बुधवार, 16 जुलाई 2014

द्वितीय अध्याय

सफलता को जानें



            सफलता सर्वप्रिय शब्द है। सभी व्यक्ति सफल होना चाहते हैं। सभी व्यक्तियों में कमोबेश सफलता की भूख पाई जाती है। एक छोटा सा बच्चा भी अपने प्रयासों में सफलता पाकर फूला नहीं समाता और अपेक्षित परिणाम न पाकर मुँह लटका लेता है, या रोने लगता है। आप कभी बच्चों को खेलते हुए देखिए, खेल में सफल होकर बच्चे कितने आनन्द का अनुभव करते हैं। बच्चा अपने माँ-बाप या अपने अभिभावकों से कोई बात मनवाना चाहता हैं और उसके प्रयास के फलस्वरूप हम उसकी बात मान लेते हैं; अपने प्रयासों के सफल होने पर वह कितना खुश होता है। कभी अनुभूति करके तो देखिए।
 
              सफलता केवल अन्तर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में स्थान पाकर ही नहीं मिलती। माँ-बाप जब अपनी नन्ही-मुन्नी बच्ची को लड़खड़ाते हुए एक कदम चलाने में सफल हो जाते हैं तो वह पहला कदम उन्हें कितना आनन्द देता है, उसकी अनुभूति शब्दों में बयां करना मेरे विचार में तो संभव नहीं है। मुझे आज भी याद है, जब मेरी पहली रचना एक स्थानीय साप्ताहिक में छपी थी, तो सफलता की कितनी अनुभूति हुई थी। उसकी बराबरी शायद नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली अनुभूति भी न कर पाये। कम से कम मुझे तो यही लगता है। सफलता की अनुभूति करने के लिए आवश्यक है कि हम सफलता के अर्थ को जानें और स्वीकार करे कि हमने उपलब्धि प्राप्त की है और यह उपलब्धि हमारे प्रयासों की सफलता है।


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