किसी फिल्म के आनंद बक्शी जी के गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
छोड़ो बेकार की बातें, कहीं बीत न जाए रैना।
सफलता के पथिक के लिए ये पंक्तियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें एक सच्चाई कही गई है। बिल्कुल सही बात! लोगों का काम ही बोलना है। यदि हम सही रास्ते पर हैं तो दुनिया की परवाह क्यों करनी? लोग क्या कहेंगे, से मुक्त होकर अपने कर्म पथ पर चलते हुए अपनी योजना पर काम कर निरंतर सफलता प्राप्त करते रहना चाहिए।
हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि हमारे लिए हमारी सफलता महत्वपूर्ण है और हमारी सफलता है-‘हमारी खुशी, प्रसन्नता या आनंद।’। लोग हमेशा ही आलोचना करेंगे या बिन माँगी सलाह देंगे, किंतु आपके सुख-दुख में आपके साथ खड़े नहीं होंगे। आप कुछ भी करें, लोगों को बात बनानी ही हैं। इसलिए लोगों की बातों के चक्कर में समय बर्बाद करने की अपेक्षा अपने लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित करें।
प्राचीन ग्रीस और रोम का एक व्यावहारिक दर्शन स्टोइकवाद है। यह दर्शन स्पष्ट करता है कि हम बाहरी परिस्थितियों और घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते किंतु हम उन पर अपने द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। स्टोइकवाद का मुख्य लक्ष्य मानसिक शान्ति और आतंरिक संतुलन की स्थिति प्राप्त करना है।
गीता, स्टोइकवाद और सात्र्र
गीता, स्टोइक्स और सार्त्रतीनों का ही सार है। लोग कुछ भी कहेंगे। उनका काम ही यह है कि वे कुछ न कुछ बोलें। गीता में तो कर्म पर ही जोर दिया गया है। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो। अपने कर्म पर फोकस करो। स्टाइक्स परिस्थितियो को दो प्रकार की बताते हैं- 1. नियंत्रणीय और 2. अयिंत्रणीय।
हम अपने कर्म पर नियंत्रण रखते हैं। हमारा कर्म करने पर ही अधिकार है। लोगों के कहने पर नहीं। लोग तो बोलेंगे, हमेशा बोलेंगे। हम सफलता का जश्न मनाएं तो हमें घमण्डी घोषित कर दिया जाएगा। असफल हो जाएं तो नाकारा, लापरवाह और भी न जाने क्या-क्या घोषित कर दिया जाएगा। यदि हम चुप रह जाएं तो हमें डरपोक घोषित कर दिया जाता है। यदि बोले तो अति-आत्मविश्वासी घोषित किया जा सकता है। सार्त्रभी दूसरे लोगों को नर्क कहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि हमारा लोगों की प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण नहीं है। हमें क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है? पर नियंत्रित करना है। हाँ! हम अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण रख सकते हैं।
गीता, स्टोइकवाद और सार्त्रका सार एक ही पंक्ति में है- ‘लोग कुछ भी कहेंगे, लोगों का काम है कहना, लेकिन तुम यह निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हो क्या सुनना है और क्या नहीं सुनना है?’ समस्या लोगों के कहने में नहीं है, तुम्हारे सुनने के तरीके में है। समाधान भी सुनने या न सुनने के विवेकपूर्ण निर्णय में ही है।
लोग कुछ भी क्यों कहते हैं?
1. अपने दर्पण में अपने आपको प्रतिबिंबित करते हैं। जो स्वयं नहीं कर सके, दूसरा करता है तो जलन होती है। गीता में इसे मात्सर्य कहा है।
2. अपने मन का भय- जब वे हमारे बदलाव को देखते हैं तो स्वीकार नहीं कर पाते; उससे उनकी सामान्य धारणा को ठेस पहुँचती है। लोग किसी को आगे बढ़ते हुए देखना स्वीकार नहीं कर पाते। अतः आलोचनाएं करके अपने आप को संतुष्ट करने के प्रयत्न करते हैं।
3. टाइमपास के लिए अपना मनोरंजन करते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। उनके पास करने को कुछ है ही नहीं। तुम्हारे जीवन को लेकर ही अपना मनोरंजन करते हैं। स्वयं को दूसरों की टिप्पणियों से बचाने के प्रयास और दूसरों के जीवन पर चटखारे लेना सामान्य जन का स्वभाव है।
घोड़े व दो सवारों की लोक कथा-
पुराने समय की बात है। एक व्यक्ति अपने किशोर पुत्र के साथ एक कम आयु के घोड़े को लेकर यात्रा कर रहा था। घोड़ा आयु व आकार के कारण अधिक मजबूत नहीं था। तत्कालीन धारणा के अनुसार उस पर एक ही व्यक्ति द्वारा सवारी की जा सकती थी। पिता और पुत्र दोनों का घोड़े पर बैठना, घोड़े को थका सकता था।
वह समय संस्कार, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की समृद्धि का काल था। पुत्र पिता के लिए सेवा भाव रखता था, तो पिता भी पुत्र के लिए अपने कर्तव्यों को भली-भाँति समझता था। पिता के विचार में घोड़ा अधिक शक्तिशाली नहीं था। उस पर पिता और पुत्र दोनों एक साथ सवारी नहीं कर सकते थे। पिता की दृष्टि से पुत्र छोटा था। उससे पैदल यात्रा करवा कर उसे थकाना उचित नहीं था। अतः उसने अपने बेटे से कहा, ‘पुत्र! घोड़े पर एक ही व्यक्ति सवारी कर सकता है। मैं तो पैदल यात्रा करने का आदी हूँ। मुझे बहुत अभ्यास है। तुम अभी छोटे हो। तुम्हारी पहली यात्रा है। अतः तुम घोड़े पर बैठ जाओ।
पुत्र को यह स्वीकार नहीं था। वह पितृभक्त किशोर था। उसने कहा, ‘ये कैसी बात कर रहे हैं पिताजी। अब मैं छोटा नहीं रहा। अब मैं कमजोर भी नहीं हूँ। बाहरी यात्रा पर भले ही पहली बार निकला हूँ। स्थानीय स्तर पर पैदल चला ही करता था। बुजुर्ग पिता पैदल चलें, और जवान पुत्र घोड़े पर चले। ऐसा अधर्म मैं नहीं कर सकता। आप घोड़े पर बैठे। मैं पैदल चलकर आपके साथ-साथ यात्रा करूँगा।’ काफी देर तक पिता-पुत्र में एक-दूसरे को मनाने के प्रयास चलते रहे। अन्त में पिता को पुत्र का आग्रह मानना ही पड़ा।
पिता घोड़े पर सवार हो गया। पुत्र पैदल-पैदल घोड़े को पकड़ कर चल रहा था। दो-चार कोस के बाद एक गाँव आया। जब वे दोनों एक गाँव के मध्य से गुजर रहे थे, तब गाँव में एक चबूतरे पर कुछ लोग बैठे थे। उन्होंने उन दोनों को देखकर उनकी मजाक उड़ाते हुए टिप्पणी की, ‘देखो भाई! इस आदमी को, कितना निर्दयी है! बच्चे को पैदल चला रहा है और खुद घोड़े पर बैठकर मजे से जा रहा है’। उन लोगों की टिप्पणियों ने पिता को दुखी कर दिया।
पिता ने बेटे से कहा, ‘बेटा! मैंने पहले ही कहा था कि तुम छोटे हो अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? तुम पैदल चलने लायक नहीं हो। लोग ठीक ही कह रहे हैं। बच्चा पैदल चले और बड़ा घोड़े पर चले। यह किसी भी तरह उचित नहीं है। अतः तुम घोडे़ पर सवार होकर चलो।
बेटे को यह उचित तो नहीं लग रहा था। उसकी पितृभक्ति उसे इसके लिए अनुमति नहीं दे रही थी। उसका धर्म इसे अनुचित बता रहा था। फिर भी लोगों की बातों के कारण उसे पिता की बात माननी पड़ी। वह घोड़े पर बैठ गया और पिता पैदल चलने लगा।
वे लोग कुछ ही दूर गए होंगे। उन्हें एक गाँव और दिखाई दिया। रास्ता उस गाँव के बीच में से ही था। जब वे गाँव से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक चैपाल पर आठ-दस लोग बैठे हैं। उन सभी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन दोनों ने उनका अभिवादन करते हुए राम-राम कहा। उनमें से एक-दो ने उनके राम-राम का प्रत्युत्तर दिया। तभी उनमें से कुछ लोग बोलने लगे, ‘देखो भाई! घोर कलयुग आ गया है। जवान लड़का घोड़े पर बैठा है और बूढ़े बाप को पैदल चला रहा है। यही देखने को बाकी रह गया था।’
बेटा पहले से ही ग्लानि में था। वह अपने पिता को ही घोड़े पर बिठा कर ले जाना चाहता था। लोगों की टिप्पणियाँ सुनकर वह शर्म से पानी-पानी हो गया। गाँव से बाहर निकल कर वह घोड़े से उतर पड़ा और बोला, ‘पिताजी मैं पहले ही कह रहा था कि ऐसा बिल्कुल उचित नहीं है। मैं जवान हूँ। मैं पैदल चलूँगा आप घोड़े पर बैठकर चले। यही मेरे पुत्र धर्म के लिए भी उचित है।’
पिता-पुत्र में काफी देर तक इस विषय पर विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान यात्रा रूकी रहने के कारण उनका समय भी बर्बाद हो रहा था। अन्त में पिता ने निर्णय किया, ‘ऐसा करते हैं कि दोनों ही घोड़े पर बैठकर चलते हैं। घोड़े को थोड़ी मुष्किल होगी किन्तु दोनों का भार उठा लेगा। इस प्रकार लोग भी कुछ नहीं कहेंगे।’
पितृभक्त पुत्र को पिता के आज्ञा का पालन करना ही था। दोनों घोड़े पर बैठकर चलने लगे। घोड़ा थोड़ा छोटा व कमजोर था। उसे दोनो के वजन को लेकर चलने में कठिनाई हो रही थी। इस कारण धीरे-धीरे चल रहा था। अगले गाँव में लोगों ने मुँह बनाते हुए कहा, ‘देखो भाई! कितने निर्दयी लोग हैं! छोटे से घोड़े पर दो-दो लोग चढ़ रहे हैं। बेजुबान प्राणी की कोई चिंता ही नहीं है। ऐसे लोगों को तो राजा के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए। कितने अधर्मी हैं। अपने आराम से मतलब है। घोड़े की चिंता बिल्कुल नहीं है।’
दोनों पिता-पुत्र किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए कि वे करें तो करंे क्या? लोगों की बातों से परेशान होकर दोनों ही घोड़े की लगाम पकड़ पैदल चलने लगे।
थोड़ी दूर ही चले होंगे कि उन्हें अगला गाँव दिखाई दिया। वे अब निश्चिन्त थे कि कम से कम उन्हें अब कोई आलोचना सहन नहीं करनी पड़ेगी। वे भोले-भाले थे। उन्हें क्या पता था कि कुछ भी करो। कैसे भी रहो। लोगों का काम व्यर्थ की मीन-मेख निकालना ही है। वे गाँव से होकर गुजर ही रहे थे। तभी उनके कानों में आवाज आईं, ‘आओ भाई! आओ! इन बेवकूफों को देखो, पास में घोड़ा है फिर भी दोनों पैदल चल रहे हैं। दुनिया में मूर्खो की कोई कमी नहीं है।’
उनकी बातें सुनकर पिता-पुत्र दोनों ही अवाक रह गए। पिता घोड़े पर बैठे तो लोगों को समस्या है। पुत्र घोड़े पर बैठे तो लोग टिप्पणी करते हैं। दोनों घोड़े पर बैठें तो आलोचनाओं का शिकार बन रहे हैं। दोनों पैदल चलकर घोड़े को आराम दे रहे हैं, तब भी लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं।
आखिर करें तो करें क्या?
इसका एक ही उत्तर है-
लोग तो कुछ भी कहेंगे- इससे नहीं है डरना
हम हैं पथ के राही, हमको आगे बढ़ना
लोग क्या कहेंगे? इस क्या का उत्तर ही तनाव से बचने का सटीक उपाय है। लोगों के कुछ भी कहने से हम अपना जीवन गुलाम नहीं बना सकते। हम दास मानसिकता में क्यों जिएं? लोगों का क्या? जीवन हमारा है, आवश्यकताएं हमारी हैं, कर्म से प्रेम हमें है, कर्म हमें करने हैं, कर्मो के परिणाम का सामना हमें करना है। ऐसी स्थिति में लोगों के कहने की चिंता क्यों करें? लोगों को प्रत्येक स्थिति में हमारी आलोचना ही करनी है। हम अपने पथ के निर्णायक स्वयं बनें। पथ हमारा, पथिक हम हैं, पाथेय की व्यवस्था हमें करनी है, गंतव्य हमारा है तो चलने की गति, साधन और समय का निर्धारण भी हम ही करेंगे किसी अन्य को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देंगे। लोगों की नजरों का शिकार नहीं बनेंगे। किसी की भी टिप्पणियों से अपने कर्म को और अपने आपको प्रभावित नहीं होने देंगे।
गीता की चार चरणीय बचाव प्रणाली-
1. समत्व-2.48: समानता का भाव विकसित करने से आलाचनाएं विचलित नहीं कर सकेंगी। ‘‘सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ’’ को समझना और कहना सरल है किंतु आचरण में ढालना असंभव नहीं, किंतु कठिन अवश्य है। यदि सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समानता के स्तर पर स्वीकार कर सकें; तो लोगों के कहने से कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा। जीवन रूपी महाभारत में उतरने में झिझक नहीं होगी।
2. अनासक्ति-2.47: ‘मा फलेषु कदाचन’ फल पर कोई अधिकार नहीं। लोगों की राय भी उसी प्रकार है। उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं, कोई अधिकार नहीं। उस पर व्यर्थ ही अपना समय और ऊर्जा नहीं लगानी। अपने कर्म पर फोकस करना है। लोग परिणाम पर टिप्पणी करते हैं। हमारा परिणाम पर कोई अधिकार नही ंतो उस पर की गई टिप्पणियों पर भी नहीं। हमें प्रक्रिया पर फोकस करना है। अपना शत-प्रतिशत प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक पूर्ण करने में लगाना है। परिणाम का आकलन दूसरों को करने दीजिए।
3. स्थितप्रज्ञ-2.55: ‘प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्’ मन की कामनाओं को त्याग कर स्थिर हो सकते हैं। जब तक लोग मुझे अच्छा समझें की चाह है, मैं गुलाम हूँ। दूसरों की नजर से अपने कार्यो का मूल्यांकन स्वीकार करना ही दास-मानसिकता है। इस चाह का त्याग करते ही मैं आजाद हूँ। लोग क्या कहेंगे? इससे फर्क नहीं पड़ेगा। हमारी प्रज्ञा स्थिति को स्वीकार कर ले, यही स्थिति प्रज्ञता है।
4. स्वधर्म- 3.35: ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’ अपना धर्म करते हुए मृत्यु भी उचित है, दूसरों के धर्म में स्वर्ग भी भयंकर ही है। कर्म ही धर्म है। अपने कर्म पर फोकस करना ही श्रेयस्कर है। दूसरों के कहने से अपने कर्म को नहीं छोड़ना है और न ही ढील देनी है। चिकित्सक का धर्म मरीज की चिकित्सा करना है। लोग कहेंगे, ‘पैसे कमा रहा है, कहने दो सेवा के साथ आजीविका भी आवश्यक है। आजीविका की व्यवस्था के बिना कोई भी व्यक्ति सेवा नहीं कर सकता। सेवा के लिए सर्वप्रथम अपने अस्तित्व को बचाकर रखना और अपने मन-शरीर को उल्लासपूर्वक कार्यरत रहने में समर्थ बनाकर रखना पहली आवश्यकता है। यह हमारा स्वधर्म है।
स्टाइक का द्विभाजन नियंत्रण सिद्धांत-
लोग क्या कहेंगे? के तनाव से बचने के लिए स्टोइक का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन करता है। स्टोइक्स मानते हैं कि जीवन में दो प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं- 1. जो हमारे नियंत्रण में हैं, जैसे- हमारे विचार, हमारे कर्म और हमारी प्रतिक्रियाएं आदि हम अपने आप पर नियंत्रण कर सकते हैं। और 2. जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, जैसे- दूसरों के विचार, दूसरों के कर्म और दूसरों की प्रतिक्रियाएं। हमारे तनाव के दो मुख्य कारण हैं- नियंत्रणीय परिस्थितियों को नियंत्रित न कर, दूसरों के लिए छोड़ देना और अपनी जिम्मेदारी से भागना तथा अनियंत्रणीय परिस्थितियों पर नियंत्रण करने के प्रयास करते हुए अनावश्यक चिंता व तनाव उत्पन्न कर अपने जीवन को नर्क बनाने के प्रयास में लगे रहना।
स्टोइक तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए तीन नियम बताते हैं- 1. नियंत्रण का नियम, 2. प्रकृति के अनुरूप जीवन 3. उदासीनता नहीं, उल्लासपूर्ण शांति।
जो हमारे नियंत्रण में है, उसे नियंत्रित करें; जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उस पर अपनी ऊर्जा व्यय नहीं करनी है। प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए तर्क और समझदारी के साथ अपने स्वभाव में विकास के पथ पर सच्चाई के साथ जीवन आनंदपूर्वक जीना है। स्टोइक भावनाओं को समाप्त कर उदासीन होने को नहीं कहते, बल्कि अशांत करने वाली घटनाओं, जैसे-दूसरों की अनावश्यक आलोचनाओं, टिप्पणियों व प्रतिक्रियाओं, सुख और दुख के अतिरेक से विचलित हुए बिना कर्मयोग के आधार पर हर क्षण कर्म में व्यस्त रहने को श्रेयस्कर मानते हैं।
सार्त्र का प्रामाणिक चुनाव:
सार्त्र लोगों के कुछ भी कहने को अप्रामाणिक मानते हैं। सार्त्रके अनुसार दूसरे लोग हमारे लिए नर्क है। जब हम अपने आपको दूसरों की नजरों से देखते हैं। अपने लिए नर्क बना रहे होते हैं। इसका समाधान है- रेडिकल फ्रीडम। स्वयं का आकलन दूसरों की नजरों से मत करो। अपना जीवन स्वयं गढ़ो। अपना सार स्वयं गढ़ो। 100 लोग अच्छा कहें या 100 लोग बुरा कहें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम जैसे हो वैसे ही हो।
एलन मस्क पर रोज मीम बनते हैं। वह नहीं देखता। वह राॅकेट बनाता है। लोग बोलते रहें, वह राॅकेट बनाता रहे। यही प्रामाणिकता है। जिनमें मीम बनाने की योग्यता और सक्षमता है, वे राॅकेट नहीं बना सकते। जो राॅकेट बना सकते हैं, मीम बनने या न बनने से प्रभावित नहीं होते।
लोग तो कुछ भी कहेंगे,
कहने दो लोगों का क्या?
कर्म पथ बढ़ते हैं हम,
चिढ़ने दो, चिढ़ने का क्या?
कर्मयोगी अपने कर्मपथ पर अडिग रहता है। अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर बनना है किसी को हराने के लिए नहीं, अपने आपको श्रेष्ठ बनाने के लिए; अपने आपको सिद्ध करने के लिए नहीं। श्रेष्ठ धनुर्धर बनने के लिए केवल निशाने को ही देखना है, उसके आसपास क्या है? लोग क्या बोलते हैं? यह मायने नहीं रखता। प्रेम पूवर्क अनासक्त रहकर निशाना लगाना है। निशाने पर नजर धनुष पर हस्तकौशल और कुछ मायने नहीं रखता। कौन क्या बोलता है? उसको सुनने के लिए यौद्धा के पास समय नहीं है।
@ प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com,
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