गुरुवार, 3 सितंबर 2026

स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण

 श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष

स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण

                                           © डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

भारत में स्वामी विवेकानंद सर्व स्वीकृत व समादृत देशभक्त संन्यासी हैं। उनका काल भले ही बीसवीं शताब्दी रहा हो, उनका प्रभाव व प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है। स्वामी विवेकानंद के विचार रूप कार्य भविष्योन्मुखी हैं। स्वामी जी शताब्दियों तक हमें न केवल अभिप्रेरित करते रहेंगे, वरन हमारे काम व जीवन को अपने आदर्शों पर चलने को मजबूर करते हुए विश्व को विकास पथ पर अग्रसर करते रहेंगे।

     कोई भी महान से महान व्यक्ति महानता के साथ पैदा नहीं होता वरन एक अबोध शिशु के रूप में ही जन्म लेता है। यह अलग बात है कि वह अपनी अबोधता को सुरक्षित रखते हुए संसार को महानता के पथ पर अग्रसर करते हुए, कब महानता को प्राप्त कर लिया, यह उसको स्वयं भी पता नहीं चलता। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। स्वामी जी ने भारत में जन्म लिया, भारतीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए अपना विकास किया। भारत के लिए चिंतन किया, भारत के लिए आजीवन कार्यरत रहे, भारत के लिए अपने संन्यासत्व को भी समर्पित कर दिया। महापुरुषों की तुलना नहीं की जा सकती, किन्तु स्वामी जी जैसा व्यक्तित्व केवल स्वामी जी का ही हो सकता है।

      स्वामी विवेकानंद ने भारत के दो महापुरुषों को अपना आदर्श माना था त्याग और वैराग्य के प्रतीक भगवान बुद्ध और कर्म तथा ज्ञान के समन्वय के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण। यदि बुद्ध उनके हृदय में करुणा के प्रतीक थे, तो कृष्ण उनके मस्तिष्क में ब्रह्मांड की समग्रता के प्रतीक थे। विवेकानंद के लिए कृष्ण कोई पौराणिक कथा-पुरुष नहीं, बल्कि भारत के इतिहास में सबसे पूर्ण मानव 'A Perfect Man' थे।

1. पूर्णावतार की अवधारणा

श्री कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। इस सन्दर्भ में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, "राम में त्याग है, पर कृष्ण में त्याग और भोग दोनों का विलक्षण समन्वय है।" (स्वामी विवेकानंद, कोलंबो से अल्मोड़ा व्याख्यान) राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे एक आदर्श राजा, आदर्श पुत्र हैं। पर कृष्ण में मर्यादा के साथ लीला भी है। वे बालक के रूप में चंचल हैं, सखा के रूप में नटखट हैं, प्रेमी के रूप में मधुर हैं, योद्धा के रूप में कठोर हैं और योगी के रूप में स्थितप्रज्ञ हैं।

स्वामीजी की दृष्टि में कृष्ण ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मानव जीवन की समग्रता को स्वीकार किया। उन्होंने जीवन से पलायन नहीं सिखाया। उन्होंने सिखाया संसार में रहो, पर संसार को अपने में मत रहने दो।

इसीलिए विवेकानंद उन्हें "The Most Comprehensive Character" कहते हैं।

2. गीता के कृष्ण कर्मयोग के प्रणेता

विवेकानंद के वेदांत का हृदय भगवद् गीता है, और गीता का हृदय कृष्ण हैं। विवेकानंद के अनुसार, श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के जटिल ब्रह्म-ज्ञान को कुरुक्षेत्र के रणांगण में खींचकर व्यावहारिक बना दिया। अर्जुन विषाद का प्रतीक है वह आधुनिक मनुष्य है जो कर्तव्य और मोह के बीच उलझा है। कृष्ण उससे यह नहीं कहते कि संन्यास ले लो, हिमालय चले जाओ। वे कहते हैं

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"

विवेकानंद इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यह श्लोक भारत की आलस्य-प्रवृत्ति के विरुद्ध सबसे बड़ी औषधि है। हमारे देश ने संन्यास को ही धर्म मान लिया, कर्म को तुच्छ समझा। कृष्ण ने कहा युद्ध करो, कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। यही कर्मयोग है। आज भी हर भारतीय को इसे समझने, आत्मसात करने और जीने की आवश्यकता है।

विवेकानंद का पूरा "दरिद्रनारायण" और "मानव सेवा" का सिद्धांत इसी पर टिका है अपना काम ईश्वर को अर्पण कर देना, यही पूजा है। स्वामी विवेकानन्द मूर्ति पूजा को निकृष्टम कोटि की भक्ति मानते हैं। वे कर्मशील बनने का आह्वान करते हैं।

3. प्रेम के कृष्ण भक्ति के आचार्य

सामान्यतः हम कृष्ण को मुरली वाले प्रेमी के रूप में देखते हैं। विवेकानंद भी कृष्ण के प्रेम-तत्व के अनन्य भक्त थे। उनका कहना था कि वृंदावन की गोपियों का प्रेम सर्वोच्च भक्ति है मधुर भाव।

इस प्रेम में कोई सौदा नहीं, कोई स्वर्ग की कामना नहीं। गोपियाँ कृष्ण से प्रेम करती हैं क्योंकि वे कृष्ण हैं, न कि वे कुछ देंगे इसलिए। विवेकानंद कहते हैं, "जब तक मनुष्य में ऐसा निःस्वार्थ प्रेम नहीं आता, तब तक भक्ति शुरू नहीं होती।"

पर विवेकानंद इस प्रेम को केवल रासलीला तक सीमित नहीं रखते। वे कहते हैं, यही प्रेम जब व्यापक हो जाता है तो वही विश्व-प्रेम बन जाता है। गोपियों ने कृष्ण में सब देखा, ज्ञानी को यही सब में कृष्ण देखना है। यही भक्ति से ज्ञान की ओर जाना है।

4. बुद्धिवादी कृष्ण अनंत ज्ञान के प्रतीक

विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल भावुक प्रेमी नहीं, वे अद्वितीय राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ और ज्ञानी भी हैं। महाभारत में कृष्ण की भूमिका देखिए वे बिना शस्त्र उठाए पूरी लड़ाई का संचालन करते हैं।

स्वामीजी युवाओं से कहते थे, "गीता पढ़ो, पर कृष्ण की बुद्धि को भी पढ़ो। कृष्ण ने कभी अन्याय से समझौता नहीं किया। वे शांतिदूत बनकर भी गए, पर जब अन्याय हठी हो गया तो युद्ध को ही धर्म कहा।" यह कृष्ण का धर्मो रक्षति रक्षितः का सिद्धांत है। विवेकानंद इसे आज के भारत के लिए प्रासंगिक मानते थे। उनका मानना था कि कमजोर बनकर अहिंसा का पालन करना कायरता है। पहले शक्तिशाली बनो, फिर क्षमा करो यही कृष्ण नीति है।

5. आज के युग में कृष्ण की प्रासंगिकता

विवेकानंद पूछते हैं आज भारत को किस कृष्ण की जरूरत है?

हमें उस मुरली वाले कृष्ण की नहीं, जो केवल वृंदावन में रास रचाए, बल्कि उस चक्रधारी कृष्ण की जरूरत है जो धर्म की स्थापना के लिए चक्र उठा सके। वे कहते थे, "यदि मैं गीता का कृष्ण बन सका होता, तो मैं केवल बांसुरी नहीं बजाता, मैं शंख भी बजाता। आज युवाओं को बांसुरी की मधुरता के साथ शंख की हुंकार की भी आवश्यकता है।"

विवेकानंद के अनुसार, श्रीकृष्ण का जीवन हमें तीन बातें सिखाता है जो आधुनिक भारत के लिए मंत्र हैं:

1.  चरित्र में समन्वय: बुद्धि में शंकर, हृदय में बुद्ध और कर्म में कृष्ण बनो।

2.  कर्तव्य में दृढ़ता: अपने स्वधर्म से पीछे मत हटो, चाहे कितना भी विषाद हो।

3.  प्रेम में व्यापकता: प्रेम केवल एक व्यक्ति से नहीं, पूरे विश्व से करो। कृष्ण से प्रेम करो तो हर प्राणी में कृष्ण देखो।

अंत में स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ही कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण के जीवन में हमें वैराग्य का चरम, ज्ञान का चरम, प्रेम का चरम और कर्म का चरम एक साथ मिलता है।" राम ने हमें सिखाया कैसे जीना चाहिए, कृष्ण ने सिखाया जीवन को कैसे जीतना चाहिए। बुद्ध ने हमें सिखाया त्याग क्या है, कृष्ण ने सिखाया त्याग के साथ जीवन का आनंद कैसे लेना है। इसीलिए विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल एक अवतार नहीं, एक संपूर्ण जीवन-दर्शन हैं जो संन्यासी को भी राह दिखाता है और गृहस्थ को भी, जो प्रेमी को भी तृप्त करता है और योद्धा को भी प्रेरणा देता है। यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा।

"यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा जहाँ मुरली के माधुर्य के साथ चक्र की निर्भयता भी हो।"

@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

बेब ठिकाना www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in, ww.rashtrapremi.webpress.com

 


 

 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

सफलता का स्वतंत्र विश्लेषण, संश्लेषण और अन्वेषण

                            🙏 दिवाकर गौड़, शोध अध्येता

मानव जन्म से ही दार्शनिक प्राणी है। जितने दार्शनिक, उतने दर्शन। कितने दार्शनिक सीमा नहीं, अतः असीमित दार्शनिक असीमित दर्शन। ये असीमित दर्शन भी व्यक्ति को भ्रम में नहीं डालते, वरन प्रकृति के निरंतरता के नियम को ही सुनिश्चित करते हैं। विज्ञान और दर्शन को एक-दूसरे का सहयोगी और पूरक बनाते हैं। दोनों में ही विश्लेषण भी है और संश्लेषण भी। अतः इस पाठ में हम कुछ विश्लेषण करते हुए उनका संश्लेषण करने का एक और प्रयास करते हैं। यह विश्लेषण और संश्लेषण भी हमें किसी अन्वेषण की ओर ले जा सकता है या नहीं, यह भी हमारे दृष्टिकोण का विषय ही होगा। उसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता का निर्धारण भी पाठक की स्वयं की स्वतंत्रता पर निर्भर करेगा, क्योंकि स्वतंत्रता ही दर्शन का आधार है। अस्तित्ववाद के अनुसार व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है और स्वतंत्र रहने के लिए ही अभिशप्त है।

विश्लेषण और संश्लेषण की प्रक्रिया का प्रयोग ही प्रसिद्ध दार्शनिक जी.डब्ल्यू.एफ. हेगेल की द्वंद्वात्मक पद्धिति में भी है। हेगेल के अनुसार सत्य स्थिर नहीं है। यह सदैव विकसित होता है। विकास की प्रक्रिया वाद(Thesis), प्रतिवाद(Antithesi) और संवाद (Synthesis) है। यह विश्लेषण और संश्लेषण के द्वारा ही आगे बढ़ती है। वाद और प्रतिवाद विश्लेषण की प्रक्रिया का ही भाग है। यही भौतिक और अभौतिक विकास का क्रम है।

प्रकृति का नियम, इच्छित परिणाम का वादा नहीं

नौ मीटर और नौ सेकंड दोनों में “नौ“ हैं, फिर भी इन्हें जोड़ा नहीं जा सकता। जो इन्हें जोड़ बैठता है, वह संख्या के धोखे में आ जाता है। “प्रकृति में सफलता या असफलता नहीं होती; हर कर्म का परिणाम या फल होता है, जो अवश्य मिलता है।’’ सफलता या असफलता प्रकृति की नहीं, मनुष्य की निर्मिति है। प्रकृति के नियमानुसार परिणाम या फल मिलता है। सफलता या असफलता के मानदण्ड व्यक्ति के अपने होते हैं। इसके मूल में एक सच्चाई है; लेकिन इस सच्चाई और इससे निकाले गए निष्कर्ष के बीच एक छलाँग छिपी है। यह छलांग प्रकृति नहीं कर्ता को लगानी है। उसी छलांग के आधार पर वह अपनी सफलता या असफलता का निर्धारण स्वयं ही करता है।


भाग एक:

फल, पर कौन-सा फल?

संरक्षण का नियम: “कोई कर्म निष्फल नहीं“ का सच्चा अर्थ

पहले उस सच्चाई को पूरे मन से स्वीकार करें, जो ‘कर्म के परिणाम की अनिवार्यता’ के दावे के मूल में है। भौतिकी का ऊर्जा-संरक्षण नियम, सचमुच यह सुनिश्चित करता है कि हर क्रिया के पीछे कुछ-न-कुछ परिणाम अवश्य आता है। ऊर्जा न बनती है, न नष्ट होती है केवल रूप बदलती है। परिवर्तन का नियम यही कहता है। इस अर्थ में “कोई कर्म निष्फल नहीं होता“ यह एक वैज्ञानिक तथ्य है, कोरा उपदेश नहीं। यह केवल दार्शनिक चिंतन मात्र नहीं है, यह वैज्ञानिक तथ्य भी है। तथ्य को सत्य के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है।


संरक्षण का नियम फल के ’गुण’ के प्रति उदासीन है।

समस्या अगले कदम पर है। ऊर्जा-संरक्षण का नियम यह तो कहता है कि “परिणाम अवश्य प्राप्त होगा“, लेकिन यह बिल्कुल नहीं कहता कि “परिणाम अच्छा होगा“ क्योंकि अच्छा या बुरा व्यक्ति सापेक्ष है। प्रकृति तो निरपेक्ष है। जिसे अचेतन माना जाता है। एक विस्फोट ऊर्जा को उतनी ही पूर्णता से संरक्षित करता है जितनी पूर्णता से एक धड़कता हुआ हृदय। जो नियम फल की उपस्थिति की गारंटी देता है, वह फल के स्वाद के विषय में मौन है। “फल मिलना“ और “अच्छा फल मिलना“ ये दो भिन्न विमाओं की राशियाँ हैं। सड़ा फल भी फल है। अच्छा या बुरा, खट्टा या मीठा, सुंदर या असुंदर, कड़ा या सड़ा; इसको तो व्यक्ति अपने विचारों की दुनिया में स्वयं ही गढ़ता है। यदि सफलता का अर्थ केवल “किसी परिणाम का आना“ है, तो यह परिभाषा इतनी विशाल हो जाती है कि व्यक्ति के दृष्टिकोण से निरर्थक प्रतीत होने लगती है, किन्तु समष्टि में सब कुछ तथ्य हैं और तथ्य, तथ्य होते हैं, जिन्हें स्वीकार किया जाता है।

दूसरा नियम: सड़ा फल ही प्रकृति की प्राथमिकता है

ऊष्मा गतिकी का दूसरा नियम कहता है: संरक्षण के साथ संगत, असंख्य संभव परिणामों में से व्यवस्थित, उपयोगी, सुगठित परिणाम (अच्छे फल) अत्यल्प हैं; और अव्यवस्थित, बिखरे, क्षीण-परिणाम (सड़े फल) असंख्य हैं। इसी अव्यवस्था की माप को एन्ट्रॉपी कहते हैं, और प्रकृति का स्वाभाविक झुकाव सदा एन्ट्रॉपी बढ़ाने की ओर है। यदि प्रकृति के चक्र को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, तो हर तंत्र अव्यवस्था की ओर ढलता है। कमरा स्वयं व्यवस्थित नहीं होता, बिखरता है, उसे व्यवस्थित करना पड़ता है। टूटा अंडा स्वयं नहीं जुड़ता; अंडे का संरक्षण व उपयोग व्यक्ति को करना पड़ता है। गरम चाय, स्वयं गरम नहीं रहती, वह प्रति क्षण ठंडी होती रहती है। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसे गरम करता या रखता है। यह व्यक्ति सापेक्ष है कि उसे चाय कब और कितनी गरम चाहिए।

एन्ट्रॉपी के विरुद्ध संघर्ष

एंट्रॉपी का अर्थ चौंका देने वाला है: प्रकृति सफलता/असफलता को केवल “अनुमति“ नहीं देती उसकी ’अंतर्निहित प्राथमिकता ही’ क्षय है, बिखराव है, सड़ा फल है। सड़ा फल व्यक्ति के लिए है। प्रकृति के लिए वह परिवर्तन मात्र है। अच्छा फल प्रकृति का स्वाभाविक उपहार नहीं; वह एक स्थानीय, क्षणिक, अत्यंत असंभाव्य अपवाद है, जिसे ढलान के विरुद्ध बल लगाकर गढ़ना पड़ता है। अच्छा और बुरा व्यक्ति का अपना विचार है। अतः अपनी अच्छे और बुरे की परिभाषा के अनुसार अच्छा प्राप्त करने के लिए अपने सचेतन प्रयासों से अपने अनुरूप परिणाम प्राप्त करने के प्रयास व्यक्ति करता है। प्रकृति के अनुसार उन प्रयासों के भी परिणाम मिलते हैं। प्रकृति के लिए, विज्ञान के लिए कुछ भी अच्छा या बुरा होता ही नहीं है। उसके लिए क्षय नहीं, केवल परिवर्तन है; क्योंकि ऊर्जा का क्षय नहीं होता, रूप परिवर्तन होता है।

’प्रकृति का स्वभाव परिवर्तन है, असफलता है, और सफलता, उस ढलान के विरुद्ध, स्थानीय रूप से, व्यक्ति के द्वारा अपने परिश्रम से अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप गढ़ा गया चमत्कार है।’ एक जीवित कोशिका, एक सधा हुआ शरीर, एक सुलझा हुआ प्रमेय, ये सब अव्यवस्था के सागर में व्यवस्था के द्वीप हैं, और इन्हें बनाए रखने की कीमत निरंतर चुकानी पड़ती है। श्रोडिंगर ने अपनी पुस्तक “जीवन क्या है?“ में कहा था कि जीव मुक्त ऊर्जा पर जीता है अर्थात् वह निरंतर अपने भीतर व्यवस्था भरता रहता है, अन्यथा क्षण-भर में बिखर जाए।

इस दृष्टिकोण से ’श्रम, निरंतरता और धैर्य’ कोरे सदुपदेश नहीं रह जाते; वे ठीक वही बल बन जाते हैं जो एन्ट्रॉपी से लड़ने के लिए अनिवार्य है। हम निरंतर परिश्रम इसलिए करते हैं क्योंकि जिस क्षण हम रुकते हैं, ढलान अपना काम कर देती है। निरंतरता कोई नैतिक सजावट नहीं, वह व्यवस्था को बनाए रखने की भौतिक शर्त है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, किंतु इस परिवर्तन की दशा व दिशा का निर्धारण व्यक्ति अपने सचेतन प्रयासों से करने में सक्षम है और वह करता भी है।

प्रकृति का “वादा“ भी निश्चितता नहीं, एक वितरण है

प्रकृति का गहनतम स्तर (क्वांटम स्तर) यह बताता है कि एक ही कारण से सदा एक ही निश्चित परिणाम नहीं निकलता; निकलता है परिणामों का एक वितरण, संभावनाओं का एक परास(विस्तार)। बड़े पैमाने पर यह यादृच्छिकता प्रायः ढँक जाती है और संसार नियति बद्ध-सा दिखता है, अतः यह कहना भूल होगी कि “जीवन महज़ संयोग है।“ बात इतनी-सी है: प्रकृति हमें एक निश्चित अच्छा फल नहीं, बल्कि फलों का एक वितरण थमाती है, और उस वितरण का बड़ा भाग वह है, जिसे व्यक्ति सड़ा हुआ मानता है। जिसे वह अपनी असफलता मानता है। व्यक्ति के लिए यहीं एक मार्मिक विडंबना है। 

गीता का श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन“ वह वस्तुतः इसी भौतिक सत्य के निकट है। कृष्ण कहते हैं, फल पर तेरा अधिकार है ही नहीं। इसका आशय यह है कि फल कर्ता की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, यह आवश्यक नहीं। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि फल अवश्य मीठा होगा; उन्होंने कहा कि फल तेरे वश में नहीं। गीता “अच्छे फल का वादा“ नहीं करती, वह फल से हमारा मोह छुड़ाती है। ’’प्रकृति फल का वादा करती है, अच्छे फल का नहीं। अच्छा फल ढलान के विरुद्ध, सतत श्रम से गढ़ा गया एक स्थानीय चमत्कार है और यही सचेतन कर्म की गरिमा है। गरिमा ही सफलता है।’’

भाग दो: दार्शनिक भी एकमत नहीं

अर्जुन, सार्त्र के दृष्टिकोण से-

गीता कहती है अर्जुन को युद्ध करना चाहिए, क्योंकि यह उसका ’स्वधर्म’ है; क्षत्रिय होना उसका जन्मगत स्वभाव है। अब इसी अर्जुन को सार्त्र के दृष्टिकोण से देखिए। सार्त्र के लिए “मैं योद्धा हूँ, इसलिए मुझे लड़ना ही है“ यह वाक्य ’आत्मवंचना’ का पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है। अपनी स्वतंत्रता से भागकर एक दी हुई भूमिका के पीछे छिप जाना।

 सार्त्र के अनुसार मनुष्य का कोई पूर्व निर्धारित स्वभाव होता ही नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्र है। वह स्वयं को गढ़ता है। अपने आपको स्वयं बनाता है और उसके लिए स्वयं ही उत्तरदाई होता है और यही प्रामाणिक जीवन है। एक ही अर्जुन, एक ही रणभूमि, और दो ठीक विपरीत निदान। दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते। किन्तु यहाँ सत्य व्यक्ति सापेक्ष है और स्वधर्म के श्री कृष्ण के दृष्टिकोण से क्षत्रिय होना सत्य है और सार्त्र के दृष्टिकोण से अर्जुन स्वतंत्र है, उसका जन्मगत कोई स्वभाव नहीं है। अनुभववादियों के अनुसार वह कोरी स्लेट है, जिस पर जो भी लिखना है; उसके लिए व्यक्ति परम स्वतंत्र है। अतः यहाँ पर आकर सच्चाई की परिभाषा व्यक्ति सापेक्ष हो जाती है। सच्चाई की परिभाषा व्यक्ति सापेक्ष होने के कारण सफलता भी व्यक्ति सापेक्ष है।

कांट बनाम महाभारत

कांट अपने प्रसिद्ध ‘कर्तव्य के लिए कर्तव्य’ सिद्धांत में कहता है कि द्वार पर खड़े हत्यारे से भी, अपने मित्र का जीवन बचाने के लिए भी, झूठ बोलना वर्जित है। सत्य एक सार्वभौमिक कर्तव्य है, परिणाम चाहे जो भी हो। परिणाम को देखकर सही किया तो वह नैतिक निरपेक्ष आदेश के अन्तर्गत नहीं आता। दूसरी ओर महाभारत में कृष्ण धर्म की विजय के लिए “अश्वत्थामाहतः“ जैसे अर्धसत्य रूपी छल का समर्थन करते हैं। यहाँ भी स्पष्ट है कि व्यक्ति को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होगा। कोई भी मार्ग पूर्व-निर्धारित नहीं है। कांट के पथ पर चलना है या कृष्ण के पथ पर या फिर अपना स्वयं का तीसरा ही मार्ग बनाना है। इसका निर्णय कर्ता व्यक्ति स्वयं है। उसके परिणामों का भोक्ता भी वह स्वयं ही होगा। सफलता या असफलता को मानना और स्वीकार करना भी उसका अपना निर्णय होगा।

कांट बनाम नीत्शे: सार्वभौम नियम बनाम मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन

नीत्शे कांट से विनम्रता पूर्वक असहमत नहीं होता, वह कांटीय नैतिकता पर ’प्रहार’ करता है, उसे “झुंड की नैतिकता“ कहता है। कांट कहता है, केवल उसी नियम पर चलो जिसे तुम सार्वभाैिमक बना सको; नीत्शे कहता है, यही सार्व भौम झुंड-नैतिकता वह बेड़ी है जिसे श्रेष्ठ मनुष्य को तोड़ना है, “अपने मूल्य स्वयं गढ़ो।“ ये दो शैलियाँ एक ही विचार के दो रूप नहीं हैं; एक दूसरे का ध्वंस करने के लिए बनी है, ऐसा भी नहीं है। ये दृष्टिकोण हैं, जो व्यक्ति को अपने मूल्य स्वयं गढ़ने की स्वतंत्रता देते हैं। अपना मार्ग स्वयं चुनने की आजादी का उपभोग करने के लिए प्रेरित करते हैं। किसी व्यक्ति को यह विचार करने के लिए मजबूर करते हैं, कि वह अनुपम है और उसे किसी पूर्व निर्धारित मार्ग पर नहीं, स्वयं निर्धारित किए गए या स्वीकार किए गए मार्ग पर चलकर स्वयं ही अपनी यात्रा का आनंद लेना है। वह स्वीकार करे या निर्धारित करे। उसके लिए उत्तरदायी और भोक्ता स्वयं ही है और इस उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकता। यही उसकी प्रामाणिकता है।

स्टोइक बनाम सार्त्र: नियति है भी या नहीं?

एक कहता है, जो निश्चित है उसे प्रेम से स्वीकार करो; दूसरा कहता है, कुछ भी निश्चित नहीं, सब तेरा चुनाव है। ये दोनों इस मूल प्रश्न पर ही भिड़ जाते हैं कि “स्वीकार करने योग्य कोई नियति है भी या नहीं।“ और यह असहमति ही वरदान है। यह टकराव ही विकास का दर्शन है।

    यदि संसार के श्रेष्ठतम मस्तिष्क भी, यह तय नहीं कर सके कि सफलता क्या है? तो कोई गुरु तुम्हें बना-बनाया उत्तर नहीं थमा सकता; वह चुनाव अनिवार्यतः तुम्हारा अपना है। यही तो सबसे बड़ी सफलता का अपना ’स्वतंत्र चयन’ और प्रामाणिकता का सिद्धांत है, पर कुछ भी घोषित नहीं, सबकुछ स्वयं के द्वारा अर्जित। महान दार्शनिकों का सफलता की परिभाषा पर एकमत न होना सफलता की परिभाषा में दरार नहीं, उसकी सबसे बड़ी छूट है, यह तुम्हें अपनी सफलता स्वयं परिभाषित करने का अधिकार सौंपती है। आप किस कर्म के परिणाम को सफलता के रूप में स्वीकार करते हो, किस परिणाम को असफलता मानते हो; किस परिणाम से अनुभव की सीख लेते हो और किस परिणाम पर रोते हो, यह आपका अपना अधिकार क्षेत्र, आपका अपना निर्णय और आपकी अपनी सफलता है।  

    सफलता की आकांक्षा से पहले यह निर्धारित कीजिए कि ’सफलता’ से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? उसके लिए योजना बनाइए और उसका क्रियान्वयन करिए। उसके बाद कर्म के परिणाम को प्राप्त कर आप अपनी सफलता का दावा कर सकते हो, क्योंकि प्रकृति प्रत्येक कर्म के परिणाम की गारंटी देती है। उसकी सफलता या असफलता या अनुभव आपके अपने हैं।

    प्रकृति हमें कर्मफल का आश्वासन देती है, हमारे द्वारा इच्छित फल का नहीं, और महान से महान दार्शनिक हमें प्रश्न देते हैं, उत्तर नहीं; उत्तर खोजने के लिए तो हम ही हैं। शेष कार्य ’अच्छा फल गढ़ना, और अपनी सफलता स्वयं परिभाषित करना’ हमारा अपना कार्यक्षेत्र है। यही, मेरी दृष्टि में, कर्म की सबसे बड़ी गरिमा है। यही गरिमा व्यक्ति की गरिमा है। यह गरिमा ही सफलता है।



/आई.आई.टी. गांधीनगर, गुजरात


सोमवार, 29 जून 2026

तनाव का मूल-लोग क्या कहेंगे?

 

लोग क्या कहेंगे?’

                                                                    ©डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

Rounded Rectangle: जन सामान्य कानून से नहीं ‘लोग क्या कहेंगे?’ से संचालित होता है। कानून टूटने पर सजा मिले यह आवश्यक नहीं, किन्तु लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही, यह अनिवार्य है। लोगों से अच्छा सुनने की आकांक्षा ही, हमें तथाकथित अच्छाई करने के लिए प्रेरित करती है।
 

 

 

 

 


सफलता के मानक बड़े ही विचित्र और विविधतापूर्ण होते हैं। एक व्यक्ति की सफलता दूसरे व्यक्ति के लिए असफलता हो सकती है। एक विद्यार्थी उत्तीर्ण होने के अंक अर्थात् 33 प्रतिशत प्राप्त कर अपने आपको सफल मान सकता है, जबकि दूसरा 70 प्रतिशत अंक पाकर अपने आपको असफल मान सकता है। ग्राहक की सफलता इस बात में है कि वह अच्छी से अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तु कम से कम मूल्य पर प्राप्त कर ले, जबकि दूसरी ओर विक्रेता की सफलता इस बात में है कि वह अपने समस्त सामान(जिसमें खराब गुणवत्ता और औसत गुणवत्ता का सामान भी सम्मिलित है) को अधिकतम मूल्य पर बेच दे। यह सफलता का मापदण्ड व्यक्तिगत व व्यावसायिक दृष्टि से हो सकता है, किन्तु यह वास्तविक सफलता नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर संतुष्टि और प्रसन्नता होती है, सफलता के लिए सामाजिक स्वीकृति या मान्यता की आवश्यकता होती है।

                जन सामान्य कानून से नहीं लोग क्या कहेंगे?’ से संचालित होता है। कानून टूटने पर सजा मिले यह आवश्यक नहीं, किन्तु लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही, यह अनिवार्य है। लोगों से अच्छा सुनना ही हमें तथाकथित अच्छाई करने को प्रेरित करता है। कानून का पालन करने की आदत सामान्यतः नहीं पाई जाती। हम सामान्यतः अपने आसपास रहने वाले जन समुदाय को असंतुष्ट नहीं करना चाहते। विश्व के बहुत बड़े भाग में आज भी स्थानीय समुदाय, पंचायत या अन्य किसी भी नाम से जाना जाता हो; कानून से अधिक प्रभावी होता है। जन जातियों व खाप पंचायतों का दबदबा आज भी कम नहीं हुआ है।

                एक बार मैं अपनी पत्नी के साथ बातचीत कर रहा था। आम महिलाओं का बातचीत का सबसे पसंदीदा विषय वस्त्राभूषण रहता है। वह आभूषणों की बात कर रही थी। आभूषणों के लिए उसकी ललक को देखकर, मैंने उसकी माँग से भी अधिक आभूषणों का सशर्त प्रस्ताव रखा। शर्त यह थी कि वह उन आभूषणों की स्वामिनी होगी किन्तु न किसी को उन आभूषणों के बारे में बताएगी और न ही किसी के सामने पहनेगी। आभूषणों की स्वीकृति से उसके चेहरे पर जो प्रसन्नता की चमक आई थी, वह शर्तो को सुनकर गायब हो गई और स्पष्ट रूप से बोली, ‘ऐसे आभूषणों का मैं क्या करूँगी?’ महिलाएँ दूसरों को दिखाने के लिए ही वस्त्राभूषण लेती हैं। जब दूसरी महिलाएँ उन्हें देखकर ईर्ष्या महसूस करती हैं, तभी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। जब तक दूसरे लोग सराहना न करें, तब तक उन आभूषणों का क्या मतलब?

                यही बात सफलता के ऊपर लागू होती है। सफलता का निर्धारण भी लोगों के कहने से ही होता है। जितने अधिक लोग सराहना करें, उतनी बड़ी सफलता। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जितने अधिक लोग हमारी सफलता से ईर्ष्या करेंगे, वह उतनी महत्वपूर्ण सफलता। हम लोगों को जलन पैदा करने के लिए ही प्रदर्शन करने का काम करते हैं। यही कारण है कि हम लोगों को दिखाने के लिए अपनी सफलता का जश्न बड़े स्तर पर मनाते हैं, भले ही उन्हें उस जश्न के लिए कर्ज क्यों न लेना पड़े। लोग सफलता को इज्जत से जोड़ते हैं और इज्जत के लिए लोग क्या-क्या नहीं कर गुजरते!

                कहने का आशय यह है कि सफलता व्यक्ति की उपलब्धियों से अधिक इस बात पर निर्भर है कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे, यही महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के काम, उपलब्धियाँ और परिणाम की सफलता लोगों के कहने पर निर्भर करती है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि व्यक्ति की सफलता या असफलता का आकलन सामाजिक संदर्भ में किया जाता है।

समाज जिसे सफल समझता है, उसे हम सफल स्वीकार कर लेते हैं। समाज जिसे असफल कहता है, उसे हम असफल मान लेते हैं। समाज क्या है? भीड़ जिसका एक मत हो ही नहीं सकता। अतः उनमें से कुछ प्रभावशाली व्यक्ति अपने मत को समाज के मत रूप में आरोपित कर देते हैं। व्यक्ति मान लेता है कि जब समाज ही इस पक्ष में है तो मैं क्या कर सकता हूँ? ऑनर किलिंग जैसे अपराध समाज के नाम पर ही किए जाते हैं। ऐसे में गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श की आवश्यकता है कि कहीं हम समाज के नाम पर असामाजिक तत्वों के चंगुल में तो नहीं फंस रहे हैं।

व्यक्ति को स्पष्ट रूप से समझना होगा कि समाज का प्रतिनिधित्व असामाजिक लोग नहीं करते। जो व्यक्ति व परिवार के हित में नहीं है, वह कभी भी सामाजिक नहीं हो सकता। अतः निःसन्देह सफलता का जश्न मनाने के लिए अपने आस-पास के लोगों की आवश्यकता है किन्तु वे लोग ऐसे ही होने चाहिए जिनको वास्तव में आपकी सफलता से प्रसन्नता हो रही है तथा जिन्होंने आपकी सफलता में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया है। जिन लोगों को आपकी सफलता से ईर्ष्या होती है या हो सकती है, ऐसे लोगों से दूरी बनाकर चलने में ही सुरक्षा है। ऐसे लोगों को जलाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में आमंत्रित करना तथाकथित सफलता के लिए खतरनाक हो सकता है।

सामाजिक संदर्भ में सफलता-

सफलता के संदर्भ में सामाजिक संदर्भ महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्य जन सफलता की समाज की दी हुई परिभाषा को ही स्वीकार करता है। उसी के आधार पर टिप्पणी आती हैं कि फलां व्यक्ति ने सफलता हासिल कर ली है। समाज की दृष्टि से पद, पैसा, संपत्ति और प्रसिद्धि सफलता का मापदण्ड होती है। इस प्रकार की सफलता में भी नारीवाद के दृष्टिकोण से भेद होता है। पुरुष के लिए जहाँ सफलता के मानक पद, पैसा, संपत्ति और प्रसिद्धि होते हैं, वहीं महिला के लिए सफलता शादी और बच्चों से मानी जाती है। हालांकि वर्तमान समय में इन मानकों में अंतर आ रहा है। इस प्रकार के सफलता के मानक बाह्य होते हैं। अतः तुलना सरल है। सफलता की इस रेस में अधिकांश लोग दोड़ सकते हैं। किंतु सफलता की इस चूहों की दौड़ में जीतकर भी खालीपन ही हाथ लगता है। आंकड़े भले ही दिखाए जा सकते हों। आंतरिक अनुभूति का पक्ष अर्थात क्वालिया(व्यक्तिगत स्तर पर आंतरिक सचेतन अनुभूति) नहीं होता।

सामान्यतः सफलता की चूहा दौड़ में व्यक्ति सफलता पाकर भी असफल ही रहता है। उसके सामने एक यक्ष प्रश्न सदैव बना रहता है-

लोग क्या कहेंगे?’

व्यक्ति की समस्त चिंताएं इसी वाक्य के अधीन होती हैं कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे की चिंता के कारण, व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग नहीं कर पाता। इसके कारण वह चिंतित रहता है। इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह तनाव में जीता है।  इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह अवसाद में जाते हुए आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम भी उठा लेता है। लोग क्या कहेंगे? के कारण व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से लाभान्वित नहीं हो पाता। वह दूसरों से मान्यता के चक्कर में अपने सुखों को भी दुखों में परिवर्तित कर लेता है।

लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। राम फंस गए लोग क्या कहेंगे?’ के जाल में, अब राज्य सुखी रहा या नहीं बाद की बात है। व्यक्तिगत सुख और परिवार की शांति तो समाप्त हो ही गई। यह सफलता तो नहीं ही कही जा सकती। यदि वास्तविक रूप से सफलता की अनुभूति करनी है। क्वालिया, (क्वालिया दर्शन में प्रयुक्त एक शब्द है, जो अहसास या अनुभूति के अर्थ में प्रयुक्त होता है। लाल रंग का क्वालिया, आंख बन्द करके भी लाल दिखना है। गीता के अनुसार अनासक्त कर्म शांति का क्वालिया देता है।) चाहिए तो लोग क्या कहंेगे के जाल को तोड़ना होगा।

लोगों का कहना कभी रोका नहीं जा सकता। वे कुछ ना कुछ कहेंगे ही किन्तु यदि उनकी सुनने लगे तो हम अपने कर्म में समर्पित नहीं हो पाएंगे। प्राप्त परिणाम की भी सफलता की अनुभूति नहीं कर पाएंगे।

जब हम लोग क्या कहेंगे?’ के सामाजिक संदर्भ में सफल होना चाहते हैं। हम प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत स्तर पर असफल हो जाते हैं। हम स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अपने अस्तित्व को नकारते हैं और अपनी प्रामाणिकता को खो देते हैं। हम व्यक्तिगत आकांक्षा और सोच को समाज को अर्पित कर देते हैं। हमारी व्यक्तिगत आवश्यकताओं का निर्धारण समाज नामक अनिश्चित, अनियोजित, असीमित व निर्दय जन भावना की आकांक्षाओं से होने लगता है, तो व्यक्ति दो पाटों के बीच में पिसने लगता है।

दो पाटों के बीच में साबुत बचा न कोय।

कबीरदास जी ने बहुत पहले लिख दिया कि दो पाटों के बीच में आज तक कोई साबुत बचा है, जो हम बचेंगे। व्यष्टि और समष्टि दोंनो के बीच में फंसकर किसी भी व्यक्ति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। अस्तित्व ही नहीं रहेगा, तो हम अपना जीवन कैसे बनाएंगे? जीवन का सार कहाँ रहेगा? आप कितना भी अच्छा कर लीजिए, समाज को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे। अपने आपको संतुष्ट करना और समाज को संतुष्ट करना दोंनो ही विरोधाभासी लक्ष्य हैं। इनमें समन्वय बनाकर अपने आपको जीवंत बनाए रखने वाला व्यक्ति ही जीवित, सक्रिय व विकसित अवस्था में रह सकता है। व्यक्ति न तो समाज के बिना अपने आपमें अकेला जी सकता है और न ही अपने आपको समाप्त कर केवल समाज के असीमित निर्देशों, अनिश्चित आकांक्षाओ और निर्दय आलोचनाओं के कारण अपने आपको मारकर जी सकता है।

व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या भूख नहीं है। व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या कपड़ा भी नहीं है। व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या आवास की समस्या नहीं है। रोटी, कपड़ा और मकान भले ही मूलभूत समस्या मानी जाती हों किन्तु इनका समाधान व्यक्ति अपने स्तर पर अपने आप कर ही सकता है। ये तनाव, अवसाद और आत्महत्या के कारण नहीं होते। व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी समस्या समाज में सम्मान की समस्या है, जिसका कोई निर्धारित मानक, पैमाना या मापदण्ड नहीं है। कानून का सम्मान करते हुए किसी देश का अच्छा नागरिक बनकर जीवनयापन करते हुए अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए अपना सार निर्मित व सिद्ध किया जा सकता है किन्तु लोग क्या कहेंगे?’ के यक्ष प्रश्न को झेलते हुए जीना अत्यन्त मुश्किल कार्य है।

Rounded Rectangle: ‘लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। उसकी बात सुनकर पारिवारिक जीवन असफल।लोग क्या कहेंगे? सार्वकालिक प्रभावशाली शक्ति है। यह सभी समुदायों में कमोबेश प्रभाव रखता है। लोगों को ध्यान में रखकर ही हमारी अधिकांश गतिविधि प्रभावित होती हैं। दूसरों से तुलना करके व्यवहार को प्रभावित करने की कला को आपवादिक रूप से कुछ लोग ही अस्वीकार कर पायेंगे। उन्हंे भी लोगों की मानसिकता को नजर अंदाज करने के लिए अपने आपसे जूझना पड़ता है।

 

 

 

 

 

 

लोग क्या कहेंगे?’ प्रश्न को छोड़कर समाज में जीना असंभव जैसा होता है। इस प्रश्न के साथ तनाव, अवसाद और आत्महत्या की श्रंखला होती है। व्यक्ति आत्महत्या रोटी, कपड़ा और मकान की कमी के कारण नहीं करता है; वह आत्महत्या लोग क्या कहेंगे? यक्ष प्रश्न के डर से करता है। यदि हम लोग क्या कहेंगे?’ प्रश्न से अपने आपको मुक्त करने की स्थिति में आ सकें, तो जीवित रहते हुए ही हम मोक्ष के आनंद की अनुभूति कर सकेंगे। वास्तविकता यही है कि मुक्ति की आकांक्षा से ही मुक्त हो जाना वास्तविक जीवन मुक्ति है और इसकी उपलब्धि अपने व्यक्तित्व का इतना विकास कर लेने में है कि हम लोग क्या कहेंगे? प्रश्न से मुक्त होकर अपने जीवन का निर्माण व उपभोग कर सकें।

हमारी व्यक्तिगत व्यक्तित्व विकास की आवश्यकताएं और समाज की आवश्यकताएँ सामान्यतः भिन्न-भिन्न ही नहीं, विरोधाभासी होती हैं। व्यक्तिगत जीवन में सफलता के शिखर पर काम करता व्यक्ति लोग क्या कहेंगे के चक्कर में आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। व्यक्ति धन, पद और संबन्धों के स्तर पर शिखर पर पहुँच सकता है किंतु लोग क्या कहेंगे? के कारण अपने सामने कोई भी मार्ग न पाकर आत्महत्या करने को विवश हो सकता है। जब तक व्यक्ति लोग क्या कहेंगे के यक्ष प्रश्न से निकल कर अपने विचार और चिंतन को महत्व नहीं देता, तब तक वह कर्म पर फोकस नहीं कर पाएगा। कर्म के बिना सफलता की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

विचारशील व्यक्ति अपनी सफलता का आकलन समाज के दृष्टिकोण से करे या अपने दृष्टिकोण से यह सदैव ही विमर्श का विषय रहा है। इस पर कोई भी सर्व-सम्मत दृष्टिकोण न अभी तक बन पाया है और शायद नहीं बन पाएगा। व्यक्ति का जीवन इस प्रश्न का उत्तर न तो खोज पाया है और न ही खोज पाएगा।

तनाव का मूल आधार-

लोग क्या कहेंगे?

दुनिया में तनाव, अवसाद या आत्महत्याओं का मूल कारण हमारे अभावों में जीना नहीं है। जीवन के लिए वास्तविक आवश्यकताएँ तो अत्यन्त न्यून होती हैं। उन्हें अर्जित करने में विशेष कठिनाई नहीं होती है। हमारे अधिकांश तनाव केवल दूसरों के दृष्टिकोण को लेकर ही होते हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। हमारे जीवन में तनाव हमारे कर्मो के कारण नहीं, हमारे द्वारा दूसरों की नजरों से अपना मूल्यांकन करने देने व उसे स्वीकार करने के कारण होता है। हमें ग्लानि दूसरों की उपलब्धियों के आगे अपने आपको छोटा समझने के कारण होती है। हम निम्न हैं, इस कारण हम में हीन भावना नहीं आती, दूसरों से तुलना करने के कारण हमारे अन्दर हीन भावना उत्पन्न होती है। दूसरों के दृष्टिकोण के बारे मे सोचकर ही हम व्यर्थ में चिंतित होते है, चिंताएँ हमारे अपने दृष्टिकोण के कारण नहीं होती हैं।

व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी या अभावों के कारण चिंता नहीं करता। व्यक्ति को यह तनाव नहीं होता कि वह किसी कार्य में असफल हो गया है। व्यक्ति को सबसे अधिक चिंता व तनाव होता है, तो वह इस बात का कि लोग उसको देखकर क्या सोच रहे होंगे? अरे भाई! किसके पास समय है, तुम्हारे बारे में सोचने का। अपने आपको इतना महत्वपूर्ण क्यों समझते हो कि लोग आपके बारे में ही सोचते रहेंगे। उनके पास और कोई काम नहीं है क्या?

                आप भी लोग क्या कहेंगे की चिंता त्याग करके अपने काम पर फोकस क्यों नहीं करते? लोग क्या कहेंगे? इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है किन्तु अपने कर्मो पर आपका नियंत्रण है। लोगों के कहने से बाहर निकलकर, अपने कर्मो पर ध्यान केन्द्रित करके आप ऐसा कर सकते हैं कि आप अपने आपको संतुष्ट और आनंदित महसूस कर सकें।

अतः यदि आप जीवित रहना चाहते हैं। आप अपने अस्तित्व की रक्षा करना चाहते हैं। अपना विकास करना चाहते हैं। अपने जीवन का सार गढ़ना चाहते हैं तो आपको इस प्रश्न से बाहर निकलना होगा-

लोग क्या कहेंगे?’

इस प्रश्न से बाहर निकलते ही आप संसार के सफल व्यक्तियों में से एक होंगे और आप जीत-हार के चक्र से बाहर निकल कर आनंद की अनुभूति करते हुए सफलता का जश्न मना सकेंगे। इससे बड़ी सफलता कोई हो ही नहीं सकती। अपने आपको स्वीकार करने और अपने अनुसार जीते हुए विकसित करने से महत्वपूर्ण सफलता और क्या हो सकती है?

 

Rounded Rectangle: लोग क्या कहेंगे? इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है किन्तु अपने कर्मो पर आपका नियंत्रण है। लोगों के कहने से बाहर निकलकर, अपने कर्मो पर ध्यान केन्द्रित करके आप ऐसा कर सकते हैं कि आप अपने आपको संतुष्ट और आनंदित महसूस कर सकें। 

 

 

 


व्यक्ति के संदर्भ में सफलता-

विचारशील व्यक्ति के दृष्टिकोण से सफलता के मापदण्ड अलग ही हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर सफलता के मापदण्ड भी व्यक्ति के स्तर पर ही निर्धारित होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत आकांक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, उसी के अनुसार सफलता के उनके मापदण्ड भी भिन्न-भिन्न ही होंगे।

व्यक्ति के मापदण्ड, मानक व प्रतिमान समाज के संदर्भ में ही होते हैं। व्यक्ति उनका आधार व तर्क समाज से ही ग्रहण करता है। किन्तु वैयक्तिक स्तर पर उनके निश्चितता और स्पष्टता देखी जा सकती है। व्यक्तिगत स्तर पर असंदिग्ध मानक हो सकते हैं, जो सामाजिक स्तर पर सर्व सहमति के साथ संभव नहीं हैं। आप कितना भी अच्छा काम कर लीजिए, उनकी आलोचना करने के लिए एक धोबी तो मिल ही जाएगा। अधिकांश लोग या लोगों का बहुमत उन मानकों के आधार पर सहमत हो सकता है, किंतु सभी सहमत नहीं हो सकते।

एक व्यक्ति सफलता के मायने केवल आर्थिक समृद्धि से ले सकता है। दूसरा सामाजिक इमेज को सफलता मान सकता है। कोई व्यक्ति प्रतिष्ठित नौकरी को महत्व दे सकता है, तो किसी अन्य के लिए व्यवसाय महत्वपूर्ण हो सकता है। किसी व्यक्ति के लिए किसी परीक्षा में असफलता भी सफलता हो सकती है। इसका सुंदर उदाहरण मेरा अपना है। मैं विधि स्नातक की परीक्षा में सम्मिलित हो रहा था। परीक्षा कक्ष में प्रवेश किया। परीक्षा कक्ष में सभी औपचारिकताओं के बाद मेरे हाथ में उत्तर पुस्तिका आ गई। उत्तर पुस्तिका के सारे आवश्यक खाने भरे जा चुके थे। उपस्थिति पत्रक पर उपस्थिति दर्ज की जा चुकी थी। प्रश्न पत्र हाथ में आ गया। ध्यानपूर्वक प्रश्न पत्र पढ़ने लगा। प्रश्न पत्र पढ़ने के बाद थोड़ी सी निराशा हुई प्रश्न पत्र अपेक्षा के अनुरूप नहीं था या कहा जाय मेरी तैयारी प्रश्न पत्र के अनुरूप नहीं थी। ऐसा भी नहीं था कि अनुत्तीर्ण होने की स्थिति बनने वाली थी, किन्तु मैं जिस प्रकार के अंक चाहता था; उस प्रकार के अंक आने की संभावना नहीं थी।

प्रश्न पत्र पढ़ने के बाद तुरंत विचारकर निर्णय लिया कि आज परीक्षा देना, उचित नहीं रहेगा। आज के प्रश्न पत्र में पुनः परीक्षा देनी है। विश्वविद्यालय के नियमानुसार उत्तीर्ण प्रश्न पत्र में अंक सुधार के लिए पुनः परीक्षा का प्रावधान नहीं था। केवल अनुत्तीर्ण विद्यार्थी ही पुनः परीक्षा में सम्मिलित हो सकते थे। यदि प्रश्न पत्र के उत्तर लिखना प्रारंभ किया, तो अनुत्तीर्ण होने की कोई संभावना नहीं थी।

अतः मैंने निर्णय किया कि परीक्षा में उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं लिखूँगा, ताकि उत्तीर्ण होने की कोई संभावना न रहे। मैं प्रश्न पत्र को पढ़कर उत्तर पुस्तिका बंद कर आराम से बैठ गया। उत्तर पुस्तिका में लिखना प्रारंभ नहीं किया। मैं इसी प्रकार खाली बैठकर झपकी लेने लगा। कक्ष निरीक्षक महोदय ने इस पर ध्यान दिया। उन्होंने मेरे पास से कई चक्कर लगाए। अन्त में पूछ बैठे, ‘लिख क्यों नहीं रहे हो?’

मैंने कहा, ‘सर! तैयारी नहीं है। अतः मैं लिखने की स्थित में नहीं हूँ।

कक्ष निरीक्षक महोदय चले गए। पुनः अगली बार चलकर आए और सुझाव देने लगे, ‘खाली बैठने से तो अच्छा है कि अपने विचार ही लिख दीजिए।

मेरे सामने यही तो समस्या थी। एक बार लिखना प्रारंभ किया तो उत्तीर्ण हो सकता था और मैं पुनः परीक्षा में सम्मिलित होने के अपने उद्देश्य में असफल हो सकता था। उत्तीर्ण होना मेरे लिए असफलता थी। मैंने कक्ष निरीक्षक महोदय से कहा, ‘श्रीमान मेरे बैठे रहने से आपको कोई समस्या है तो मुझे बाहर जाने की अनुमति दे दीजिए। प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका दोनों जमा कर लीजिए। मुझे कुछ भी नहीं लिखना है। उत्तर पुस्तिका में क्या लिखना है या क्या नहीं लिखना है या कुछ भी नहीं लिखना है। इसका निर्णय मुझे करना है और मैं निर्णय कर चुका हूँ कि मुझे कुछ भी नहीं लिखना है।

उसके बाद कक्ष निरीक्षक महोदय शांत हो गए। मैं पूरी अवधि तक परीक्षा कक्ष में बैठा और बिना कुछ लिखे बाहर आ गया। जब परीक्षा परिणाम घोषित हो गया और मैं अंक पत्र लेने कालेज गया। अंक पत्र वितरित करने वाले लिपिक महोदय मेरे अंक पत्र को देखकर पूछ बैठे, इस प्रश्न पत्र मैं अनुपस्थित रहे। मैंने कहा, ‘नहीं! मैं उपस्थित था।

उनका कहना था, ‘ऐसा कैसे संभव है कि सभी प्रश्नों में इतने अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी के एक प्रश्न पत्र में शून्य अंक हों।

ऐसा ही है श्रीमान जी, ‘मैंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।उस समय उस प्रश्न पत्र में अनुत्तीर्ण होना मेरी योजना थी और वे शून्य अंक ही मेरी सफलता थी।

सामान्यतः व्यक्तिगत सफलता का आकलन दूसरों की उपलब्धियों से तुलना करके नहीं, अपनी तुलना अपने आपसे करके ही किया जा सकता है। व्यक्तिगत सफलता का आकलन निम्न प्रश्नों के आधार पर किया जा सकता है-

1.            क्या मैं अपने द्वारा किए जाने वाले काम को करने के लिए स्वतंत्र हूँ?

2.            क्या मैं अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए अपने चुनाव स्वयं करता हूँ?

3.            क्या मैं अपने द्वारा चुने हुए कामों को करता हूँ?

4.            क्या मैं अपने कामों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करता हूँ?

5.            क्या मैं कल से बेहतर हूँ?

6.            क्या मैं तनाव मुक्त, शांत व आनंदित हूँ?

व्यक्तिगत स्तर पर सफलता चूहा दौड़ से बाहर निकलकर अपनी रेस स्वयं तय करने में है। नीत्शे के अनुसार अपने मूल्य स्वयं गढ़ो। अरस्तू व्यक्तिगत सफलता के लिए सद्गुणों के अभ्यास का निर्देश करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर कर्म करके ही व्यक्ति उपलब्धियाँ हासिल करता है। कर्म व्यक्ति करता है, समाज नहीं। समाज व्यक्ति के मन, वचन और कर्म को नियमित करने के प्रयत्न करता है। कई बार ये प्रयत्न व्यक्ति के काम को नियमित ही नहीं करते प्रतिबंधित भी कर देते हैं।

                किसी भी वस्तु, पद, धन या संबन्ध प्राप्त करने की इच्छा को बाह्य प्रेरणा कहा जा सकता है। कुछ पाने का विचार, व्यक्ति की अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की अपेक्षा से ही उद्भूत होता है। कोई भी विचार, इच्छा, अभिलाषा या आकांक्षा व्यक्ति के अंतर्मन में जन्म लेती है, समाज के नहीं। वही आकांक्षा व्यक्ति के लिए अभिप्रेरणा का स्रोत बनती है। व्यक्ति अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिए दूसरों के साथ मिलकर या अकेले ही काम करने को तत्पर होता है। जब वही आकांक्षा अन्य व्यक्तियों के अंतर्मन में होती है और वे आपस में विचार-विमर्श करके उसकी सामूहिक अभिव्यक्ति करते हैं, तब वह सामाजिक आकांक्षा में परिवर्तित हो सकती है। किन्तु ऐसा ही हो, यह सदैव आवश्यक नहीं है।

                हमें स्मरण रखना होगा कि भले ही किसी विचार, इच्छा, अभिलाषा या आकांक्षा को सामूहिक अभिव्यक्ति मिल गई हो। मूल रूप से उसका जन्म किसी एक ही व्यक्ति के अन्तर्मन में होता है। यह अलग बात है कि वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करके अपनी उस आकांक्षा को सामूहिक या सामाजिक आकांक्षा में परिवर्तित कर देता है। अपनी व्यक्तिगत आकांक्षा को सामूहिक आकांक्षा में परिवर्तित कर देना भी उस व्यक्ति की उपलब्धि ही है।

                वास्तविक रूप से सफलता व्यक्ति की ही उपलब्धि है। कोई भी काम व्यक्ति के स्तर पर होता है। कोई भी प्रयास व्यक्ति के द्वारा किया जाता है और सफलता तो प्रयास को ही मिलती है। परिवार या समाज तो व्यक्तियों का समूह मात्र है। व्यक्ति की उपलब्धियों पर समाज ताली बजाकर उसको स्वीकार करता है, उसे मान्यता देता है किंतु योजना, क्रियान्वयन और परिणाम व्यक्ति के ही होते हैं। जो व्यक्ति समाज की तालियों को नजरंदाज कर अपने काम में लगा रहता है, वही सफलता के सौपानों पर आगे बढ़ता है। समाज की प्रशंसा और आत्ममुग्धता दोनों ही व्यक्ति के कर्म को मंद करते हुए उसे नाकारा बना देते हैं।

                कांट का कथन, ‘कर्तव्य के लिए कर्तव्यव्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शक वाक्यों में से एक है। जो बिना किसी लालच के, बिना समाज के स्वीकार करने या समाज से मान्यता की अपेक्षा किए बिना स्वतःस्फूर्त अपने कर्म को करता है। वह ही सफल है। काम को करना या न करने का उसका निर्णय और खुलकर अपने काम की जिम्मेदारी स्वीकार करना, व्यक्तिगत स्तर पर अपने आपमें सफलता है। 

Rounded Rectangle: सफलता का आशय है कुछ सामान्य आदतों का निरंतर अभ्यास; और असफलता है निर्णय करने में कुछ सामान्य गलतियों का निरंतर दुहराते जाना।                                                                                                                                  -जिम रोह्न
 

 

 

 

 


वास्तव में सफलता के अर्थ पर सर्वस्वीकृति बनाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है। एक व्यक्ति की सफलता की परिभाषा दूसरे से भिन्न हो सकती है। एक समाज की सफलता की परिभाषा दूसरे समाज से भिन्न हो सकती है। यह सब व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताओं पर निर्भर है। उसके दर्शन पर निर्भर है। उसके जीवन मूल्यों पर निर्भर है। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताओं और जीवन मूल्यों पर ही समाज के प्रतिमानों का विकास होता है। नैतिक मानदण्ड भी उसी का अनुकरण करते हैं।

व्यक्ति, परिवार व समाज की सफलता के मापदण्ड भले ही भिन्न-भिन्न होेते हों, किन्तु लोग क्या कहेंगे के महत्व को न तो व्यक्ति नजर अन्दाज कर सकता है और न ही परिवार; समाज का तो आधार ही लोग क्या कहेंगे? है। जन सामान्य की अवधारणा ही समाज नाम की इकाई के अस्तित्व को बनाए रखती है।

                नीत्शे और सार्त्र जैसे दार्शनिक कुछ भी कहें। समाज दार्शनिकों के अनुसार नहीं चलता। समाज के दर्शन का आधार तो लोग क्या कहेंगे? से ही निर्धारित होता है। समाज की स्वीकृति के बिना महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण कानून भी निष्प्रभावी व असफल रह जाते हैं।

Rounded Rectangle: नीत्शे और सार्त्र जैसे दार्शनिक कुछ भी कहें। समाज दार्शनिकों के अनुसार नहीं चलता। समाज के दर्शन का आधार तो लोग क्या कहेंगे? से ही निर्धारित होता है।
 

 

 

 


@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

बेब ठिकाना www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in, ww.rashtrapremi.webpress.com