गुरुवार, 27 नवंबर 2014

कुशल प्रबन्धक के आवश्यक गुण-2

4. विश्वसनीय व्यक्तित्व:- प्रबंधक दूसरों के साथ मिलकर दूसरों से कार्य का निष्पादन कराता है। दूसरों से कार्य निष्पादन के लिए आवश्यक है कि वे आप पर और आपकी योजनाओं पर विश्वास करते हों। विश्वसनीयता आदेशों या अधिकारों से नहीं आती। विश्वसनीयता तो आचरण व व्यवहार से आती है। विश्वसनीयता बदलें में भी नहीं आती, यदि आप किसी पर विश्वास करते हैं तो यह आवश्यक नहीं कि वह भी आप पर विश्वास करे। आप उसके आचरण व कार्य करने के तरीके के कारण विश्वास करते हैं, वह भी आप के आचरण व कार्य करने के तरीकों के आधार पर विश्वास या अविश्वास कर सकेगा। विश्वसनीय व्यक्ति की बात पर उसके शत्रु भी भरोसा करते हैं, जबकि अविश्वसनीय व्यक्ति की बात को उसके संबन्धी और मित्र भी नहीं मानते। विश्वनीयता के निर्धारण के लिए वह क्या कहता है की अपेक्षा वह क्या करता है? क्यों करता है? महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति कहता कुछ है और करता कुछ है; ऐसा व्यक्ति कभी विश्वसनीय नहीं होता। 
राम बजाज के अनुसार, ‘ज्ञान कोरा ढिंढोरा पीटने से नहीं आएगा, न ही मनन और चिंतन से आएगा, बल्कि आएगा तो जीवन में कठोर मेहनत, उच्च शिक्षा और जिन्दगी के अनुभवों से।’ कहने का आशय यह है कि जो ज्ञान जिन्दगी के अनुभवों से आता है, वह ज्ञान ही विश्वसनीय होता है। केवल भाषण देने वाले बुद्धिजीवी विश्वसनीय नहीं हो सकते। ऐसे बुद्धिजीवियों के लिए तो यह शेर उपयोगी हो सकता है-
      ‘उसकी बातों पर न जा, वो कहता क्या है?
 उसके कदमों को देख, वो किधर जाते हैं?’
विश्वसनीयता कार्य व आचरण से आती है, भाषणों से नहीं; जिन व्यक्तियों की कथनी व करनी मेँ अन्तर होता है। उनकी बात पर उसके सहयोगी भी विश्वास नहीं कर सकते और जिन व्यक्तियों की कथनी-करनी में समानता होती है उन पर उनके दुश्मन भी विश्वास करते हैं। ऐसी स्थिति में वह अविश्वसनीय व्यक्ति सहयोग प्राप्त करने में असफल होकर प्रबंधन में भी असफल सिद्ध होता है तो दूसरी ओर विश्वसनीय व्यक्ति अपने सहयोगियों का विश्वास प्राप्त कर एक कुशल प्रबंधक बन सकता है।
5. यथार्थ में आदर्शो का अनुकरण करने वाला:- केवल आदर्शो की डीगें हाँकने वाले बहुत मिल जायेंगे किन्तु अच्छा प्रबंधक वही हो सकता है, जो आदर्शो को अपने आचरण व व्यवहार में ढाल कर आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है। आदेश, निर्देश व उपदेश सहयोगियों को तभी स्वीकार होते हैं, जब उन्हें  करके दिखाया जाय। यदि कथनी और करनी में अन्तर हो तो उस व्यक्ति की विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो जाती है। अतः जिन बातों को हम आदर्श मानते हैं, उन पर चलकर ही हम उन्हें अपने सहयोगियों के लिए भी अुनकरणीय बना सकते हैं। आदर्शो की बात करते समय व्यक्ति को श्री राम शर्मा के कथन को ध्यान में रखना चाहिए, ‘सभ्यता का स्वरूप है सादगी, अपने लिए कठोरता, दूसरों के लिए उदारता।’ 
स्वयं दृढंता पूर्वक कर्मरत रहकर ही हम दूसरों को कार्य करने के लिए अभिप्रेरित कर सकते हैं। कहा भी जाता है, ‘सिद्धांतों की कई टन बातों से व्यवहार का थोड़ा सा अंश कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।’ अतः सिद्धातों को यथार्थ रूप में ढालें किंतु ध्यान रखें कि यथार्थवाद या व्यवहारवाद के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा न दें; संगठन व समाज को चूना न लगायें; अपने कर्तव्यों में लापरवाही न बरतें।

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