कि अपने पति की हत्या की योजना और उसका सफल क्रियान्वयन करने वाली महिलाएँ भी इस मनोरंजन उत्सव का आनंद लेती हुई देखी जा सकती हैं।
एक दिन मेरे एक मित्र का फोन आया कि फलां कर्मचारी स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने के कारण सीसीएल(क्षति पूरक अवकाश) की माँग कर रहा है, क्या किया जाना चाहिए? मुझे एक विद्यालय के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का स्मरण हो आया, किस प्रकार वह केवल कनिष्ठ विद्यार्थियों तक सीमित रह गया था। जिन विद्यार्थियों में वरिष्ठ होने का दंभ था, उन्होंने अपने आपको आयोजनों से दूर रखा। यही नहीं कार्यक्रम में अध्यापकों की और से बोलने वाले शिक्षक भी विद्यालय के सबसे कनिष्ठ व संविदा कर्मी थे। मैं आश्चर्य चकित रह गया। यह वही दिवस है, जिस दिन के लिए सैकड़ों वर्षो तक हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया था। अनगिनत लोगों ने अपना बचपन व जवानी खपा दी और असंख्य लोग शहीद हो गए। आज उनके वंशजों के लिए स्वतंत्रता दिवस एक छुट्टी मनाने का अवसर मात्र रह गया है! कक्षा 10, 11 व 12 के विद्यार्थी को स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों में भागीदारी करने में शर्म की अनुभूति होती हैं! महाविद्यालयों में तो औपचारिक ध्वजारोहण ही हो पाता है। अध्यापक स्वयं उसमें उत्साहपूर्वक भाग लेने की अपेक्षा छुट्टी के रूप में उपयोग करना चाहते हैं। हम किस प्रकार के नागरिक तैयार कर रहे हैं?
भारत को सात वार, नौ त्योहारों का देश कहा जाता रहा है। इसके पीछे सामाजिक मूल्यों को जिंदा रखने व विकास करने का दर्शन रहा है। परंपरा के अनुसार किसी दिवस को मनाने का उद्देश्य उस विशिष्ट दिवस से जुड़ी हुई यादों को स्मरण करते हुए व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में उन जीवन मूल्यों को बनाए रखने के प्रयास करना है। वर्तमान में हमने परंपराओं का बाजारीकरण कर दिया है या फिर हमारी तर्कशीलता ने उन पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। किसी उत्सव, जन्मदिवस या बलिदान दिवस के दिन उसके महत्व पर उसके द्वारा प्राप्त जीवन मूल्यों पर न चर्चा होती है और न ही हमारे काम में उसका कोई अहसास होता है। हम उसकी गंभीरता को भूलकर उसकी खिल्ली उड़ाते हुए देखे जाते हैं।
प्रसिद्ध विद्वान व संविधानविद डॉ अंबेडकर के जन्म दिन पर उनके संघर्षपूर्ण जीवन से सीख लेने या फिर उनके कार्यो के बारे में जानने और संविधान व कानून का पालन करते हुए अच्छे नागरिक के रूप में विकसित होने की अपेक्षा केवल मौजमस्ती के लिए केक काटने व छुट्टी मनाने वाले हम लोग उनका अपमान नहीं कर रहे तो और क्या है? सभी महापुरुषों की जयंतियों/बलिदान दिवसों के साथ हम यही तो कर रहे हैं। हम उनका अनुकरण करते हुए कर्मठ बनने की अपेक्षा उनके नाम पर छुट्टी मनाकर न केवल, उनका अपमान कर रहे होते हैं, वरन उनके द्वारा किए गए कार्यो का अनुकरण न करके उनकी खिल्ली उड़ा रहे होते हैं।
आज 3 सितंबर है। 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसी कड़ी में विद्यालयों में वरिष्ठ कक्षाओं के छात्र अपने से कनिष्ठ कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने का अभिनय करते हैं। मूलतः यह शिक्षण पेशे को सम्मान देने के लिए किया जाता है। वास्तविकता कुछ और ही है। शिक्षक के लिए यह दिवस एक प्रकार से आराम का और विद्यार्थियों के लिए मौजमस्ती का दिन हो जाता है। पिछले सप्ताह उत्तराखण्ड के एक सज्जन से वार्ता हो रही थी। अपनी आर्थिक मजबूरी का जिक्र कर वे बता रहे थे। किस प्रकार वे मजदूरी करके अपने घर को चला रहे हैं। बचपन से ही एक घर बनाने का प्रयास कर रहे हैं किंतु अभी तक पूर्ण नहीं कर पाए। उनके दो बच्चे हैं। दोनों का 600-600 रुपए मासिक शुल्क जाता है। विद्यालय के और खर्चे अलग। उन्होंने बताया कि जिस विद्यालय में उनका बच्चा कक्षा 12 में पढ़ता है, उसमें शिक्षक दिवस के नाम पर 700 रुपए प्रति छात्र लिए जा रहे हैं! वे दुखी होते हुए बता रहे थे, वे भी देने पड़ रहे हैं। विद्यालय में एक शादी की तरह आयोजन किया जा रहा है। 70-80 हजार तो टेंट पर ही खर्च किया जा रहा है।
मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई कि वे मजदूरी करके भी अपनी बच्ची को भी बराबर शिक्षा दिलवा रहे हैं। उन्होंने सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए अपनी बच्ची का नाम मिडडे मील खिलाने वाले विद्यालय में नहीं लिखवाया है। शिक्षा दिलवाने में लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं कर रहे। किंतु साथ ही अपने शिक्षक होने पर और ऐसी व्यवस्था का अंग होने पर अच्छा नहीं लगा कि शिक्षक दिवस के नाम पर इस प्रकार पैसे की बर्बादी, जिसके पक्ष में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्वयं कभी नहीं रहे। उनके कार्यो, उनके सामाजिक योगदान और उनके दर्शन पर चर्चा करने व अनुकरण करने के प्रयास की अपेक्षा, उसे मनोरंजन दिवस बनाकर उनके कार्यो व दर्शन का मजाक नहीं उड़ा रहे तो हम क्या कर रहे हैं? एक महान व्यक्तित्व के नाम पर एक मजदूर को 700 रुपए देने के लिए मजबूर करना, कहाँ तक उस व्यक्तित्व के चिंतन से मेल खाता है। यदि ऐसे छात्र को तथाकथित चंदे में छूट भी दे दी जाती है, तो भी क्या वह अपनी कक्षा के छात्रों के आगे हीनभावना से ग्रसित नहीं हो जाएगा। किसी भी महापुरुष की जयंती मनाने का यह तरीका संपूर्ण व्यवस्था पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर देता है!
लगभग 15 वर्ष पूर्व की बात स्मरण हो आती है। हरियाणा के एक विद्यालय में इसी प्रकार का एक आयोजन था। अध्यापकों ने एक विद्यार्थी को रात्रि में छत पर एक विद्यार्थी को शराब का सेवन करता हुआ पकड़ा। जब उस विद्यार्थी के पिता को बुलाया गया, उसके पिता की आँखों से आँसुओं की धार रूक नहीं रही थी। उनका कहना था कि दिन भर मजदूरी करके इसे पढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। स्कूल में फीस लगेगी, यह कहकर 500 रुपए लेकर आया था। मेरे पास नहीं थे। किसी से उधार लेकर दिए थे। अभी भी किराए के लिए उधार लाया हूँ। कुछ पढ़ लिख लिया है तो मुझे तो कुछ समझता ही नहीं है। यहीं एक तथ्य और निकल कर आया। जिस दुकान पर उस विद्यार्थी को पढ़ाने वाले शिक्षक बैठते थे, उस दुकानदार ने एक राज की बात बताई, ‘सर! ये अध्यापक लोग यहाँ बैठकर शराब पीते हैं। खाली बोतलों को इकट्ठा करके मैं महीने के अन्त में बेच देता हूँ।’
मेरे यह कहने पर कि तुम ऐसा क्यों करने देते हो? उसका उत्तर था, ‘मैं क्या कर सकता हूँ। मैं इंकार करूँगा तो मेरी दुकान ही बंद करवा देंगे। वास्तविकता यही थी कि वे अध्यापक विद्यार्थियों को प्रेरित करके पैसे इकट्ठे करवाते थे और विद्यार्थियों के साथ मौजमस्ती करते थे। विद्यालय को फेशन प्रदर्शन का स्थल समझने वाले शिक्षक/शिक्षिकाएँ किस प्रकार विद्यार्थियों को निर्धारित गणवेश में आने के लिए प्रेरित कर सकेंगे। जींस-टी शर्ट पहनकर कक्षाओं में जाने वाले अध्यापकों, स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस को एक छुट्टी मानने वाले अध्यापकों से समाज अपेक्षा ही क्या कर सकता है? इस प्रकार के हम शिक्षक लोग शिक्षक दिवस पर एक लेखक, शिक्षक व दार्शनिक के कार्यो के बारे में जानकारी देकर अपने विद्यार्थियों को प्रेरित कैसे कर सकते हैं? जबकि हम स्वयं ही पढ़ने-लिखने की आदतों को छोड़ चुके हैं।
इस शिक्षक दिवस के अवसर पर सभी शिक्षक साथियों से विनम्र अनुरोध है कि वे विचार करें कि क्या वे वास्तव में एक शिक्षक के रूप में ईमानदारी पूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं? कहीं अपने कर्तव्यों से भागकर केवल एक नौकर मात्र तो नहीं बन गए हैं? एक-एक कालांश को कम करवाने के लिए झगड़ने वाले शिक्षक को वास्तव में शिक्षण में मजा आता है? कक्षाओं में न जाने वाले शिक्षक वास्तव में ईमानदारी से स्वयं अपना ही आत्मावलोकन करने का प्रयास करके इस शिक्षक दिवस को उपयोगी बनाने और अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करने का प्रयास कर सकते हैं? कल ही एक कक्षा 6 की बच्ची ने संपूर्ण व्यवस्था पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया कि क्या हमें अध्यापक प्रार्थना सभा और कक्षाओं में हमारे संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक मूल्यों और संस्कारों के बारे में और अधिक जानकारी देने का प्रयास नहीं कर सकते? छोटी बच्ची का यह प्रश्न कि बड़ी कक्षाओं के भैया भले ही पढ़ाई में 100 में से 100 अंक ले आएं किन्तु यदि वे विद्यालय गणवेश पहनकर आने की आदत विकसित नहीं कर पाए, तो ऐसी शिक्षा का क्या मतलब है? वास्तव में यह प्रश्न शिक्षक, शिक्षालय व शिक्षा प्रणाली पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर देता है। शिक्षक दिवस पर हमें इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
यह एक यक्ष प्रश्न है कि वह बच्ची जो हमसे पाना चाहती है, क्या वह हमारे पास है? क्या हम उसे प्राप्त करने के प्रयत्न करते हैं? क्या हमने पिछले एक वर्ष में अपनी आय से पुस्तकों पर 1000 रुपए भी खर्च किए हैं? क्षमा करना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए खरीदी गई पुस्तकें इसमें सम्मिलित न करें। खरीदने की तो बात ही क्या है? पुस्तकालय से लेकर क्या हम हर महीने एक पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित कर सकते हैं? यदि शिक्षक दिवस पर इस प्रकार के प्रयत्न करने के प्रयास करने का संकल्प करते हैं, तो निःसन्देह शिक्षक दिवस को हम औचित्यपूर्ण बना सकते हैं अन्यथा हमारे शिक्षक होने पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है! इस प्रकार केवल परंपरा और मौजमस्ती के लिए शिक्षक दिवस मनाकर तो हम एक समर्पित शिक्षक, लेखक व दार्शनिक का सम्मान नहीं अपमान ही कर रहे हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार केवल अध्यापक के रूप में नियुक्त होकर हम अध्यापक के रूप में सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो जाते, सम्मान अपने कर्मा के द्वारा अर्जित करना पड़ता है। क्या वास्तव में हम ऐसा कर रहे हैं। निःसन्देह हममें से ही कुछ लोग ऐसा कर भी रहे हैं। उनका काम उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति का अहसास कराता है। हम सभी को आत्मावलोकन करना चाहिए हम कहाँ हैं? क्या हम भी अपने कर्तव्यों के द्वारा शिक्षक की गरिमा को प्राप्त करने के पथ पर आगे बढ़ने को तैयार हैं? तभी शिक्षक दिवस को औचित्यपूर्ण कहा जा सकेगा।


रविवार, 24 अप्रैल 2022

अपने लिए जिएं-१

 समाज सेवा और परोपकार के नाम पर घपलों की भरमार करने वाले महापुरूष परोपकारी होने और दूसरों के लिए जीने का दंभ भरते हैं। अपनी आत्मा की मोक्ष के लिए पूरी दुनिया को उपेक्षित करके तपस्या करने में तल्लीनता का दंभ भरने वाले स्वार्थी व्यक्ति अपने आपको महर्षि कहकर गौरवान्वित होने का प्रयत्न करते हैं। रंगे हुए कपड़े पहनकर बिना परिश्रम के संसार के सुख भोगने वाले मुफ्तखोर अपने आपको साधु कहलाने का दंभ भरते हैं। करोड़ों रूपयों में खेलने वाले अपने को त्यागी का नाम देते हैं। 

धार्मिक आस्था का सहारा लेकर भोली भाली युवतियों को फंसाकर उनके साथ रासलीला रचाने वाले अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संत कहलाते हैं। पकड़ने जाने पर भी जेलों में रहकर भी नहीं शर्माते हैं। उनके लाखों अंधभक्त उसके बावजूद उनके अनुयायी बने रहते हैं। अपने पेशे के साथ धोखाधड़ी करके धन कमाने के लिए मानवता को कलंकित करने वाले महापुरूष भी अपने को जनसेवक घोषित करते हैं। गरीब जनता से टेक्स के नाम पर धन इकट्ठा करके उसका दुरुपयोग करने वाले तथाकथित नेता अपने आपको जन सेवक ही नहीं, जननायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 

अपने शरीर का प्रदर्शन ही नहीं शरीर को सीढ़ियों की तरह प्रयोग करके किसी मुकाम पर पहुँचने वाली महिलाएं विदुषी कहलाती हैं और हमारी नई पीढ़ी की लड़कियों के लिए नायिका बन जाती हैं। पर्दे के पीछे पुरुषों को फसाकर मस्ती करने वाली तथाकथित भद्र महिलाएं सती सावित्री की कहानी सुनाकर भोली भाली युवतियों को मूर्ख बनाती हैं। प्रेमी संग मिलकर अपने ही पति की हत्या का षड्यंत्र रचने वाली स्त्रियाँ करवा चौथ का व्रत रखकर व्रत को कलंकित करती हैं। पैसे के लिए पारिवारिक संबन्धों को दाव पर लगाया जाता है और प्रेम के नाम पर ब्लेकमेल करते हुए धन ऐंठकर अपने आपको महान सिद्ध करने के प्रयत्न भी किए जाते हैं। आश्रमों और अनाथालयों के नाम पर देह व्यापार चलाने वाली महिलाएं और पुरुष समाज सेवा के नाम पर सरकारों व समाज को लूटते हैं। 

उपरोक्त कुछ उदाहरण मात्र हैं, जो समाज सेवा, जनसेवा, परोपकार या फिर ईश्वर के नाम पर किए जाते हैं। मंदिरों, मस्जिदों, चर्चो व अन्य पूजा स्थलों में दिनों दिन भीड़ बढ़ते हुए भी भ्रष्टाचार और बेईमानी क्यों बढ़ रही हैं। इन पूजा स्थलों में जाने वाले तथाकथित आस्तिक लोग अगर ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सदाचार को अपना लें तो कोई कारण नहीं कि भ्रष्टाचार, बेईमानी और सामूहिक दुष्कर्म जैसे कृत्य इस प्रकार बढ़ें। अतः आवश्यकता इस बात की है कि जनसेवा, समाजसेवा और धार्मिक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाते हुए अपने आपको महानता के चोगे से मुक्त कर अपने लिए जीना प्रारंभ करें।

हमें जनसेवा करने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करते हुए अपनी आजीविका कमाए और अपनी कमाई से ही अपने खर्चों का निर्वहन करें। हमें जनसेवा के नाम पर होने वाले चंदों की लूट से आश्रम ऐयाशी करने के स्थान पर अपने परिश्रम से कमाई रोटी खाकर अपने लिए काम करने और अपने लिए जीने की आवश्यकता है। हमें निपट स्वार्थी बनकर केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए काम करके आजीविका कमाने की आवश्यकता है। हमें जनसेवा, समाजसेवा और धर्म सेवा को तिलांजलि देकर अपने लिए जीकर स्वार्थी बनने की आवश्यकता है। हमें समाजसेवा के नाम पर, धर्म के नाम पर और राजनीति के नाम पर मुफ्तखोरी को रोककर सभी स्वार्थी बनकर स्वयं के लिए जीने की आवश्यकता है। हमें आवश्यकता है कि हम मुफ्तखोरी की बुराई से बचकर अपने लिए जिएं किसी को दान न करें किंतु ईमानदारी से अपने लिए स्वयं कमाएं। दूसरों के लिए नहीं, समाज के लिए नहीं, ईश्वर के लिए नहीं अपने लिए जिएं। ईमानदारी पूर्वक अपने लिए कमाएं और स्वयं कमाकर खाएं और संपत्ति का सृजन करें। आओ हम संकल्प करें कि हम अपने लिए जिएंगे अपने परिश्रम के द्वारा अपने स्वार्थो को पूरा करेंगे।