शनिवार, 27 दिसंबर 2014

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-9

एक प्रबंधक निर्देशन देते समय निर्देशक की भूमिका में होता है। कई बार प्रबंधक अपनी भूमिका की सीमाओं से परे अपने सहयोगियों के लिए अध्यापक की भूमिका में भी आ जाता है। अध्यापक ज्ञान प्रदान करता है, तो प्रबंधक भी अपने सहयोगियों को आवश्यक ज्ञान प्रदान करता है, निर्देश देता है। निर्देशन प्रबंध प्रक्रिया के अन्तर्गत महत्वपूर्ण घटक है। यही नहीं वह अपने सहयोगियों के विकास के लिए भी कार्य करता है। कर्मचारियों के जीवन-वृत्ति विकास की योजना भी प्रबंधक बनाता है, दूसरी ओर अपने व अपने परिवार के सदस्यों की जीवन-वृत्ति विकास की योजनाएँ लगभग सभी व्यक्तियों को कमोबेश बनानी पड़तीं हैं या बनानी चाहिए। इस प्रकार की योजना बनाने का प्रबंधन तभी संभव है कि व्यक्ति अपने विकास के लिए सतत् प्रयत्नशील रहे, जिस प्रकार की अपेक्षा एक शिक्षक से की जाती है, ‘‘अच्छे शिक्षक अपने ज्ञान को सीमा से परे भी पहुँचाते हैं तथा छात्रों को भौतिक राजनैतिक और आर्थिक सीमाओं से रहित होकर विभिन्न पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होने की सुविधा देते हैं।’’ यही कार्य कुछ हद तक प्रत्येक प्रबंधक ही क्यों प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षित है, तभी वह सफलता की और निरंतर अग्रसर हो सकेगा।
          व्यक्ति को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है कि सफल मानव जीवन जीने के लिए अपने कर्तव्यों को समझना व उन कर्तव्यों के निर्वहन के लिए अपने अधिकारों का सदुपयोग करना अत्यन्त आवश्यक है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

जीवन के आधार स्तम्भ-8

कर्तव्यनिष्ठ


एक व्यक्ति दुर्घटना में घायल अपने बच्चे को लेकर चिकित्सालय पहुँचा। जाँच के बाद चिकित्सक ने कहा कि ऑपरेशन होगा। शल्यक्रिया विशेषज्ञ चिकित्सक उस समय चिकित्सालय में उपलब्ध नहीं थे। उन्हें फोन किया गया। चिकित्सक जितना जल्दी आ सकते थे, आ गए फिर भी चिकित्सालय पहुँचने में उन्हें लगभग आधे घण्टे का समय लगा। घायल बच्चे का पिता भड़क उठा, ‘आपको अपना कर्तव्य नहीं पता। आप अस्पताल से गायब हैं, और जब बुलाया जाता है तो इतनी देर से आते हैं.......। चिकित्सक ने कहा- ‘मैं जितनी जल्दी आ सकता था, पहुँच गया......। चिकित्सक बात पूरी कर ही न पाये थे कि बच्चे का पिता बिफर उठा- ‘अगर आपके बच्चे के साथ दुर्घटना घटी होती, तब भी आप इतनी देर से आते?’
       चिकित्सक ने कहा, ‘मुझे बातों में मत उलझाइए, ‘इस समय तुरंत आपरेशन करना होगा। सर्जन ऑपरेशन करने चले गए। एक घण्टे तक बच्चे का पिता बैचेन रहा। वह संशय में था कि मैंने डाक्टर को जली-कटी सुना दी......डाक्टर वैसे ही लापरवाह है, कहीं..........? वह भगवान से प्रार्थना करने लगा। एक घण्टे बाद सर्जन ने बाहर आकर कहा, बधाई हो, ऑपरेशन सफल रहा............ मुझे जल्दी जाना है, मैं निकलता हूँ, आप नर्स से दवाइयाँ समझ लें...। पिता खुश था, लेकिन वह यह भी सोच रहा था कि डाक्टर तो बड़ा घमण्डी है, दो मिनट बात भी नहीं की । सच, उसे अपना कर्तव्य पता ही नहीं है। पिता नर्स के पास गया। नर्स ने बताया- डाक्टर साहब के बच्चे की मौत एक एक्सीडेण्ट में हो गई है। जब उन्हें फोन करके यहाँ बुलाया गया, तब वे उसकी अंत्येष्टि कर रहे थे। बच्चे का पिता स्तब्ध रह गया।
कथा मर्म- पूरी बात, परिस्थितियों को बिना जाने-बूझे किसी की कर्तव्यनिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं है। हाँ, कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति प्रश्नचिह्न लगाने पर भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता और अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है।
निःसन्देह हमें इसी प्रकार की कर्तव्यनिष्ठा की भावना विकसित करने की आवश्यकता है कि किसी भी प्रकार के आरोप-प्रत्यारोपों से मुक्त होकर हम अपने कर्तव्य पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकें। इस प्रकार की कर्तव्यनिष्ठा निःसन्देह हमें सफलता के चरम शिखर की ओर ले जायेगी।
प्रबंधन सूत्र- कभी भी परिस्थितियों की पूरी जानकारी का विश्लेषण किए बिना किसी व्यक्ति के कार्य पर अपना दृष्टिकोण न थोपें। प्रबंधक कार्य का प्रभारी होता है, व्यक्तियों का नहीं; दृष्टिकोण गलत हो सकता है, तथ्य नहीं। सही तथ्यों को जाने और सच्चाई को जानकर दूसरे व्यक्ति के कार्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना अपने कर्तव्य का निर्वाह करें।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

जीवन के आधार स्तम्भ-७

व्यक्ति के कर्तव्य: 


व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने के लिए ही आजीवन प्रयास रत रहता है या यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति को आजीवन अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए ही उपयोगी जीवन जीना चाहिए। अपने कर्तव्यों की पूर्ति करना ही वास्तव में उसकी सफलता है। व्यक्ति के जीवन के प्रबंधन में विभिन्न पक्षों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। अतः स्वाभाविक है कि उन सभी पक्षों के प्रति व्यक्ति के भी कुछ कर्तव्य होते हैं। वास्तव में यह एक प्रकार के ऋण हैं जिनको व्यक्ति को चुकाना ही चाहिए। प्राचीन प्रबंधन व्यवस्था के अन्तर्गत इन्हें पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण के नाम से संबोधित किया गया था। वास्तव में जीवन प्रबंधन में यह व्यवस्था बहुत ही महत्वपूर्ण थी और समाज की व्यवस्था बड़े ही सुचारू ढंग से चलती थी। कालान्तर में यह व्यवस्था अप्रभावी होती गई और समाज में नित नई समस्याएँ उत्पन्न होती गयीं। कर्तव्यों की अवहेलना समाज के लिए ही समस्याएँ उत्पन्न नहीं करती, स्वयं व्यक्ति का जीवन भी खतरे से खाली नहीं रहता।
कर्तव्यों की बात करते समय सामान्यतः हम दूसरों को कर्तव्यनिष्ठता का पाठ पढ़ाने लगते हैं जबकि कर्तव्यनिष्ठा व्यक्ति की अपनी निष्ठा से जुड़ी हुई है। सामान्यतः हम किसी को कर्तव्यनिष्ठ नहीं बना सकते, जब तक कि सामने वाला व्यक्ति हम में अगाध श्रृद्धा नहीं रखता हो, जब तक वह हमसे मार्गदर्शन माँगता नहीं। अतः कर्तव्यनिष्ठा के मामले में हमें स्वयं की कर्तव्यनिष्ठा पर ध्यान देना चाहिए और दूसरों की कर्तव्य निष्ठा पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। दूसरों की कर्तव्य निष्ठा पर प्रश्न चिह्न लगाने से पूर्व धैर्य पूर्वक विचार कर लेना चाहिए। कुछ इसी प्रकार की सीख 12 फरवरी 2014 को दैनिक जागरण के सप्तरंग, कल्पतरू में प्रकाशित इस प्रेरक प्रसंग से ली जा सकती है। मैं साभार इस प्रेरक प्रसंग को प्रस्तुत कर रहा हूँ-

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

जीवन के आधार स्तम्भ-6

जीवन प्रबंधन व उत्तरदायित्व 


व्यक्ति के जीवन प्रबंधन में उसका स्वयं के अतिरिक्त परिवार व समाज का भी अप्रतिम योगदान होता है। अतः व्यक्ति भी स्वयं अपने, अपने परिवार व समाज के विकास के लिए प्रयत्न करने के प्रति कर्तव्याधीन होता है। वर्तमान समय में देखा जा रहा है कि हमारी व्यवस्था कुछ इस प्रकार का प्रबंधन कर रही है कि व्यक्ति अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होता जा रहा है, जबकि यथार्थ यह है कि किसी भी प्रकार के अधिकार व्यक्ति के कर्तव्यों की पूर्ति के लिए समाज द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
यहाँ ध्यान दिए जाने की बात यह है कि जब हम अधिकारों की बात करते हैं तो हमारे कतव्य भी उन अधिकारों के अनिवार्य अंग होते हैं। मूल भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था थी किन्तु मूल कर्तव्यों की नहीं। इसका कारण यह है कि अधिकारों में अनिवार्य रूप से कर्तव्य अन्तर्भूत होते हैं। अधिकार दिये ही इसलिए जाते हैं कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने में सक्षम बन सके। व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने के लिए अपने अधिकारों को प्रयोग करने के लिए उत्तरदायी है। वर्तमान समय में कर्तव्य विमुखता की प्रवृत्ति को देखते हुए ही संविधान में संशोधन करके मूल कर्तव्यों को जोड़ना पड़ा। अतः व्यक्ति के जीवन प्रबंधन के दौरान कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों की अवधारणा को अन्तर्भूत करना आवश्यक है।


गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जीवन प्रबन्धन के आधार स्तंभ-५

जीवन प्रबंधन में समाज की भूमिकाः 


व्यक्ति सामाजिक प्राणी है। वह शून्य में नहीं जी सकता। व्यक्ति अपने समाज का एक अभिन्न अंग होता है। वह जिस समाज में रहता है, उस समाज का चिंतन, परंपराएँ, जीवन शैली, स्तर सभी कुछ व्यक्ति के जीवन प्रबंधन को प्रभावित करता है। अधिक पारंपरिक समाज स्वतंत्र विकास को कुछ हद तक अवरोधित कर सकता है तो अधिक वैयक्तिक स्वतंत्रता का हामी समाज नैतिक व सामाजिक मूल्यों की स्थापना में पिछड़ जाता है और सामाजिक संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगतीं हैं। अतः जीवन प्रबंधन करते समय वैयक्तिक स्वतंत्रता व सामाजिक नियंत्रणों में संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
          इस प्रकार स्पष्ट है कि जीवन का प्रबंधन निःसन्देह महत्वपूर्ण है, यह केवल व्यक्ति के लिए ही नहीं, माता-पिता, स्वयं व्यक्ति, शिक्षा प्रणाली, परिवार व समाज के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। अतः माता-पिता द्वारा जीवन प्रबंधन किए जाने के बाबजूद विद्यालय, परिवार व समाज भी संयुक्त रूप से जीवन प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होते हैं। किसी भी स्तर पर जीवन में रहने वाली खामी केवल व्यक्ति को ही प्रभावित नहीं करती, परिवार, समाज व राष्ट्र सभी प्रभावित होते हैं।

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-४

जीवन प्रबंधन में विद्यालय(शिक्षकों) की भूमिका: 


जीवन प्रबंधन में माता-पिता व परिवार के बाद शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्ति का शैक्षणिक आधार विद्यालयों में तैयार होता है। यद्यपि विद्यालयों में सर्वांगीण विकास की बात की जाती है, विकास के सभी पक्षों पर ध्यान देने का प्रयास किया जाता है तथापि वर्तमान शिक्षा प्रणाली जीवन-वृत्ति विकास(करियर) की ओर ही अधिक केन्द्रित दिखाई देती है। यही नहीं जीवन प्रबंधन में विद्यालय का योगदान अभिभावकों द्वारा चयनित विद्यालय पर भी निर्भर करता है। विद्यालय में विद्यार्थी के जीवन प्रबंधन में केवल शिक्षकों का योगदान ही नहीं होता, साथियों के साथ-साथ विद्यालय वातावरण भी छात्र-छात्राओं के जीवन प्रबंधन में योगदान देता है। अतः बच्चे की शिक्षा के लिए शिक्षालय का चयन पूरी तरह सोच समझकर करना चाहिए और बच्चे का विद्यालय में प्रवेश कराने का आशय यह नहीं है कि बच्चा विद्यालय को सौंप दिया है। बच्चे के जीवन प्रबंधन का मूल कर्तव्य व उत्तरदायित्व अभिभावकों का ही होता है। अतः विद्यालयी शिक्षा के दौरान भी निरंतर बच्चे के विकास पर नजर रखनी चाहिए। शिक्षकों के निकट संपर्क में रहना चाहिए। हाँ! विद्यालय का योगदान भी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं किंतु अभिभावकों को प्रत्येक स्तर पर जागरूक रहने की आवश्यकता है।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

जीवन के आधार स्तम्भ-३

जीवन प्रबंधन में परिवार की भूमिका:


बच्चों को जन्म भले ही माँ-बाप के द्वारा दिया जाता हो, किन्तु उनके जीवन के प्रबंधन में परिवार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। संयुक्त परिवार प्रणाली इस दृष्टि से सर्वात्कृष्ट व्यवस्था थी। वर्तमान एकल परिवार में जहाँ माता-पिता दोनों सेवारत रहने के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, बच्चों का सन्तुलित विकास नहीं हो पाता। परिवार की जीवन प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवार जो भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक विकास में भूमिका अदा करता है, वह एकल परिवार में संभव नहीं हो पाता और जीवन प्रबंधन में कुछ न कुछ छूट जाता है। परिवार में बच्चों के विकास में परिवार के सदस्य जो भूमिका अदा करते थे, उसकी प्रतिपूर्ति आया, नौकरानी, क्रैच या नर्सरी द्वारा संभव नहीं है।