शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

योग गतिविधि नहीं, जीवनशैली

 *योग : कोई गतिविधि नहीं, जीवन शैली है*

                 डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


आम आदमी के लिए योग का अर्थ है — सुबह-सुबह पार्क में जाकर दो-चार आसन कर लेना, थोड़ा प्राणायाम कर लेना और फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर डाल देना। यह योग नहीं, योग का विज्ञापन है। वर्तमान में यही हो रहा है। हम जीवन नहीं जी रहे, प्रदर्शन कर रहे हैं। विज्ञापनों ने हमारे ऊपर नियंत्रण कर लिया है। हम अपनी आदतों को भी विज्ञापन के अनुरूप बनाते जा रहे हैं। अपने आपका विज्ञापन कर रहे हैं। कहा जाता है- जो दिखता है-वह बिकता है। इसका मतलब हम बिकाऊ वस्तु हैं या इंसान! योग के साथ भी हम वही कर रहे हैं। हम योग को आत्मसात नहीं कर रहे। योग को बिकाऊ वस्तु बना दिया गया है। जबकि योग जीवन की जीवंत प्रणाली है।  विज्ञापन में देख रहे हैं और अपने आपको आसन व प्राणायाम के साथ विज्ञापित कर रहे हैं। हम योग को बिना जाने योग के भौतिक लाभ लेना चाहते हैं। योग सर्वांगीण विकास का पथ है, आनंद का स्रोत है; किन्तु किसी भी उपकरण को समझे बिना उसका प्रयोग और प्रयोग के बिना प्रभावी परिणाम केवल सपनों या विज्ञापनों में ही प्राप्त हो सकते हैं। 

          अब आइए हम योग को समझने का प्रयत्न करते हैं। सर्वप्रथम इसके उच्चारण को सही करें। यह योग ही है, योगा नहीं। योगा आंग्ल भाषा के प्रभाव के कारण गलत उच्चारण किया जाने लगा है। इसमें सुधार करना ही उचित है। आगे विचार करें। योग कोई एक घंटे की कसरत नहीं है। योग 24 घंटे जीने की कला है। योग कोई क्रिया नहीं, जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली शैली है। इस शैली में हमारी सभी व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं का समाधान है। 


      महर्षि पतंजलि ने योग को आठ अंगों में बाँटा — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। जन सामान्य के लिए योग परलोक सुधारने की, ईश्वर से साक्षात्कार करवाने की लगभग असंभव सी साधना है। हम समझते हैं कि योग क ये आठों अंग योगियों के काम हैं, हमारे नहीं। पर सच यह है कि ये आठों हमारे ही रोज़ के जीवन को ठीक करने के औजार हैं। अभी हम जीवन जी नहीं रहे जीवन को काट रहे हैं। योग को समझकर और आत्मसात कर हम जीवन जीना प्रारंभ कर सकते हैं। 

      योग के आठों अंगों का संक्षिप्त व व्यवहारिक परिचय अग्रानुसार है-

*1. यम - समाज से संबंध*- यम व्यवहार का विज्ञान व कुशलता है। यह समाज के साथ संबन्धों के आधार हैं, जो समाज में हमारे स्थान का निर्धारण करते हैं। यम का अर्थ है - दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करोगे। इसके पाँच नियम हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।

आज के प्रबंधन की भाषा में यही है - सामाजिक नैतिकता (Social Ethics)या व्यवहार कौशल(soft skill)। आप ऑफिस में हैं, क्या आप अपने साथी की टाँग खींचते हैं? वह हिंसा है। क्या आप झूठी रिपोर्ट बनाते हैं? वह असत्य है। क्या आप ऑफिस का समय चुराते हैं? वह अस्तेय का उल्लंघन है। यम हमें सिखाता है कि जब तक समाज से तुम्हारा संबंध शुद्ध नहीं होगा, तुम योगी नहीं बन सकते, अच्छे नागरिक भी नहीं बन सकते।

*2. नियम - स्वयं से संबंध*

नियम का अर्थ है - अपने साथ कैसा व्यवहार करोगे। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।

आज हम बाहर से साफ दिखते हैं, पर भीतर से अशांत हैं। शौच केवल शरीर का नहीं, विचारों का भी चाहिए। संतोष का अर्थ आलस्य नहीं, जो है उसमें प्रसन्न रहकर और बेहतर के लिए प्रयास करना। स्वाध्याय का अर्थ किताब पढ़ना ही नहीं, स्वयं का अध्ययन करना। जो व्यक्ति अपने आपको नहीं पढ़ पाया, वह दुनिया को क्या पढ़ेगा? नियम हमें आत्म-अनुशासन सिखाता है।


*3. आसन - शरीर से संबंध*- आसन अर्थात आसान स्थिति। कहा भी गया है- *"स्थिरसुखमासनम।"*  जो स्थिर भी हो और सुखद भी हो, वही आसन है। आसन शरीर की एक स्थिति है, जो शरीर के लिए स्वाभाविक, स्थिर और सुखद हो। कठिनाई से की गई स्थिति आसन नहीं है। जो स्थिति आसानी से प्राप्त की जा सके और शरीर के लिए अनुकूल भी हो, वही आसन है। 

       वर्तमान समय में आसनों को ही पूरा योग समझ लिया गया है। पर आसन तीसरा सोपान है, पहला नहीं। बिना यम-नियम के किया गया आसन केवल शारीरिक कसरत है। वह योगयोग के अन्तर्गत नहीं आएगी। आसन का उद्देश्य शरीर को इतना स्वस्थ और स्थिर बनाना कि वह आत्मा की यात्रा में बाधा न बने। शरीर तो मंदिर है, मंदिर गंदा होगा तो कर्म रूपी पूजा कैसे होगी? शरीर ही कर्म करने का साधन, माध्यम या उपकरण है। 

4. प्राणायाम -    प्राणायाम  श्वास से संबंधित है। प्राण को प्राणवायु अर्थात आक्सीजन से जोड़ा जा सकता है। प्राचीन कालीन दार्शनिक एनिक्सीमेंस ने तो हवा को ब्रह्माण्ड का मूल तत्व माना था। प्राणायाम उसी प्राणवायु को लेकर ऊर्जा वानवान होने का उपकरण है। प्राणायाम का अर्थ साँस को रोकना नहीं, साँस को जानना है। प्राण + आयाम = जीवन ऊर्जा का विस्तार।

      आज का सबसे बड़ा रोग है - तनाव। तनाव का सीधा संबंध श्वास से है। जब मन अशांत होता है, श्वास उखड़ जाती है। जब श्वास को नियंत्रित कर लेते हैं, मन स्वयं नियंत्रित हो जाता है। 5 मिनट का अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भ्रामरी - ये कोई चमत्कार नहीं, ये आपके ही नर्वस सिस्टम का रीसेट बटन हैं। यदि हम इसे पांच मिनट तक सीमित न करके जीवन के साथ आत्मसात कर सकें तो कल्पना ही कर सकते हैं। जीवन कितना ऊर्जस्वित हो जाएगा। प्राणवायु की आवश्यकता हर जगह है- कभी भी- कहीं भी। अतः प्राणायाम- जीवन शैली का भाग है- कहीं भी- कभी भी।

5.*प्रत्याहार -*   इंद्रियों से संबंधित है। यह सर्वविदित है कि इंद्रियों के माध्यम से ही हम संवेदना व अनुभव प्राप्त करते हैं तो इंद्रियों के माध्यम से ही हम अपने कर्म संपन्न करते हैं। यही कारण है कि इंद्रियों का वर्गीकरण ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेंद्रियों केके रूप में किया जाता रहा है।  इद्रियों को ही हमें वासनाओं में भटकाने का दोष भी दिया जाता रहा है। 

         प्रत्याहार का अर्थ है - इंद्रियों को बाहर से भीतर की ओर लौटाना। आज हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण है - हर समय बाहर देखना। मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया - आँखें, कान, सब बाहर ही तो भटक रहे हैं। यह भटकन हमें शारीरिक व मानसिक रूप से रोगी बना रही है। हम मनुष्य कम पशु अधिक हो जाते हैं। इस स्थिति से उन्नयन करने वाली योगिक क्रिया है- प्रत्याहार। 

         प्रत्याहार कोई आँख बंद करना नहीं है, यह मन का डाटा बचाना है। जैसे कछुआ खतरा देखते ही अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, वैसे ही साधक व्यर्थ की सूचनाओं से अपने को भीतर खींच लेता है। सूचनाओं के कचड़े में से उपयोगिता औरऔर सृजनात्मकता को बचाने का काम प्रत्याहार से ही संभव है। जो व्यक्ति प्रत्याहार नहीं जानता, वह कभी फोकस नहीं कर सकता।

6. धारणा - एकाग्रता से संबंधित है। धारणा किसी एक विषय को धारण करना है। किसी एक बिंदु पर मन को टिकाना, धारणा है। आज के युग में सबसे बड़ी कमी धारणा की ही है। हम सब कुछ एक साथ करना चाहते हैं - खाना खाते हुए मोबाइल, पढ़ते हुए गाने, बात करते हुए कुछ और सोचना। यह मल्टीटास्किंग नहीं, मल्टी-फेल्योर है।

      धारणा सिखाती है - जो करो, उसी में पूरे हो जाओ। पढ़ो तो सिर्फ पढ़ो। सुनो तो सिर्फ सुनो। यही सफलता का सूत्र है। एकाग्रता की कमी से आज केवल किशोर और युवा ही नहीं, हम सब जूझ रहे हैं। हम जो भी करें, वही करें- मन-वचन-कर्म में एक ही विषय धारण करें। रजनीश ओशो इसी स्थिति को ध्यान से जोड़ने के पक्षधर रहे हैं। 

*7. ध्यान* - जागरूकता से संबंधित है। धारणा से अगली स्थिति। धारणा जब सहज और निरंतर हो जाती है, तो वही ध्यान बन जाती है। ध्यान कोई आँख मूँद कर बैठना नहीं है, ध्यान तो हर काम को ध्यान से करना है। यदि आप खाना ही खा रहे हैं। आप अध्ययन कर रहें हैं तो अध्ययन ही कर रहे हैं। चाय बनाना भी ध्यान हो सकता है, यदि उसे पूरे होश से बनाया जाए। और पूजा भी ध्यान नहीं है, यदि मन कहीं और भटक रहा हो। ध्यान कोई अल्पकालीन गतिविधि नहीं हैहै जिसे रुककर याया बैठकर संपन्न किया जा सके। ध्यान हमें सिखाता है - वर्तमान में जीना। जो वर्तमान में है, वही ध्यान में है;  जो ध्यान में है, वही आनंद में है।

*8. समाधि* - योग के अष्टांगों में सबसे अंत में समाधि का स्थान आता है। सभी योगिक क्रियाओं का साध्य समाधि को माना जाता है। धारणा- ध्यान और समाधि के नाम तो गिनाए जाते हैं, किंतु जन सामान्य इनके अर्थ को समझने तो क्या जानने के भी प्रयत्न नहीं करता। समाधि में फोटो नहीं खींचें जाते। अपने आपको जाना जाता है। सुकरात स्वयं को जानने (Know Thyself) की बात करते हैं।  समाधि को स्वयं से मिलन की अवस्था कहा जा सकता है। 

      समाधि का अर्थ है - स्वयं में समाधान। जहाँ कोई प्रश्न नहीं, कोई द्वंद्व नहीं। यह कोई हिमालय की गुफा में मिलने वाली अवस्था नहीं है। जब एक किसान अपने खेत में लहलहाती फसल देखकर तृप्त होता है, वह समाधि है। जब एक माँ अपने बच्चे को सुलाकर शांत होती है, वह समाधि है। जहाँ कर्ता और कर्म एक हो जाएँ, वही समाधि है। जब मन-वचन-कर्म का भेद मिट जाय, वह समाधि है। योग के सभी अंग हमें कर्म से दूर जाकर साधना करने को नहीं कहते, अपने समस्त कर्मो को पूर्ण निष्ठा, समर्पण व कुशलता पूर्वक करने का आह्वान करते हैं। 

         तभी तो गीता में योगिराज श्रीकृष्ण कहते हैं -

                         *योग: कर्मसु कौशलम्।*

आधुनिक पाश्चात्य दर्शन के समीक्षावाद के प्रवर्तक दार्शनिक कांट भी कर्तव्य के लिए कर्तव्य करने की बात करते हैं। योग का अर्थ काम से भागना नहीं, काम में कुशलता लाना है। जो काम कुशलता, समता और पूरे मन से किया जाए, वही योग है।

        एक क्लर्क जो फाइल को ईमानदारी से, एकाग्रता से निपटाता है, वह योगी है। एक शिक्षक जो पूरी तैयारी से कक्षा में जाता है,  और पूरी,  निष्ठा, समर्पण व तन्मयता के शिक्षण करता है,  वह योगी है। एक हलवाहा जो पूरे मन से हल चलाता है, वह योगी है।

         योग हमें संन्यासी नहीं बनाता, योग हमें श्रेष्ठ गृहस्थ बनाता है। योग हमें दुनिया से नहीं भगाता, दुनिया में ठीक से जीना सिखाता है। इसलिए योग को एक घंटे की गतिविधि मत बनाइए, उसे 24 घंटे की जीवन शैली बनाइए। योग को फोटो और वीडियो में नहीं, अपने जीवन में उतारिए। योग मत करिए, जीवन को ही योगमय कर लीजिए। 

यम से समाज सुधारिए, नियम से सुधरे आप। 

आसन से शरीर साधिए, प्राणायाम हरे संताप। 

प्रत्याहार में खुद लौटिए, धारणा मन की माप। 

ध्यान से जीवन कर्म कर, समाधि स्वयं की छाप। 


जीवन ही योग है। योग ही जीवन है।

बुधवार, 16 सितंबर 2026

प्रबंधन ग्रंथ के रूप में-गीता

 गीता : प्रबंधन ग्रंथ के रूप में

             डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

गीता वर्तमान में सबसे अधिक छपने, सबसे अधिक बिकने, सबसे अधिक अनुदित होने और सबसे अधिक चर्चित होने वाली पुस्तकों में से एक है। गीता के अनुयायी गीता को एक पुस्तक नहीं, धार्मिक ग्रंथ मानते हैं। उसका पाठ करके अपने आपको धन्य मानते हैं। वे गीता पाठ करके परलोक सुधार रहे हैं, ऐसा मानते हैं। मनुष्य यही सबसे बड़ी गलती करता है। अत्यंत महत्वपूर्ण व उपयोगी ग्रंथों को धार्मिक मानकर आचरण से बाहर कर देता है। यही गलती गीता के साथ हुई। गीता को धार्मिक ग्रन्थों की सूची में रखकर उसके वास्तविक व लौकिक लाभों से अपने आप को वंचित कर लिया। 

आज प्रबंधन की बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ विदेशी किताबों से पढ़ाई जाती हैं। पीटर ड्रकर, एफ. डबल्यू. टेलर, स्टीफन कोवी, साइमन सिनेक आदि प्रबंध शास्त्रियों पर फोकस किया जाता है। हम पत्तों की चमक को लेकर प्रबंधन पर काम करते हैं, किन्तु 5000 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में जो प्रबंधन-सूत्र दिया गया; उसे भुला बैठे हैं। गीता प्रबंधन का आधार ग्रंथ है। गीता के प्रबंधन के सूत्र न केवल आज भी प्रासंगिक हैं, वरन किसी एमबीए के पाठयक्रम से भी महत्वपूर्ण व उपयोगी हैं। गीता के रूप में प्रबंधन दुनिया के बड़े से बड़े पाठयक्रमों से भी बड़ा है।


गीता विश्वस्तरीय, विश्वसनीय व सर्व स्वीकृत  धर्मग्रंथ तो है ही, साथ ही, वह दुनिया का पहला और सबसे सफल मैनेजमेंट मैनुअल भी है। श्री कृष्ण दुनिया के प्रथम प्रबंधन गुरु हैं, जिन्होंने अपने प्रबंधन सूत्र युद्ध के मैदान में दिए। श्री कृष्ण कोरे प्रबंधन उपदेशक नहीं थे, उन्होंने उन प्रबंधन सूत्रों का आत्मसातीकरण करके राजा न बनकर राज्यों का प्रबंधन किया। वे विकट से विकट परिस्थितियों में भी सभी समस्याओं का प्रबंधन करते हुए नियोजित परिणाम प्राप्त करते हैं। 

   श्री कृष्ण का प्रबंधन कौशल अतुलनीय है। उनके प्रबंधन सूत्र केवल राज्य का ही नहीं मनुष्य का प्रबंधन करते हैं। मनुष्य का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि शेष सबका प्रबंधन मनुष्य को ही करना है। श्री कृष्ण के प्रबंधन कौशल को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-

1. लक्ष्य का प्रबंधन (Goal Management)- सफलता के लिए एक लक्ष्य होना आवश्यक है। लक्ष्य के लिए योजना बनाकर क्रियान्वयन करके ही सफलता की ओर बढ़ा जा सकता है। अर्जुन के सामने लक्ष्य की ही समस्या है। अर्जुन की समस्या लक्ष्यहीनता नहीं, लक्ष्य-भ्रम थी। उसे अपना कर्तव्य दिख रहा था, पर मोह उसे रोक रहा था। कृष्ण ने पहला सूत्र दिया — 

       'धर्म पर लक्ष्य केंद्रित करो, भावना पर नहीं।'

प्रबंधन का पहला नियम भी यही है — व्यक्तिगत पसंद से ऊपर संस्थागत लक्ष्य। संस्था या समाज व्यक्ति से ऊपर है। तभी तो कहा गया है-

त्यजेद एकं कुलंस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेद। 

ग्राम जनपदस्यार्थे, आत्मार्थे पृथ्वी त्यजेद।। 

गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कर्म पर जोर देते हुए, मनुष्य को परिणाम से मुक्त रहने की सीख देते हैं। परिणाम की चिंता से मुक्त होकर ही कर्म पर केन्द्रित रहकर गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी। गीता का आधारभूत प्रबंधन सूत्र है-

          'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'

समीक्षावाद के प्रतिपादक दार्शनिक कांट इसे कर्तव्य के लिए कर्तव्य कहते हैं। उनके अनुसार यदि कुछ पाने की चाह में कर्तव्य किया तो वह नैतिक नहीं है। अतः हमें कर्म केवल कर्तव्य की भावना से ही करना है। यह परिणाम केन्द्रित (Result Oriented)नहीं, प्रक्रिया केन्द्रित (Process Oriented) प्रबंधन है। फल आएगा, पर तुम्हारा अधिकार सिर्फ श्रेष्ठ प्रक्रिया पर है।

2. समय का प्रबंधन (Time Management)- समय(Time) व स्थान(space) विज्ञान और दर्शन में सबसे अधिक चर्चित विषयों में गिने जाते हैं। व्यक्ति का जीवन समय की एक धारा ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक का उपयोगी काल ही मनुष्य का वास्तविक जीवन है। 

गीता कहती है — न भूत में जियो, न भविष्य की चिंता में मरो। वर्तमान को जिओ, निरंतर कर्मरत रहो। 

        *तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।*

जो होना है, वह होगा। जो बीत गया, वह गया। प्रबंधक का काम है — अभी को ठीक करना। चिंता समय(Time) की सबसे बड़ी चोरी है। प्रबंधक चिंता नहीं करता नियोजन व क्रियान्वयन कर अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है। 


3. मन(स्व) का प्रबंधन (Self Management)- आधुनिक समय में प्रबंधन को लेकर कहा जाता है कि प्रबंधक केवल संसाधनों का ही प्रबंधन नहीं करता; संबंधों का भी प्रबंधन करता है। मन बाहरी संबंधों का ही नहीं, अपने संबंधों का भी आधार होता है। संबंधों के प्रबंधन का सबसे बड़ा कारखाना बाहर नहीं, अंदर है — मन।

            *उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।*

अपना उद्धार तुम्हें खुद ही करना है। कोई मोटिवेशनल स्पीकर नहीं आएगा। गीता स्व-नेतृत्व (Self-Leadership)सिखाती है — इंद्रियों को नियंत्रित करो, तो स्व का नियंत्रण हो जाएगा। स्व का नियंत्रण होने पर पूरा संगठन नियंत्रित हो जाएगा। है। मन बाहरी संबंधों का ही नहीं, अपने संबंधों का भी आधार होता है। संबंधों के प्रबंधन का सबसे बड़ा कारखाना बाहर नहीं, अंदर है — मन।

    'उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।'

अपना उद्धार तुम्हें खुद ही करना है। कोई मोटिवेशनल स्पीकर नहीं आएगा। गीता स्व-नेतृत्व (Self-Leadership)सिखाती है — इंद्रियों को नियंत्रित करो, तो स्व का नियंत्रण हो जाएगा। स्व का नियंत्रण होने पर पूरा संगठन नियंत्रित हो जाएगा।

4. टीम का प्रबंधन (Team Management)- प्रबंधन अपनी टीम को आदेश नहीं देता। वह संवाद करता है। कृष्ण ने कभी अर्जुन को आदेश नहीं दिया। उन्होंने प्रश्न, संवाद और तर्क से उसे स्वयं ही तैयार होने का अवसर प्रस्तुत किया। यही है भागीदारी प्रबंधन (Participative Leadership)। अर्जुन अपने किंकर्तव्यविमूढ़ पाता है। अर्जुन को लगा कि वह अकेला है, पर कृष्ण ने बताया —

      *निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।*

तुम सिर्फ निमित्त हो, करने वाला कोई और है। तुझे तो अपनी भूमिका का, अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है।  टीम व  प्रक्रिया का संचालन सुनिश्चित करना है। अहंकार छोड़ोगे, तभी टीम साथ चलेगी। कोई भी सफलता व्यक्ति को नहीं, टीम को मिलती है। टीम को ही श्रेय देना अच्छे अभिप्रेरक का काम है। 

5. संकट का प्रबंधन (Crisis Management)- सामान्य समय में प्रबंधन कौशल की परीक्षा नहीं होती, वास्तविक रूप से प्रबंधन कौशल की परीक्षा संकट के समय ही होती है। युद्ध के मुहाने पर जब सबसे बड़ा योद्धा ही हथियार डाल दे — इससे बड़ा संकट क्या होगा? कृष्ण ने आदेश नहीं दिया, उपदेश नहीं दिए, लेक्चर नहीं दिया, ऐसे समय आदेश, उपदेश और  भाषण  काम नहीं करते। विश्व के प्रबंधन गुरु ने *काउंसलिंग* की और काउंसिल काम कर गयी।

    पहले सुना, फिर समझा, फिर जगाया। यही आज का  संकट प्रबंधन प्रतिरूप (Crisis Management Model)है। सुनो, परानुभूति और क्रिया— Listen, Empathize, Act.

6. परिवर्तन का प्रबंधन (Change Management)- परिवर्तन प्रकृति का नियम है। विज्ञान में एंट्रोपी की अवधारणा बताती है कि प्रकृति क्षय की ओर ले जाती है। मन की प्रकृति भी अधोगामी मानी जाती है। निसंदेह परिवर्तन अवश्यंभावी है, किन्तु मनुष्य के सचेतन प्रयास इस परिवर्तन को विकास के पथ पर ले जा सकते हैं। परिवर्तन का प्रबंधन वही तकनीक है। 

        *वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।*

गीता परिवर्तन की चिंता से मुक्त करती है। प्रबंधक को चिंता मुक्त होकर प्रयास करना आवश्यक है। जैसे पुराने वस्त्र बदलते हो, वैसे ही पुरानी रणनीति भी बदलनी पड़ती है। जो संस्था बदलती नहीं, वह मरती है। गीता परिवर्तन को मृत्यु नहीं, नव-जन्म अर्थात नव-प्रवर्तन बताती है।



 इस प्रकार स्पष्ट है  गीता कोई पूजा-पाठ की पुस्तक नहीं — वह कर्म की पुस्तिका है। वह अप्रतिम प्रबंधन ग्रंथ है। यह पारलौकिक ही नहीं, लोकिक ज्ञान भी देती है। यह युद्ध के साथ जीवन युद्ध में विजय अर्थात आनंद पथ पर यात्रा सुनिश्चित करने का प्रबंधन करती है। गीता हमें सीख देती है कि तिलक-दीप से संस्था नहीं चलतीं, प्रबंधन से चलती हैं। भौतिक विकास विज्ञान व तकनीक से होता है। दुनिया तकनीक से चलती है। हल-कलम-कुदाल से चलती है।

आधुनिक प्रबंधन कहता है —  कार्य ही पूजा है (Work is Worship)। गीता में प्रबंधन गुरु श्रीकृष्ण कहते हैं —  सही भावना के साथ किया गया काम अपने आप में पूजा है। इसलिए जब अगली बार कोई कहे कि गीता पढ़नी चाहिए, तो आप कहिए — पढ़नी नहीं, जीनी चाहिए।

गीता पढ़ना तो सरल, कठिन गीता सी चाल।

कथनी मीठी लगत है, करनी में ही ढाल।।


* 

सोमवार, 14 सितंबर 2026

लोग तो कुछ भी कहेंगे- हमको आगे बढ़ना



किसी फिल्म के आनंद बक्शी जी के गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं- 

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।

छोड़ो बेकार की बातें, कहीं बीत न जाए रैना।

सफलता के पथिक के लिए ये पंक्तियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें एक सच्चाई कही गई है। बिल्कुल सही बात! लोगों का काम ही बोलना है। यदि हम सही रास्ते पर हैं तो दुनिया की परवाह क्यों करनी? लोग क्या कहेंगे, से मुक्त होकर अपने कर्म पथ पर चलते हुए अपनी योजना पर काम कर निरंतर सफलता प्राप्त करते रहना चाहिए।

हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि हमारे लिए हमारी सफलता महत्वपूर्ण है और हमारी सफलता है-‘हमारी खुशी, प्रसन्नता या आनंद।’। लोग हमेशा ही आलोचना करेंगे या बिन माँगी सलाह देंगे, किंतु आपके सुख-दुख में आपके साथ खड़े नहीं होंगे। आप कुछ भी करें, लोगों को बात बनानी ही हैं। इसलिए लोगों की बातों के चक्कर में समय बर्बाद करने की अपेक्षा अपने लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित करें।

प्राचीन ग्रीस और रोम का एक व्यावहारिक दर्शन स्टोइकवाद है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि हम बाहरी परिस्थितियों और घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते किंतु हम उन पर अपने द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। स्टोइकवाद का मुख्य लक्ष्य मानसिक शान्ति और आतंरिक संतुलन की स्थिति प्राप्त करना है।

गीता, स्टोइकवाद और सात्र्र

गीता, स्टोइक्स और सार्त्रतीनों का ही सार है। लोग कुछ भी कहेंगे। उनका काम ही यह है कि वे कुछ न कुछ बोलें। गीता में तो कर्म पर ही जोर दिया गया है। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो। अपने कर्म पर फोकस करो। स्टाइक्स परिस्थितियो को दो प्रकार की बताते हैं- 1. नियंत्रणीय और 2. अयिंत्रणीय।

हम अपने कर्म पर नियंत्रण रखते हैं। हमारा कर्म करने पर ही अधिकार है। लोगों के कहने पर नहीं। लोग तो बोलेंगे, हमेशा बोलेंगे। हम सफलता का जश्न मनाएं तो हमें घमण्डी घोषित कर दिया जाएगा। असफल हो जाएं तो नाकारा, लापरवाह और भी न जाने क्या-क्या घोषित कर दिया जाएगा। यदि हम चुप रह जाएं तो हमें डरपोक घोषित कर दिया जाता है। यदि बोले तो अति-आत्मविश्वासी घोषित किया जा सकता है। सार्त्रभी दूसरे लोगों को नर्क कहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि हमारा लोगों की प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण नहीं है। हमें क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है? पर नियंत्रित करना है। हाँ! हम अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण रख सकते हैं।

  गीता, स्टोइकवाद और सार्त्रका सार एक ही पंक्ति में है- ‘लोग कुछ भी कहेंगे, लोगों का काम है कहना, लेकिन तुम यह निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हो क्या सुनना है और क्या नहीं सुनना है?’ समस्या लोगों के कहने में नहीं है, तुम्हारे सुनने के तरीके में है। समाधान भी सुनने या न सुनने के विवेकपूर्ण निर्णय में ही है।

लोग कुछ भी क्यों कहते हैं?

1. अपने दर्पण में अपने आपको प्रतिबिंबित करते हैं। जो स्वयं नहीं कर सके, दूसरा करता है तो जलन होती है। गीता में इसे मात्सर्य कहा है।

2. अपने मन का भय- जब वे हमारे बदलाव को देखते हैं तो स्वीकार नहीं कर पाते; उससे उनकी सामान्य धारणा को ठेस पहुँचती है। लोग किसी को आगे बढ़ते हुए देखना स्वीकार नहीं कर पाते। अतः आलोचनाएं करके अपने आप को संतुष्ट करने के प्रयत्न करते हैं।

3. टाइमपास के लिए अपना मनोरंजन करते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। उनके पास करने को कुछ है ही नहीं। तुम्हारे जीवन को लेकर ही अपना मनोरंजन करते हैं। स्वयं को दूसरों की टिप्पणियों से बचाने के प्रयास और दूसरों के जीवन पर चटखारे लेना सामान्य जन का स्वभाव है।

घोड़े व दो सवारों की लोक कथा-

पुराने समय की बात है। एक व्यक्ति अपने किशोर पुत्र के साथ एक कम आयु के घोड़े को लेकर यात्रा कर रहा था। घोड़ा आयु व आकार के कारण अधिक मजबूत नहीं था। तत्कालीन धारणा के अनुसार उस पर एक ही व्यक्ति द्वारा सवारी की जा सकती थी। पिता और पुत्र दोनों का घोड़े पर बैठना, घोड़े को थका सकता था।

वह समय संस्कार, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की समृद्धि का काल था। पुत्र पिता के लिए सेवा भाव रखता था, तो पिता भी पुत्र के लिए अपने कर्तव्यों को भली-भाँति समझता था। पिता के विचार में घोड़ा अधिक शक्तिशाली नहीं था। उस पर पिता और पुत्र दोनों एक साथ सवारी नहीं कर सकते थे। पिता की दृष्टि से पुत्र छोटा था। उससे पैदल यात्रा करवा कर उसे थकाना उचित नहीं था। अतः उसने अपने बेटे से कहा, ‘पुत्र! घोड़े पर एक ही व्यक्ति सवारी कर सकता है। मैं तो पैदल यात्रा करने का आदी हूँ। मुझे बहुत अभ्यास है। तुम अभी छोटे हो। तुम्हारी पहली यात्रा है। अतः तुम घोड़े पर बैठ जाओ।

पुत्र को यह स्वीकार नहीं था। वह पितृभक्त किशोर था। उसने कहा, ‘ये कैसी बात कर रहे हैं पिताजी। अब मैं छोटा नहीं रहा। अब मैं कमजोर भी नहीं हूँ। बाहरी यात्रा पर भले ही पहली बार निकला हूँ। स्थानीय स्तर पर पैदल चला ही करता था। बुजुर्ग पिता पैदल चलें, और जवान पुत्र घोड़े पर चले। ऐसा अधर्म मैं नहीं कर सकता। आप घोड़े पर बैठे। मैं पैदल चलकर आपके साथ-साथ यात्रा करूँगा।’ काफी देर तक पिता-पुत्र में एक-दूसरे को मनाने के प्रयास चलते रहे। अन्त में पिता को पुत्र का आग्रह मानना ही पड़ा।

पिता घोड़े पर सवार हो गया। पुत्र पैदल-पैदल घोड़े को पकड़ कर चल रहा था। दो-चार कोस के बाद एक गाँव आया। जब वे दोनों एक गाँव के मध्य से गुजर रहे थे, तब गाँव में एक चबूतरे पर कुछ लोग बैठे थे। उन्होंने उन दोनों को देखकर उनकी मजाक उड़ाते हुए टिप्पणी की, ‘देखो भाई! इस आदमी को, कितना निर्दयी है! बच्चे को पैदल चला रहा है और खुद घोड़े पर बैठकर मजे से जा रहा है’। उन लोगों की टिप्पणियों ने पिता को दुखी कर दिया।

पिता ने बेटे से कहा, ‘बेटा! मैंने पहले ही कहा था कि तुम छोटे हो अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? तुम पैदल चलने लायक नहीं हो। लोग ठीक ही कह रहे हैं। बच्चा पैदल चले और बड़ा घोड़े पर चले। यह किसी भी तरह उचित नहीं है। अतः तुम घोडे़ पर सवार होकर चलो।

बेटे को यह उचित तो नहीं लग रहा था। उसकी पितृभक्ति उसे इसके लिए अनुमति नहीं दे रही थी। उसका धर्म इसे अनुचित बता रहा था। फिर भी लोगों की बातों के कारण उसे पिता की बात माननी पड़ी। वह घोड़े पर बैठ गया और पिता पैदल चलने लगा।

वे लोग कुछ ही दूर गए होंगे। उन्हें एक गाँव और दिखाई दिया। रास्ता उस गाँव के बीच में से ही था। जब वे गाँव से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक चैपाल पर आठ-दस लोग बैठे हैं। उन सभी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन दोनों ने उनका अभिवादन करते हुए राम-राम कहा। उनमें से एक-दो ने उनके राम-राम का प्रत्युत्तर दिया। तभी उनमें से कुछ लोग बोलने लगे, ‘देखो भाई! घोर कलयुग आ गया है। जवान लड़का घोड़े पर बैठा है और बूढ़े बाप को पैदल चला रहा है। यही देखने को बाकी रह गया था।’

बेटा पहले से ही ग्लानि में था। वह अपने पिता को ही घोड़े पर बिठा कर ले जाना चाहता था। लोगों की टिप्पणियाँ सुनकर वह शर्म से पानी-पानी हो गया। गाँव से बाहर निकल कर वह घोड़े से उतर पड़ा और बोला, ‘पिताजी मैं पहले ही कह रहा था कि ऐसा बिल्कुल उचित नहीं है। मैं जवान हूँ। मैं पैदल चलूँगा आप घोड़े पर बैठकर चले। यही मेरे पुत्र धर्म के लिए भी उचित है।’

पिता-पुत्र में काफी देर तक इस विषय पर विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान यात्रा रूकी रहने के कारण उनका समय भी बर्बाद हो रहा था। अन्त में पिता ने निर्णय किया, ‘ऐसा करते हैं कि दोनों ही घोड़े पर बैठकर चलते हैं। घोड़े को थोड़ी मुष्किल होगी किन्तु दोनों का भार उठा लेगा। इस प्रकार लोग भी कुछ नहीं कहेंगे।’

पितृभक्त पुत्र को पिता के आज्ञा का पालन करना ही था। दोनों घोड़े पर बैठकर चलने लगे। घोड़ा थोड़ा छोटा व कमजोर था। उसे दोनो के वजन को लेकर चलने में कठिनाई हो रही थी। इस कारण धीरे-धीरे चल रहा था। अगले गाँव में लोगों ने मुँह बनाते हुए कहा, ‘देखो भाई! कितने निर्दयी लोग हैं! छोटे से घोड़े पर दो-दो लोग चढ़ रहे हैं। बेजुबान प्राणी की कोई चिंता ही नहीं है। ऐसे लोगों को तो राजा के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए। कितने अधर्मी हैं। अपने आराम से मतलब है। घोड़े की चिंता बिल्कुल नहीं है।’

दोनों पिता-पुत्र किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए कि वे करें तो करंे क्या? लोगों की बातों से परेशान होकर दोनों ही घोड़े की लगाम पकड़ पैदल चलने लगे।

थोड़ी दूर ही चले होंगे कि उन्हें अगला गाँव दिखाई दिया। वे अब निश्चिन्त थे कि कम से कम उन्हें अब कोई आलोचना सहन नहीं करनी पड़ेगी। वे भोले-भाले थे। उन्हें क्या पता था कि कुछ भी करो। कैसे भी रहो। लोगों का काम व्यर्थ की मीन-मेख निकालना ही है। वे गाँव से होकर गुजर ही रहे थे। तभी उनके कानों में आवाज आईं, ‘आओ भाई! आओ! इन बेवकूफों को देखो, पास में घोड़ा है फिर भी दोनों पैदल चल रहे हैं। दुनिया में मूर्खो की कोई कमी नहीं है।’

उनकी बातें सुनकर पिता-पुत्र दोनों ही अवाक रह गए। पिता घोड़े पर बैठे तो लोगों को समस्या है। पुत्र घोड़े पर बैठे तो लोग टिप्पणी करते हैं। दोनों घोड़े पर बैठें तो आलोचनाओं का शिकार बन रहे हैं। दोनों पैदल चलकर घोड़े को आराम दे रहे हैं, तब भी लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं। 

आखिर करें तो करें क्या?

                इसका एक ही उत्तर है-

लोग तो कुछ भी कहेंगे- इससे नहीं है डरना

हम हैं पथ के राही, हमको आगे बढ़ना

लोग क्या कहेंगे? इस क्या का उत्तर ही तनाव से बचने का सटीक उपाय है। लोगों के कुछ भी कहने से हम अपना जीवन गुलाम नहीं बना सकते। हम दास मानसिकता में क्यों जिएं?  लोगों का क्या? जीवन हमारा है, आवश्यकताएं हमारी हैं, कर्म से प्रेम हमें है, कर्म हमें करने हैं, कर्मो के परिणाम का सामना हमें करना है। ऐसी स्थिति में लोगों के कहने की चिंता क्यों करें? लोगों को प्रत्येक स्थिति में हमारी आलोचना ही करनी है। हम अपने पथ के निर्णायक स्वयं बनें। पथ हमारा, पथिक हम हैं, पाथेय की व्यवस्था हमें करनी है, गंतव्य हमारा है तो चलने की गति, साधन और समय का निर्धारण भी हम ही करेंगे किसी अन्य को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देंगे। लोगों की नजरों का शिकार नहीं बनेंगे। किसी की भी टिप्पणियों से अपने कर्म को और अपने आपको प्रभावित नहीं होने देंगे।

गीता की चार चरणीय बचाव प्रणाली-

1. समत्व-2.48: समानता का भाव विकसित करने से आलाचनाएं विचलित नहीं कर सकेंगी। ‘‘सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ’’ को समझना और कहना सरल है किंतु आचरण में ढालना असंभव नहीं, किंतु कठिन अवश्य है। यदि सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समानता के स्तर पर स्वीकार कर सकें; तो लोगों के कहने से कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। जीवन रूपी महाभारत में उतरने में झिझक नहीं होगी।

2. अनासक्ति-2.47: ‘मा फलेषु कदाचन’ फल पर कोई अधिकार नहीं। लोगों की राय भी उसी प्रकार है। उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं, कोई अधिकार नहीं। उस पर व्यर्थ ही अपना समय और ऊर्जा नहीं लगानी। अपने कर्म पर फोकस करना है। लोग परिणाम पर टिप्पणी करते हैं। हमारा परिणाम पर कोई अधिकार नही ंतो उस पर की गई टिप्पणियों पर भी नहीं। हमें प्रक्रिया पर फोकस करना है। अपना शत-प्रतिशत प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक पूर्ण करने में लगाना है। परिणाम का आकलन दूसरों को करने दीजिए।

3. स्थितप्रज्ञ-2.55: ‘प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्’ मन की कामनाओं को त्याग कर स्थिर हो सकते हैं। जब तक लोग मुझे अच्छा समझें की चाह है, मैं गुलाम हूँ। दूसरों की नजर से अपने कार्यो का मूल्यांकन स्वीकार करना ही दास-मानसिकता है। इस चाह का त्याग करते ही मैं आजाद हूँ। लोग क्या कहेंगे? इससे फर्क नहीं पड़ेगा। हमारी प्रज्ञा स्थिति को स्वीकार कर ले, यही स्थिति प्रज्ञता है।

4. स्वधर्म- 3.35: ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’ अपना धर्म करते हुए मृत्यु भी उचित है, दूसरों के धर्म में स्वर्ग भी भयंकर ही है। कर्म ही धर्म है। अपने कर्म पर फोकस करना ही श्रेयस्कर है। दूसरों के कहने से अपने कर्म को नहीं छोड़ना है और न ही ढील देनी है। चिकित्सक का धर्म मरीज की चिकित्सा करना है। लोग कहेंगे, ‘पैसे कमा रहा है, कहने दो सेवा के साथ आजीविका भी आवश्यक है। आजीविका की व्यवस्था के बिना कोई भी व्यक्ति सेवा नहीं कर सकता। सेवा के लिए सर्वप्रथम अपने अस्तित्व को बचाकर रखना और अपने मन-शरीर को उल्लासपूर्वक कार्यरत रहने में समर्थ बनाकर रखना पहली आवश्यकता है। यह हमारा स्वधर्म है। 

स्टाइक का द्विभाजन नियंत्रण सिद्धांत- 

लोग क्या कहेंगे? के तनाव से बचने के लिए स्टोइक का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन करता है। स्टोइक्स मानते हैं कि जीवन में दो प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं- 1. जो हमारे नियंत्रण में हैं, जैसे- हमारे विचार, हमारे कर्म और हमारी प्रतिक्रियाएं आदि हम अपने आप पर नियंत्रण कर सकते हैं। और 2. जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, जैसे- दूसरों के विचार, दूसरों के कर्म और दूसरों की प्रतिक्रियाएं। हमारे तनाव के दो मुख्य कारण हैं- नियंत्रणीय परिस्थितियों को नियंत्रित न कर, दूसरों के लिए छोड़ देना और अपनी जिम्मेदारी से भागना तथा अनियंत्रणीय परिस्थितियों पर नियंत्रण करने के प्रयास करते हुए अनावश्यक चिंता व तनाव उत्पन्न कर अपने जीवन को नर्क बनाने के प्रयास में लगे रहना।

स्टोइक तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए तीन नियम बताते हैं- 1. नियंत्रण का नियम, 2. प्रकृति के अनुरूप जीवन 3. उदासीनता नहीं, उल्लासपूर्ण शांति।

जो हमारे नियंत्रण में है, उसे नियंत्रित करें; जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उस पर अपनी ऊर्जा व्यय नहीं करनी है। प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए तर्क और समझदारी के साथ अपने स्वभाव में विकास के पथ पर सच्चाई के साथ जीवन आनंदपूर्वक जीना है। स्टोइक भावनाओं को समाप्त कर उदासीन होने को नहीं कहते, बल्कि अशांत करने वाली घटनाओं, जैसे-दूसरों की अनावश्यक आलोचनाओं, टिप्पणियों व प्रतिक्रियाओं, सुख और दुख के अतिरेक से विचलित हुए बिना कर्मयोग के आधार पर हर क्षण कर्म में व्यस्त रहने को श्रेयस्कर मानते हैं।

सार्त्र का प्रामाणिक चुनाव:

सार्त्र लोगों के कुछ भी कहने को अप्रामाणिक मानते हैं। सार्त्रके अनुसार दूसरे लोग हमारे लिए नर्क है। जब हम अपने आपको दूसरों की नजरों से देखते हैं। अपने लिए नर्क बना रहे होते हैं। इसका समाधान है- रेडिकल फ्रीडम। स्वयं का आकलन दूसरों की नजरों से मत करो। अपना जीवन स्वयं गढ़ो। अपना सार स्वयं गढ़ो। 100 लोग अच्छा कहें या 100 लोग बुरा कहें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम जैसे हो वैसे ही हो।

एलन मस्क पर रोज मीम बनते हैं। वह नहीं देखता। वह राॅकेट बनाता है। लोग बोलते रहें, वह राॅकेट बनाता रहे। यही प्रामाणिकता है। जिनमें मीम बनाने की योग्यता और सक्षमता है, वे राॅकेट नहीं बना सकते। जो राॅकेट बना सकते हैं, मीम बनने या न बनने से प्रभावित नहीं होते।

लोग तो कुछ भी कहेंगे,

कहने दो लोगों का क्या?

कर्म पथ बढ़ते हैं हम,

चिढ़ने दो, चिढ़ने का क्या?

कर्मयोगी अपने कर्मपथ पर अडिग रहता है। अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर बनना है किसी को हराने के लिए नहीं, अपने आपको श्रेष्ठ बनाने के लिए; अपने आपको सिद्ध करने के लिए नहीं। श्रेष्ठ धनुर्धर बनने के लिए केवल निशाने को ही देखना है, उसके आसपास क्या है? लोग क्या बोलते हैं? यह मायने नहीं रखता। प्रेम पूवर्क अनासक्त रहकर निशाना लगाना है। निशाने पर नजर धनुष पर हस्तकौशल और कुछ मायने नहीं रखता। कौन क्या बोलता है? उसको सुनने के लिए यौद्धा के पास समय नहीं है।

@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण

 श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष

स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण

                                           © डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

भारत में स्वामी विवेकानंद सर्व स्वीकृत व समादृत देशभक्त संन्यासी हैं। उनका काल भले ही बीसवीं शताब्दी रहा हो, उनका प्रभाव व प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है। स्वामी विवेकानंद के विचार रूप कार्य भविष्योन्मुखी हैं। स्वामी जी शताब्दियों तक हमें न केवल अभिप्रेरित करते रहेंगे, वरन हमारे काम व जीवन को अपने आदर्शों पर चलने को मजबूर करते हुए विश्व को विकास पथ पर अग्रसर करते रहेंगे।

     कोई भी महान से महान व्यक्ति महानता के साथ पैदा नहीं होता वरन एक अबोध शिशु के रूप में ही जन्म लेता है। यह अलग बात है कि वह अपनी अबोधता को सुरक्षित रखते हुए संसार को महानता के पथ पर अग्रसर करते हुए, कब महानता को प्राप्त कर लिया, यह उसको स्वयं भी पता नहीं चलता। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। स्वामी जी ने भारत में जन्म लिया, भारतीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए अपना विकास किया। भारत के लिए चिंतन किया, भारत के लिए आजीवन कार्यरत रहे, भारत के लिए अपने संन्यासत्व को भी समर्पित कर दिया। महापुरुषों की तुलना नहीं की जा सकती, किन्तु स्वामी जी जैसा व्यक्तित्व केवल स्वामी जी का ही हो सकता है।

      स्वामी विवेकानंद ने भारत के दो महापुरुषों को अपना आदर्श माना था — त्याग और वैराग्य के प्रतीक भगवान बुद्ध और कर्म तथा ज्ञान के समन्वय के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण। यदि बुद्ध उनके हृदय में करुणा के प्रतीक थे, तो कृष्ण उनके मस्तिष्क में ब्रह्मांड की समग्रता के प्रतीक थे। विवेकानंद के लिए कृष्ण कोई पौराणिक कथा-पुरुष नहीं, बल्कि भारत के इतिहास में सबसे पूर्ण मानव — 'A Perfect Man' थे।

1. पूर्णावतार की अवधारणा

श्री कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। इस सन्दर्भ में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, "राम में त्याग है, पर कृष्ण में त्याग और भोग दोनों का विलक्षण समन्वय है।" (स्वामी विवेकानंद, कोलंबो से अल्मोड़ा व्याख्यान) राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे एक आदर्श राजा, आदर्श पुत्र हैं। पर कृष्ण में मर्यादा के साथ लीला भी है। वे बालक के रूप में चंचल हैं, सखा के रूप में नटखट हैं, प्रेमी के रूप में मधुर हैं, योद्धा के रूप में कठोर हैं और योगी के रूप में स्थितप्रज्ञ हैं।

स्वामीजी की दृष्टि में कृष्ण ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मानव जीवन की समग्रता को स्वीकार किया। उन्होंने जीवन से पलायन नहीं सिखाया। उन्होंने सिखाया — संसार में रहो, पर संसार को अपने में मत रहने दो।

इसीलिए विवेकानंद उन्हें "The Most Comprehensive Character" कहते हैं।

2. गीता के कृष्ण — कर्मयोग के प्रणेता

विवेकानंद के वेदांत का हृदय भगवद् गीता है, और गीता का हृदय कृष्ण हैं। विवेकानंद के अनुसार, श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के जटिल ब्रह्म-ज्ञान को कुरुक्षेत्र के रणांगण में खींचकर व्यावहारिक बना दिया। अर्जुन विषाद का प्रतीक है — वह आधुनिक मनुष्य है जो कर्तव्य और मोह के बीच उलझा है। कृष्ण उससे यह नहीं कहते कि संन्यास ले लो, हिमालय चले जाओ। वे कहते हैं —

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"

विवेकानंद इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यह श्लोक भारत की आलस्य-प्रवृत्ति के विरुद्ध सबसे बड़ी औषधि है। हमारे देश ने संन्यास को ही धर्म मान लिया, कर्म को तुच्छ समझा। कृष्ण ने कहा — युद्ध करो, कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। यही कर्मयोग है। आज भी हर भारतीय को इसे समझने, आत्मसात करने और जीने की आवश्यकता है।

विवेकानंद का पूरा "दरिद्रनारायण" और "मानव सेवा" का सिद्धांत इसी पर टिका है — अपना काम ईश्वर को अर्पण कर देना, यही पूजा है। स्वामी विवेकानन्द मूर्ति पूजा को निकृष्टम कोटि की भक्ति मानते हैं। वे कर्मशील बनने का आह्वान करते हैं।

3. प्रेम के कृष्ण — भक्ति के आचार्य

सामान्यतः हम कृष्ण को मुरली वाले प्रेमी के रूप में देखते हैं। विवेकानंद भी कृष्ण के प्रेम-तत्व के अनन्य भक्त थे। उनका कहना था कि वृंदावन की गोपियों का प्रेम सर्वोच्च भक्ति है — मधुर भाव।

इस प्रेम में कोई सौदा नहीं, कोई स्वर्ग की कामना नहीं। गोपियाँ कृष्ण से प्रेम करती हैं क्योंकि वे कृष्ण हैं, न कि वे कुछ देंगे इसलिए। विवेकानंद कहते हैं, "जब तक मनुष्य में ऐसा निःस्वार्थ प्रेम नहीं आता, तब तक भक्ति शुरू नहीं होती।"

पर विवेकानंद इस प्रेम को केवल रासलीला तक सीमित नहीं रखते। वे कहते हैं, यही प्रेम जब व्यापक हो जाता है तो वही विश्व-प्रेम बन जाता है। गोपियों ने कृष्ण में सब देखा, ज्ञानी को यही सब में कृष्ण देखना है। यही भक्ति से ज्ञान की ओर जाना है।

4. बुद्धिवादी कृष्ण — अनंत ज्ञान के प्रतीक

विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल भावुक प्रेमी नहीं, वे अद्वितीय राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ और ज्ञानी भी हैं। महाभारत में कृष्ण की भूमिका देखिए — वे बिना शस्त्र उठाए पूरी लड़ाई का संचालन करते हैं।

स्वामीजी युवाओं से कहते थे, "गीता पढ़ो, पर कृष्ण की बुद्धि को भी पढ़ो। कृष्ण ने कभी अन्याय से समझौता नहीं किया। वे शांतिदूत बनकर भी गए, पर जब अन्याय हठी हो गया तो युद्ध को ही धर्म कहा।" यह कृष्ण का धर्मो रक्षति रक्षितः का सिद्धांत है। विवेकानंद इसे आज के भारत के लिए प्रासंगिक मानते थे। उनका मानना था कि कमजोर बनकर अहिंसा का पालन करना कायरता है। पहले शक्तिशाली बनो, फिर क्षमा करो — यही कृष्ण नीति है।

5. आज के युग में कृष्ण की प्रासंगिकता

विवेकानंद पूछते हैं — आज भारत को किस कृष्ण की जरूरत है?

हमें उस मुरली वाले कृष्ण की नहीं, जो केवल वृंदावन में रास रचाए, बल्कि उस चक्रधारी कृष्ण की जरूरत है जो धर्म की स्थापना के लिए चक्र उठा सके। वे कहते थे, "यदि मैं गीता का कृष्ण बन सका होता, तो मैं केवल बांसुरी नहीं बजाता, मैं शंख भी बजाता। आज युवाओं को बांसुरी की मधुरता के साथ शंख की हुंकार की भी आवश्यकता है।"

विवेकानंद के अनुसार, श्रीकृष्ण का जीवन हमें तीन बातें सिखाता है जो आधुनिक भारत के लिए मंत्र हैं:

1.  चरित्र में समन्वय: बुद्धि में शंकर, हृदय में बुद्ध और कर्म में कृष्ण बनो।

2.  कर्तव्य में दृढ़ता: अपने स्वधर्म से पीछे मत हटो, चाहे कितना भी विषाद हो।

3.  प्रेम में व्यापकता: प्रेम केवल एक व्यक्ति से नहीं, पूरे विश्व से करो। कृष्ण से प्रेम करो तो हर प्राणी में कृष्ण देखो।

अंत में स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ही कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण के जीवन में हमें वैराग्य का चरम, ज्ञान का चरम, प्रेम का चरम और कर्म का चरम एक साथ मिलता है।" राम ने हमें सिखाया कैसे जीना चाहिए, कृष्ण ने सिखाया जीवन को कैसे जीतना चाहिए। बुद्ध ने हमें सिखाया त्याग क्या है, कृष्ण ने सिखाया त्याग के साथ जीवन का आनंद कैसे लेना है। इसीलिए विवेकानंद के लिए कृष्ण केवल एक अवतार नहीं, एक संपूर्ण जीवन-दर्शन हैं — जो संन्यासी को भी राह दिखाता है और गृहस्थ को भी, जो प्रेमी को भी तृप्त करता है और योद्धा को भी प्रेरणा देता है। यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा।

"यदि भारत को फिर से उठना है, तो उसे कृष्ण के इस समग्र रूप को अपनाना होगा — जहाँ मुरली के माधुर्य के साथ चक्र की निर्भयता भी हो।"

@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,

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