🙏 दिवाकर गौड़, शोध अध्येता
मानव जन्म से ही दार्शनिक प्राणी है। जितने दार्शनिक, उतने दर्शन। कितने दार्शनिक सीमा नहीं, अतः असीमित दार्शनिक असीमित दर्शन। ये असीमित दर्शन भी व्यक्ति को भ्रम में नहीं डालते, वरन प्रकृति के निरंतरता के नियम को ही सुनिश्चित करते हैं। विज्ञान और दर्शन को एक-दूसरे का सहयोगी और पूरक बनाते हैं। दोनों में ही विश्लेषण भी है और संश्लेषण भी। अतः इस पाठ में हम कुछ विश्लेषण करते हुए उनका संश्लेषण करने का एक और प्रयास करते हैं। यह विश्लेषण और संश्लेषण भी हमें किसी अन्वेषण की ओर ले जा सकता है या नहीं, यह भी हमारे दृष्टिकोण का विषय ही होगा। उसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता का निर्धारण भी पाठक की स्वयं की स्वतंत्रता पर निर्भर करेगा, क्योंकि स्वतंत्रता ही दर्शन का आधार है। अस्तित्ववाद के अनुसार व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है और स्वतंत्र रहने के लिए ही अभिशप्त है।
विश्लेषण और संश्लेषण की प्रक्रिया का प्रयोग ही प्रसिद्ध दार्शनिक जी.डब्ल्यू.एफ. हेगेल की द्वंद्वात्मक पद्धिति में भी है। हेगेल के अनुसार सत्य स्थिर नहीं है। यह सदैव विकसित होता है। विकास की प्रक्रिया वाद(Thesis), प्रतिवाद(Antithesi) और संवाद (Synthesis) है। यह विश्लेषण और संश्लेषण के द्वारा ही आगे बढ़ती है। वाद और प्रतिवाद विश्लेषण की प्रक्रिया का ही भाग है। यही भौतिक और अभौतिक विकास का क्रम है।
प्रकृति का नियम, इच्छित परिणाम का वादा नहीं
नौ मीटर और नौ सेकंड दोनों में “नौ“ हैं, फिर भी इन्हें जोड़ा नहीं जा सकता। जो इन्हें जोड़ बैठता है, वह संख्या के धोखे में आ जाता है। “प्रकृति में सफलता या असफलता नहीं होती; हर कर्म का परिणाम या फल होता है, जो अवश्य मिलता है।’’ सफलता या असफलता प्रकृति की नहीं, मनुष्य की निर्मिति है। प्रकृति के नियमानुसार परिणाम या फल मिलता है। सफलता या असफलता के मानदण्ड व्यक्ति के अपने होते हैं। इसके मूल में एक सच्चाई है; लेकिन इस सच्चाई और इससे निकाले गए निष्कर्ष के बीच एक छलाँग छिपी है। यह छलांग प्रकृति नहीं कर्ता को लगानी है। उसी छलांग के आधार पर वह अपनी सफलता या असफलता का निर्धारण स्वयं ही करता है।
भाग एक:
फल, पर कौन-सा फल?
संरक्षण का नियम: “कोई कर्म निष्फल नहीं“ का सच्चा अर्थ
पहले उस सच्चाई को पूरे मन से स्वीकार करें, जो ‘कर्म के परिणाम की अनिवार्यता’ के दावे के मूल में है। भौतिकी का ऊर्जा-संरक्षण नियम, सचमुच यह सुनिश्चित करता है कि हर क्रिया के पीछे कुछ-न-कुछ परिणाम अवश्य आता है। ऊर्जा न बनती है, न नष्ट होती है केवल रूप बदलती है। परिवर्तन का नियम यही कहता है। इस अर्थ में “कोई कर्म निष्फल नहीं होता“ यह एक वैज्ञानिक तथ्य है, कोरा उपदेश नहीं। यह केवल दार्शनिक चिंतन मात्र नहीं है, यह वैज्ञानिक तथ्य भी है। तथ्य को सत्य के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है।
संरक्षण का नियम फल के ’गुण’ के प्रति उदासीन है।
समस्या अगले कदम पर है। ऊर्जा-संरक्षण का नियम यह तो कहता है कि “परिणाम अवश्य प्राप्त होगा“, लेकिन यह बिल्कुल नहीं कहता कि “परिणाम अच्छा होगा“ क्योंकि अच्छा या बुरा व्यक्ति सापेक्ष है। प्रकृति तो निरपेक्ष है। जिसे अचेतन माना जाता है। एक विस्फोट ऊर्जा को उतनी ही पूर्णता से संरक्षित करता है जितनी पूर्णता से एक धड़कता हुआ हृदय। जो नियम फल की उपस्थिति की गारंटी देता है, वह फल के स्वाद के विषय में मौन है। “फल मिलना“ और “अच्छा फल मिलना“ ये दो भिन्न विमाओं की राशियाँ हैं। सड़ा फल भी फल है। अच्छा या बुरा, खट्टा या मीठा, सुंदर या असुंदर, कड़ा या सड़ा; इसको तो व्यक्ति अपने विचारों की दुनिया में स्वयं ही गढ़ता है। यदि सफलता का अर्थ केवल “किसी परिणाम का आना“ है, तो यह परिभाषा इतनी विशाल हो जाती है कि व्यक्ति के दृष्टिकोण से निरर्थक प्रतीत होने लगती है, किन्तु समष्टि में सब कुछ तथ्य हैं और तथ्य, तथ्य होते हैं, जिन्हें स्वीकार किया जाता है।
दूसरा नियम: सड़ा फल ही प्रकृति की प्राथमिकता है
ऊष्मा गतिकी का दूसरा नियम कहता है: संरक्षण के साथ संगत, असंख्य संभव परिणामों में से व्यवस्थित, उपयोगी, सुगठित परिणाम (अच्छे फल) अत्यल्प हैं; और अव्यवस्थित, बिखरे, क्षीण-परिणाम (सड़े फल) असंख्य हैं। इसी अव्यवस्था की माप को एन्ट्रॉपी कहते हैं, और प्रकृति का स्वाभाविक झुकाव सदा एन्ट्रॉपी बढ़ाने की ओर है। यदि प्रकृति के चक्र को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, तो हर तंत्र अव्यवस्था की ओर ढलता है। कमरा स्वयं व्यवस्थित नहीं होता, बिखरता है, उसे व्यवस्थित करना पड़ता है। टूटा अंडा स्वयं नहीं जुड़ता; अंडे का संरक्षण व उपयोग व्यक्ति को करना पड़ता है। गरम चाय, स्वयं गरम नहीं रहती, वह प्रति क्षण ठंडी होती रहती है। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसे गरम करता या रखता है। यह व्यक्ति सापेक्ष है कि उसे चाय कब और कितनी गरम चाहिए।
एन्ट्रॉपी के विरुद्ध संघर्ष
एंट्रॉपी का अर्थ चौंका देने वाला है: प्रकृति सफलता/असफलता को केवल “अनुमति“ नहीं देती उसकी ’अंतर्निहित प्राथमिकता ही’ क्षय है, बिखराव है, सड़ा फल है। सड़ा फल व्यक्ति के लिए है। प्रकृति के लिए वह परिवर्तन मात्र है। अच्छा फल प्रकृति का स्वाभाविक उपहार नहीं; वह एक स्थानीय, क्षणिक, अत्यंत असंभाव्य अपवाद है, जिसे ढलान के विरुद्ध बल लगाकर गढ़ना पड़ता है। अच्छा और बुरा व्यक्ति का अपना विचार है। अतः अपनी अच्छे और बुरे की परिभाषा के अनुसार अच्छा प्राप्त करने के लिए अपने सचेतन प्रयासों से अपने अनुरूप परिणाम प्राप्त करने के प्रयास व्यक्ति करता है। प्रकृति के अनुसार उन प्रयासों के भी परिणाम मिलते हैं। प्रकृति के लिए, विज्ञान के लिए कुछ भी अच्छा या बुरा होता ही नहीं है। उसके लिए क्षय नहीं, केवल परिवर्तन है; क्योंकि ऊर्जा का क्षय नहीं होता, रूप परिवर्तन होता है।
’प्रकृति का स्वभाव परिवर्तन है, असफलता है, और सफलता, उस ढलान के विरुद्ध, स्थानीय रूप से, व्यक्ति के द्वारा अपने परिश्रम से अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप गढ़ा गया चमत्कार है।’ एक जीवित कोशिका, एक सधा हुआ शरीर, एक सुलझा हुआ प्रमेय, ये सब अव्यवस्था के सागर में व्यवस्था के द्वीप हैं, और इन्हें बनाए रखने की कीमत निरंतर चुकानी पड़ती है। श्रोडिंगर ने अपनी पुस्तक “जीवन क्या है?“ में कहा था कि जीव मुक्त ऊर्जा पर जीता है अर्थात् वह निरंतर अपने भीतर व्यवस्था भरता रहता है, अन्यथा क्षण-भर में बिखर जाए।
इस दृष्टिकोण से ’श्रम, निरंतरता और धैर्य’ कोरे सदुपदेश नहीं रह जाते; वे ठीक वही बल बन जाते हैं जो एन्ट्रॉपी से लड़ने के लिए अनिवार्य है। हम निरंतर परिश्रम इसलिए करते हैं क्योंकि जिस क्षण हम रुकते हैं, ढलान अपना काम कर देती है। निरंतरता कोई नैतिक सजावट नहीं, वह व्यवस्था को बनाए रखने की भौतिक शर्त है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, किंतु इस परिवर्तन की दशा व दिशा का निर्धारण व्यक्ति अपने सचेतन प्रयासों से करने में सक्षम है और वह करता भी है।
प्रकृति का “वादा“ भी निश्चितता नहीं, एक वितरण है
प्रकृति का गहनतम स्तर (क्वांटम स्तर) यह बताता है कि एक ही कारण से सदा एक ही निश्चित परिणाम नहीं निकलता; निकलता है परिणामों का एक वितरण, संभावनाओं का एक परास(विस्तार)। बड़े पैमाने पर यह यादृच्छिकता प्रायः ढँक जाती है और संसार नियति बद्ध-सा दिखता है, अतः यह कहना भूल होगी कि “जीवन महज़ संयोग है।“ बात इतनी-सी है: प्रकृति हमें एक निश्चित अच्छा फल नहीं, बल्कि फलों का एक वितरण थमाती है, और उस वितरण का बड़ा भाग वह है, जिसे व्यक्ति सड़ा हुआ मानता है। जिसे वह अपनी असफलता मानता है। व्यक्ति के लिए यहीं एक मार्मिक विडंबना है।
गीता का श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन“ वह वस्तुतः इसी भौतिक सत्य के निकट है। कृष्ण कहते हैं, फल पर तेरा अधिकार है ही नहीं। इसका आशय यह है कि फल कर्ता की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, यह आवश्यक नहीं। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि फल अवश्य मीठा होगा; उन्होंने कहा कि फल तेरे वश में नहीं। गीता “अच्छे फल का वादा“ नहीं करती, वह फल से हमारा मोह छुड़ाती है। ’’प्रकृति फल का वादा करती है, अच्छे फल का नहीं। अच्छा फल ढलान के विरुद्ध, सतत श्रम से गढ़ा गया एक स्थानीय चमत्कार है और यही सचेतन कर्म की गरिमा है। गरिमा ही सफलता है।’’
भाग दो: दार्शनिक भी एकमत नहीं
अर्जुन, सार्त्र के दृष्टिकोण से-
गीता कहती है अर्जुन को युद्ध करना चाहिए, क्योंकि यह उसका ’स्वधर्म’ है; क्षत्रिय होना उसका जन्मगत स्वभाव है। अब इसी अर्जुन को सार्त्र के दृष्टिकोण से देखिए। सार्त्र के लिए “मैं योद्धा हूँ, इसलिए मुझे लड़ना ही है“ यह वाक्य ’आत्मवंचना’ का पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है। अपनी स्वतंत्रता से भागकर एक दी हुई भूमिका के पीछे छिप जाना।
सार्त्र के अनुसार मनुष्य का कोई पूर्व निर्धारित स्वभाव होता ही नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्र है। वह स्वयं को गढ़ता है। अपने आपको स्वयं बनाता है और उसके लिए स्वयं ही उत्तरदाई होता है और यही प्रामाणिक जीवन है। एक ही अर्जुन, एक ही रणभूमि, और दो ठीक विपरीत निदान। दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते। किन्तु यहाँ सत्य व्यक्ति सापेक्ष है और स्वधर्म के श्री कृष्ण के दृष्टिकोण से क्षत्रिय होना सत्य है और सार्त्र के दृष्टिकोण से अर्जुन स्वतंत्र है, उसका जन्मगत कोई स्वभाव नहीं है। अनुभववादियों के अनुसार वह कोरी स्लेट है, जिस पर जो भी लिखना है; उसके लिए व्यक्ति परम स्वतंत्र है। अतः यहाँ पर आकर सच्चाई की परिभाषा व्यक्ति सापेक्ष हो जाती है। सच्चाई की परिभाषा व्यक्ति सापेक्ष होने के कारण सफलता भी व्यक्ति सापेक्ष है।
कांट बनाम महाभारत
कांट अपने प्रसिद्ध ‘कर्तव्य के लिए कर्तव्य’ सिद्धांत में कहता है कि द्वार पर खड़े हत्यारे से भी, अपने मित्र का जीवन बचाने के लिए भी, झूठ बोलना वर्जित है। सत्य एक सार्वभौमिक कर्तव्य है, परिणाम चाहे जो भी हो। परिणाम को देखकर सही किया तो वह नैतिक निरपेक्ष आदेश के अन्तर्गत नहीं आता। दूसरी ओर महाभारत में कृष्ण धर्म की विजय के लिए “अश्वत्थामाहतः“ जैसे अर्धसत्य रूपी छल का समर्थन करते हैं। यहाँ भी स्पष्ट है कि व्यक्ति को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होगा। कोई भी मार्ग पूर्व-निर्धारित नहीं है। कांट के पथ पर चलना है या कृष्ण के पथ पर या फिर अपना स्वयं का तीसरा ही मार्ग बनाना है। इसका निर्णय कर्ता व्यक्ति स्वयं है। उसके परिणामों का भोक्ता भी वह स्वयं ही होगा। सफलता या असफलता को मानना और स्वीकार करना भी उसका अपना निर्णय होगा।
कांट बनाम नीत्शे: सार्वभौम नियम बनाम मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन
नीत्शे कांट से विनम्रता पूर्वक असहमत नहीं होता, वह कांटीय नैतिकता पर ’प्रहार’ करता है, उसे “झुंड की नैतिकता“ कहता है। कांट कहता है, केवल उसी नियम पर चलो जिसे तुम सार्वभाैिमक बना सको; नीत्शे कहता है, यही सार्व भौम झुंड-नैतिकता वह बेड़ी है जिसे श्रेष्ठ मनुष्य को तोड़ना है, “अपने मूल्य स्वयं गढ़ो।“ ये दो शैलियाँ एक ही विचार के दो रूप नहीं हैं; एक दूसरे का ध्वंस करने के लिए बनी है, ऐसा भी नहीं है। ये दृष्टिकोण हैं, जो व्यक्ति को अपने मूल्य स्वयं गढ़ने की स्वतंत्रता देते हैं। अपना मार्ग स्वयं चुनने की आजादी का उपभोग करने के लिए प्रेरित करते हैं। किसी व्यक्ति को यह विचार करने के लिए मजबूर करते हैं, कि वह अनुपम है और उसे किसी पूर्व निर्धारित मार्ग पर नहीं, स्वयं निर्धारित किए गए या स्वीकार किए गए मार्ग पर चलकर स्वयं ही अपनी यात्रा का आनंद लेना है। वह स्वीकार करे या निर्धारित करे। उसके लिए उत्तरदायी और भोक्ता स्वयं ही है और इस उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकता। यही उसकी प्रामाणिकता है।
स्टोइक बनाम सार्त्र: नियति है भी या नहीं?
एक कहता है, जो निश्चित है उसे प्रेम से स्वीकार करो; दूसरा कहता है, कुछ भी निश्चित नहीं, सब तेरा चुनाव है। ये दोनों इस मूल प्रश्न पर ही भिड़ जाते हैं कि “स्वीकार करने योग्य कोई नियति है भी या नहीं।“ और यह असहमति ही वरदान है। यह टकराव ही विकास का दर्शन है।
यदि संसार के श्रेष्ठतम मस्तिष्क भी, यह तय नहीं कर सके कि सफलता क्या है? तो कोई गुरु तुम्हें बना-बनाया उत्तर नहीं थमा सकता; वह चुनाव अनिवार्यतः तुम्हारा अपना है। यही तो सबसे बड़ी सफलता का अपना ’स्वतंत्र चयन’ और प्रामाणिकता का सिद्धांत है, पर कुछ भी घोषित नहीं, सबकुछ स्वयं के द्वारा अर्जित। महान दार्शनिकों का सफलता की परिभाषा पर एकमत न होना सफलता की परिभाषा में दरार नहीं, उसकी सबसे बड़ी छूट है, यह तुम्हें अपनी सफलता स्वयं परिभाषित करने का अधिकार सौंपती है। आप किस कर्म के परिणाम को सफलता के रूप में स्वीकार करते हो, किस परिणाम को असफलता मानते हो; किस परिणाम से अनुभव की सीख लेते हो और किस परिणाम पर रोते हो, यह आपका अपना अधिकार क्षेत्र, आपका अपना निर्णय और आपकी अपनी सफलता है।
सफलता की आकांक्षा से पहले यह निर्धारित कीजिए कि ’सफलता’ से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? उसके लिए योजना बनाइए और उसका क्रियान्वयन करिए। उसके बाद कर्म के परिणाम को प्राप्त कर आप अपनी सफलता का दावा कर सकते हो, क्योंकि प्रकृति प्रत्येक कर्म के परिणाम की गारंटी देती है। उसकी सफलता या असफलता या अनुभव आपके अपने हैं।
प्रकृति हमें कर्मफल का आश्वासन देती है, हमारे द्वारा इच्छित फल का नहीं, और महान से महान दार्शनिक हमें प्रश्न देते हैं, उत्तर नहीं; उत्तर खोजने के लिए तो हम ही हैं। शेष कार्य ’अच्छा फल गढ़ना, और अपनी सफलता स्वयं परिभाषित करना’ हमारा अपना कार्यक्षेत्र है। यही, मेरी दृष्टि में, कर्म की सबसे बड़ी गरिमा है। यही गरिमा व्यक्ति की गरिमा है। यह गरिमा ही सफलता है।
/आई.आई.टी. गांधीनगर, गुजरात
