रविवार, 23 जून 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आजीवन शिक्षा की अवधारणा


शिक्षा मानव विकास प्रक्रिया का आधारभूत घटक है। मानव विकास सूचकांक तैयार करते समय भी इसको पर्याप्त भार दिया जाता है। शिक्षा ही मानव को मानव की गरिमा प्रदान करती है। शिक्षा विहीन मनुष्य तो पशु के समान ही होता है। शिक्षा के बिना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती। भारतीय परंपरा में शिक्षा को किसी विशेष आयु तक सीमित नहीं किया गया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली मृत्युपर्यन्त सीखने की अवधारणा को प्रस्तुत करती रही है। वर्तमान समय में इसे आजीवन शिक्षा या आजीवन सीखने के रूप में स्वीकार किया जाता है।

आजीवन सीखना या आजीवन शिक्षा निरंतर सीखने का एक तरीका है, जो पेशेवर या व्यक्तिगत सन्दर्भ में हो सकता है। यह न केवल निरंतरता पर जोर देता है, वरन यह स्व-प्रेरित भी होता है। आजीवन सीखना औपचारिक या अनौपचारिक हो सकता है और यह व्यक्ति के जीवन भर मृत्युपर्यन्त चलता रहता है। यह एंड्रोगोजी या वयस्क शिक्षण सिद्धांत से निकटता से जुड़ा है। यह रचनावाद की संरचना के अन्तर्गत भी आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे प्रौढ़ शिक्षा के साथ रखा गया है।

वर्तमान वैश्वीकरण, तेजगति और ज्ञान-चालित अर्थव्यवस्था में आजीवन शिक्षा विकास की गति को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। इक्कीसवीं की अर्थव्यवस्था श्रम आधारित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था है; जिसमें शिक्षा की कमी वाले लोगों को बेरोजगारी और कम वेतन का जोखिम उठाना पड़ता है। शिक्षाविद एलन बर्टन जोन्स के विचार में, ‘‘उपभोक्ता अर्थव्यवस्था एक सीखने वाला समाज बन जाएगी। जो कंपनियाँ तेजी से सीखेंगी, वे अपनी प्रतिद्वंद्वियों को हरा देंगी। सीखना एक आजीवन प्रक्रिया बन जाएगी, ग्रह पर सबसे बड़ी गतिविधि इक्कीसवीं सदी का प्रमुख विकास बाजार बनेगा।’’ यह स्थिति वास्तव में आ चुकी है। यदि हमें समाज में अपने स्थान को बनाए रखना है, तो बाजार में अपना स्थान बनाए रखने के लिए विकास करना है। विकास पथ पर चलने के लिए आजीवन सीखने का कोई विकल्प नहीं है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के भाग 3 के उपभाग 21 में आजीवन शिक्षा की अवधारणा को स्वीकार करते हुए आजीवन सीखने के लिए संरचनात्मक ढांचा विकसित करने की बात की गई है। उपभाग 21.9 में समुदाय एवं शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए पुस्तकों तक पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक समझा गया है। यह नीति अनुशंसा करती है कि सभी समुदाय व शिक्षण संस्थान-विद्यालय, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय ऐसी पुस्तकों की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे जो कि सभी शिक्षार्थियों, जिनमें निशक्त जन व विशेष आवश्यकता वाले शिक्षार्थी भी सम्मिलित हैं की आवश्यकताओं और रुचियों को पूरा करते हों। केन्द्र व राज्य सरकारें ये सुनिश्चित करेंगी कि पूरे देश में सभी की, जिसमें सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित लोगों के साथ-साथ ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले भी शामिल हैं, पुस्तकों तक पहुँच हो और पुस्तकों का मूल्य सभी के खरीद सकने के सामर्थ्य के अन्दर हो। सार्वजनिक व निजी दोनों प्रकार की एजेंसियाँ/संस्थान पुस्तकों की गुणवत्ता व आकषर्ण बेहतर बनाने की रणनीति पर काम करेंगी। पुस्तकों की ओनलाइन उपलब्धता बढ़ाने व डिजिटल पुस्तकालयों को अधिक व्यापक बनाने हेतु कदम उठाए जाएंगे। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 समुदायों व संस्थानों में जीवंत पुस्तकालयों को बनाने व उनका सफल संचालन सुनिश्चित करने के लिए, यथोचित संख्या में पुस्तकालय स्टॉफ की उपलब्धता पर जोर देती है। उनके व्यावसायिक विकास के लिए उचित करियर मार्ग बनाने एवं करियर प्रबंधन डिजाइन करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। विद्यालयों के पुस्तकालयों को समृद्ध करना, वंचित क्षेत्रों में ग्रामीण पुस्तकालयों व पठन कक्षों की स्थापना करना, भारतीय भाषाओं में पठन सामग्री उपलब्ध करवाना, बाल पुस्तकालय व चल पुस्तकालय खोलना, पूरे भारत में सभी विषयों पर सामाजिक पुस्तक क्लबों की स्थापना व शिक्षण संस्थानों व पुस्तकालयों में आपसी सहयोग बढ़ाना; आजीवन सीखने की प्रक्रिया को तेज करने के अन्य उपायों में सम्मिलित हैं।

सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में वैदिक काल से ही स्वीकार की गई है। आज की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में तो आजीवन सीखना अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया है। सीखना दो प्रकार में वर्गीकृत किया जा सकता है- व्यावसायिक उपयोगिता के लिए सीखना और केवल सीखने के लिए सीखना। वर्तमान समय में एक बार आजीविका में लगने के बाद भी उस आजीविका में प्रभावी रूप से बने रहने के लिए भी सीखने की आवश्यकता बनी रहती है। तीव्र प्रौद्योगिकी विकास के कारण कार्य करने के तरीके भी अप्रचलित हो जाते हैं। अतः अपने आपको कार्यशील बनाए रखने के लिए निरन्तर व्यावसायिक विकास के लिए आजीवन सीखने की आवश्यकता बनी रहती है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन(OECD) के शोध में अनुमान लगाया गया है कि मौजूदा नौकरियों में से 32 प्रतिशत में उनके संचालन के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह भी अनुमान है कि 14 प्रतिशत नौकरियों को पूरी तरह से स्वचालित किया जा सकता है। फिर भी पाँच में से दो(41 प्रतिशत) वयस्क ही शिक्षा व प्रशिक्षण में भाग लेते हैं। जो कर्मचारी आजीवन सीखने को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, उनके पीछे छूटने व अप्रचलित हो जाने का जोखिम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी समस्या के निराकरण के प्रयास के रूप में आजीवन सीखने की अवधारणा पर जोर देती है। 

    आजीवन शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को न केवल व्यक्तिगत रूप से लाभ होता है, बल्कि इससे मजबूत समाज और मजबूत बाजार बनाने में भी मदद मिलती है। ओईसीडी के अनुसार, ‘एक कुशल कार्यबल फर्मो के लिए नई प्रौद्योगिकियों और कार्य संगठन प्रथाओं को विकसित करना और पेश करना आसान बनाता है, जिससे समग्र रूप से अर्थव्यवस्था में उत्पादकता और विकास को बढ़ावा मिलता है।’ 

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत को विकास की प्रक्रिया में तेजगति से आगे बढ़ाने के लिए, वैश्वीकरण के इस दौर में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में देश का विकास सुनिश्चित करने का रोड मैप आजीवन सीखने की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करती है। यही व्यक्ति और समाज का विकास सुनिश्चि त करने का एक मात्र मार्ग है।


शनिवार, 22 जून 2024

काला दिल या काला रंग?


होटल से निकलते ही ओटो रिक्शा मिल गया। रिक्शे वाले ने अपने आप ही मेरे पास आकर ओटो रोक लिया था। 

मैंने उसे पूछा, ‘बस अड्डे चलोगे?

‘हाँ, आइए बैठिए।’ ओटो वाले ने कहा।

मैंने पुनः उसको पूछा, ‘किराया कितना लगेगा?’

‘चालीस रुपए।’ ओटो वाले ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

मैं उस क्षेत्र से परिचित नहीं था। होटल से निकलने से पूर्व ही मैंने तय कर लिया था कि ओटो बुक नहीं करूँगा और सामान्य सवारी की तरह बस अड्डे के लिए यात्रा करूँगा। केवल 12 किलोमीटर की यात्रा है। वीआईपी संस्कृति मुझे कभी पसंद नहीं रही।

 सरकारी यात्रा है। सरकार के द्वारा समस्त व्ययों का भुगतान किया जाना है। फिर भी सरकारी पैसे को खर्च करते समय भी मितव्ययिता क्यों नहीं अपनाई जानी चाहिए!

सरकारी पैसा देश का पैसा है। उसका मितव्ययितापूर्ण सदुपयोग करना ही देशभक्ति है। लापरवाही से अधिव्यय करना देश के साथ गद्दारी है। जन परिवहन के साधनों का प्रयोग करना पर्यावरण व सरकारी नीति के अनुरुप है। इसका प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिए। समस्त संसार को ज्ञान देने का दंभ भरने वाला अध्यापक समूह ही इस बात का ध्यान नहीं रखे, यह किसी भी प्रकार से औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।

मेरे ओटो में बैठने के बाद कुछ आगे जाकर एक व्यक्ति और मेरे बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया। उसी समय उसी व्यक्ति के साथ एक युवती भी ओटो में आई किन्तु वह चालक से आग्रह करके आगे चालक की बगल वाली सीट पर बैठ गयी। 

युवती ने कुछ आगे चलकर ही चालक से कहा, ‘आगे श्रृंगार सामग्री की दुकान पर थोड़ी देर के लिए रोक लेना।’

उसकी बात सुनकर मेरे बगल में बैठा व्यक्ति मुस्कराने लगा और मेरी ओर मुखातिब होकर धीरे से( इस सावधानी के साथ कि युवती सुन न ले) बोला, ’इस काली भैंस को श्रृंगार सामग्री से क्या फर्क पड़ेगा? इसे कौन देखेगा!’

अब उन महापुरुष से कौन कहता, ‘वह युवती तो सांवला रंग होते हुए भी अपने आपको श्रृंगार से सुन्दर बनाने के प्रयत्न में है। उनका काला दिल तो किसी सौन्दर्य प्रसाधन से सुन्दर नहीं हो पाएगा।’

मैंने अभी तक उस व्यक्ति और युवती को देखा ही न था। अनावश्यक रूप से किसी को देखना, मैं उचित नहीं समझता। मैं अभी तक उस व्यक्ति और उस युवती को साथ-साथ समझ रहा था। वे दोनों एक ही ई-रिक्शा में से उतर कर ओटो में बैठे थे। 

उस व्यक्ति का इस प्रकार किसी महिला के लिए टिप्पणी मुझे अच्छी नहीं लगी। मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीें दिया। ऐसे लोगों की उपेक्षा ही उचित व्यवहार है।

उस व्यक्ति की टिप्पणी के बाद मेरा ध्यान उस युवती की ओर गया। मैंने उस पर नजर डाली। 20-22 वर्ष की युवती रही होगी। श्रृंगार की दुकान पर वह क्यों उतरना चाहती है? वह श्रृंगार करे या न करे? रास्ते चलते एक अपरिचित व्यक्ति को इस पर अपने विचार करने की क्या आवश्यकता है?  ये विषय महिलाओं का अपना विषय है। राह चलती महिलाओं के लिए इस प्रकार टिप्पणी करने की पुरुषों की सोच न केवल महिलाओं के स्व-निर्णय के अधिकारों का हनन हैं, वरन अपने विचारों की संकीर्णता के कारण अपने विकास को भी बाधित करना है।

महिलाओं को आजादी और सम्मान देना, संपूर्ण समाज के हित में है। इस सत्य को हम सभी को समझना होगा। हाँ! एक बात अवश्य ही उल्लेखनीय थी कि वह ओटो वाला पूर्ण पेशेवर अंदाज का परिचय देते हुए किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कर रहा था।

उस युवती ने एक स्थान पर ओटो रुकवाया और ओटो वाले से थोड़ी देर रुकने के लिए कहा।

‘नहीं, यह संभव नहीं है। मैं सवारियों को रोककर खड़ा नहीं रह सकता। आप दूसरे ओटो से आ जाइएगा।’ ओटो वाले ने विनम्रता के साथ कहा।

युवती के काले रंग को अपने काले दिल में बसाए रखने वाले सज्जन अभी भी युवती की गतिविधियों पर छिपी हुई नजर रखे हुए थे।


बुधवार, 19 जून 2024

भूतिनी

 मनोरंजक लोक प्रिय लोक कथा


प्राचीन काल की बात है। एक गाँव में एक संयुक्त परिवार रहता था। नई पीढ़ियों के साथ-साथ परदादा, परदादी, दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची से भरा-पूरा परिवार था। परिवार में गरीबी भले ही थी, किन्तु वे सभी आपस में प्रेम से रहते थे। अभाव के बीच भी, प्रेम का भाव उन्हें जोड़े हुए था। 

अन्य बच्चों के साथ-साथ परिवार में पाँच लड़कियाँ भी थीं। जिनके नाम क्रमशः टूटी, फटी, फीकी, मरी व भूतिनी थे। लड़कियों के नाम तो न जाने किसने कैसे रखे? किन्तु वही प्रचलित थे। गरीब परिवारों में नाम के लिए ज्यादा सोच विचार नहीं किया जाता। कहा भी जाता है कि नाम में क्या रखा है? समाज में जिस नाम से जाना जाने लगे। वही नाम महत्वपूर्ण हो जाता है।

जैसा पारंपरिक समाज में होता है। लड़कियों को जिम्मेदारी मानकर जल्दी से जल्दी शादी करके विदा करना होता है। लड़कियों को पराई अमानत माना जाता रहा है। अब पराई अमानत को जितनी जल्दी विदा कर उऋण हो लिया जाय। उतना अच्छा माना जाता है। लड़की की शादी करने के बाद गंगा स्नान की परंपरा भी रही है। इसी कड़ी में बड़ी लड़की भूतनी की शादी के प्रयास किए जाने लगे।

शादी के प्रयासों की श्रृंखला में एक दिन लड़के का परिवार लड़की को देखने आने वाला था। परिवार में पूरी तैयारी थी। गरीब परिवार था। अतः संसाधनों का अभाव ही था। अतः जैसे ही आए, उन्हें पूछा गया कि आप खाट(चारपाई) पर बैठना पसन्द करेंगे या चटाई पर?

लड़के वालों को लगा कि चारपाई ही ठीक रहेगी। अतः उन्होंने कहा, ‘खाट, पर ही बैठ जाएंगे।’

उस समय घर के अधिकांश लोग बाहर काम पर गए थे। घर में केवल लड़कियाँ ही थीं। अतः दादी ने अपनी छोटी लड़की को ही आवाज लगाई।

‘टूटी! खाट लेकर आ।’

लड़के वाले आश्चर्यचकित रह गए। हमको टूटी खाट पर बिठाया जाएगा। वे बोले, ‘नहीं, नहीं, आप खाट रहने दीजिए। हम चटाई पर ही बैठ जाएंगे।’

अब खाट के स्थान पर मेहमानों ने चटाई का चुनाव किया था। अतः दादी ने दूसरी लड़की को आवाज लगाई, ‘फटी! चटाई लेकर तो आ।’

    मेहमान सन्न रह गए। पहले टूटी खाट और अब फटी चटाई। वे बोले आप रहने दीजिए। हम तो जमीन पर ही बैठ जाते हैं, यह कहते हुए वे जमीन पर बैठ ही गए।

  जब मेहमान जमीन पर बैठ गए। उनको पानी पिलाने के बाद पूछा गया कि वे चाय पीना पसन्द करेंगे या दूध?’

 ‘हम चाय ही पी लेंगे।’ उनकी ओर से जवाब आया। 

अब तीसरी लड़की की बारी थी। अतः दादी ने आवाज लगाई, ‘फीकी! चाय लेकर आ।’

फीकी चाय का नाम सुनकर ही लड़के वालों का माथा चकराने लगा। 

‘नहीं, नहीं, आप चाय रहने दीजिए। हम दूध ही पी लेंगे।’ उनमें से एक ने कहा। 

काफी देर हो चुकी थी। अभी तक मेहमानों को जलपान भी नहीं कराया जा सका था। अब दादा ने ऊँचे स्वर में आवाज लगाते हुए कहा, ‘मरी! भेंस का दूध लेकर आ। जल्दी कर।’

‘मरी भेंस का दूध’ वाक्यांश सुनते ही, सभी मेहमानों ने एक स्वर में कहा, ‘नहीं, नहीं, हमें कुछ नहीं पीना। हमें जरूरी काम है और जल्दी जाना है। अतः आप जल्दी से लड़की को दिखा दीजिए।’ 

अब कोई विकल्प नहीं था। होने वाली दुल्हन को ही बुलाया जाना था। अतः पर-दादी ने आवाज लगाई, ‘अरे भाई! जल्दी से भूतनी को बुलाओ।’

भू्तिनी का नाम सुनते ही, सभी मेहमानों ने सरपट दौड़ लगा ली। लड़की के परिवार वाले समझ नहीं पा रहे थे। वे भाग क्यों रहे हैं! वे पीछे से आवाज लगा रहे थे, ‘ रूको! रूको! इतनी भी क्या जल्दी है! आप देखने आए हैं तो कम से कम भूतिनी को देखकर तो जाओ।’

 भागने वाले मेहमान पीछे मुड़कर देखने के लिए भी तैयार नहीं थे। 


प्रेम में मोबाइल

 अपनी-अपनी वजहें


मुरादाबाद जंक्शन का वातानुकूलित उच्च श्रेणी प्रतीक्षालय सामान्य रूप से भरा था। न तो बहुत अधिक भीड़ थी कि नवीन आगंतुकों के लिए स्थान ही न हो और न ही उसे खाली कहा जा सकता था। उसने प्रवेश करते ही प्रतीक्षालय में विहंगम दृष्टि डाली ताकि वह अपने लिए स्थान तलाश सके। चारों दिशाओं में उसके बैठने के लिए स्थान उपलब्ध था। एक यात्री के लिए स्थान ही कितना चाहिए? उसके पास तो सामान भी अधिक नहीं था। केवल एक बैग। उसने ऐसी सीट का चयन किया, जिस पर सीधे एसी की हवा न आ रही हो। वह सीधे एसी में बैठना कभी सुविधाजनक नहीं पाता। एक सीट पर अपना बैग रखा और दूसरी पर बैठ गया।

सामने जमीन पर एक व्यक्ति पड़ा हुआ था। उसके पास कोई सामान नहीं था। कपड़े भी बेतरतीव थे। अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि वह यात्री नहीं था। प्लेटफार्म पर पड़े रहकर समय पास कर रहा था। शायद अस्वस्थ रहा हो। कपड़ों से कुली लग रहा था। चारों तरफ बैठे यात्रियों में उसे कुछ विशेष दिखाई नहीं दिया। सामने की सीट पर जाकर उसकी दृष्टि ठहर गयी।

सामने की सीट पर दो किशोर और किशोरी, नहीं, शायद किशोरावस्था से युवावस्था में सद्य प्रवेशित युवक-युवती बैठे थे। बहुत अधिक सुन्दर नहीं कहा जा सकता था, किन्तु किशारावस्था व युवावस्था दोनों के आकर्षण व सौन्दर्य से परिपूर्ण थे। युवक युवती से लगातार बातें करने के प्रयास में था किन्तु युवती अपने मोबाइल में मशगूल थी। युवक की उपस्थिति उसे सुरक्षित अनुभव करा रही थी, तो युवक की उसे कोई चिन्ता नहीं था। युवक के प्रति उसके व्यवहार में एक लापरवाही प्रदर्शित हो रही थी। युवक के चेहरे पर उससे बातें करने की ललक और बैचेनी दोनों सहजता से देखी जा सकती थीं।

युवक-युवती के कंधे पर हाथ रखता है। युवती कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। काफी देर तक वह युवती के कंधे को सहलाता रहता है। युवक युवती को खींचकर अपनी तरफ करता है और युवती को अपने से सटा लेता है। युवती का सिर युवक के कंधे पर टिक जाता है। युवती की गतिविधियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह पूर्ववत अपने मोबाइल पर लगी रहती है।

युवक युवती के गाल को सहलाता है। युवती पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। युवक युवती के गाल को अपनी उँगलियों से मसलता है। युवती मोबाइल पर व्यस्त है। युवक की बैचेनी उसके चेहरे से स्पष्ट है। ऐसा लगता है कि वह युवती के आगोश में समा जाना चाहता है। वह युवती को जी-जान से चाहता है। युवती युवक की बाँहों में थी। युवती के कपोल युवक के मुँह के अत्यन्त निकट थे। ऐसा लगता था, अगले ही पल युवती के होठों पर अपने होठ रख देगा। सार्वजनिक स्थान के संकोच ने ही शायद उसे रोक रखा था। युवती को उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था, क्योंकि उसका पूरा ध्यान मोबाइल पर था। आसपास के परिवेश को तो क्या वह तो अपने प्रेमी को ही नहीं देख रही थी। वह उसके कपोलों से खेल भी रहा था; किन्तु युवती मोबाइल में ही लगी रही। जैसे उसे युवक की उपस्थिति का अहसास ही न हो।

इस दौरान युवक अपनी बोरियत दूर करने के लिए तीन बार बाहर निकल कर प्लेटफार्म पर जाकर चक्कर लगा आया था। युवती को आकर्षित करने के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे थे। अन्त में युवक ने झुंझलाकर, युवती के चेहरे को दोनों हाथों में लेकर कहा, ‘‘क्या जान! मैं केवल तुम्हारे लिए ही अपने घर को छोड़कर आया हूँ, और तुम हो कि मुझसे बात ही नहीं कर रहीं। केवल मोबाइल में लगी हो, जैसे तुम्हारे लिए मेरा कोई अस्तित्व ही न हो।’ 

इस बार युवती ने युवक को झिड़कते हुए जबाव दिया, ‘मैं मोबाइल की वजह से ही तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हें कुछ भी करने से रोक तो नहीं रही।’ और वह पुनः मोबाइल में मशगूल हो गई।

कथा लेखक को लगातार प्रेमी युगल पर नजर रखना कुछ अशिष्ट लग रहा था। अतः उसने कुछ देर के लिए अपनी दृष्टि दूसरी ओर कर ली। शायद! उसे झपकी आ गयी थी। जब उसने पुनः उन सीटों पर दृष्टि डाली। वे खाली थीं।


शनिवार, 1 जून 2024

बंधन(महासमर) नरेन्द्र कोहली से कुछ महत्वपूर्ण सीख

 ‘‘शारीरिक आकर्षण में एक-दूसरे के साथ बँधे रहना और चाहकर भी संबन्ध विच्छेद न कर पाना तो यातना है।’’

‘‘सुख यदि कहीं मिलता है तो केवल प्रेम में मिलता है। प्रेम भी वह, जिसमें प्रतिदान की कामना न हो, केवल दान ही दान हो।’’

‘‘पिता और पति में भेद होता है। नारी मन कहीं पिता को समर्थन देकर और पति का उल्लंघन कर तुष्टि पाता है। पति ही उसका निकटतम् मित्र है और वही उसका घोरतम शत्रु। पति-विजयिनी नारी ही तो स्वयं को सारे नियमों से मुक्त पाती है।’’

‘‘स्वार्थ तो स्वार्थ ही है, चाहे भौतिक सुख की दृष्टि से हो या आध्यात्मिक उत्थान की दृष्टि से...’’

‘‘न्याय और सत्य का सिद्धांत यह कहता है कि यदि हम अपने धनात्मक कार्य के लिए पुरस्कार की अपेक्षा करते हैं, तो अपने ऋणात्मक कार्य के लिए दण्ड की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। कर्म सिद्धांत को काटकर आधा मत करो। फल तो प्रत्येक कर्म का होगा- ऋणात्मक कर्म का भी और धनात्मक कर्म का भी। तुम एक को पुरस्कार कहते हो और एक को दण्ड। तुम्हें एक की अपेक्षा है, दूसरे की नहीं। प्रकृति के नियम सार्वभौमिक हैं, वे आंषिक सत्य नहीं हैं।’’

‘‘मित्रता भावना से होती है, कर्म से नहीं; और नीति सदा ही शत्रुता  और मित्रता से निरपेक्ष होती है।’’

‘‘निम्न कोटि के लोग अपनी आजीविका से भयभीत रहते हैं, मध्यम कोटि के मृत्यु से; और उत्तम कोटि के लोग केवल अपयष से।’’

‘‘प्रेमी का प्रेम अस्थिर होता है, आवेशपूर्ण होता है, किसी पहाड़ी नदी के समान! और पति का प्रेम धीर, गम्भीर होता है, गहरा और मन्थर- गंगा के समान। उसमें आवेश और उफान चाहे न आये, किन्तु वह सदा भरा पूरा है। वह अकस्मात बहाकर चाहे न ले जाये, किन्तु पार अवश्य उतारता है।’’

‘‘आदर न धन से मिलता है, न ज्ञान से, न यष से, न कुल से- आदर केवल आचरण से मिलता है।’’

‘‘नीति कहती है-‘सत्य बोलो।’ तो इसलिए नहीं कि सत्य बोलने से आकाश से अमृत टपकने लगेगा। वह हम इसलिए कहते हैं कि यदि समाज में सत्य बोलेंगे तो उनका परस्पर विश्वास बना रहेगा, व्यवहार में सुविधा रहेगी, जीवन में संघर्ष सरलता से पार किए जा सकेंगे; किन्तु यदि एक व्यक्ति दूसरे से झूठ बोलेगा, किसी को किसी के शब्द पर विश्वास नहीं रहेगा, तो सामाजिक व्यवहार में असुविधाएँ बढ़ जाएँगी, और यह परस्पर का अविश्वास उस समाज को नष्ट कर देगा।’’

                                                          बंधन(महासमर) नरेन्द्र कोहली