शुक्रवार, 15 मई 2026

‘लोग क्या कहेंगे?’

 सामान्यतः सफलता की चूहा दौड़ में व्यक्ति सफलता पाकर भी असफल ही रहता है। उसके सामने एक यक्ष प्रश्न सदैव बना रहता है-

‘लोग क्या कहेंगे?’

व्यक्ति की समस्त चिंताए इसी वाक्य के अधीन होती हैं कि लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे की चिंता के कारण, व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग नहीं कर पाता। इसके कारण वह चिंतित रहता है। इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह तनाव में जीता है।  इसी यक्ष प्रश्न के कारण वह अवसाद में जाते हुए आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम भी उठा लेता है। लोग क्या कहेंगे? के कारण व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से लाभान्वित नहीं हो पाता। वह दूसरों से मान्यता के चक्कर में अपने सुखों को भी दुखों में परिवर्तित कर लेता है।

‘लोग क्या कहेंगे?’ के चक्कर से निकले बिना व्यक्ति को आनंद की प्राप्ति करने में सफलता मिलना मुश्किल नहीं, असंभव है। लोगों में सर्वसम्मति कभी नहीं, होती। राम राज्य में सभी ओर भले ही सुख हो किंतु एक धोबी तो मिल ही जाएगा, जो कहेगा- नहीं, राम ने सीता को घर में रखकर बिल्कुल भी सही नहीं किया। राम फंस गए ‘लोग क्या कहेंगे?’ के जाल में, अब राज्य सुखी रहा या नहीं बाद की बात है। व्यक्तिगत सुख और परिवार की शांति तो समाप्त हो ही गई। यह सफलता तो नहीं ही कही जा सकती। यदि वास्तविक रूप से सफलता की अनुभूति करनी है। क्वालिया चाहिए तो लोग क्या कहेंगे? के जाल को तोड़ना होगा। लोगों का कहना कभी रोका नहीं जा सकता। वे कुछ ना कुछ कहेंगे ही किन्तु यदि उनकी सुनने लगे तो हम अपने कर्म में समर्पित नहीं हो पाएंगे। प्राप्त परिणाम की भी सफलता की अनुभूति नहीं कर पाएंगे।

जब हम ‘लोग क्या कहेंगे?’ के सामाजिक संदर्भ में सफल होना चाहते हैं। हम प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत स्तर पर असफल हो जाते हैं। हम व्यक्तिगत आकांक्षा और सोच को समाज को अर्पित कर देते हैं। हमारी आवश्यकताएं, विचारशील व्यक्ति अपनी सफलता का आकलन समाज के दृष्टिकोण से करे या अपने दृष्टिकोण से यह सदैव ही विमर्श का विषय रहा है।