श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष
स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण
© डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
भारत में स्वामी विवेकानंद सर्व स्वीकृत व
समादृत देशभक्त संन्यासी हैं। उनका काल भले ही बीसवीं शताब्दी रहा हो, उनका प्रभाव व प्रासंगिकता आज
भी कम नहीं हुई है। स्वामी विवेकानंद के विचार रूप कार्य भविष्योन्मुखी हैं।
स्वामी जी शताब्दियों तक हमें न केवल अभिप्रेरित करते रहेंगे, वरन हमारे काम व जीवन को अपने आदर्शों पर चलने को मजबूर करते हुए विश्व
को विकास पथ पर अग्रसर करते रहेंगे।
कोई भी महान से महान व्यक्ति महानता के साथ पैदा नहीं होता वरन एक अबोध
शिशु के रूप में ही जन्म लेता है। यह अलग बात है कि वह अपनी अबोधता को सुरक्षित
रखते हुए संसार को महानता के पथ पर अग्रसर करते हुए, कब
महानता को प्राप्त कर लिया, यह उसको स्वयं भी पता नहीं चलता।
स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। स्वामी जी ने भारत में जन्म
लिया, भारतीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए अपना विकास किया।
भारत के लिए चिंतन किया, भारत के लिए आजीवन कार्यरत रहे,
भारत के लिए अपने संन्यासत्व को भी समर्पित कर दिया। महापुरुषों की
तुलना नहीं की जा सकती, किन्तु स्वामी जी जैसा व्यक्तित्व
केवल स्वामी जी का ही हो सकता है।
स्वामी विवेकानंद ने भारत के दो महापुरुषों को अपना आदर्श माना था — त्याग और वैराग्य के प्रतीक
भगवान बुद्ध और कर्म तथा ज्ञान के समन्वय के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण। यदि बुद्ध
उनके हृदय में करुणा के प्रतीक थे, तो कृष्ण उनके मस्तिष्क
में ब्रह्मांड की समग्रता के प्रतीक थे। विवेकानंद के लिए कृष्ण कोई पौराणिक
कथा-पुरुष नहीं, बल्कि भारत के इतिहास में सबसे पूर्ण मानव — 'A Perfect Man' थे।
1. पूर्णावतार की अवधारणा
श्री कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। इस
सन्दर्भ में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, "राम में त्याग है, पर कृष्ण में त्याग और भोग दोनों
का विलक्षण समन्वय है।" (स्वामी विवेकानंद, कोलंबो से अल्मोड़ा व्याख्यान)
राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे एक आदर्श राजा, आदर्श पुत्र हैं। पर कृष्ण में मर्यादा के साथ लीला भी है। वे बालक के रूप
में चंचल हैं, सखा के रूप में नटखट हैं, प्रेमी के रूप में मधुर हैं, योद्धा के रूप में कठोर
हैं और योगी के रूप में स्थितप्रज्ञ हैं।
स्वामीजी की
दृष्टि में कृष्ण ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मानव जीवन की समग्रता को स्वीकार
किया। उन्होंने जीवन से पलायन नहीं सिखाया। उन्होंने सिखाया — संसार में रहो, पर संसार को अपने में मत रहने दो।
इसीलिए विवेकानंद उन्हें "The Most Comprehensive Character" कहते हैं।
2. गीता के कृष्ण — कर्मयोग के प्रणेता
विवेकानंद के वेदांत का हृदय भगवद् गीता है, और गीता का हृदय कृष्ण हैं।
विवेकानंद के अनुसार, श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के जटिल
ब्रह्म-ज्ञान को कुरुक्षेत्र के रणांगण में खींचकर व्यावहारिक बना दिया। अर्जुन
विषाद का प्रतीक है — वह
आधुनिक मनुष्य है जो कर्तव्य और मोह के बीच उलझा है। कृष्ण उससे यह नहीं कहते कि
संन्यास ले लो, हिमालय चले जाओ। वे कहते हैं —
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा
फलेषु कदाचन।"
विवेकानंद इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि
यह श्लोक भारत की आलस्य-प्रवृत्ति के विरुद्ध सबसे बड़ी औषधि है। हमारे देश ने
संन्यास को ही धर्म मान लिया, कर्म को तुच्छ समझा। कृष्ण ने कहा — युद्ध करो, कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। यही कर्मयोग है।
आज भी हर भारतीय को इसे समझने, आत्मसात करने और जीने की आवश्यकता है।
विवेकानंद का
पूरा "दरिद्रनारायण" और "मानव सेवा" का सिद्धांत इसी पर टिका
है — अपना काम ईश्वर को अर्पण कर
देना, यही पूजा है। स्वामी विवेकानन्द मूर्ति पूजा को निकृष्टम कोटि की भक्ति मानते हैं। वे कर्मशील बनने का आह्वान करते हैं।
3. प्रेम के कृष्ण — भक्ति के आचार्य
सामान्यतः हम कृष्ण को मुरली वाले प्रेमी के
रूप में देखते हैं। विवेकानंद भी कृष्ण के प्रेम-तत्व के अनन्य भक्त थे। उनका कहना
था कि वृंदावन की गोपियों का प्रेम सर्वोच्च भक्ति है — मधुर भाव।
इस प्रेम में
कोई सौदा नहीं, कोई स्वर्ग की कामना नहीं। गोपियाँ कृष्ण से प्रेम करती हैं क्योंकि वे
कृष्ण हैं, न कि वे कुछ देंगे इसलिए। विवेकानंद कहते हैं,
"जब तक मनुष्य में ऐसा निःस्वार्थ प्रेम नहीं आता, तब तक भक्ति शुरू नहीं होती।"
पर विवेकानंद इस
प्रेम को केवल रासलीला तक सीमित नहीं रखते। वे कहते हैं, यही प्रेम जब व्यापक हो जाता
है तो वही विश्व-प्रेम बन जाता है। गोपियों ने कृष्ण में सब देखा, ज्ञानी को यही सब में कृष्ण देखना है। यही भक्ति से ज्ञान की ओर जाना है।
4. बुद्धिवादी कृष्ण — अनंत ज्ञान के प्रतीक
विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल भावुक प्रेमी नहीं, वे अद्वितीय राजनीतिज्ञ,
कूटनीतिज्ञ और ज्ञानी भी हैं। महाभारत में कृष्ण की भूमिका देखिए — वे बिना शस्त्र उठाए पूरी लड़ाई
का संचालन करते हैं।
स्वामीजी युवाओं
से कहते थे, "गीता पढ़ो,
पर कृष्ण की बुद्धि को भी पढ़ो। कृष्ण ने कभी अन्याय से समझौता नहीं
किया। वे शांतिदूत बनकर भी गए, पर जब अन्याय हठी हो गया तो
युद्ध को ही धर्म कहा।" यह कृष्ण का धर्मो
रक्षति रक्षितः का सिद्धांत है। विवेकानंद इसे आज के भारत के लिए प्रासंगिक मानते
थे। उनका मानना था कि कमजोर बनकर अहिंसा का पालन करना कायरता है। पहले शक्तिशाली
बनो, फिर क्षमा करो — यही कृष्ण नीति है।
5. आज के युग में कृष्ण की
प्रासंगिकता
विवेकानंद पूछते हैं — आज भारत को किस कृष्ण की जरूरत
है?
हमें उस मुरली
वाले कृष्ण की नहीं, जो केवल वृंदावन में रास रचाए, बल्कि उस चक्रधारी
कृष्ण की जरूरत है जो धर्म की स्थापना के लिए चक्र उठा सके। वे कहते थे,
"यदि मैं गीता का कृष्ण बन सका होता, तो
मैं केवल बांसुरी नहीं बजाता, मैं शंख भी बजाता। आज युवाओं
को बांसुरी की मधुरता के साथ शंख की हुंकार की भी आवश्यकता है।"
विवेकानंद के
अनुसार, श्रीकृष्ण का जीवन
हमें तीन बातें सिखाता है जो आधुनिक भारत के लिए मंत्र हैं:
1. चरित्र में समन्वय: बुद्धि में शंकर, हृदय में बुद्ध
और कर्म में कृष्ण बनो।
2. कर्तव्य में दृढ़ता: अपने स्वधर्म से पीछे मत हटो, चाहे
कितना भी विषाद हो।
3. प्रेम में व्यापकता: प्रेम केवल एक व्यक्ति से नहीं, पूरे विश्व से करो। कृष्ण से प्रेम करो तो हर प्राणी में कृष्ण देखो।
अंत में स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ही कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण के जीवन में हमें वैराग्य का चरम, ज्ञान का चरम, प्रेम का चरम और कर्म का चरम एक साथ मिलता है।" राम ने हमें सिखाया कैसे जीना चाहिए, कृष्ण ने सिखाया जीवन को कैसे जीतना चाहिए। बुद्ध ने हमें सिखाया त्याग क्या है, कृष्ण ने सिखाया त्याग के साथ जीवन का आनंद कैसे लेना है। इसीलिए विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल एक अवतार नहीं, एक संपूर्ण जीवन-दर्शन हैं — जो संन्यासी को भी राह दिखाता है और गृहस्थ को भी, जो प्रेमी को भी तृप्त करता है और योद्धा को भी प्रेरणा देता है। यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा।
"यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा — जहाँ मुरली के माधुर्य के
साथ चक्र की निर्भयता भी हो।"
@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,
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