सोमवार, 20 मई 2019

समय की एजेंसी-13

समय की बचत और निवेश


हम समय को प्राप्त नहीं कर सकते, वरन् प्राप्त समय का सदुपयोग कर सकते हैं। प्राप्त समय का उपयोग किस प्रकार करना है? यह हमारे ऊपर ही निर्भर है और इसी पर सफलता और असफलता की नींव भी टिकी है। समय को प्राप्त करना संभव नहीं है, ठीक उसी प्रकार समय की बचत करना भी संभव नहीं है। यहाँ पर बचत करने से मेरा आशय समय को बचाकर सुरक्षित रखने से है। समय को बचाकर नहीं रखा जा सकता। जिस प्रकार हम अन्य संसाधनों को बचाकर भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकते हैं, उस प्रकार समय के साथ संभव नहीं हैं क्योंकि समय चक्र को रोकना किसी के वश की बात नहीं। सफल वही हो सकता है, जो समय चक्र को रोकने के व्यर्थ प्रयास करने के फेर में न पड़कर समय के साथ-साथ दौड़ लगाकर उसका सदुपयोग करने की क्षमता व विवेक रखता है और समय के सन्दर्भ में सही चयन कर सही गतिविधियों में समय का निवेश करता है।
             जी हाँ, समय को प्राप्त नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार समय को बचाकर नहीं रखा जा सकता। हाँ! हम समय को एक कार्य से बचाकर दूसरे में लगा सकते हैं। यही चयन की समस्या या चयन करने का अधिकार है। समय एक ऐसा संसाधन है जिसका निवेश करने के लिए उसे बचाकर रखने की आवश्यकता नहीं होती, समय का तो सीधा निवेश किया जाता है। जो व्यक्ति सीधा निवेश करना जानता है, वही समय का सही प्रयोग करके सफलता के झण्डे गाड़ता है।

              समय के उपयोग के लिए यह समझना आवश्यक है कि हम किसी विशिष्ट कार्य से समय बचा सकते हैं किंतु उस समय को संरक्षित नहीं कर सकते। समय को सुरक्षित रखने का कोई भण्डारगृह आज तक नहीं बना है और इस प्रकार का भण्डारगृह बन सकने की भविष्य में भी कोई उम्मीद नहीं है। हाँ, एक गतिविधि से समय की बचत करके उसे दूसरी गतिविधि में प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार एक गतिविधि से दूसरी गतिविधि में समय का निवेश करना ही व्यक्ति के प्रबंध कौशल का परिचायक है। जो व्यक्ति समय के सन्दर्भ में अपनी गतिविधियों को जितनी कुशलता के साथ प्रबंधन करना जानता है, वह व्यक्ति सफलता का उतना ही अधिक अधिकारी है।
पाठको! एडस् के बारे कहा जाता है कि बचाव ही उपचार है। इसी प्रकार समय के सन्दर्भ में समझना होगा कि प्रयोग ही निवेश है। हमारे जीवन का हर पल हमारे जीवन में नवीन अवसर लेकर आता है, किंतु सदैव स्मरण रखें, ‘मृत्यु और अवसर कभी प्रतीक्षा नहीं करते।’ समय के जिस पल का उपयोग हमने नहीं किया, उस पल को हमने खो दिया अर्थात् बर्बाद कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि समय का मतलब जीवन है अर्थात् समय बर्बाद करने का मतलब जीवन को बर्बाद करने से है क्योंकि अर्थपूर्ण उपयोगी समय ही तो जीवन है।
   अतः हमें इस बात को गांठ बांध लेना चाहिए कि हमारे जीवन का हर पल हमारे लिए अवसरों का भण्डार है, हमारे लिए प्रगति के अनेक रास्ते खोलता है किंतु प्रगति के उन रास्तों में से किसी एक का चुनाव हमें करना है। केवल चुनाव ही नहीं करना, चुनाव करने के बाद हमें अविरल आनन्द लेते हुए उस प्रगति पथ पर चलकर पूर्व-निर्धारित गंतव्य पर पहुँचना है। 
            मित्रों! हमें स्मरण रखना होगा कि इस गंतव्य का चुनाव हमने स्वयं ही किया है, उस गंतव्य पर पहुँचने का मतलब आपके चुनाव व प्रयासों की सफलता है। गंतव्य पर पहुँचने के बाद आपको पुनः नये रास्तों का विकल्प मिलेगा, जहाँ पुनः चुनाव का अवसर मिलेगा और फिर नये गंतव्य की ओर चलना है। यही तो जीवन यात्रा है और जीवन यात्रा के प्रत्येक पल और प्रत्येक कदम का आनन्द लेते हुए आगे बढ़ना है। आनन्द गंतव्य की प्राप्ति पर निर्भर नहीं, आनन्द गंतव्य की यात्रा में लगने वाले समय का सदुपयोग करने पर निर्भर है। किसी निर्धारित स्थल पर पहुँचने पर आनंदित होने का मतलब है कि केवल कुछ क्षणों का आनंद क्योंकि वहाँ से फिर एक नवीन यात्रा के लिए निकल जाना है। अतः जीवन का आनंद किसी विशेष स्थल पर नहीं, सदैव पथ पर पथिक बनकर चलते रहने में है। पथिक को गंतव्य की ओर चलना अवश्य है किंतु उसे यात्रा का आनंद लेना है; पथ में पर्यटन का आनंद लेते हुए चलना है क्योंकि हम जीवन भर चलने वाले पथिक हैं। पथिक का आनंद गंतव्य पर नहीं रखा है, वरन्् पथ में बिखरा पड़ा है जिसे प्रति पल अपने नयनों से निहारते चलना है। इसके लिए हमें केवल कार्य की सफलता पर ही नहीं, प्रक्रिया की सफलता पर भी आनंद लेने की प्रवृत्ति का विकास करना होगा। 

रविवार, 19 मई 2019

समय की एजेंसी - 12

गलती करके नहीं, दूसरों की गलतियों से सीखें


कोई भी व्यक्ति समय को खरीद या बेच नहीं सकता। समय का उपयोग किया जा सकता है या उसे बर्बाद किया जा सकता है। हम समय का उपयोग, समाजोपयोगी गतिविधियों में कर सकते हैं या असामाजिक गतिविधियों में कर सकते हैं। हम कर्मरत रहते हुए अपने जीवन को आनन्ददायक बना सकते हैं या आलस्य में रहकर जीवन के महत्त्वपूर्ण भाग को बर्बाद भी कर सकते हैं। बहुत से लोग अपने जीवन को अर्थहीन तरीके से आलस, तंद्रा, टीवी देखने, इंटरनेट पर चैटिंग करने, अपने तथाकथित दोस्तों के साथ गप्पें लगाने या खेल के नाम पर अनुपयोगी क्रियाओं में घण्टों बर्बाद करते हुए जीवन के बहुत बड़े भाग को बर्बाद कर देते हैं। उसके बाद अपने जीवन का उपयोग कर सफल हुए व्यक्तित्वों से तुलना करते हुए व्यवस्था को गालियाँ देते हैं कि इस प्रकार का भेदभाव क्यों है? अधिकांश व्यक्ति अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी भी स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार वे कभी गलती करते ही नहीं हैं। उनकी असफलता की जिम्मेदारी सदैव किसी न किसी अन्य की ही होती है। उनको अपने नाकारापन के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए कोई और नहीं मिले तो दुर्भाग्य और भगवान तो सदैव दोषारोपण के लिए तैयार हैं ही। वे बेचारे अपने बचाव में तर्क देने भी नहीं आ सकते।

               सामान्य व्यक्ति यह नहीं सोचते कि उनके जीवन को कोई अन्य व्यक्ति या व्यवस्था नहीं, वे स्वयं बर्बाद कर रहे हैं। वे यह विचार नहीं करते कि वे क्या कर रहे हैं? और किस ढंग से कर रहे हैं? यहाँ तक कि उनमें इतनी समझ भी नहीं होती कि अपने अमूल्य जीवन को स्वयं ही बर्बाद करने पर पश्चाताप भी कर सकें अर्थात  दूसरों की आलोचनाएं करने या व्यवस्था को कोसने में और भी अधिक समय को बर्बाद करते रहते हैं और अपने द्वारा स्वयं ही अपना जीवन बर्बाद करने पर अफसोस भी नहीं करते। इस प्रकार वे अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा खो देते हैं, जिसे वे कभी वापस नहीं पा सकते। 
                जीवन के बड़े भाग को बर्बाद करने के बाद, कई बार कहने लगते हैं, ‘गलती हो गयी।’ बचाव में तर्क भी तैयार होता है, मानव गलतियों को पुतला है; गलती करके ही सीखा जाता है। निःसन्देह गलतियाँ सीख दे जाती हैं किंतु यह आवश्यक नहीं कि हम गलती करके ही सीखें। हम दूसरों की गलतियों को और उनके परिणामों को देखकर भी सीख सकते हैं। वास्तव में चतुर व्यक्ति वह है जो स्वयं गलती न करके दूसरों की गलतियों से सीख ले। हमें दूसरों की सफलता से ईष्र्या न करके उससे प्रेरणा ग्रहण कर आगे बढ़ना चाहिए। दूसरों की गलतियों को उनकी आलोचना का आधार बनाने की अपेक्षा हमें उनकी गलतियों से सीख लेकर अपने समय को उस प्रकार की गलतियों से बचाकर उपयोगी कार्याे में लगाकर सफलता की राह पर बढ़ते रहना चाहिए।

समय का प्रयोग करने वाला ही शक्तिशाली


पारंपरिक रूप से समय को सबसे शक्तिशाली कहा जाता रहा है। कहा जाता है कि समय-समय की बात है, समय-समय का खेल। सफलता के गिरि चढ़े, अगले क्षण हो फेल। समय को भाग्य का पर्यायवाची भी माना जाता रहा है। समय को शक्तिशाली कहने वाले लोग समय को ही सब कुछ मानकर मनुष्य को कमजोर मान बैठते हैं। उनका कहना होता है कि समय ही सबसे शक्तिशाली है, मनुष्य को इसके सामने घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मनुष्य इसकी क्षमता को मापने में सक्षम नहीं है। समय को ही ऐसे मनुष्य जीत हार का कारण मान लेते हैं। समय के साथ अच्छा और बुरा होने का विशेषण लगा कर अपनी अकर्मण्यता की जिम्मेदारी समय के गले मढ़ देते हैं। इस प्रकार वे आत्मसंतुष्टि भले ही प्राप्त कर लें। अपनी असफलताओं से सीख लेने से भी वंचित रह जाते हैं। 
            भाग्यवादियों का मानना होता है कि समय के फेर से कोई व्यक्ति एक ही पल रंक से राजा और एक ही पल में राजा से रंक हो सकता है। उनका मानना होता है कि सफलता या जीत के लिए एक ही पल काफी होता है। कोई व्यक्ति एक ही पल में अमीर और एक ही पल में गरीब हो सकता है। व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के बीच में भी एक ही पल का अन्तर होता है। 
            निःसन्देह एक ही पल में व्यक्ति राजा से रंक और रंक से राजा हो सकता है। ऐसे स्वर्णावसर आते हैं किंतु इसका श्रेय समय को देना उचित नहीं समय तो सम है। सदैव एक जैसा रहता है। समय अच्छा या बुरा नहीं होता। अच्छा या बुरा होता है, समय का उपयोग। निःसन्देह प्रतिपल हमें नवीन अवसर प्राप्त होते हैं किंतु अवसरों को उपयोग तो हमारे अपने कर्मों के ऊपर निर्भर करता है। ऐसे अवसर ही हमारी निर्णय क्षमता और प्रत्युत्पन्न मति की परीक्षा होते हैं। निर्णय लेने के क्षण हमारे लिए चुनौती के रूप में सामने आते हैं। कई बार हमारा एक निर्णय हमारे भविष्य का आधार बन जाता है। ऐसे अवसर भी कर्मशील व समयनिष्ठ व्यक्तियों को ही प्राप्त होते हैं। ऐसे अवसरों का उपयोग अपनी जागरूकता के ऊपर निर्भर करता है। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और तुरंत निर्णय करने की शक्ति पर निर्भर करता है। 
              समय रूपी अवसर प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध हैं, यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह समयनिष्ठ होकर उपलब्ध समय का योजनाबद्ध व विवेकपूर्ण उपयोग करके समय पर अच्छा होने का ठप्पा लगा दे या आलस्य, अकर्मण्यता का शिकार होकर अवसाद में जाकर आत्महत्या कर समय के रूप में प्रकृति-प्रदत्त जीवन रूपी अमूल्य भेंट को बर्बाद कर दे। समय निःसन्देह सर्वाधिक अमूल्य भेंट है, क्योंकि समय ही जीवन है और जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण इस भौतिक संसार में कुछ भी नहीं होता। हम जितनी भी गतिविधियों में भाग लेते हैं। जो भी लम्बी चैड़ी योजनाएँ बनाते हैं। सभी जीवन को केंद्र में रखकर ही तैयार की जाती हैं। इस तथ्य से पाठक भी सहमत होंगे।

समय रूपी संसाधन की प्राप्ति


यह स्पष्ट हो चुका है कि समय एक अमूल्य व दुर्लभ संसाधन है। पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि संसाधन सीमित होते हैं, संसाधनों का वैकल्पिक प्रयोग किया जा सकता है। विभिन्न विकल्पों में से किस विकल्प पर और कितना किसी संसाधन को प्रयोग किया जाय? अर्थशास्त्र में इसे चयन की समस्या कहकर संबोधित किया गया है। किस विकल्प का चयन करके संसाधन को उस विकल्प के लिए आबंटित करना है? इसका निर्णय व्यक्ति को करना होता है और फिर उस निर्णय को लागू करना होता है क्योंकि केवल निर्णय करना पर्याप्त नहीं होता। 
            सुविचारित निर्णय लेना और सुविचारित योजना बनाकर उस निर्णय को लागू करना ही सफलता का मूलमंत्र है। यह सभी संसाधनों के सन्दर्भ में सही है। समय भी एक संसाधन है। अतः समय के भी वैकल्पिक प्रयोग हैं। समय का उपयोग करते समय भी चयन की समस्या सामने आती है। अपने उपलब्ध समय को किस गतिविधि में लगाना है? इसका चयन करना ही हमारे लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय होता है। हम अपने सीमित समय को किन गतिविधियों में लगा रहे हैं, यह हमारी प्राथमिकताएँ ही इसका आधार बनती हैं। हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर ही तय करते हैं कि हमें अपने अमूल्य समय का निवेश कहाँ करना है।
     समय के सन्दर्भ में सर्वप्रथम यह स्मरण रखना आवश्यक है कि अन्य संसाधनों की तरह हमें यह नहीं मालूम कि हमारे पास कितना समय है? अन्य संसाधनों को मापन के विभिन्न तरीके हैं, विभिन्न मापन पैमाने हैं किंतु समय के सन्दर्भ में यह लागू नहीं होता। किसी को भी नहीं मालूम कि उसे कितना जीवन प्राप्त है। जीवन अर्थात् ‘समय’ जो प्रकृति-प्रदत्त है। प्रकृति ने ही हमें जीवन जीने का अवसर दिया है किंतु यह अवसर कब तक है, इसे कोई भी नहीं जानता और न ही आज तक ऐसा कोई तरीका विकसित हुआ है कि हम जान सकें कि हमारे पास कितना समय है? समय की प्राप्ति प्रकृति जिसे हम ईश्वर भी कह सकते हैं, पर ही निर्भर है। समय प्रदान करना तो प्रकृति, ईश्वर या अन्य किसी अदृश्य शक्ति पर निर्भर है, यह माना जा सकता है किंतु उस समय को स्वीकार करके उसका उपयोग करना तो हमारे और केवल हमारे ऊपर ही निर्भर है। 

             हम अपने प्रयासों से एक भी अतिरिक्त पल प्राप्त नहीं कर सकते। विशेषकर कार्यकारी उपयोगी पल, जिसे उपयोगी जीवन कहा जा सकता है; हमारे पास बहुत कम होते हैं। जब हम यह जानते हैं कि अतिरिक्त समय की प्राप्ति संभव नहीं है तो आओ हम समय के दूसरे पहलू पर विचार करते हैं। दूसरा पहलू यह है कि निःसन्देह गुजरे हुए समय को प्राप्त नहीं किया जा सकता किंतु अपने सहयोगियों के समय को प्राप्त करके अपने कार्य में सहयोग लिया जा सकता है। हम कर्मचारियों को काम पर रखते हैं, वे हमारी योजना के अनुसार काम करते हैं, तब वास्तव में हम उनसे समय ही प्राप्त करते हैं। समय को प्राप्त करना, समय को बचाना और समय का निवेश करना बड़े ही भ्रम पैदा करने वाले शब्द हैं। क्या समय को बचाया जा सकता है? इस प्रश्न पर अगले अध्याय में चर्चा करेंगे।

गुरुवार, 16 मई 2019

समय की एजेंसी-११

मितव्ययिता के साथ सदुपयोगः


जिस प्रकार लेखाकार (Accountant) एक-एक पैसे का हिसाब रखता है, ठीक उसी प्रकार हमें समय की छोटी से छोटी इकाई का ख्याल रखना होगा। समय की छोटी से छोटी इकाई का लेखा-जोखा रखना होगा। जिस प्रकार आर्थिक प्रबंधन में मितव्ययिता आवश्यक गुण है, उसी प्रकार समय का उपयोग करते समय भी एक-एक पल को बचाकर उसका उपयोगी कार्यों में मितव्ययिता के साथ सदुपयोग करना ही समय की आराधना है। समय भी एक आर्थिक संसाधन है। समय का प्रयोग करके ही तो हम पैसा कमाते हैं। समय को ही पैसा कहा जाता है। समय का संसाधन होना ही हमें इसके मितव्ययितापूर्ण उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। 
            समय का मितव्ययितापूर्ण प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए हमें सही समय पर जागना होगा। सही समय पर अपने नैत्यिक कार्यो अर्थात् उषापान अर्थात् सुबह सुबह उठकर कम से कम दो गिलास जल का सेवन, शौचादि से निवृत्ति, स्नान आदि क्रियाओं के बाद योग, व्यायाम आदि सभी क्रियाओं को नियत समय पर ही करना होगा। अपनी सभी आवश्यक नैत्यिक क्रियाओं के संपादन के पश्चात् नियत समय पर अपने पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए तैयार हो जाना समयनिष्ठता के अन्तर्गत ही आता है। 
               समयनिष्ठ हुए बिना मानव संसाधन का सदुपयोग करना संभव नहीं है। वर्तमान गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में जरा सा आलस आपको पीछे ढकेल देगा और फिर पछताने में समय बर्बाद करने से कुछ हासिल नहीं होगा। अतः समय को जीना ही जीवन को जीना है। हमें जीवन में कुछ अच्छा करना है, कुछ उपलब्धियाँ हासिल करनी हैं तो इसके लिए समय के प्रति निष्ठा, प्रतिबद्धता, लगन और कर्मरत रहने की श्रेष्ठ आदत का विकास करना होगा।

समय पृथ्वी पर उपलब्ध अमूल्य संसाधनः



समय पृथ्वी पर उपलब्ध सबसे कीमती संसाधन है। इस संसाधन को कीमती कहना भी शायद उचित नहीं होगा, इसके लिए तो अमूल्य शब्द ही उचित प्रतीत हो रहा है। समय की तुलना अन्य किसी संसाधन से नहीं की जा सकती। मानव के समय का आशय मानव जीवन से है और अनादि काल से मानव जीवन को दुर्लभ कहा जाता रहा है। अन्य समस्त संसाधनों पर किसी न किसी सीमा तक मानव का नियंत्रण हो गया है किंतु मानव जीवन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है। अंत समय पर बड़े से बड़े डाक्टर भी ‘ईश्वर ही कुछ कर सकता है,’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। एक बार जीवन चला जाय तो वह वापस नहीं आता। यह अलग बात है कि पुनर्जीवन में विश्वास करने वाले व्यक्ति पुनः जन्म लेने की बात करते हैं किंतु ऐसा होने पर भी नया जीवन होगा; किंतु जो समय बीत गया है, उसे पुनः पाना संभव नहीं होता। 
           समय चक्र सदैव गतिमान रहता है। हम समय चक्र को रोक नहीं सकते और न ही इसकी गति को धीमी कर सकते हैं। हाँ! हम समय चक्र के साथ-साथ अपनी गतिविधियों का नियोजन करके समय चक्र के साथ-साथ चलकर अपने जीवन को उपयोगी बनाकर संसार में एक छाप छोड़ सकते हैं। समय सदैव अग्रगामी होता है। यह पीछे नहीं चलता। इस संसार में सब कुछ समय पर निर्भर करता है, समय से पहले कुछ नहीं हासिल होता ऐसा माना जाता है। निःसन्देह समय से पहले कुछ हासिल नहीं होता, किंतु समय के साथ चलकर ही कुछ हासिल किया जा सकता है। समय की बर्बादी हमारे जीवन को ही बर्बाद कर देती है। वर्तमान समय के सदुपयोग पर ही हमारे भावी जीवन की नींव रखी जाती है। हम यदि वर्तमान समय को बर्बाद कर रहे हैं, तो वर्तमान को ही बर्बाद नहीं कर रहे भविष्य को भी बर्बाद करने की तैयारी कर रहे हैं। 

धन नहीं, समय आनन्द प्रदाता


देखने में आता है कि सामान्य व्यक्ति समय से अधिक धन को महत्त्व देते हैं। वे धन को ही सब कुछ मानते हैं। वे समय के महत्त्व को नहीं समझते। समय के महत्त्व को न समझने के कारण वे धन भी नहीं कमा पाते धन कमा भी लें तो समय व धन दोनों का ही आनन्द नहीं ले पाते। हमें इस बात को समझना होगा कि व्यक्ति धन के लिए नहीं, धन व्यक्ति के लिए होता है। यही बात समय के सन्दर्भ में नहीं है। समय के सन्दर्भ में तो समय ही मानव जीवन है। अतः हम यह भी कह सकते हैं कि समय ही व्यक्ति है। 
            धन अन्य वस्तुओं को प्राप्त करने का साधन मात्र होता है। सामान्य व्यक्ति को प्रतीत होता है कि धन, समृद्धि और आनन्द प्रदान करता है, किंतु यह सत्य नहीं है। धन का संयम व विवेकपूर्ण उपयोग न किया जाय तो यह कष्ट का कारण भी बन जाता है। कई बार तो धन के कारण अपने पराये हो जाते हैं, यहाँ तक कि निकटस्थ संबन्धी ही प्राणों का हरण कर लेते हैं। वास्तव में धन अपने आप में कुछ भी नहीं है। धन प्राप्त करने का आधार समय है और धन से अन्य भौतिक वस्तुओं को खरीदा जा सकता है किंतु धन से न तो जीवन को खरीदा जा सकता और न ही आनन्द को खरीदा जा सकता है। वास्तविक रूप से समय ही हमें धन, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और आनन्द प्रदान करता है।

बुधवार, 15 मई 2019

समय की एजेंसी-10

चयन का सिद्धांत

जब संसाधनों की बात आती है, तब अर्थशास्त्र याद आता है। अर्थशास्त्र के कुछ आधारभूत नियम हैं, जिनमें से एक यह है कि संसाधन सीमित हैं और संसाधनों का वैकल्पिक प्रयोग संभव है। कहने का अर्थ यह है कि कोई भी संसाधन असीमित नहीं है। प्रत्येक संसाधन सीमित है। संसाधनों का प्रयोग करने के लिए अनेक क्षेत्र या विकल्प होते हैं। अतः मनुष्य को संसाधनों का प्रयोग करते समय चयन करना पड़ता है। 
समय भी एक संसाधन है। अतः अर्थशास्त्र के ये नियम समय पर भी लागू होते हैं। हम धन खर्च करके वस्तुओं और व्यक्तियों के समय को खरीद तो सकते हैं किंतु अपने जीवन अर्थात् अपने पास उपलब्ध समय में वृद्धि नहीं कर सकते अर्थात् हम केवल अपने वर्तमान समय का प्रयोग अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कर सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम यह चयन कर सकते हैं कि हम अपने समय को किस प्रकार प्रयोग करें। हमें किसी गतिविधि के लिए अधिक समय की आवश्यकता है तो किसी अन्य गतिविधि में से समय की बचत करनी होगी। क्योंकि समय की बचत ही समय की प्राप्ति है।
हमें प्रगति पथ पर चलना है तो समयनिष्ठ बनना होगा। समयनिष्ठ का आशय समय के महत्त्व को समझकर समय का पूर्व-योजनानुसार सदुपयोग करना होगा। हमें अपने सभी कार्यो के लिए प्राथमिकताओं के आधार पर समय का आवंटन करना होगा।
मोटे तौर पर हम विचार करें तो हमारे कुछ मौलिक कत्र्तव्य होते हैं, जो स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति हो सकते हैं। हमें गुणवत्तापूर्ण मानव जीवन जीने के लिए अपने समय का सदुपयोग अपने सभी कत्र्तव्यों में संतुलन बनाकर करना होगा। यह संतुलन मानवीय समय को संसाधन स्वीकार कर, उसकी सीमितता को स्वीकार कर, उसके वैकल्पिक प्रयोगों को स्वीकार कर चयन प्रणाली को लागू करके ही स्थापित किया जा सकता है। चयन प्रणाली का आशय अपनी प्राथमिकताओं के निर्धारण से है। उपलब्ध संसाधन का विभिन्न विकल्पों में अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर आवंटन ही चयन करना है। विभिन्न विकल्पों में से किसी एक का चयन प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है। यह चयन करना ही निर्णयन कहलाता है। प्रबंधक व प्रशासक का मुख्य कार्य निर्णय लेना और उसे लागू करवाना ही है।

मानव संसाधन का सदुपयोग

मानव संसाधन के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के लिए सर्वप्रथम हमें यह स्वीकार करना होगा कि मानव का मतलब उसे उपलब्ध समय से है। मानव अपने आप में संसाधन नहीं है, उसको प्राप्त कार्यकारी समय ही संसाधन है। अतः मानव संसाधन के सदुपयोग का अर्थ मानव के पास उपलब्ध समय के सदुपयोग से है।
मानव संसाधन के उचित प्रयोग के लिए हमें समयनिष्ठ होना होगा। हमें समझना होगा। समय ईश्वर प्रदत्त है। समय का पर्यायवाची काल भी है, ईश्वर को महाकाल भी कहा जाता है। कुछ चिंतक समय और ईश्वर को एक ही रूप में देखते हैं। इस प्रकार ईश्वरनिष्ठ और समयनिष्ठ होना एक ही बात है। समयनिष्ठ होना ही वास्तव में ईश्वरनिष्ठ होना है। समय की आराधना ही ईश्वर की आराधना है। नियत समय पर नियत कर्म का अनासक्त भाव से संपादन करना ही समय की आराधना है। इस प्रकार समयनिष्ठ होने का आशय समय की प्रत्येक इकाई का सम्मान करना है। समय को महाकाल भी कहा जाता है। महाकाल को शिव के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार समय ही ईश्वर है। समय की आराधना ईश्वर की आराधना है।

सोमवार, 13 मई 2019

समय की एजेंसी-9

मानव संसाधन का जीवन

प्रत्येक संसाधन का एक उपयोगी जीवन काल होता है। हम प्रत्येक संसाधन की परिभाषा ही उसकी उपयोगिता के आधार पर कर रहे हैं। अतः प्रत्येक संसाधन के उपयोगी जीवन काल पर ध्यान देना होगा। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति मानव समुदाय के लिए उपयोगी नहीं रहता तो वह संसाधन भी नहीं रहता। अतः मानव को संसाधन के रूप में देखते समय उसके उपयोगी जीवन काल पर विचार करना होगा। कहने का आशय यह है कि मनुष्य का उपयोगी जीवन काल ही संसाधन के रूप में माना जा सकता है अर्थात् मनुष्य को जो कार्य करने के लिए समय मिलता है; वह समय ही मानव के लिए संसाधन है। यदि किसी कारणवश मानव का समय समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाता तो वह संसाधन भी नहीं रह जाता। मानव संसाधन के संदर्भ में इसलिए कहा गया है कि समय ही जीवन है। जो व्यक्ति समय बर्बाद करता है वह  जीवन बर्बाद करता है। इसे इस प्रकार भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति टाइम पास करता है, वास्तव में टाइम उसके जीवन को पास कर देता है।
मानव अपने आप में एक संसाधन है, जो अन्य संसाधनों का उपयोग करता है। मानव संसाधन का अर्थ मानव के गुणवत्तापूर्ण समय के उपयोगी जीवन काल से है। मानव संसाधन की उपयोगिता उसकी सक्षमता, योग्यता व कौशल से निर्धारित होती है। जो व्यक्ति जितना अधिक सक्षम, योग्य व कुशल होगा उसका समाज में उतना ही महत्त्व होगा। ऐसे व्यक्तियों का एक-एक क्षण कीमती होता है। वास्तविक बात यह है कि समय ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। यदि हम धन को प्रगति का आधार मानते हैं तो समय ही है जो धन कमाने का आधारभूत संसाधन है। अतः वास्तव में समय ही सबसे बड़ा धन है। हम समय लगाकर धन कमा सकते हैं किंतु धन खर्च करके अपने समय में वृद्धि नहीं कर सकते। हाँ! धन के माध्यम से अन्य व्यक्तियों का समय खरीद सकते हैं। दूसरे व्यक्तियों के समय को खरीद कर उसका प्रयोग करना ही तो रोजगार या नौकरी देना कहलाता है।

रविवार, 12 मई 2019

समय की एजेंसी-8

समय एक संसाधन


जब हम विकास की बात करते हैं, तब उद्यमिता और उद्यमी की बात चलती है। उद्यमी का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार उद्यम होता है, किंतु उद्यम मात्र से विकास की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती। उद्यमी को उद्यम लगाने के लिए विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। व्यवसाय व उद्योग के क्षेत्र में विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। उद्यमियों के संदर्भ में बात करें तो उनके लिए पूँजी प्रथम संसाधन होता है। पूँजी, सामग्री, श्रम, तकनीक व प्रबंधन को संसाधनों के रूप में माना जा सकता है। उद्यमी पूँजी के द्वारा ही अन्य संसाधनों को प्राप्त करते हैं। इस तरह के सभी संसाधनों में श्रम और प्रबंधन मानवीय संसाधन हैं जो अन्य अमानवीय संसाधनों का प्रयोग करते हैं। अतः मानवीय संसाधन अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। संसाधनों की आवश्यकता व्यवसाय व उद्योगों के क्षेत्र में ही नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पड़ती है। संसाधनों की आवश्यकता केवल उद्यमी को ही नहीं, संसार के प्रत्येक व्यक्ति को पड़ती है। 
     विकिपीडिया के अनुसार, ‘प्रकृति का कोई भी तत्त्व तभी संसाधन बनता है, जब वह मानवीय सेवा करता है। इस सन्दर्भ में 1933 में जिम्मरमैन का कथन था, ‘न तो पर्यावरण उसी रूप में और न ही उसके अंग संसाधन हैं, जब तक वह मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सक्षम न हो।’ संसाधन को और भी अधिक स्पष्ट करना चाहें तो किसी वस्तु का संसाधन होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा सकता है या नहीं? इस प्रकार हमारे आसपास उपलब्ध हर वस्तु संसाधन कहलाती है जिसका इस्तेमाल हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकते हैं, जिसे बनाने या जिसकी उपयोगिता में वृ़िद्ध करने के लिए हमारे पास प्रौद्योगिकी है और जिसका इस्तेमाल सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से मान्य है। कहने का आशय यह है कि वह प्रत्येक वस्तु या पदार्थ संसाधन है जो मानवीय जीवन को सुगम बनाता है, या अन्य संसाधनों पर प्रक्रिया करके उन्हें अधिक उपयोगी बनाकर मानव समुदाय की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 

संसाधनों के प्रकार


संसाधनों की गिनती करवाने में विभिन्न दृष्टिकोण सामने आते हैं। संसाधनों की उपयोगितावादी दृष्टिकोण के अनुसार प्रकृति प्रदत्त व मानव निर्मित सभी वस्तुएं संसाधनों के अन्तर्गत आ जाती हैं। सभी वस्तुएँ किसी न किसी रूप में, किसी न किसी प्रकार से मनुष्य के काम आती ही हैं और उसके जीवन को सुविधाजनक बनाती हैं। व्यापक अर्थ में व्यापक दृष्टिकोण से देखेंगे तो दुनिया में शायद ही ऐसी कोई वस्तु मिले, जो मानव के उपयोग में न आती हो, मानव के जीवन को आरामदायक या सुविधाजनक न बनाती हो। अतः हम सभी संसाधनों के नामों का उल्लेख यहाँ नहीं कर सकते। हमें सभी संसाधनों की चर्चा करने व समझने की यहाँ आवश्यकता भी नहीं है। हमारे लिए संसाधनों के वर्गीकरण की चर्चा करना पर्याप्त है। उत्पत्ति के आधार पर संसाधन सामान्यतः दो वर्गो में रखे जाते हैं-
1. जैविक संसाधन
2. अजैविक संसाधन
जैविक संसाधन वे संसाधन कहे जाते हैं जिनकी प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन व्याप्त होता है या जीवन रहा होता है। जबकि अजैविक संसाधन वे संसाधन होते हैं जिनमें जीवन नहीं होता अर्थात्् निर्जीव वस्तुएं अजैविक संसाधन के अन्तर्गत आती हैं।
                  संसाधन की परिभाषा की कसौटी पर कसने पर स्पष्ट होता है कि मानव स्वयं में एक संसाधन है। मानव, मानव के इस्तेमाल में आता है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में मानवीय सहयोग की आवश्यकता पड़ती ही है। इसी आवश्यकता के कारण तो समाज में विभिन्न रिश्तों का जन्म हुआ है। मानव की तो उपयोगिता है ही; मानव विभिन्न प्रक्रियाओं के द्वारा अन्य सभी संसाधनों की उपयोगिता में वृद्धि भी करता है। उपयोगिता में वृद्धि करना अपने आपमें उत्पादन कहलाता है। इस प्रकार मानव स्वयं संसाधन होते हुए अन्य संसाधनों को अधिक उत्पादक बनाकर मानव समुदाय के जीवन को सुगम बनाता है। इस प्रकार मानव के संसाधन होने में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। यही नहीं अन्य समस्त संसाधनों का प्रयोग भी मानव ही करता है। अतः मानव को संसाधनों का संसाधन कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

गुरुवार, 9 मई 2019

समय की एजेंसी-7

समय अबंधनीय है



जी हाँ! समय अबंधनीय है। इसे बांधा नहीं जा सकता। मूर्धन्य विचारक चाणक्य ने भी लिखा है, ‘जीवन में सबसे कीमती है आपका वर्तमान, जो एक बार चला जाता है तो दुनिया का सारा धन लगा दो, तो भी दुबारा नहीं पा सकते हो।’ समय के इस अबंधनीय स्वरूप के संदर्भ में महाभारत की एक कथा का सन्दर्भ देना उपयोगी रहेगा। 
                एक बार चक्रवर्ती महाराज धर्मराज युधिष्ठर अपने चारों भाइयों सहित अपने दरबार में विराजे थे। संध्याकाल हो चुका था। दरबार से उठने का समय हो चुका था। उसी समय एक गरीब ब्राह्मण सहायतार्थ दरबार में हाजिर हुआ। धर्मराज युधिष्ठर उस दिन का अपना कार्य समाप्त कर चुके थे और अपने आवास के लिए प्रस्थान करने वाले थे। अतः उन्होंने ब्राह्मण को अगले दिन आने का निर्देश दिया। ब्राह्मण अगले दिन की आशा में निश्चिंत होकर वापस चला गया क्योंकि धर्मराज युधिष्ठिर सत्य बोलते थे। यदि उन्होंने कह दिया है कि कल सहायता प्राप्त हो जायेगी तो हो जायेगी। इसमें किसी को कोई सन्देह ही नहीं था।
         यह क्या? धर्मराज जब अपने आवास के लिए निकले तो ढोल-नगाड़ों की आवाज के साथ किसी उत्सव की तरह वाद्ययंत्रों की आवाज उनके कानों में पड़ी। वे आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि राज्य में किसी राज्योत्सव की कोई सूचना राज्य के किसी विभाग से उन्हें नहीं मिली थी। उन्होंने जिज्ञासा को शांत करने के लिए तुरंत कारण जानने का प्रयास किया तो सूचना मिली कि युवराज भीम के आदेश से प्रसन्नतासूचक वाद्ययंत्र बजाये जा रहे हैं। धर्मराज ने तुरंत भीम को बुलाया और पूछा तो भीम ने उत्तर दिया कि आज बड़े ही आनंद का विषय है क्योंकि संसार में जो उपलब्धि आज तक कोई व्यक्ति हासिल नहीं कर पाया, वह आपने हासिल कर ली है। आपने समय को जीत लिया है। युधिष्ठर के कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने भीम से पूछा, ‘यह किसने कहा कि मैंने समय को जीत लिया है? समय को जीतना तो संभव ही नहीं है।’
            अब भीम की बारी थी। उसने कहा, ‘महाराज! अभी-अभी कुछ समय पूर्व ही आपने दरबार में एक ब्राह्मण को कल आने के लिए कहा है। इसका आशय है कि आप अवश्य ही कल तक उसको सहायता देने के लिए जीवित रहेंगे और यही नहीं वह ब्राह्मण भी आपसे सहायता लेने के लिए कल तक अवश्य जीवित रहेगा। आप कभी असत्य भाषण नहीं करते, अतः आपकी किसी बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। आपने कल आने के लिए कहा है तो निःसन्देह आपने समय पर विजय प्राप्त कर ली है, जो संसार में आज तक कोई नहीं कर पाया है। अतः निःसन्देह हम सभी लोगों के लिए प्रसन्नता व उत्सव का विषय है। बताया यह जाता है कि धर्मराज युधिष्ठर को अपनी गलती का अहसास हो गया और उन्होंने तुरंत दूत भेजकर ब्राह्मण देवता को तुरंत बुलाकर सहायता प्रदान की।
                       यह पौराणिक उदाहरण देने का यहाँ केवल यही आशय है कि समय को बांधना किसी के लिए भी संभव नहीं है। अतः किसी भी काम को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। काम को कल पर छोड़ने का आशय यह है कि आज के दिन को जीवन के हाथों से जाने दिया गया। कल क्या होगा? इसे कोई नहीं जानता। अतः आज का मतलब आज, आज और अभी जो पल सामने है, उसे जिंदादिली के साथ जीना है। जीवन का एक पल भी बर्बाद नहीं करना है।
            हम सभी मनुष्य जीवन की दुर्लभता की बात करते हैं। हिंदु धर्म में मान्यता है कि 84 लाख योनियों में से गुजरते हुए मनुष्य योनि में जन्म होता है। मनुष्य योनि में जन्म लेकर श्रेष्ठ कार्य करते हुए हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य आध्यात्म पर चर्चा करना नहीं है। मोक्ष के मार्ग को दिखाना नहीं है। हमारा उद्देश्य जीवन की दुर्लभता पर चर्चा करना है। जीवन दुर्लभ है और अनिश्चित है। कोई नहीं जानता कि उसकी मृत्यु कब आ जाय? आज से कल का पता नहीं। 

                    जब हम जानते हैं कि मृत्यु कभी भी आ सकती है, तो उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? हम युधिष्ठिर की तरह आज का काम कल पर टालने की कोशिश क्यों करते हैं? जीवन दुर्लभ है और समय ही जीवन है। हमें नहीं मालूमकि हमारे पास कितना समय है। अतः हमें जीवन के प्रत्येक पल का उपयोग पूर्णता व प्रभावशीलता के साथ करना है। समाज उन्हीं की अमरता के नारे लगाता है, जो उपलब्ध समय में समाज के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य कर जाते हैं। समय ही जीवन है तो फिर हम समय की एजेंसी का प्रयोग करने में लापरवाही  करके अपने जीवन को छोटा कर लेते हैं? क्यों हम अपने समय को जीकर जीवन का आनंद नहीं लेते? 


बुधवार, 8 मई 2019

समय की एजेंसी-6

दीर्घ जीवन नहीं, प्रभावी जीवन

       निःसन्देह समय ही जीवन है अैेर उपलब्ध समय का सदुपयोग करना ही जिंदगी हैं अन्यथा यही कहा जाता है कि यह जिंदगी भी कोई जिंदगी है? जो व्यक्ति अपने जीवन में मिले समय का समाज हित में सकारात्मक प्रयोग करते हैं, उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त होता है। महाभारत के उद्योग पर्व 131ः13 में लिखा है-
‘मुहूर्तमपि ज्वलितं श्रेयो न तु धूमायितं चिरम्’
 अर्थात् ‘चिरकाल तक धूमायित रहने की अपेक्षा क्षणभर के लिए जल उठना कहीं अधिक श्रेयस्कर है।’ स्वामी विवेकानन्द 39 वर्ष 7 माह तथा शंकराचार्य केवल 32 वर्ष का उपयोगी जीवन जीकर अमर हो गये।
      समय प्राकृतिक देन है। समय को कहीं से खरीदा नहीं जा सकता। समय कीमती ही नहीं दुर्लभतम व अमूल्य संसाधन है, जिसे संरक्षित नहीं किया जा सकता। हाँ! जिन गतिविधियों में अनावश्यक समय की बर्बादी हो रही है, वहाँ से बचाकर उपयोगी गतिविधियों में लगाया जा सकता है। इसलिए सफल जीवन के लिए आवश्यक है कि हमें न तो अपना और न ही दूसरों का समय कभी बर्बाद करना चाहिए। 

सफलता का रहस्यः

सफलता का सबसे बड़ा रहस्य है कि पहले अपने आपको बेहतर बनाना होगा। आप कुछ भी बन सकते हैं, जो आप सचमुच बनना चाहते हैं। आप कोई भी लक्ष्य हासिल कर सकते हैं जो आपने निर्धारित किया हो, और जिसे पाने के लिए आप सचमुच अपने समय का उपयोग करते हैं। इसके लिए आपको स्वयं का प्रबंधन करना होगा, अपने कार्यो का समय के संदर्भ में प्रबंधन करना होगा और लगातार करते रहना होगा।
          सामान्यतः लोग समय की उपयोगिता का निर्धारण पैसे से भी करते हैं। फ्रैंक्लिन के अनुसार, ‘समय ही पैसा है।’ निःसन्देह हम अपने समय का सदुपयोग करके ही सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, पैसा भी उन्हीं में से एक है। हमें ध्यान रखना होगा कि समय का प्रयोग करके हम पैसा कमा सकते हैं किंतु पैसा खर्च करके हम अपने लिए समय प्राप्त नहीं कर सकते। 
                     जीवन के जिस भाग को अर्थात्् समय को आपने नष्ट कर दिया, उसे आप कितना भी पैसा खर्च करके पुनः प्राप्त नहीं कर सकते। अतः हमें हर क्षण यह स्मरण रखना होगा कि समय ही जीवन है और जीवन से अधिक कीमती कोई भी वस्तु इस संसार में नहीं है। कितनी भी विपत्तियाँ आयें, कुछ भी नष्ट हो जायें किंतु समय को नष्ट नहीं होने देना हैं। संसार के सभी संसाधन पुनः प्राप्त किए जा सकते हैं किंतु समय नहीं; अतः समय के पल-पल का उपयोग करके ही हम अपने जीवन को जी सकते हैं।

समय प्रतीक्षा नहीं करता

समय करता नहीं प्रतीक्षा,
यह है मेरी उससे शिक्षा।
श्रम करने से जो कतराते,
वही माँगते हैं बस भिक्षा।

उपरोक्त काव्य पंक्तियाँ मेरी किसी कविता का भाग हैं। इनमें भी काव्य के रूप में मेरे द्वारा यही संदेश दिया गया है कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और जो अपने पास उपलब्ध समय में श्रम नहीं करते; केवल वही भिक्षा माँगने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। समय ही जीवन है, और वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इस तथ्य को हम एक कहावत से भी समझ सकते हैं, ‘समय और ज्वार-भाटा कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते।’ 

समय के मूल्य को समझना

यह धरती पर जीवन के अस्तित्व की तरह सत्य है। समय बिना किसी रूकावट के निरंतर चलता रहता है और वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। यह तथ्य हमें ही नहीं अपनी भावी पीढ़ियों अर्थात्् अपने बच्चों को भी समझाना होगा। ताकि वे समय की महत्ता को समझ सकें और अनावश्यक गतिविधियों में अपना समय नष्ट करने की अपेक्षा समय का सकारात्मक ढंग से प्रयोग करने हेतु जागृत हो सकेें। हमें जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त करने के लिए समय के हर क्षण का उपयोग करना सीखना होगा। यदि हम समय को बर्बाद करेंगे तो हमारा जीवन बर्बाद हो जायेगा क्योंकि समय ही तो जीवन है और जीवन से महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। अतः समय के मूल्य को समझना जीवन के मूल्य को समझना है। 
                    प्रसिद्ध विचारक फील्ड के अनुसार,  ‘सफलता और असफलता के बीच की सबसे बड़ी विभाजक रेखा को इन पाँच शब्दों में बताया जा सकता है, ‘मेरे पास समय नहीं है।’ निःसन्देह हम सभी के पास समय है। हमारी प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है कि हम उपलब्ध समय का निवेश कहाँ करते हैं। हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि हम अपने कार्यों के लिए समय का आवंटन इस प्रकार करें कि हमें कभी यह न कहना पड़े कि मेरे पास समय नहीं है। कभी भी हमारे सामने ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए कि हमारे महत्त्वपूर्ण कार्यो के लिए समय न हो; क्योंकि यदि हमारे पास समय नहीं है तो जीवन भी नहीं है।

जिंदगी हर पल मिलती है

           कई बार लोग कहते मिलेंगे कि जिंदगी एक बार मिलती है। वास्तव में यह सही नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि जिंदगी तो बार-बार मिलती है। हाँ! मौत एक बार मिलती हैै। जिंदगी तो हर दिन मिलती है, हर घण्टे मिलती है, हर पल मिलती है। आपको जीना आना चाहिए। आप समय का सदुपयोग करके प्रति पल जिंदगी को जीकर यादगार बना सकते हैं। समय को जीना अर्थात उपयोग करना ही तो वास्तव में जिंदगी है और यह जिंदगी हर पल हमारे सामने खड़ी है।

केवल वर्तमान में ही जीना है

यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम अपने समय का उपयोग करके जिंदगी जीना चाहते हैं या टाइम पास करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए प्रतिपल मरना चाहते हैं? अगर हमें जिंदगी चाहिए तो ध्यान रखना पड़ेगा कि समय ही जीवन है। समय को संरक्षित नहीं किया जा सकता। अतः हमारे लिए भूत और भविष्य के स्थान पर वर्तमान ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। हमें केवल वर्तमान में ही जीना है। कल निकल चुका, वापस जाकर नहीं जी सकते। कल क्या होगा? किसी को नहीं मालूमकल हमें मिलेगा भी या नहीं? अतः बीते हुए या भावी समय के बारे में चिंता करके वर्तमान को खराब न करें। 
                      वर्तमान समय के पल-पल को पूर्ण उत्साह और आनन्द के साथ जीकर ही हम जिंदा होने का प्रमाण दे सकते हैं अन्यथा बिना कुछ किए समय बर्बाद करने और अचेत मूर्छावस्था में पड़े हुए व्यक्ति या मृत व्यक्ति में तो कोई विशेष अन्तर नहीं रह जाता है। समय को पास करने के लिए हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती। टाइमपास बड़ा ही सामान्य शब्द है, जो सामान्य जन के लिए है। सफलता के पथिक के लिए तो समय के सन्दर्भ में कार्यो का नियोजन करना ही उसकी आदत बन चुकी होती है। उसके पास कभी समय की कमी नहीं होती। समय की कमी कहाँ से होगी? उसके पास तो समय की एजेंसी होती है।
                    समय सभी के लिए अनमोल है; प्रकृति ने यह सभी को निःशुल्क उपहार स्वरूप दिया है। हम प्राप्त समय का न तो संरक्षण कर सकते हैं और न ही इसका क्रय या विक्रय कर सकते हैं। कहा भी जाता है कि जो समय को बर्बाद करता है, समय ही उसे बर्बाद कर देता है। जो व्यक्ति समय को खो देता है, वह उसे कभी वापस प्राप्त नहीं कर सकता। एक फेसबुक पोस्ट के अनुसार, ‘सही समय का इंतजार करते-करते जिंदगी निकल जाएगी, अच्छा होगा कि समय को ही सही करने की कोशिश की जाए।’ समय को सही समय के पूर्ण सदुपयोग से ही किया जा सकता है। यदि हम समय पर भोजन नहीं करेंगे, समय पर विश्राम नहीं करेंगे या समय पर शरीर की देखभाल नहीं करेंगे, समय पर अपनी दवायें नहीं लेंगे तो समय हमारे स्वास्थ्य को नष्ट कर देगा, नहीं, हम स्वयं अपने स्वास्थ्य को नष्ट कर देंगे; क्योंकि समय तो तटस्थ यात्री है, जो सदैव चलता रहता है। समय कुछ करता नहीं, हमको ही समय के साथ चलते हुए करना होता है।
                सामान्यतः हमें ध्येयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ रहने की सीख दी जाती है किंतु इस सबके साथ आवश्यक यह भी है कि हम समयनिष्ठ भी रहें क्योंकि यदि हम समयनिष्ठ नहीं रहेंगे, तो जीवननिष्ठ भी नहीं रहेंगे। यदि जीवन ही नहीं होगा तो ध्येयनिष्ठ और सत्यनिष्ठ रहने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा। समयनिष्ठ रहने से हमारा आशय हमें प्राप्त समय की प्रत्येक इकाई का सदुपयोग करने से है। हम समय की प्रत्येक इकाई को जिंदगी में परिवर्तित कर लें अर्थात् समय के प्रत्येक पल को सच्चाई के साथ अपने ध्येय की पूर्ति में लगायें। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हमें प्राप्त समय को शानदार और यादगार जिंदगी में परिवर्तित करते हैं या मृत्यु में? क्योंकि जिंदगी का विपरीतार्थक मृत्यु ही है। यदि आप जिंदगी नहीं जीते हैं तो निःसन्देह मृत्यु की ओर प्रस्थान कर रहे होते हैं। क्योंकि समय अबंधनीय है अर्थात् समय को बांधना संभव नहीं है। समय सीमा रहित है, समय की सीमा का निर्धारण करना हमारे लिए संभव नहीं है। हाँ! समय अवश्य ही हमारे लिए सीमारेखा होता है। हमारा जीवन समय की कठपुतली है। समय को हराना संभव नहीं है। समय संसार का सबसे शक्तिशाली उपादान है। समय अपने आप में निष्क्रिय संसाधन है। इसका प्रयोग हम अपनी सक्रियता से ही कर सकते हैं।

सोमवार, 6 मई 2019

समय की एजेंसी-5

समय ही जीवन


समय ही जीवन है?


समय = जिंदगी


एलन लेकीन का कथन है, ‘‘समय=जिंदगी’ इसलिए जब हम समय बर्बाद करते हैं, तब हम अपनी जिंदगी बर्बाद करते हैं। दूसरी ओर जब आप अपने समय के स्वामी होते हैं, तब आप अपनी जिंदगी के भी स्वामी होते हैं।’’ कहा यह भी जाता है कि ‘जिसने स्वयं को जीत लिया, उसने जग को जीत लिया।’ अपने पास उपलब्ध समय का स्वामी होना अर्थात्् अपने समय का अपनी इच्छानुसार योजना बनाकर प्रयोग करके आनंदपूर्ण जीवन जीना ही तो स्वयं को जीतना है। इस प्रयास में ही युगों-युगों से साधक साधना करते आए हैं। जिंदगी को अपने योजना के अनुसार जीना ही कार्य प्रबंधन अर्थात् समय के संदर्भ में अपनी गतिविधियों का प्रबंधन करना कहा जाता है।
             अब हम विचार करते हैं कि जिंदगी अर्थात् जीवन क्या है? इस पर बहुत गहन व दार्शनिक चिंतन की आवश्यकता पड़ सकती है किंतु लेखक न तो विद्वान है और न ही दार्शनिक। लेखक एक अध्येता है, जो कुछ सीखना चाहता है और जो कुछ अच्छा लगे उसे अपनों के साथ शेयर करना चाहता है। अतः इस विषय पर किसी प्रकार का दार्शनिक व विद्वतापूर्ण निष्पादन यहाँ संभव न हो सकेगा और न ही इस प्रकार की अपेक्षा इस पुस्तक से पाठकों को करनी चाहिए। सामान्य व इस व्यावहारिक चर्चा के माध्यम से यहाँ पर जीवन व समय का संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। 
               आध्यात्म या धार्मिक व्यक्तियों की बातों का संदर्भ लें तो सामान्तः हमें सुनने को मिलता है कि जन्म और मृत्यु मानव के हाथ में नहीं है। ऊपर वाला पहले से ही निर्धारित करके भेजता है कि किस प्राणी को कितने दिन तक इस लोक में रहना है। हिंदु धर्म में तो यमराज, धर्मराज और चित्रगुप्त की कल्पना भी की गई है। 
                 चित्रगुप्त का तो काम ही यह है कि वह प्राणी के जन्म-मरण और कर्मो का लेखा-जोखा रखे और जब जिसकी आयु पूर्ण हो जाय, उसके प्राणों को यमदूतों के माध्यम से यम लोक बुला ले। कहने का आशय यह है कि यह अवधारणा बताती है कि किस प्राणी को कितना समय मिला है? यह पूर्व निर्धारित है अर्थात् उसको मिला हुआ समय ही प्राणी का जीवन काल कहलाता है। यह एक धारणा है, जो आस्था का विषय है किंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि हम नहीं जानते कि हमारा जीवन काल कितना है? अतः हमारे लिए तो हमारा जीवन काल अनिश्चित ही है। अगले क्षण ही समाप्त होना संभव है। अतः हमारा जीवन क्षणभंगुर है।

जीवन क्या है? 

यह प्रश्न अनादिकाल से मनुष्य के सामने अटल खड़ा रहा है। विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषाएं दी हैं। यहाँ तक कि जटिल सैद्धान्तिक परिभाषाओं को समझना मेरे जैसे सामान्य जन के लिए तो टेढ़ी खीर होता है। अतः मैं यहाँ जीवन की गूढ़ परिभाषाओं के बारे में चर्चा करके पाठकों का दिमाग गरम नहीं करूंगा। मैं तो सामान्य जन के साथ अपने विचारों को बांटना चाहता हूँ कि हम प्रबंधन की सहायता से अपने जीवन का विस्तार कैसे कर सकते हैं? सामान्य चर्चा के समय कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति बड़ा ही सफल जीवन जीया। अमुक व्यक्ति का जीवन निरर्थक ही रहा। अमुक व्यक्ति का जीवन भी कोई जीवन है? अच्छा होता ईश्वर उसे उठा ही लेता। इन सभी चर्चाओं में एक ही बात निकल कर आती है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन का अर्थात् प्राप्त समय का प्रभावी प्रयोग किया, उसे सफल कहा जाता है। जो व्यक्ति कुछ नहीं करता या कुछ नहीं कर सकता, उसके लिए तो ईश्वर से उठा लेने की प्रार्थना की जाती है।
                संसार में प्रत्येक व्यक्ति उसे मिले हुए समय का ही उपभोग करता है। किस व्यक्ति का जन्म कब हुआ और मृत्यु कब हुई? इसी से उसका जीवन काल निर्धारित होता है। कुछ विचारक मानव को मिले हुए जीवन को उसके द्वारा ली जाने वाली श्वासों से जोड़ते हैं। उनका मानना होता है कि हम जितने धीमे-धीमे श्वास-प्रश्वास लेंगे हमारा जीवन उतना ही अधिक दीर्घ होगा। योग के क्षेत्र में प्राणायाम के द्वारा अपनी आयु बढ़ाने की बहुत कथायें मिल जाती हैं। मेरे विचार का विषय उन विभिन्न विचारों की प्रामाणिकता पर विचार करना नहीं है। मेरा मन्तव्य केवल यह स्पष्ट करना है कि जीवन और कुछ नहीं किसी प्राणी को जीवित रहने के लिए मिला हुआ समय ही उसका जीवन है।

आदतों को बदला जा सकता है

मानव की प्रत्येक गतिविधि में कम या अधिक समय का उपयोग होता है। समय के साथ-साथ व्यक्ति विभिन्न क्रियाओं को संपन्न ही नहीं करता, अपने जीवन को भी कम करता जाता है अर्थात्् समय की प्रत्येक इकाई के साथ हमें मिला हुआ समय कम होता जाता है। कुछ क्रियाओं को बार-बार करने से व्यक्ति की आदतों का विकास होता है। मानव समय के साथ-साथ ही आदतों का विकास करता है। एक बार जब किसी आदत का निर्माण हो जाता है, तब वह हमारे व्यवहार का महत्त्वपूर्ण भाग बन जाती है। आदतों को प्रयत्नों द्वारा बदला भी जा सकता है। एक अध्येता के अनुसार नवीन व्यवहार लगभग चालीस दिन में आदतों में परिवर्तित हो जाता है। अतः व्यवहार में परिवर्तन के द्वारा आदतों को बदला जा सकता है। आदतों में सकारात्मक परिवर्तन जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि का आधार होता है। 

अपने आप पर निवेश

शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार व्यवहार में होने वाले सकारात्मक परिवर्तन को ही शिक्षा या अधिगम के नाम से जाना जाता है। इसी को सीखना भी कहते हैं। व्यवहार में होने वाले इस परिवर्तन को आवश्यकतानुसार नियोजित या नियंत्रित भी किया जा सकता है। अपने जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा हम इस प्रकार के सीखने में भी लगाते हैं। जब हम सीखने में अपना समय लगा रहे होते हैं, उसमें भी हमारे जीवन में कमी हो रही होती है किंतु सीखने से हम अपने समय की उपयोगिता और उत्पादकता में वृद्धि करने में सफल हो सकते हैं। सरकारी क्षेत्र में शिक्षा पर किए गए व्यय को अनुत्पादक व्यय माना जाता रहा है किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। शिक्षा व प्रशिक्षण से हमारी उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है। वास्तव में सीखने में लगाया गया समय, समय की बर्बादी नहीं है, सही अर्थो में शिक्षा व प्रशिक्षण पर लगाया गया समय अपने आप पर किया गया निवेश है। अपने जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने पर किया गया निवेश है। समय की एजेंसी पर किया गया निवेश है।
                   हम आजीवन सीखते रहतें हैं किंतु सीखने के लिए हम कार्य करना बंद नहीं कर देते। कार्य बंद करके सीखना नहीं होता। कार्य बंद करके तो समय बर्बाद करना होता है। कार्य करते हुए सीखना अर्थात्् अनुभव से सीखना ही तो सीखने का सबसे अच्छा तरीका है। हाँ! दूसरों के अनुभवों से भी सीखना संभव है। कार्य प्रबंधन के ़क्षेत्र में समय के सन्दर्भ में कार्यों का प्रबंधन करके और उसको पूरा करने के बाद जब हम पुनरावलोकन करते हैं, वह सीखने की प्रक्रिया होती है; जो हमें भावी कार्य प्रबंधन में और भी अधिक कुशल बनाती है। शिक्षा व प्रशिक्षण व्यक्ति को प्रभावशाली ढंग से जीने के योग्य बनाते हैं।

जिंदा रहना ही जीवन नहीं

जब हम जीवन की बात करते हैं, तो विचार का विषय यह भी होता है कि जीवन है क्या? जीवन कितना है? के उत्तर में हम संभावित आयु के बारे में ही बात करते हैं। इसका अर्थ तो यही हुआ कि हमें जितना समय मिला है, वही जीवन है किंतु वास्तव में यदि कोई व्यक्ति कोमा में है तो यथार्थ में वह जिंदा तो है किंतु कुछ करने की स्थिति में नहीं होता। ऐसे जीवन को हम उपयोगी, उत्पादक या प्रभावशाली जीवन नहीं कह सकते। केवल जिंदा रहना ही वास्तव में व्यक्ति, परिवार, देश व समाज के लिए उपयोगी जीवन नहीं होता।
              वास्तव में इस प्रकार के जीवन को हम जीवन ही नहीं कह पाते। जीवन तो जिंदादिली का नाम है। सामान्य व्यक्ति कहने लगता है कि यह जीवन भी कोई जीवन है? इससे तो अच्छा है, मृत्यु हो जाय। व्यक्ति बीमार हो और उसके प्राण-पखेरू उड़ न रहे हों; तो उसकी आत्मा की शांति के लिए गाय दान करने की परंपरा रही है। वर्तमान समय में कई बार तो ऐसे व्यक्ति के परिजनों ने उनकी मृत्यु के लिए न्यायालय से अनुमति प्राप्त करने के लिए याचिकाएं भी लगाई हैं। 
                कहने का आशय यह है कि वास्तविकता में समाज की दृष्टि में सक्रिय जीवन ही जीवन होता है। हम इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि उपलब्ध समय का सदुपयोग करना ही वास्तव में जीवन जीना है। 

रविवार, 5 मई 2019

समय की एजेंसी-४

कार्य प्रबंधन के महत्वपूर्ण क्षेत्र

मानव जीवन के सभी क्षेत्रों में समय के संदर्भ में कार्य प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। समय सर्वव्यापक है। संपूर्ण संसार में समय ही है जो अनादि, अनन्त और क्षणभंगुर है। समय अपने आप में असीम व अनन्त है किंतु मानव ही क्यों? अमानवीय साधनों का भी निर्धारित जीवन काल होता है। समय अपने आप में असीम व अनंत भले ही हो, हमारे पास असीमित समय नहीं है। हम यह तो जानते हैं कि हमें प्राप्त समय सीमित है किंतु कितना सीमित है? हम तो उस सीमा को भी नहीं जानते। अगले क्षण भी हम जीवित रहेंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं ले सकता। इसीलिए जीवन को क्षणभंगुर कहा जाता है, अर्थात सभी मानवीय व अमानवीय संसाधन क्षणभंगुर हैं। कब नष्ट होकर दूसरे रूप में आ जायँ? कोई नहीं जानता। समय अनादि है, जिसका आदि अर्थात् प्रारंभ कब हुआ हम नहीं जानते। समय अनन्त है अर्थात् इसका अंत नहीं होगा किंतु हमारे लिए यह क्षणभंगुर है क्योंकि हमारा समय कब समाप्त हो जायेगा? हम नहीं जानते। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारे शरीर सहित सभी पदार्थ क्षणभंगुर हैं। इस अनिश्चित समय में ही हमें व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक अनेक काम करने हैं। इन अनेक कार्यो का उपलब्ध समय के सन्दर्भ में प्रबंधन करना अत्यावश्यक है। 
                 जीवन भले ही क्षणभंगुर हो किंतु हमारे कर्तव्य असीमित होते हैं। हम अपनी मृत्यु के बाद तक के लिए अपने लोगों के लिए व्यवस्था करने का प्रयास करते हैं। हमारे पास कामों की कमी कभी नहीं होती। एक समाप्त होता है, चार प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। अर्थशास्त्र में चयन के सिद्धांत के अनुसार विकल्प अनेक होते हैं तो चयन करना पड़ता है। यही तो प्रबंधन में निर्णयन कहलाता है। चयन का मतलब अपने कार्यो की प्राथमिकताओं का निर्धारण करना, प्रस्तावित कार्य के लिए समय का आवंटन करना और उस समय में कार्य को पूर्ण प्रभावशीलता के साथ पूर्ण करने के लिए प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। इसे सामान्यतः कार्य प्रबंधन कहा जाता है किंतु वास्तव में समय का प्रबंधन नहीं हो सकता। अतः हम इसे कार्य प्रबंधन कहना ही उपयुक्त समझते हैं।
                    हमें हर क्षेत्र में समय की कमी महसूस होती है। अधिकांश व्यक्ति समय की कमी का रोना रोते देखे जा सकते हैं। इसी कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। कार्य प्रबंधन में कुशलता या अकुशलता ही सफलता या असफलता का आधार होती है। फील्ड के अनुसार, ‘सफलता और असफलता के बीच की सबसे बड़ी विभाजक रेखा को इन पाँच शब्दों में बताया जा सकता है कि ‘मेरे पास समय नहीं है।’’ वास्तव में सभी के पास समय है। यह उस पर निर्भर करता है कि वह अपने समय को कहाँ और किस प्रकार उपयोग करता है? यह समय के संदर्भ में अपनी गतिविधियों के प्रबंधन पर निर्भर करता है। अपनी प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। कार्य प्रबंधन को विभिन्न क्षेत्रों में लागू करके ही सफलता सुनिश्चित की जा सकती है। विभिन्न क्षेत्रों में कार्य प्रबंधन की आवश्यकता को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

सभी क्षेत्रों में प्रबंधन की आवश्यकताः

संसार में समस्त कार्य समय के संदर्भ में प्रबंधन की माँग करते हैं। कार्य प्रबंधन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी रहता है, किसी घर का प्रबंध सभालने वाली सामान्य गृहिणी हो, किसान हो, मजदूर हो, कोई डाक्टर हो, कोई छोटा-मोटा व्यापारी हो, कोई बड़ा उद्योगपति हो, पेशेवर चार्टर्ड एकाउटेण्ट, वकील ही क्यों न हो सभी को कार्य प्रबंधन की आवश्यकता होती है। सभी कुछ न कुछ मात्रा में प्रबंधन करते ही हैं। उनकी प्रबंध कुशलता ही उनके स्तर को निर्धारित करती है। जिसमें जितनी अधिक प्रबंध कुशलता होती है, वह उतना ही अधिक महत्वपूर्ण कार्य करने व करवाने में सफल होता है। प्रबंध कुशलता में सक्षम व्यक्ति के लिए कोई कार्य मुश्किल नहीं होता। कोई व्यक्ति किसी छोटे से छोटे कार्य को कर रहा हो या बड़े से बड़े कार्य करने में व्यस्त हो किंतु उसे प्रबंधन तो करना ही होता है। प्रबंधन ही उस कार्य को पूर्णता दिलाता है।
               एक छोटे बच्चे को भी अपने प्रिय खेल में भाग लेने के लिए माता के हाथ के दूध को छोड़कर भाग जाना पड़ता है। आप किसी निठल्ले बैठे व्यक्ति को कोई रचनात्मक कार्य बतायेंगे तो वह भी यही कहेगा कि उसके पास समय नहीं है। उसके द्वारा यह कहने का आशय यह नहीं है कि उसके पास समय नहीं है। उसका आशय यह है कि उसने अपने लिए प्राथमिकताओं का निर्धारण कुछ अलग ढंग से कर रखा है। उसे उस समय को कहीं अन्यत्र लगाना है। हम यह कह सकते हैं कि उसने अपनी प्राथमिकताओं का निर्धारण सही से नहीं किया है और अपनी गतिविधियों का समय के संदर्भ में प्रबंधन करना उसे नहीं आता है, किंतु उसके विचार व योग्यता के अनुसार वही सही है। सभी व्यक्तियों को सभी क्षेत्रों में प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के सन्दर्भ में कार्य प्रबंधन की चर्चा करना उपयोगी रहेगा।

1. गृहिणी के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता- 

व्यक्ति के जीवन में प्रथम समूह उसका घर अर्थात्् परिवार होता है। परिवार का मुख्य आधार गृहिणी होती है। कहावत भी है, ‘बिन घरनी, घर भूत का डेरा’। परिवार का सृजन, विकास व परिवर्धन गृहिणी के द्वारा ही संभव है। गृहिणी द्वारा गृह प्रबंधन कुशलता के साथ हो तो घर ही जन्नत बन जाता है। यदि गृहिणी गृह प्रबंध में कुशल न हो या उसकी निष्ठा घर से बाहर हो तो घर -घर नहीं रहता, एक भवन मात्र रह जाता है, ऐसे भवन को नर्क या दोजख में परिवर्तित होने में अधिक समय नहीं लगता। महत्त्वाकांक्षी व कर्मठ व्यक्ति के लिए ऐसा घर प्रताड़ना भवन बन जाता है और ऐसे व्यक्ति के लिए ऐसे घर से अलग हो जाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं रहता। 
                इस प्रकार मेरे कहने का आशय यह है कि परिवार व्यक्तित्व के विकास व समाज का आधार होता है और गृहिणी घर का आधार होती है। संपूर्ण घर को कुशलता के साथ संभालने के लिए गृहिणी को कार्य प्रबंधन की अत्यन्त आवश्यकता होती है। एक घर-गृहस्थी को कुशलतापूर्वक संभालने वाली महिला भी एक प्रबंधक है और किसी संस्था को संभालने वाले प्रबंधक से किसी भी प्रकार से कम नहीं होती। किसी संस्था के प्रबंधक के कत्र्तव्य पूर्णतः परिभाषित होेते हैं। एक गृहिणी के कत्र्तव्य और उत्तरदायित्व परिभाषित नहीं होते, असीमित होते हैं। 
                गृहिणी को न केवल घर का प्रबंधन करना होता है, वरन् उसे संबन्धों का प्रबंधन भी करना होता है, अपने आप का भी प्रबंधन करना होता है। वह ही एकमात्र धुरी होती है जो सभी परिवारीजनों को एक सूत्र में बांधे रखती है। इतनी बड़ी जिम्मेदारी के लिए उसके पास समय की कमी बराबर बनी रहती है किंतु इसके बाबजूद वह कार्य प्रबंधन तकनीकों का प्रयेाग करके सब कुछ व्यवस्थित बनाये रखने में सफल होती है। 
                 वह परिवारीजनों से बिना किसी आधिकारिकता के सहयोग लेती है। बच्चों से सहयोग लेती है, बड़ों से सहयोग लेती है, सभी को प्रसन्न रखने की कोशिश करती है और सभी की प्रसन्नता में ही अपनी प्रसन्नता खोज लेती है। इतनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन वह कार्य प्रबंधन के द्वारा ही कर पाने में सफल होती है। निःसन्देह एक घर को चलाने का कार्य एक संस्था के चलाने के कार्य से अधिक प्रबंध कुशलता की मांग करता है। 
               अतः हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि एक गृहिणी कार्य प्रबंधन के द्वारा ही अपने उत्तरदायित्वों का कुशलता व सफलता के साथ निर्वहन कर पाती है। हाँ! यह अलग बात है कि उसे कार्य प्रबंधन के शिक्षण व प्रशिक्षण के लिए किसी विद्यालय या महाविद्यालय में नहीं जाना पड़ता। पारंपरिक रूप से अपने घर से ही वह प्रबंधन में कुशलता हासिल कर लेती है। धीरे-धीरे यह पक्ष कमजोर पड़ता जा रहा है, गृह प्रबंधन सीखने की पारंपरिक व्यवस्था कमजोर पड़़ती जा रही है। अतः हो सकता है, अगली शताब्दी में गृह प्रबंधन भी एक स्वतंत्र विषय के रूप में विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाना प्रारंभ करना पड़े।

2. विद्यार्थियों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

 विद्यार्थी किसी भी देश की पूँजी होते हैं। विद्यार्थियों को  किसी भी देश का भविष्य कहा जाता है। ‘अध्यापक हैं युग निर्माता, छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता’ नारे के अनुसार; उन्हें राष्ट्र का भाग्य विधाता भी कहा जाता है। विद्यार्थी जीवन सबसे अधिक मजेदार और भविष्य की तैयारी के लिए सबसे अधिक उत्तरदायित्व वाला काल होता है। विद्यार्थियों को अध्ययन ही नहीं, व्यक्तिगत, पारिवारिक, विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों, पाठ्येत्तर गतिविधियों व अन्य अनेक गतिविधियों में व्यस्त रहना होता है। व्यक्तिगत स्तर पर भी विद्यार्थी जीवन को ही मौजमस्ती का काल भी कहा जाता रहा है। वर्तमान में कैरियर को लेकर विद्यार्थी मनोवैज्ञानिक दबाव में भी रहते हैं। विद्यार्थी को अभिभावकों की अति महत्त्वाकांक्षा के दबाव का भी सामना करना पड़ता है। 
             विद्यार्थियों को प्रातःकाल पीटी से लेकर, कक्षाओं के नियमित कालांशों के अलावा सायंकालीन खेलकूद में भी भाग लेना होता है। विद्यालय समय के बाद भी कक्षाओं में ढेर सारा गृहकार्य भी दे दिया जाता है। इसके अतिरिक्त,  अतिरिक्त कक्षाओं की भी परंपरा चल पड़ी है। इस प्रकार विद्यार्थी भी बहुत अधिक व्यस्त हो जाता है। कई विद्यार्थी तो अवसाद के शिकार हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में अपनी सभी गतिविधियों में सफलतापूवर्क भाग लेने के लिए विद्यार्थियों को अपनी सभी गतिविधियों का समय के सन्दर्भ में प्रबंधन करना पड़ता है। समय के सन्दर्भ में कार्य प्रबंधन ही विद्यार्थियों को तनाव, दबाब व अवसाद से बचाकर सफलता दिलाने का एकमात्र विकल्प है।
               कार्य प्रबंधन के बिना विद्यार्थी जीवन की सफलता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। विद्यार्थी का संपूर्ण जीवन समय तालिका के अनुसार विद्यालय की घण्टियों पर चलता है। विद्यार्थी जीवन में ही व्यक्ति बार-बार समय तालिका बनाने और लागू करने का प्रयास करता है। यदि वह अपनी समय तालिका को भली प्रकार बना और लागू कर पाता है तो ज्ञान की उपलब्धियाँ हासिल कर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विद्यार्थी जीवन के लिए कार्य प्रबंधन अत्यन्त आवश्यक है। इसी काल में वह समय के सन्दर्भ में कार्य प्रबंधन सीखने का अभ्यास भी करता है।

3. व्यापारियों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

 किसी भी कार्य को करने के लिए समय के अनुशासन की आवश्यकता रहती है। क्रय व विक्रय की क्रिया से लाभ कमाने को व्यापार कहते हैं। व्यापार तो समय पालन पर ही निर्भर करता है। जो व्यक्ति समय पालन नहीं कर सकता, वह कभी भी अच्छा व्यापारी क्या? व्यापारी ही नहीं हो सकता। समय के अनुशासन का पालन करके ही वह अपने ग्राहकों का विश्वास अर्जित कर सकता है। समय के सन्दर्भ में व्यापारिक गतिविधियों का प्रबंधन किए बिना व्यापार की साख निर्मित नहीं हो सकती और कोई भी व्यापार साख के बिना दीर्घकाल तक चल ही नहीं सकता।

               व्यापारी अपने व्यवसाय का स्वयं मालिक होता है, अतः संपूर्ण व्यापार के संचालन का उत्तरदायित्व उसी का होता है। उसे अन्य व्यक्तियों से भी काम लेना होता है। उसके व्यापार में अन्य संसाधनों का भी निवेश होता है। व्यापारी के लिए समय का अत्यन्त महत्त्व है। अधिक समय तक उधारी रहने पर व्यापारी एक-एक दिन का ब्याज लगा लेता है। व्यापारी को अपने ही नहीं, अपने कर्मचारियों व अन्य आर्थिक संसाधनों के समय का भी प्रबंधन करना होता है।

4. उद्योगपतियों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

उद्यम को करने वाले उद्यमी कहलाते हैं। उद्यम ही आधुनिक औद्योगिक विकास की धुरी है।  उद्योग के अन्तर्गत अधिकांशतया वस्तुओं का उत्पादन, निर्माण या प्रक्रियाकरण सम्मिलित होता है। उद्योग किसी देश के विकास की आधारशिला होते हैं। उद्यमी छोटा हो सकता है, बड़ा हो सकता है। बड़ा होने पर वही  उद्योगपति कहलाता है। उद्योगपति ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। उद्योगपति पूँजी लगाते हैं, इसी कारण इन्हें पूँजीपति भी कहते हैं।
                पेशेवर प्रबंधन का श्रेय पूँजीपतियों को ही जाता है। जब तक उद्योग व व्यवसाय छोटे स्तर पर रहता है, मालिक ही प्रबंधक का काम भी करते हैं। जब उत्पादन बड़े पैमाने पर करने के लिए वृहद स्तर के उद्योगों की स्थापना की जाती है। वृहद स्तर के उद्योग काॅरपोरेशन प्रारूप में काम करते हैं। कम्पनी प्रारूप में स्वामित्व और प्रबंधन अलग-अलग होते हैं। 
              उद्योगपति उद्योग का प्रबंधन स्वयं नहीं करते हैं, पेशेवर प्रबंधकों से करवाते हैं। पेशेवर प्रबंधक ही वास्तव में उद्योगों का संचालन करते हैं। उद्योगपति पेशेवर प्रबंधकों से प्रबंधन करवाते हैं। इसका आशय यह नहीं है कि उद्योगपतियों पर कोई काम नहीं होता। पेशेवर प्रबंधकों से काम करवाने के लिए भी काम करना पड़ता है। दूसरों से कार्य करवाना ही तो प्रबंधन है। ‘कार्य करने वाला व्यक्ति कर्मचारी होता है, किंतु काम करवाने वाला व्यक्ति प्रबंधक होता है।’ काम करवाने के लिए भी प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। उद्योगपति कार्य प्रबंधन करके ही पूँजीपति बनते हैं। कार्य प्रबंधन के बिना वे उद्योगपति रहेंगे ही नहीं। इस प्रकार उद्योगपति को भी कदम-कदम पर कार्य प्रबंधन पर ध्यान दे देना चाहिए। वास्तव में उद्यमी प्रबंधकों का भी प्रबंधक होता है। कार्य प्रबंधन के बिना वह एक साथ अनेक उद्यमों का स्वामित्व सभांल पाने में सक्षम न हो सकेगा। अतः उद्यमियों के लिए समय के संदर्भ में कार्य प्रबंधन अनिवार्य है।


5. फ्रीलांसरों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

जो व्यक्ति किसी के अधीन कार्य न करके स्वतंत्र रूप से अपनी क्षमता व कुशलता के साथ कार्य करते हैं, उन्हें फ्रीलांसर कहते हैं। फ्रीलांसर अधिकांशतया अपने घर से ही कार्य करते हैं। उनका घर ही उनका कार्यालय हो सकता है, आवश्यकता के अनुसार घर से अलग कार्यालय की भी स्थापना कर सकते हैं। ये अपनी सेवाएं विभिन्न बाहरी पार्टियों को प्रदान करते हैं और कार्य के आधार पर भुगतान प्राप्त करते हैं। घर से कार्य करते हुए अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक व अपने व्यावसायिक कत्र्तव्यों को एक साथ पूरा करना काफी कठिन होता है। इस कठिन कार्य को पूरा करने के लिए फ्रीलांसर को अनिवार्यतः कार्य प्रबंधन करना ही होता है। फ्रीलांसर कार्य प्रबंधन को अपनाये बिना कभी अपने हुनर को निखार नहीं सकता। उसे अपने सभी कार्य समयनिष्ठ रहकर पूरे करने होते हैं।

6. विभिन्न पेशेवरों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

 वर्तमान समय में न केवल पारंपरिक पेशों का विकास हो रहा है, वरन् नये-नये पेशों का भी जन्म हो रहा है। कोई भी पेशा विशिष्टीकृत सेवाओं का विक्रय है। पेशा व्यक्तिगत आस्था, विश्वास और निष्ठा के आधार पर विकसित और पल्लवित होता है। पेशेवर व्यक्ति को अपनी छवि पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। आस्था, विश्वास और निष्ठा तो समय के अनुशासन से ही पैदा होते हैं। आस्था, विश्वास और निष्ठा के बिना केवल विशिष्टीकृत सेवाओं के बल पर कोई पेशेवर अपने पेशे में सफल नहीं हो सकता। 
             इस प्रकार कहा जा सकता है कि निष्ठा, आस्था और विश्वास ही वह शक्ति है, जो पेशेवरों को समयनिष्ठ बनाती है। पेशेवरों को समय निष्ठ होना अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा वह अपने ग्राहकों का विश्वास अर्जित नहीं कर पाएगा। विश्वास के बिना पेशेवरों की कोई कीमत नहीं रहती। स्पष्ट है किसी भी पेशे के लिए समय के सन्दर्भ में कार्य प्रबंधन अत्यन्त आवश्यक है।

7. प्रबंधकों व प्रशासकों के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:- 

प्रबंधक व प्रशासक किसी भी संस्था के संचालक होते हैं। संस्था के लिए नीतियों को विकसित करने से लेकर उन्हें लागू करके सफलतापूर्वक संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने का सारा उत्तरदायित्व प्रबंधकों और प्रशासकों का ही होता है। किसी संस्था का नियोजन, संगठनीकरण, कर्मचारीकरण, निर्देशन व नियंत्रण का संपूण कार्य प्रबंधन व प्रशासन के अन्तर्गत ही आता है। प्रबंधन और प्रशासन में सीमा रेखा खींचकर अन्तर करना भी बड़ा मुश्किल कार्य है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 
             प्रबंधक व प्रशासक ही किसी संस्था की गतिविधियों के लिए जवाबदेह होते हैं। ये संस्था के अन्य सभी वर्गो से अधिक व्यस्त रहते हैं। इनके पास इतने अधिक कार्य होते हैं कि समय के सन्दर्भ में कार्यो का प्रबंधन किए बिना अपने कार्यों को कर ही नहीं सकते। कार्य करने वाले को कर्मचारी कहा जाता है, किंतु अधिक कार्य करने वाले को अधिकारी कहा जाता है। प्रबंधक और प्रशासक, वे अधिकारी है कि वे अधिक कार्य ही नहीं करते, सभी कार्यो को संपन्न करवाते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि प्रबंधन व प्रशासन के लिए कार्य प्रबंधन अनिवार्य आवश्यकता है।

8. नेताओं के लिए कार्य प्रबंधन की आवश्यकता:-

वर्तमान समय में नेताओं के लिए नकारात्मक अवधारणा निर्मित होती जा रही है, किंतु हमें विचारने की बात है कि सभी नेता स्वार्थी और लालची नहीं होते। वास्तव में नेता प्रबंधन और प्रशासकों से भी काम करवाने वाला व्यक्ति होता है। नेता वह होता है, जो अपने कामों के माध्यम से बड़े जनसमूह को प्रभावित करता है और जनसमूह की आकांक्षा की पूर्ति के लिए काम करता है। पीटर ड्रकर के अनुसार, ‘प्रबंधक का काम है काम को सही करने का और नेतृत्वकर्ता का काम है सही काम करने का।’ 
          नेताओं को प्रबंधन व प्रशासन से भी अधिक जवाबदेह होना होता है, वे संपूर्ण राष्ट्र व समाज के प्रति उत्तरदायी होते हैं। कुछ नकारात्मक छवि के नेताओं के कारण हम नेताओं के महत्व व उनके कार्यो को नजर अंदाज नहीं कर सकते। हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ही उदाहरण लें, उन पर अक्सर अधिक विदेश यात्राएँ करने का आरोप लगाया जाता रहा है। इस प्रकार के आरोप लगाने वाले विरोधी नेता वे होते हैं, जो अक्सर अपनी विदेश यात्राओं में आराम फरमाते हैं और केवल निजी पर्यटन के लिए अपनी विदेश यात्राओं का प्रयोग करते हैं। श्री मोदी जी की दिनचर्या संपूर्ण विश्व के लिए एक आदर्श दिनचर्या है। विश्व के नेता भी उनका लोहा मानते हैं। 
            श्री मोदी जहाँ भी जाते हैं, अपने पास उपलब्ध समय में अपने कार्यक्रमों का प्रबंधन इस प्रकार करते हंै कि वे उस क्षेत्र के अधिकतम् देशों की यात्राएँ कर सकें। अधिकतम् देशों के प्रतिनिधियों से मिल सकें। यहाँ तक कि वे विमान में भी कार्यो को निपटा रहे होते हैं। जहाँ तक जानकारी उपलब्ध है वे 3 से 4 घण्टे का ही विश्राम करते हैं और उनका सारा समय इस प्रकार से आबंटित होता है कि वे अधिकतम् गतिविधियों में भाग ले सकें। विश्व स्तर पर देखने पर अनेक ऐसे नेता मिल जायेंगे जिन्होंने कम समय में प्रबंधन के बल पर प्रभावपूर्ण कार्य किया और कार्य प्रबंधन के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ गए।
           इस प्रकार स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में प्रबंधन के असीम क्षेत्र हैं। प्रबंधन, प्रशासन, पेशेवर, उद्यमी, नेता, वकील, अध्यापक, दुकानदार, विद्यार्थी, गृह प्रबंधन, समारोह प्रबंधन आदि कोई भी मानवीय क्रिया ऐसी नहीं है जिसमें समय के सन्दर्भ में प्रबंधन की आवश्यकता न पड़ती हो। मनुष्य जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जहाँ उसे कार्य प्रबंधन की आवश्यकता न पड़ती हो। मनुष्य को जहाँ भी कोई कार्य करना है या करवाना है किसी संसाधन का प्रयोग करना है या करवाना है, वहाँ समय के सन्दर्भ में उसको उन समस्त गतिविधियों का प्रबंधन करना ही होगा। आबंटित व्यक्तियों या वस्तुओं के समय के प्रबंधन के बिना हम उनका मितव्ययितापूर्ण उत्पादक उपयोग सुनिश्चित नहीं कर सकते। अतः कार्य प्रबंधन मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनिवार्य है।



शनिवार, 4 मई 2019

समय की एजेंसी-३

समय का नहीं, गतिविधियों का प्रबंधन


प्रबंधन व्यक्ति की एक कुशलता या तकनीक है जिसके प्रयोग से वह न्यूनतम संसाधनों के प्रयोग से गुणवत्तापूर्ण अधिकतम परिणाम प्राप्त करने के प्रयत्न करता है। प्रबंधन मानवीय कुशलता और अन्य साधनों का प्रयोग करते हुए लक्ष्यों का निर्धारण करने तथा उन लक्ष्यों को प्राप्त करना है। संकुचित अर्थ में प्रबंधन दूसरे व्यक्तियों से काम कराने की युक्ति है, जो व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों से कार्य करा लेता है; वह प्रबंधक कहा जाता है। 
                 व्यापक अर्थ में प्रबंधन एक कला और विज्ञान है जो निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न मानवीय प्रयासों से सम्बन्ध रखता है। जब भी हम दूसरे व्यक्तियों या वस्तुओं से काम लेने की बात करते हैं, जैसा कि प्रबंधन का काम है; हम उन व्यक्तियों या उन वस्तुओं का निर्धारित समय तक नियोजन करके प्रयोग कर रहे होते हैं। पीटर एफ ड्रकर के अनुसार, ‘प्रबंधन प्रत्येक क्रिया का गतिशील एवं जीवनदायक तत्व है, उसके नेतृत्व के अभाव में उत्पादन के साधन केवल साधन मात्र रह जाते हैं, कभी उत्पादन नहीं बन पाते।’
प्रसिद्ध प्रबंधशास्त्री हेनरी फेयोल के अनुसार, ‘उपक्रम में उपलब्ध समस्त संसाधनों का उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यथासंभव सर्वोत्तम उपयोग के लिए प्रयास करना ही प्रबंधन का कार्य है।’ वास्तव में प्रबंधन के बिना अन्य सभी संसाधन, संसाधन मात्र ही रह जायेंगे कभी उत्पादन व सेवाओं में परिवर्तित नहीं हो सकेंगे। उत्पादन और सेवाएं ही तो उपलब्धियाँ हैं। उपलब्धि ही सफलता कहलाती है। इसका आशय यह है कि प्रबंधन के बिना उपलब्धियाँ नहीं हो सकतीं और उपलब्धियाँ नहीं हैं तो सफलता का तो शब्द ही प्रयोग नहीं किया जा सकता। प्रबंधन ही सफलता का आधार तय करता है। 
                  उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट होता है कि प्रबंधन मुख्यतः  मानवीय प्रयासों से ही संबन्ध रखता है। प्रबंधन भी अन्य संसाधनों की तरह एक संसाधन है, किंतु प्रबंधन वह संसाधन है जो अन्य संसाधनों का प्रयोग करके वस्तुओं और सेवाओं की उपयोगिता में वृद्धि करता है। किसी वस्तु या सेवा की उपयोगिता में वृद्धि ही तो उत्पादन गतिविधियों का आधार है। इस प्रकार व्यापक अर्थ में व्यक्तियों व वस्तुओं के निर्धारित समय को पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नियोजित करके प्रयोग करने के लिए की जाने वाली प्रत्येक गतिविधि प्रबंधन है अर्थात्् व्यक्तियों व वस्तुओं के निर्धारित समय का नियोजित प्रयोग कर निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए जो गतिविधि की जाती हैं, प्रबंधन है। 
                  प्रबंधन की आवश्यकता केवल निर्जीव संसाधनों को ही नहीं पड़ती, सजीव संसाधनों अर्थात श्रम और प्रबंधन को भी प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। प्रबंध नही लक्ष्य निर्धारित करता है, लक्ष्यों को प्राप्त करने की योजना बनाता है और लक्ष्यों को प्राप्त कर हमें सफलता की अनुभूति कराता है। प्रबंधन के अभाव में सफलता का अस्तित्व ही नहीं रहता। सफलता शब्द से हमारा परिचय प्रबंध नही कराता है।  सरलता से कहें तो मानवीय व अमानवीय संसाधनों के समय का निर्धारित लक्ष्यों के लिए प्रयोग कर सफलता प्राप्त करना ही प्रबंधन है।
                   जब हम कार्य प्रबंधन की बात करते हैं तो स्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता है कि समय का संरक्षण व प्रबंधन करना संभव नहीं है। कार्य प्रबंधन का आशय समय के सन्दर्भ में अपने कार्यो व गतिविधियों का प्रबंधन करना है, ताकि उपलब्ध भौतिक व मानवीय संसाधनों के समय का संपूर्णता के साथ उपयोग सुनिश्चित करके उनसे पूर्ण मितव्ययिता के साथ अधिकतम उपयोगिता प्राप्त की जा सके। इसके अन्तर्गत प्रबंधन की उपयोगिता भी सुनिश्चित की जाती है। प्रबंधन दल के प्रत्येक सदस्य के समय का भी पूर्ण उपयोग किया जाए, इसकी व्यवस्था देखना भी कार्य प्रबंधन के अन्तर्गत ही आएगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कार्य प्रबंधन का अर्थ अपने कार्यो का अपने पास उपलब्ध समय के संदर्भ में प्रबंधन करना है। कार्य प्रबंधन के अंतर्गत प्रबंधन मानवीय व अमानवीय संसाधनों के उपलब्ध समय का ही कार्य प्रबंधन नहीं करता, वरन अपने समय का भी प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए अपने कार्यो का प्रभावी प्रबंधन करता है।

उपलब्ध समय में अधिकतम व प्रभावपूर्ण कार्य


                निश्चित रूप से समय का प्रबंधन नहीं किया जा सकता, किंतु समय के संदर्भ में अपनी गतिविधियों का प्रबंधन किया जा सकता है। न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम् परिणाम प्राप्त करने के लिए अपनी सभी गतिविधियों का प्रबंधन करना समय की प्रत्येक इकाई का सही व प्रभावी प्रयोग करने के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। प्रबंधन के द्वारा हम उपलब्ध समय में ही उसका अधिकतम व प्रभावपूर्ण कार्य करते हैं, जो हम बिना प्रबंधन के नहीं कर पाते। यही नहीं किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए भी समय के सन्दर्भ में गतिविधियों का प्रभावपूर्ण प्रबंधन एक आवश्यक शर्त है। वास्तविकता यह है कि कार्य प्रबंधन का प्रयोग न करके हम इसे कार्य प्रबंधन शब्द से संबोधित करें तो अधिक उपयुक्त रहेगा। वैसे नाम में क्या रखा है? कार्य प्रबंधन कहें या समय प्रबंधन? अपनी गतिविधियों का प्रबंधन तो समय के संदर्भ में करना ही होगा। प्रबंधन के बिना सफलता के शिखर की यात्रा नहीं की जा सकती। कार्य प्रबंधन शब्द का प्रयोग केवल मानव समय के लिए ही नहीं, वस्तुओं के लिए भी किया जा सकता है। वस्तुओं का भी उपयोगी जीवन काल होता है। उनको भी उपलब्ध समय में उपयोग करना होता है अन्यथा वे भी बर्बाद हो जाती है। वस्तुओं का भी पूर्ण उपयोग करना कार्य प्रबंधन के अन्तर्गत ही आएगा। वास्तव में प्रबंधक पूँजी के समय का प्रबंधन करता है, वस्तुओं के समय का प्रबंधन करता है, श्रम के समय का प्रबंधन करता है; यही नहीं वह प्रबंधकों के समय का भी प्रबंधन करता है। 
                 निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कार्य प्रबंधन या कार्य प्रबंधन, प्रबंधन की वह शाखा है, जो उपलब्ध मानवीय व अमानवीय संसाधनों जिनमें श्रम और प्रबंधन भी सम्मिलित है, के उपलब्ध समय का पूर्ण मितव्ययिता व उपयोगिता के साथ उपयोग कर अधिकतम कार्य संपादित करके सफलता सुनिश्चित करती है। 
                  समय के संदर्भ में कार्य प्रबंधन ही प्रबंधन का सार है। प्रत्येक संसाधन का एक निर्धारित उपलब्ध समय होता है और प्रत्येक संसाधन की कीमत उसके उपलब्ध समय को ध्यान में रखकर ही निर्धारित की जाती है। उन सभी संसाधनों का प्रतिफल भी उनके प्रयोग किए गए समय के आधार पर प्रदान किया जाता है। उत्पादन में वृद्धि व लागत में कमी करने पर अधिकतम लाभ प्राप्त करने पर जोर दिया जाता है। श्री टेलर का उद्देश्य अपने उत्पाद की लागत में कमी करने के लिए अपनी श्रम लागत को कम करना था और वे श्रमिकों के समय को और भी अधिक उत्पादक बनाना चाहते थे। यह कार्य उनकी प्रत्येक गतिविधियों में लगने वाले समय का वैज्ञानिक अध्ययन करके उनमें से अनावश्यक समय को निकालकर और अधिक उत्पादन में प्रयोग करके ही हो सकता था।
                 समय के सन्दर्भ में अपनी गतिविधियों का प्रबंधन केवल व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र के लिए ही नहीं, शैक्षणिक क्षेत्र के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है। यही नहीं प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समय के सन्दर्भ में गतिविधियों का प्रबंधन आवश्यक है। विद्यार्थी, अध्यापक, चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता, उद्योगपति, व्यवसायी, प्रबंधक, लिपिक, चैकीदार, चपरासी, बढ़ई, लुहार व श्रमिक आदि सभी के लिए ही नहीं, संसार में प्रत्येक व्यक्ति के लिए समय के सन्दर्भ में अपनी गतिविधियों के प्रबंधन की आवश्यकता रहती है। यहाँ तक कि जब स्त्री-पुरुष नितांत एकांतिक क्षणों में बिस्तर में होते हैं, वहाँ भी समय के सन्दर्भ में प्रत्येक गतिविधि का प्रबंधन आवश्यक होता है अन्यथा उन्हें कभी भी चरमोत्कर्ष प्राप्त नहीं होता और वे परम आनन्द की अनुभूति करने से वंचित ही नहीं रह जाते वरन्् उनका पूरा जीवन मनोवैज्ञानिक रूप से असंतुष्टि की भेंट चढ़ जाता है। यही नहीं वैवाहिक जीवन समाप्त होकर आत्महत्या, हत्या या तलाक की स्थिति तक पहुँच जाता है। इस प्रकार हमें समझना होगा कि कार्य प्रबंधन, गतिविधि प्रबंधन या कार्य प्रबंधन हम कुछ भी कहकर संबोधित कर लें, हमें समय के संदर्भ में अपनी गतिविधियों का प्रबंधन करना ही होगा अन्यथा हमारी आयु बीत तो जाएगी, किंतु हम जीवन जी नहीं पाएगें।
               स्पष्ट है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमें समय के संदर्भ में कार्य प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है। आओ कार्य प्रबंधन के सन्दर्भ में या समय के सन्दर्भ में गतिविधियों के प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में कुछ चर्चा अगले अध्याय में करें।    

शुक्रवार, 3 मई 2019

समय की एजेंसी-२

स्वेच्छया मृत्यु वरण


आयु की दीर्घता मनुष्य की प्रभावशीलता का द्योतक नहीं होती। महाभारत के उद्योग पर्व(131ः13) में दिया है, ‘मुहूर्तमपि ज्वलितं श्रेयो न तु धूमायितं चिरम्’ अर्थात् चिरकाल तक धूमायित रहने की अपेक्षा एक मुहूर्त के लिए जलना अधिक अच्छा है। जलने से प्रकाश मिलता है और धुंआ तो पर्यावरण के लिए भी हानिकारक ही होता है। ठीक इसी तरह मानव का उपयोगी जीवन लघु रहकर भी प्रभावशाली हो सकता है। स्वामी विवेकानन्द केवल 39 वर्ष की आयु प्राप्त किए किंतु 39 वर्ष में ही वे सैकड़ों वर्षो का जीवन जी गए। उन्हांेने विश्व पर वह छाप छोड़ी  कि आज भी हम उन से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। सदियों तक हम स्वामी जी के काम से प्रेरित होते रहेंगे। कहने का आशय यह है कि कोई व्यक्ति कितने वर्ष तक जीवित रहा, यह उस व्यक्ति या उसके परिवार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, किंतु समाज के लिए उसके उपयोगी जीवन का ही महत्व होता है। वास्तव में व्यक्ति के उपयोगी आयु काल को ही जीवन की संज्ञा देना उपयुक्त रहेगा। 

            आपको ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जब परिवार के सदस्य ही यह प्रतीक्षा करने लगते हैं कि उनका वह संबंधी मर क्यों नहीं रहा है? आसपास के लोगों में भी चर्चा मिल सकती है कि अब तो अच्छा है कि ईश्वर उसे ऊपर ही उठा ले। यही नहीं स्वयं व्यक्ति भी अपनी मृत्यु की कामना करने लगता है। 
                महाभारत में भीष्म के प्रसंग को देखा जा सकता है, उनकी मृत्यु नहीं हो रही थी, जिसे इच्छा मृत्यु का वरदान कहा जाता है। अतः भीष्म ने स्वयं मृत्यु का वरण किया। इसे आत्महत्या कहें तो भी शायद गलत न होगा? अपनी उपयोगिता समाप्त हो जाने की अनुभूति के बाद पांडवों का हिमालय गमन और श्री राम द्वारा सरयू में जल समाधि लेने की कथा ही नहीं, एक निश्चित समय बाद वानप्रस्थ और संन्यास की प्रथा जीवन में कार्य प्रबंधन के उदाहरण माने जा सकते हैं। जैन मत में तो अन्न-जल त्याग करके अपने शरीर को त्याग देना बहुत बड़ा महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसे संथारा या सल्लेखना कहा जाता है। 

उपभोक्तावाद- उपभोग करो और फेंक दो
(Use and Throw)


वर्तमान समय में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिसमें लोगों की मृत्यु की प्रतीक्षा की जाती है या व्यक्ति स्वयं अपनी मृत्यु चाहता है। आत्महत्या भी अपने आप को अनुपयोगी समझ लेने की अनुभूति मात्र ही होती है। समाज में वृद्धों के लिए सम्मान की कमी के कारण भी वृद्धावस्था में काफी संख्या में लोग मरने की बातें करते हुए देखे जा सकते हैं। वास्तव में जब परिवारजन या स्वयं व्यक्ति मरने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। जीवन मूल्यों की दृष्टि से अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं किंतु आर्थिक दृष्टि से उस व्यक्ति के समय का सही से प्रयोग न हो पाने के कारण ही ऐसा होता है। वह व्यक्ति परिवार के लिए उपयोगी नहीं रह गया है। वर्तमान बाजारवादी समाज में प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता मात्र रह गया है। व्यक्ति के दो पहलू हैं। एक तरफ तो वह उपभोक्ता है, तो दूसरी तरफ वह अपने समय का उपयोग करके उत्पादक या सेवा प्रदाता भी है। दोनों में ही संतुलन आवश्यक है।
उपभोक्तावाद, ‘उपभोग करो और फेंक दो(Use and Throw)’ की नीति का पालन करता है। इसी समय की अनुपयोगिता के कारण व्यक्ति स्वयं ही अपनी मृत्यु की इच्छा व्यक्त करता है। शायद यही भीष्म के साथ भी हुआ होगा। वर्तमान में तो ऐसी घटनायें भी सुनने को मिल जाती हैं कि अमुक व्यक्ति को उसके परिवारजनों ने ही मार दिया। पति द्वारा पत्नी की और पत्नी द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर पति की हत्या की बातें खूब आती हैं। इन घटनाओं का सामाजिक व कानूनी पहलू कुछ भी हो, किंतु वास्तविकता यही है कि जो व्यक्ति जिसके उपयोग का नहीं रह जाता, इसके विपरीत वह उसके जीवन में बाधाएँ खड़ी करने लगता है। उसके ऊपर भार स्वरूप हो जाता है तो उसको रास्ते से हटने की प्रतीक्षा की जाने लगती है। कुछ दुस्साहसी उसे रास्ते से हटा ही देते हैं।

आयु और जीवन


मित्रों! हम आयु पर चर्चा कर चुके हैं। आइये अब कुछ चर्चा आयु और जीवन पर भी कर लें। आयु सभी को प्रकृति प्रदत्त होती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के समय को आयु के नाम से संबोधित किया जाता है। किसी की भी आयु को लेकर कोई निश्चितता नहीं होती। आयु प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त होती है, हमारी जिसमें भी आस्था हो। यह आस्था का विषय है, जिस पर चर्चा करना अनावश्यक है। जीवन प्रकृति प्रदत्त या ईश्वर प्रदत्त नहीं होता, हमारे स्वयं के द्वारा निर्धारित होता है। जन्म और मृत्यु के बीच का उपयोगी समय अर्थात् आयु का वह भाग जिसका हमने व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक विकास के लिए उपयोग किया है उसे जीवन कहा जाता है अर्थात्् जिस आयु का हमने आनन्दपूर्वक अपने, परिवार और समाज के लिए प्रभावशाली तरीके से उपभोग किया है वही जीवन है। संक्षिप्त रूप में कहें तो ‘जो जिया वही जीवन है’। आयु प्रकृति प्रदत्त मानी जा सकती है किंतु जीवन का सृजन तो हमें ही करना है। जीवन केवल हमारे और हमारे ऊपर ही निर्भर है कि इसे हम छोटा करना चाहते हैं या विस्तार देना चाहते हैं या फिर समाप्त कर देना चाहते हैं।
               आयु के उपलब्ध समय को हम जीवन में बदल सकते हैं। जीवन जीना एक कला है। इसलिए ही तो बहुत से लोग जीवन जीने की कला सिखाने का भी दावा करते हैं। उनका यह दावा कुछ हद तक सही भी होता है क्योंकि जीवन जीना सभी को नहीं आता। हममें से अधिकांश व्यक्ति जीवन बिता रहे होते हैं। आयु बिताने और जीवन जीने में जमीन आसमान का अंतर है। ‘चलो आज का दिन भी ठीक-ठाक गुजर गया।’ यह आयु का बिताना है। ‘वाह! आज का दिन तो बड़े आनन्द से बहुत कुछ दे गया, आज की उपलब्धियाँ मेरे, मेरे परिवार और समुदाय के लिए उपयोगी, प्रेरणादायक और स्मरणीय रहेगीं।’ यह जीवन जीना है। जीवन जीने की कला पर आपको बहुत से भाषण, आलेख और पुस्तकें मिल जायेंगी किंतु जीवन जीना एक कला है और किसी भी कला को सुनना या पढ़ना नहीं होता उसका अभ्यास करना होता है। अतः जब तक आप जीवन को जीना प्रारंभ नहीं करेंगे। आप जीवन रूपी कला से दूर ही रहेंगे।

समय रूपी संसाधन का प्रबंधन 


जब हम समय को एक संसाधन के रूप में स्वीकार करते हैं, तब हमें यह भी देखना पड़ेगा कि उस संसाधन का पर्याप्त और सही प्रयोग हो रहा है या नहीं। प्राचीन समय में लोग धन को जमीन में गाड़कर रखते थे और कई बार यह भी भूल जाते थे कि उन्होंने धन रखा कहां है? ऐसे धन का कोई उपयोग नहीं हो पाता था। सामान्यतः ऐसा धन पड़े-पड़े ही नष्ट भी हो जाया करता था। आज भी इस प्रकार के उदाहरण मिल जायेंगे। जब हम काले धन की चर्चा करते हैं, उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है कि वह अनुपयोगी पड़ा रहता है और देश व समाज के लिए उसका कोई उपयोग नहीं हो पाता। इस स्थिति से बचने के लिए सरकार काले धन को बाहर लाने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं लागू करती है। 
               जो धन कर बचाने के लिए जाने या अनजाने छिपाकर रखा जाता है, उसका उपयोग नहीं हो पाता; और विभिन्न सरकारें उसे विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बाहर लाकर उपयोगी बनाना चाहती हैं, काले धन की परिधि में आता है। काले धन को वापस अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने के प्रयास में कई बार तो सरकारें मुद्रा का विमुद्रीकरण भी कर देती हैं। भारत में तीन बार ऐसा किया जा चुका है। देश की आजादी से पूर्व ईस्वी सन् 1946 में मुद्रा का विमुद्रीकरण काले धन को बाहर लाने के उद्देश्य से किया गया था। आजादी के बाद जनता पार्टी सरकार द्वारा 1978 में मुद्रा का विमुद्रीकरण किया गया था। 
               वर्तमान भाजपा सरकार ने 8 नवम्बर 2016 को रातोंरात नोटबंदी की घोषणा करके लोगों को चैंका दिया था। यह विमुद्रीकरण और उससे होने वाली कठिनाइयों को हमने प्रत्यक्ष रूप से झेला है। इस प्रकार छिपे हुए धन को बाहर निकालने के लिए विभिन्न प्रयास किए जाते रहे हैं। 
        धन से भी अधिक अमूल्य व दुर्लभ संसाधन समय है। समय का कोई मूल्य ही नहीं होता कि हम उसका विमूल्यीकरण कर सकें। हमारी गतिविधियों में काफी मात्रा में ऐसा समय पड़ा-पड़ा बर्बाद होता रहता है, जिसका वास्तव में कोई प्रयोग ही नहीं हो रहा। सामाजिक स्तर पर अर्थशास्त्र की भाषा में ऐसे समय को छिपी हुई बेरोजगारी भी कहा जाता है।
                 धन को कम से कम बचाकर तो रखा जा सकता है, साथ ही उसका निवेश करके और भी धन कमाया जा सकता है। इसी कारण कहावत प्रचलित है कि ‘पैसे को देखकर पैसा आता है’, किंतु यह सुविधा समय के साथ उपलब्ध नहीं है। समय के साथ समय नहीं आता। बेंजैमिन फ्रैक्लिन के अनुसार, ‘समय ही पैसा है।’ समय ही पैसा है का आशय है कि समय की प्रत्येक इकाई का प्रयोग धन कमाने में किया जा सकता है। वास्तव में समय की बचत, समय की प्राप्ति है किंतु प्राप्त समय का तुरंत निवेश करना आवश्यक है क्योंकि समय को बचाकर रखा नहीं जा सकता। समय को आप किसी विशेष कार्य से बचा तो सकते हैं किंतु आप समय को संरक्षित करके रख नहीं सकते। बचाए हुए समय को तुरंत अन्य क्रियाओं में निवेश करना अर्थात् उपयोग करना आवश्यक है अन्यथा वह नष्ट हो जायेगा।

                 अतीत से निकलकर वर्तमान में जियेें- समय को बचाया या संरक्षित नहीं किया जा सकता। अतः किसी भी प्रकार के गुजरे हुए समय के बारे में चर्चा करना, चिंता करना समय की बर्बादी है। इस सन्दर्भ में किसी विचारक ने ठीक ही कहा है, ‘आप अतीत को तो नहीं बदल सकते, ंिकंतु आप भविष्य के बारे में चिंता करके अपने वर्तमान को अवश्य बर्बाद कर सकते हैं।’ डिसाइड आपको करना है कि आप उपलब्ध वर्तमान को बर्बाद करके अपने व अपने लोगों का जीवन बर्बाद करना चाहते हैं या अपने सामने उपलब्ध प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते हुए कदम-कदम पर सफलता के सीढ़ियाँ चढ़ना चाहते हैं। कहावत है कि चिंता चिता से बढ़कर होती है। हममें से अधिकांश व्यक्ति इस कहावत को सत्य स्वीकार करते हैं, इसके बावजूद हम अपने चारों और चिंताओं की चारदीवारी खड़ी कर लेते हैं।
         लेखक के.ल्याॅन्स के अनुसार, ‘गुजरा हुआ कल कैंसल्ड चैक है; आने वाला कल प्राॅमिसरी नोट है; आपके पास एक मात्र नकद आज है- इसलिए इसे समझदारी से खर्च करें।’ इस कथन से हम कल, आज और कल के बारे में चिंता से मुक्ति पा सकते हैं। कैंसल्ड चैक का रिकाॅर्ड रखने के अतिरिक्त और कोई महत्व नहीं रह जाता। ठीक उसी प्रकार बीते हुए कल का अनुभव से सीख लेने के अतिरिक्त और कोई मतलब नहीं रह जाता। बीते हुए को तो विस्मृति में ही डालना समझदारी मानी जाती है। कहावत भी है, ‘रात गई और बात गई।’ इसी प्रकार आने वाले कल के बारे में चिंता करने का भी कोई मतलब नहीं है। 
                 कल क्या होगा? किसको पता? कल हम जिंदा भी रहेंगे, इसके बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। जो समय हमें मिलेगा भी या नहीं? उसके बारे में चिंता करने का क्या मतलब? अतः हमें समझना होगा कि महत्वपूर्ण तो आज है, महत्वपूर्ण तो अब है, हमें उपलब्ध समय का उपयोग करना है। अभी जो हमारे पास नकद है, उसकी अच्छे से गिनती करनी है। रकम को गिनती करके तिजोरी में रखते हैं या बैंक में जमा करते हैं या कहीं निवेश करते हैं। समय के संदर्भ में इतने विकल्प उपलब्ध नहीं होते। यहाँ तो एक ही विकल्प है कि उसका किसी कार्य में निवेश करना है। निवेश के अनेक विकल्प होते हैं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम सबसे अधिक लाभकारी विकल्प में निवेश करें अर्थात् सबसे महत्वपूर्ण, उपयोगी और प्रभावशाली कार्य में निवेश करें। 

प्रबंधन सर्वव्यापक है

जी हाँ! हम विचार करें तो आपको प्रबंधन का अस्तित्व प्रत्येक गतिविधि और प्रत्येक स्थान पर मिल जायेगा। आप किसी कार्यक्रम या पार्टी में जायें आपको वहाँ की व्यवस्थाओं के बारे में टिप्पणी सुनने को मिल ही जायेंगी। टिप्पणियाँ कुछ इस तरह हो सकती हैं-
1. वाह! क्या खूब व्यवस्था की है। यहाँ का मेनेजमेण्ट बहुत अच्छा है।
2. भाई! पैसा तो खूब लगाया है। मेनेज सही से नहीें हुआ। बबार्दी बहुत हो रही है।
3. पैसे की कमी होते हुए भी मेनेज बहुत अच्छे ढंग से किया है। उम्मीद से बढ़कर सुन्दर व्यवस्थाएं हैं।
4. ‘ऊँची दुकान फीके पकवान’ चारों तरफ दिखावा ही दिखावा है। पैसे का प्रदर्शन है किंतु व्यवहार तो ठीक नहीं।  रिलेशन मेनेज करना नहीं आता।
              उपरोक्त टिप्पणियों से यह ही स्पष्ट नहीं होता कि प्रबंधन का प्रभाव कितना होता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रत्येक गतिविधि में प्रबंधन की भूमिका होती है। छोटे से छोटे कार्य से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यो तक प्रबंधन अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
              प्रभावशाली प्रबंधन और कुप्रबंधन कुछ भी हो आपको प्रबंधन तो मिल ही जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मामलों का स्वयं ही प्रबंधक होता है। परिवार के प्रबंधन का दायित्व सामान्यतः गृहिणी का माना जाता है। घर का आधार ही घरनी अर्थात् घरवाली होती है। कहावत भी है, ‘बिन घरनी, घर भूत कौ डेरा।’ वर्तमान समय में तो गृह प्रबंधन के रूप में प्रबंधन की एक शाखा का विकास हो रहा है। किसी संस्था का तो प्रबंधक के बिना अस्तित्व ही संभव नहीं है।  समय पर चर्चा करने के बाद आओ हम संक्षिप्त रूप से प्रबंधन पर चर्चा कर लें, तभी कार्य प्रबंधन शब्द को स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा। 

प्रबंधन क्या है?

संसार में उपलब्ध संसाधनों में प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता है। न्यूनतम संसाधनों से अधिकतम उत्पादन या उपयोगिता की प्राप्ति केवल और केवल प्रबंधन के द्वारा करवाई जाती है। प्रबंधन ही वह संसाधन है जो अन्य संसाधनों के मितव्ययितापूर्ण उपयोग को सुनिश्चित कर सकता है। मानवीय संसाधनों के अन्तर्गत श्रम व प्रबंधन दोंनो ही आते हैं किंतु श्रम की व्यवस्था और उससे काम लेने का काम भी प्रबंधन ही करता है। प्रबंधन ही समस्त संसाधनों को प्राप्त करने, उन्हें संस्था में बनाये रखने, उनका विकास करने और आवश्यकता पड़ने पर उनका निवेश करने का काम करता है। प्रबंधन केवल अन्य संसाधनों का ही प्रबंधन नहीं करता, वह प्रबंधकों का भी प्रबंध करता है। इसका कारण यह है कि श्रम के पश्चात् प्रबंधन ही एकमात्र ऐसा संसाधन है जो सजीव व गतिशील है। प्रबंधन अपने साथ-साथ अन्य संसाधनों के प्रयोग को भी सुनिश्चित करता है। उद्यमी, श्रम और प्रबंधन मानवीय संसाधन हैं जो अन्य सभी संसाधनों का उपयोग करते हैं।

गुरुवार, 2 मई 2019

समय की एजेंसी-१

समय और प्रबंधन


हम अपने आप से प्रश्न करें,
क्या समय का प्रबंधन संभव है?
 निःसन्देह इसका एक ही उत्तर आयेगा, ‘नहीं।’ 
        जी हाँ! यही सत्य है। समय का प्रबंधन कोई नहीं कर सकता। न तो समय का संचय किया जा सकता है और न ही उसे प्रबंधित किया जा सकता है। हाँ, हम अपने पास उपलब्ध समय को या तो बर्बाद कर सकते हैं, जिसे हम टाइम पास करना बोलते हैं या समय का उपयोग करके उसका उत्पादक व महत्वपूर्ण कार्यो में निवेश कर सकते हैं। निःसन्देह हम समय का प्रबंधन नहीं कर सकते किंतु हम समय के सन्दर्भ में अपनी गतिविधियों अर्थात् किए जाने वाले कार्यो का प्रबंधन कर सकते हैं। समय के सन्दर्भ में कार्यो का प्रबंधन ही हमारे पास उपलब्ध समय का सदुपयोग सुनिश्चित करके कार्याे का उचित समय में संपादन सुनिश्चित करता है। अपने पास उपलब्ध समय की प्रत्येक इकाई अर्थात् प्रत्येक क्षण का उपयोग करके और अपने कर्तव्यों को उचित समय का आवंटन करके हम समय के साथ अपने काम काज का प्रबंधन कर सकते हैं। अपने पास उपलब्ध समय के संदर्भ में अपने कार्यो व गतिधियों के प्रबंधन को हम स्वयं का प्रबंधन कहें तो भी उचित ही होगा।  समय के साथ अपने कामकाज का प्रबंधन करके ही हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं। जीवन का सही से प्रयोग करके उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। सामान्य जन इसी को कार्य प्रबंधन अर्थात्् टाइम मैनेजमेंट कहता है।
              मानव संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, ऐसा माना जाता है। व्यक्ति ने तुलनात्मक रूप से अन्य समस्त प्राणियों की अपेक्षा अपने बौद्धिक स्तर का विकास करके ऐसा सिद्ध भी किया है। मानव अपने बौद्धिक विकास के बल पर प्रकृति के अन्य उपादानों का न केवल कुशलतम उपयोग करने के प्रयत्न करता है, वरन्् वह प्रकृति के अन्य उपादानों को नियन्त्रित करने के प्रयत्न भी करता है। अपने इन्हीं प्रयत्नों के क्रम में वह ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रहों पर भी दस्तक दे रहा है। इन सभी प्रयत्नों व उपलब्धियों के कारण ही मानव को सर्वश्रेष्ठ होने का हकदार कहा जा सकता है।

समय अमूल्य संसाधन


हम मानव का कितना भी बखान कर लें। हमने कितना भी तकनीकी विकास किया हो, किंतु प्रकृति का एक संसाधन ऐसा है जिस पर नियंत्रण की बात तो दूर उसको संग्रह करने की क्षमता भी मानव में नहीं है और न ही इस प्रकार की कल्पना है कि वह भविष्य में भी समय पर नियंत्रण या समय को संरक्षित करने की क्षमता प्राप्त कर पायेगा। वास्तव में समय ही मानव को उपलब्ध सबसे मूल्यवान संसाधन है। मूल्यवान कहना भी संभवतः उपयुक्त न होगा। इसे अमूल्य कहना ही उपयुक्त है, क्योंकि इसके मूल्य का आकलन संभव ही नहीं है। समय का मूल्य व्यक्ति सापेक्ष कहा जा सकता है। समय का कोई एक मूल्य निर्धारित करना संभव नहीं है क्योंकि व्यक्ति केवल एक उपकरण मात्र नहीं है, जिसकी कीमत लगाई जा सके। ठीक उसी प्रकार व्यक्ति के समय की भी कीमत निर्धारित नहीं हो सकती। 
             समय बाजार में बिक्री करने की वस्तु नहीं है, अतः इसकी कोई अधिकृत कीमत निर्धारित नहीं होती; किंतु समय का मूल्यांकन समय के उपयोग आधारित विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर होता है। सेवाओं के रूप में मानव के समय को ही किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था द्वारा खरीदा जाता है। सेवाओं के अनुसार उनका पारिश्रमिक उन व्यक्तियों की कुशलता पर या उनके द्वारा उस समय में किए गए कार्यो की मात्रा व गुणवत्ता पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के एक दिन का भी कोई विशेष मूल्य नहीं होता, जबकि कोई कलाकार कुछ मिनटों में ही लाखों कमा लेता है। समय की उत्पादकता में वृद्धि  अवश्य ही  समय के मूल्य में वृद्धि करती है। समय की कीमत तो उसके उपयोग पर ही निर्भर होती है। यदि आप समय का उपयोग नहीं करते तो निश्चित रूप से वह समय बर्बाद हो गया और उस समय की कोई कीमत नहीं रह जाती।
              वास्तव में समय ही जीवन है। मानव आयु का मतलब ही मानव को अपने जीवन में मिले हुए समय से है। मानव को कितना समय उपलब्ध है, वही उस व्यक्ति का जीवन है। वह अपने समय का कितना कुशलतम् प्रयोग करता है? इस पर उसके जीवन की सफलता निर्भर करती है। हम सामान्यतः सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से समय की कीमत पर विचार करें तो मानव द्वारा समय की उपयोगिता के द्वारा ही उसे परिणाम मिलते हैं और समय की उपयोगिता के आधार पर ही व्यक्ति का मूल्यांकन होता है। समाज उन्हीं को पूजता है, जो समाज के लिए अपने जीवन अर्थात् अपने संपूर्ण समय या फिर सबसे महत्वपूर्ण समय में समाज के लिए कोई ऐतिहासिक कार्य कर जाते हैं। जो समाज के लिए अपने महत्वपूर्ण पलों का उपयोग करता है, समाज केवल उन्हीं को स्मरण करता है।

 क्या हो रहा है?

                वर्तमान समय में हम किसी से बातचीत में सामान्यतः पहला या दूसरा प्रश्न यह करते हैं, ‘और भाई! क्या हो रहा है?’ इस प्रश्न का उत्तर भी बड़ा ही सामान्य होता है, ‘कुछ नहीं ऐसे ही टाइमपास हो रहा है।’ यह अधिकांश व्यक्तियों के बीच के वार्तालाप का भाग रहता है। यही यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति समय की बर्बादी कर रहा है या समय का निवेश कर रहा है। जब व्यक्ति यह कहता है कि वह कुछ नहीं कर  रहा है। तब यह स्पष्ट है कि वह सबसे अमूल्य दुर्लभ संसाधन समय को बर्बाद कर रहा है, क्योंकि समय का संचय तो संभव नहीं है। यदि आप समय का सदुपयोग नहीं कर रहे हो तो उसे बर्बाद ही कर रहे हो। इसके अतिरिक्त समय के सन्दर्भ में अन्य कोई विकल्प तो उपलब्ध ही नहीं है। 
              बैंजेमिन फ्रेंकलिन के अनुसार, ‘सामान्य व्यक्ति समय को काटने के बारे में सोचता है और महान् व्यक्ति सोचते हैं समय का उपयोग करने के बारे में।‘ इसको हम इस प्रकार कहें कि जो समय का उपयोग करते हैं, वे महान् बन जाते हैं तो भी अनुपयुक्त न होगा। वास्तव में व्यक्ति साधारण या असाधारण नहीं होता, उसके कार्य साधारण या असाधारण होते हैं। जिसके कार्य असाधारण होते हैं, उसी को हम असाधारण व्यक्तित्व का धनी कहते हैं। असाधारण कार्य वही कर पाता है, जो समय के साथ चलता है। समय के पल-पल का उपयोग करता है। समय का प्रबंधन करने में कुशल होता है।
              कार्य प्रबंधन शब्द की चर्चा युवाओं में ही नहीं सभी उम्र के लोगों में देखी जा सकती है। कार्य प्रबंधन की चर्चा महिलाओं, पुरूषों, विद्यार्थियों, युवाओं, वृद्धों, व्यापारियों, नौकरी-पेशा वर्गो, पत्रकारों, लेखकों, राजनीतिज्ञों व समाजसेवकों सभी वर्गो  में सुनी जा सकती है। कार्य प्रबंधन पर बाजार में भी पुस्तकों का क्रेज है। नित नयी पुस्तकंे बाजार में आ रही हैं। कार्य प्रबंधन पर चर्चित व्यक्तियों को प्रबंधन गुरू के नाम से संबोधित किया जाने लगा है।
             अतः आओ हम कार्य प्रबंधन अर्थात् टाइम मैनेजमेण्ट शब्द के शाब्दिक अर्थ पर विचार करते हुए आगे बढ़ें। कार्य प्रबंधन समय और प्रबंधन दो शब्दों से मिलकर बना है। कार्य प्रबंधन शब्द युग्म को पूरी तरह समझने के लिए इन दोनों ही शब्दों पर अलग-अलग विचार कर लेना अधिक उपयोगी रहेगा। सर्वप्रथत समय पर विचार करते हैं, तत्पश्चात प्रबंधन पर विचार करेंगे।

समय की सर्व स्वीकृत परिभाषा नहीं


समय बड़ा ही चर्चित शब्द है। इसका अर्थ बहुत ही व्यापक व विभिन्न सन्दर्भो में बहुअर्थी है। विकीपीडिया के अनुसार, ‘समय एक भौतिक राशि है। जब समय बीतता है, तब घटनाएँ घटित होती हैं तथा चलबिंदु स्थानान्तरित होते हैं। इसलिए दो लगातार घटनाओं के होने अथवा किसी गतिशील एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने के अंतराल को समय कहते हैं। समय नापने के यंत्र को घड़ी अथवा घंटीयंत्र कहा जाता है।’
हमारी समस्त गतिविधियाँ समय के बारे में चर्चा करते हुए ही बीतती हैं? कई बार हम कहते हैं बड़ा मुश्किल समय है, खैर कोई बात नहीं, धैर्य रखो, ये भी निकल जाएगा। कोई कहता है, उसके तो दिन फिर गए। कोई-कोई तो जमाना खराब है कहकर वर्तमान को ही कोसने लगता है। बैंकिंग क्षेत्र के ग्रेशम के नियम, ‘बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’, की तरह ही समय का भी नियम है कि कठोर समय कोमल समय को बाहर कर देता है। 
               वास्तव में समय अच्छा या बुरा; कोमल या कठोर नहीं होता; यह विशेषण तो मनुष्य द्वारा आरोपित कर दिये जाते हैं। समय का प्रयोग मनुष्य द्वारा विभिन्न गतिविधियों में विभिन्न प्रकार से किया जाता है। इस प्रकार प्रयोग करने का तरीका ही कोमल या कठोर परिणाम देता है। अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर मानव उन परिणामों का दोष समय के ऊपर थोप देता है। यह मानव प्रवृत्ति है कि उसका कभी दोष नहीं होता। दोष सदैव दूसरे का ही होता है। यदि दोषारोपण के लिए कोई भी नहीं मिले, तो समय को दोष दिया जा सकता है। समय सबसे कमजोर है, उसे सभी के आरोपों को सहन करना ही पड़ता है। आखिर समय तो जबाब देने के लिए उपलब्ध नहीं होता ना। व्यक्ति अपनी कमियों को समय के ऊपर थोप देता है। कई बार तो अच्छे परिणाम मिलने पर अच्छा समय है, कहकर समय को श्रेय भी दिया जाता है।

क्षण से पल ओ पल से घड़ी, घड़ी से दिन बन जाता है।
इसका  बढ़ते  रहना काम,  समय  कब  वापस आता है?

                    विभिन्न कालों में समय के विभाजन के भी अलग-अलग तरीके रहे हैं। समय को क्षण, घड़ी, पल, सेकण्ड, मिनट, घण्टे आदि में ही नहीं, इसे पहरों में भी बांटा जाता रहा है। समय की अनेक इकाई प्रचलित हैं। भाषा अध्यापक समय को भूत, वर्तमान व भविष्य काल कहकर पढ़ाते हैं। सामान्यतः व्यक्ति द्वारा अपने कर्म की कमी को भी समय के गले मढ़ दिया जाता है। बुरा समय व अच्छा समय कहकर अपनी कठिनाइयों को भी समय से जोड़ दिया जाता है। कुल मिलाकर समय की बात सभी करते हैं किंतु समय को बांधना किसी के वश की बात नहीं है। अब इतने महत्वपूर्ण तत्व की सर्वस्वीकृत परिभाषा देना भी अपने बस की बात नहीं है। समय को आदि और अन्त में नहीं बांधा जा सकता तो इसको परिभाषा में कौन बाँध सकता है?
             समय की सर्वस्वीकृत परिभाषा देना, उसी प्रकार असंभव है, जिस प्रकार ईश्वर की अवधारणा को सर्वस्वीकृत रूप से स्पष्ट करना। समय की परिभाषा करना इस पुस्तक के लिए आवश्यक भी नहीं है। यहाँ पर समय को एक संसाधन के रूप में देख सकते हैं। समय को व्यक्ति और वस्तु दोनों के सन्दर्भ में देखा जा सकता है। व्यक्ति और वस्तु दोनों का ही उपयोगी जीवन काल होता है। उपयोगी जीवन काल के पश्चात् वस्तु का निस्तारण कर दिया जाता है। व्यक्ति के जीवन काल के बाद व्यक्ति के शरीर का भी विभिन्न समुदायों में विभिन्न प्रकार से निस्तारण किया जाता है जिसे सम्मानित शब्द अन्तिम संस्कार के नाम से जाना जाता है।

आयु


व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के समय को आयु के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार आयु भी समय का ही एक मापक है। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न प्राणियों की आयु विभिन्न होती है और अनिश्चित होती है। आयु के बारे में केवल अनुमान लगाये जा सकते हैं किंतु किसी व्यक्ति की कितनी आयु होगी, इसका पता लगाने का कोई विश्वसनीय तरीका अभी ज्ञात नहीं है। 
             किसी व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक जो समय उपलब्ध होता है, उसी समय को आयु के नाम से जाना जाता है अर्थात् समय ही आयु है। जिस प्रकार किसी के धन को मापा जा सकता है, उसी प्रकार उसकी उम्र की गणना तो की जा सकती है किंतु उसकी आयु कितनी होगी? इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किस पल मृत्यु हो जाय किसी को नहीं पता? गंभीर से गंभीरतम् बीमारियों के मरीज वर्षो तक बिस्तर पर पड़े हुए जिन्दा रहते हैं। वर्षो तक कोमा में पड़े हुए लोगों के भी जिन्दा रहने के आकड़े मिल जाएँगे। इस प्रकार आयु अधिक होने का कोई लाभ न तो व्यक्ति को मिल पाता है और न ही उस व्यक्ति के परिवार को। सामाजिक दृष्टि से भी ऐसी आयु का कोई उपयोग नहीं होता। वह व्यक्ति कष्ट भोगता रहता है। कई बार लोग इसे नर्क के नाम से संबोधित करने लगते हैं। किसी देश की स्वास्थ्य सुविधाओं का आकलन करने के लिए औसत आयु का भी प्रयोग किया जाता है। तथ्य यही कहते हैं कि किसी देश में स्वास्थ सुविधाओं की वृद्धि के साथ-साथ औसत आयु में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार आुय देश के विकास के मापन का आधार भी बनती है।
               आयु के सन्दर्भ में चर्चा चल रही है। अतः इस विषय पर आयुर्वेद में आयु की परिभाषा को यहाँ स्पष्ट किया जा रहा है, ’शरीरेन्द्रियसत्वात्मस्रंयोगों धारि जीवितम’ अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन एवं आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। वास्तव में शरीर, इन्द्रिय, मन एवं आत्मा को समय के सन्दर्भ में समझकर ही हम आयु की अवधारणा को स्पष्ट  कर सकते हैं। आयु के विषय में स्मरण रहे कि आयु के विज्ञान को ही आर्युवेद के नाम से जाना जाता है। आयु का विज्ञान होने के नाते आयुर्वेद भारत की सबसे महत्वपूर्ण विधा रही है।