शनिवार, 15 मार्च 2014

सफलता का राज

सफलता का राज


वर्तमान समय में सफलता की दरकार किसे नहीं है। सफलता की दौड़ में सभी भाग लेना चाहते हैं, यही नहीं सफलता को प्राप्त करने के लिए तड़पन बढ़ती ही जा रही है। सफलता के पीछे हम लोग जितनी दौड़ लगाते हैं, सफलता भी उतनी ही दूर चली जाती हुई प्रतीत होती है। हम दूसरों को सफल होते हुए देखते हैं, किन्तु बहुत कम लोग होते हैं; जो स्वयं सफलता की अनुभूति कर पाते हैं। अधिकाशः लोग सफलता की और ललचाई दृष्टि से देखते रहते हैं किन्तु सफलता है कि उनकी ओर ध्यान ही नहीं देती। सफलता के लिए जितने प्रयास करते हैं, सफलता उतनी ही दूर चलती जाती है। मर्ज बढता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की वाली कहावत सफलता के लिए पूरी तरह सटीक बैठती है। हम जैसे-जैसे सफलता के निकट बढ़ते हैं, हमारा सफलता का पैमाना भी आगे बढ़ता जाता है। कल तक हम जिसको सफलता मानते थे, आज हमें लगता है कि सफलता यह नहीं, सफलता तो अभी हमसे कोसों दूर है। सभी सफलता पाना चाहते हैं किन्तु बहुत कम लोग होते हैं, जो यह स्वीकार कर पाते हैं कि वे सफल हो रहे हैं। सफलता को तभी पाया जा सकता है, जबकि हम यह स्वीकार करें कि असफलता नाम की कोई चीज शब्दकोष के सिवाय कहीं मिलती ही नहीं! छोटी-छोटी सफलताओं को स्वीकार करके ही हम जीवन का आनन्द उठा सकते हैं। वास्तव में हम दिन-प्रतिदिन क्या हर पल-क्षण कुछ न कुछ करते ही रहते हैं और उन प्रयासों के परिणामस्वरूप हम दिन-प्रतिदिन ही नहीं क्षण-प्रतिक्षण उपलब्धियाँ भी हासिल करते हैं। वह छोटी-छोटी उपलब्धियाँ ही छोटी-छोटी सफलताएँ हैं।
जी, हाँ! व्यक्ति द्वारा किया गया प्रयास कभी भी असफल नहीं होता। प्रत्येक प्रयास जितने संसाधानों, तकनीक व प्रबंधन के साथ किया गया होगा, वह उतनी ही उपलब्धियाँ हासिल करता है। आपने सुना ही होगा, हथोड़े की सौवीं चोट से भले ही कार्य पूर्ण हुआ हो किन्तु उससे पहले की निन्यानवें चोट भी व्यर्थ नहीं होतीं। कार्य की पूर्णता भले ही सौवीं चोट के साथ प्राप्त हुई हो किन्तु पूर्व की निन्यानवें चोटों के बिना सौंवी चोट हो ही नहीं सकती थी और न ही कार्य को पूर्णता प्राप्त हो सकती थी। अतः किया गया प्रत्येक प्रयास अपने आप में पूर्ण होता है और कभी भी निष्फल नहीं जाता। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक चोट के पश्चात् हमें पता चलता है कि अभी और चोट मारने की आवश्यकता है। यही तो अनुभव है। अनुभव तो शिक्षा का अंग है। अनुभव के बिना व्यक्ति कभी वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अतः जिन प्रयासों से अनुभव की प्राप्ति हुई है। उन प्रयासों को असफल कैसे कहा जा सकता है? और असफल क्यों कहा जाना चाहिए? अनुभव के महत्व को भौतिक उपलब्धि से कमतर आंकना व्यक्ति व समाज किसी के लिए हितकर नहीं है। अतः यह बात अकाट्य है कि किसी भी नियोजित व पूर्ण मनोयोग से किए गये कार्य से असफलता नहीं मिलती, उससे या तो सफलता मिलती है या अनुभव। अनुभव भविष्य के लिए उपयोगी व मार्गदर्शक होता है।
स्पष्ट है कोई भी प्रयास कभी भी पूर्ण रूप से असफल नहीं होता। कार्य को पूर्णता भले ही उस प्रयास के साथ प्राप्त नहीं हो पाई हो किंतु वह प्रयास भावी प्रयासों के लिए मार्ग का निर्धारण अवश्य करता है। जिस प्रयासों को हम असफल कहते हैं। वास्तविक रूप में वे हमें अनुभव प्रदान करते हैं और बताते हैं कि हमारे प्रयासों में क्या कमी रह गई है? अनुभव हमें अपने प्रयासों का कार्य के सम्बन्ध में पुनरावलोकन करने का अवसर देता है। अनुभव से हमें मालुम होता है कि पुनः योजनाबद्ध ढंग से और भी अधिक प्रभावी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। जिन प्रयासों से हमें अनुभव जैसी मूल्यवान अमूर्त वस्तु प्राप्त हुई हो, उन प्रयासों को असफल कहना निःसन्देह उन प्रयासों व कर्ता का अपमान करना है। प्राप्त अनुभव सदैव महत्वपूर्ण होता है। प्रतिपुष्टि(feedback) संचार की ही नहीं, कार्य की पूर्णता के लिए भी आवश्यक होता है। किए गये प्रयासों के अनुभव केवल हमारे लिए ही नहीं, आगामी पीढ़ियों के लिए भी उपयोगी होते हैं; तभी तो महादेवी वर्मा ने अपनी कविता ‘जाग तुझको दूर जाना’ में युवक-युवतियों को ललकारते हुए कहा है-
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
×××××
पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
                      जाग तुझको दूर जाना!
 
महादेवी की इस कविता से भी यही ध्वनि निकलती है कि पतंगा भले ही अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर पाया हो किन्तु उसका जल जाना भी चिह्न छोड़ जाता है, उसकी राख भी दीपक की निशानी व भावी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करती है। यद्यपि कवयित्री ने यह कविता स्वतंत्रता के लिए दीर्घकालिक संघर्ष करने वालों के सन्दर्भ में लिखी है, तथापि यह प्रत्येक कार्य में लागू होती है। प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य निरंतर लगन व निष्ठा की अपेक्षा करता है। लक्ष्य के प्रति विश्वास ही निरंतरता के भाव को बनाये रख सकता है। निरंतर कार्यरत रहने के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन का विश्वास ‘‘खुश व्यक्ति अपने वर्तमान से इतना संतुष्ट होता है कि वह भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं सोच सकता।’’ अधिक उपयोगी हो सकता है। हमें अपने प्रयास की पूर्णता में ही सफलता के आनन्द की अनुभूति करनी चाहिए। यदि हम ऐसा कर सकें तो हमारा प्रत्येक प्रयास पूर्णता की सफलता ही लेकर आयेगा। अनुभव या उपलब्धि तो बोनस में मिलेगी।
समझने की बात यह है कि यदि हमने प्रयास किया है तो उसका परिणाम तो मिलेगा ही, हाँ, यह हो सकता है कि हमने प्रयासों की तुलना में आकांक्षाएँ अधिक पाल ली हों और प्रयास का परिणाम हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति न कर पाता हो। हमें प्रत्येक कदम पर तो उपलब्धियाँ हासिल नहीं होंगी। उपलब्धि अर्थात मंजिल के लिए कितने कदमों की आवश्यकता है। यह तो मंजिल पर पहुँच कर ही पता चलेगा या उसके अनुभव से पता चलेगा जो मंजिल पर पहुँचकर वापस आया हो। यदि हमारी मंजिल नई है तो हमें बार-बार प्रयास करके अनुभव प्राप्त करते हुए पहुँचने की आवश्यकता पड़ सकती है।
अतः सफलता को मापने से पूर्व अपने प्रयासों का आकलन करना आवश्यक होता है। हमारे द्वारा विनियोग किए गये संसाधनों का आकलन, हमारे द्वारा प्रयुक्त तकनीकी का आकलन व कार्य के लिए अपने ईमानदार प्रयासों का आकलन करके ही अपेक्षाओं का निर्धारण करेंगे तो हमें समझ आ सकेगा कि वास्तव में हमें असफलता नहीं, मूल्यवान अनुभवों के रूप में भी सफलता ही मिली है, जो हमें आगे बढ़ने के लिए अभिप्रेरणा का कार्य कर सकती है। सफलता जादू से नहीं, समर्पित व  सुप्रबंधित प्रयासों से मिलती है।


शुक्रवार, 7 मार्च 2014

सफलताः


सफलता शब्द का निमार्ण ‘स’ उपसर्ग और ‘ता’ प्रत्यय के ‘फल’ के साथ योग से हुआ है, जिसका अर्थ है- अपने प्रयासों का परिणाम प्राप्त करना अर्थात किए गये प्रयासों का परिणाम के रूप में फलीभूत होना। अभिधा शब्द-शक्ति के अनुसार सफल का अर्थ फल लगने से होता है किन्तु इसका अधिकांशतः लाक्षणिक अर्थ लिया जाता है। लाक्षणिक अर्थ में सफलता का अर्थ- ‘किसी कर्म का तदनुकूल परिणाम प्राप्त होने से है।’
इस प्रकार सफलता कर्म के पश्चात् आती है। सफलता से पूर्व कर्म की उपस्थिति आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को बिना कर्म किए कोई वस्तु अनायास प्राप्त हो जाती है तो उसे सफलता नहीं कहा जा सकता। वह व्यक्ति सफलता के आनन्द का अधिकारी भी नहीं है। यदि वह व्यक्ति अनायास प्राप्त होने वाली वस्तु को प्राप्त करने का जश्न मनाता है, तो वह मुफ्तखोर है। मुफ्तखोरी न तो व्यक्ति के विकास के लिए उपयोगी है और न समाज और राष्ट्र के विकास के लिए। जब कर्म ही नहीं किया गया तो सफलता किस बात की। पेड़ पर ही फल लगेगा, तभी वह सफल होगा। बिना बीज डाले, सिंचाई किए, पुष्पित-पल्लवित हुए फल प्राप्त नहीं हो सकता। प्राप्त होना भी नहीं चाहिए। कहने का आशय है अनायास कुछ प्राप्त हो जाना सफलता नहीं है। 
सफलता तो तब है, जब हमने कोई लक्ष्य निर्धारित किया हो, परिस्थितियों का अध्ययन किया हो, पूर्वानुमान लगाया हो, उसके लिए योजना बनाई हो, उसके लिए संसाधन जुटाये हों, उन संसाधनों का तकनीकी के साथ कुशलतापूर्वक प्रयोग किया हो। इस प्रकार मानवीय व भौतिक संसाधनों का प्रबंधन करने के साथ किए गये प्रयासों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाला संतुष्टिदायक परिणाम ही उस कार्य का फल है। कार्य का फल प्राप्त होना ही तो सफलता है। 

रविवार, 2 मार्च 2014

सफ़लता का राज

सफलता को जानें-स्वीकार करें


सफलता सर्वप्रिय शब्द है। सभी व्यक्ति सफल होना चाहते हैं। एक छोटा बच्चा भी अपने प्रयासों में सफलता पाकर फूला नहीं समाता। आप कभी बच्चों को खेलते हुए देखिए, खेल में सफल होकर बच्चे कितने आनन्द का अनुभव करते हैं। बच्चा अपने माँ-बाप या अपने अभिभावकों से कोई बात मनवाना चाहता हैं और उसके प्रयास के फलस्वरूप हम उसकी बात मान लेते हैं; अपने प्रयासों के सफल होने पर वह कितना खुश होता है। कभी अनुभूति करके तो देखिए।
         इसी प्रकार सफलता हमें भी अच्छी लगती हैं, किन्तु मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की। हम जैसे-जैसे बड़ें होते हैं, अपने प्रयासों में प्रबंधन को नजरअन्दाज करने लगते हैं। हम जैसे-जैसे बड़े होते हैं, यह भूल जाते हैं कि हम जो भी प्रयास सुप्रबन्धित ढंग से करते हैं वे उनका परिणाम सुफल लेकर आता है। हम सफलता की कामना करते हैं और शायद सफल होते भी हैं, किन्तु सफलता की अवधारणा को न समझने के कारण, सफलता का आनन्द नहीं ले पाते। हमें जीवन में प्रतिदिन सफलताएं मिलती हैं। आवश्यकता है उन्हें समझने और उनका यथोचित जश्न मनाने की।        
         सफलता को समझे बिना हम उसका आनन्द नहीं उठा सकते यह ठीक उसी प्रकार है कि औषधि आपके पास है किन्तु आप उसके महत्व व उपयोग को न जानने के कारण अस्वस्थ हैं; जैसे ही आपको पता चलता है कि अरे! यही तो औषधि है जिसके सेवन से आरोग्य प्राप्त कर में आनन्द का उपभोग कर सकता हूँ। आप आनन्द के हकदार हो जाते हैं अर्थात पहले से ही उपलब्ध संसाधनों से आप आनन्द का उपभोग करने लगते हैं। यही बात सफलता के आनन्द का उपभोग करने के लिए भी है। सफलता सुप्रबंधन के साथ किए गये आपके प्रयासों का एक अनिवार्य परिणाम होता है और सफलता आनन्द प्राप्त करने का संसाधन है। दूसरे शब्दों में हम कहें सफलता ही तो व्यक्ति को आनन्द की अनुभूति कराने का जादू है, आओ हम इस जादू का परिचय प्राप्त करें।



शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

‘ज्ञानवृद्धस्य वयः न समीक्ष्यते’

 वर्तमान प्रबंधन के युग में प्रबंधन का प्रयोग सभी क्षेत्रों में देखा जा रहा है। साहित्य के क्षेत्र में प्रबंधन सूत्रों का प्रयोग करके नए खिलाड़ी बेस्ट सेलर के खिताब से नवाजे जा रहे हैं। आविष्कारों के लिए नए-नए कम उम्र बच्चों के मॉडलों को देखा जा सकता है। बच्चे भी आजकल बहुत अच्छा कर रहे हैं और नई पीढ़ी के संचार माध्यमों के कारण वे समाज के सामने प्रस्तुत भी हो रहे हैं। सामाजिक प्रयासों के अन्तर्गत युवक-युवतियों के प्रयासों को सराहना मिल रही है। राजनीतिक क्षेत्र में जितनी लोकप्रियता युवा प्रयासों से अरविन्द केजरीवाल ने प्राप्त की है। वह राजनीतिक पण्डितों के लिए आश्चर्य का विषय है। वास्तव में विज्ञान का जीवन में प्रयोग ही तकनीक है और तकनीक और प्रबंधन वे जादू की छड़ी हैं,जिनका साथ-साथ प्रयोग करके कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है।
           प्रोद्यौगिकी और प्रबंधन के क्षेत्र में प्राचीन कहावत सटीक बैठती है- ‘ज्ञानवृद्धस्य वयः न समीक्ष्यते’ अर्थात ज्ञान के क्षेत्र में आयु के आधार पर सम्मान नहीं मिलता। यही सूत्र प्रबंधन व तकनीकी के क्षेत्र में भी लागू होता है। वास्तव में ज्ञान का वास्तविक जीवन में प्रबंधन के साथ प्रयोग ही तो नवीनतम् तकनीक है। प्रबंधन का जादू ही है, जो एक आन्दोलन एक अज्ञात व अपरिचित नौजवान को दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा देता है। कुछ कर गुजरने की ललक है, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी भी उन्हें बांध नहीं पाती और समाज के प्रति अपने सपनों को पूरा करने की खातिर कांग्रेस और भाजपा जैसी धुरंधर पार्टियों की रणनीति को धता बताते हुए कुर्सी को ठोकर मारकर फिर मैदान में आकर जनता को ललकारते हैं और स्वयं जनता को साथ लेकर उसके हित में काम करते हैं। 
          आप बता रही है कि हम अन्दर जाकर देख चुके हैं- हमाम में सब नंगे हैं। राजनीति के क्षेत्र में वास्तव में आप वह निष्कपट व निडर बच्चा है, ‘जो इंगित करके चिल्लाता है, अरे! राजा तो नंगा है।’


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

दैनिक जागरण सप्तरंग, कल्पतरू दिनांक 12 फरवरी 2014 से साभार


कर्तव्यनिष्ठ

एक व्यक्ति दुर्घटना में घायल अपने बच्चे को लेकर चिकित्सालय पहुँचा। जाँच के बाद चिकित्सक ने कहा कि ऑपरेशन होगा। शल्यक्रिया विशेषज्ञ चिकित्सक उस समय चिकित्सालय में उपलब्ध नहीं थे। उन्हें फोन किया गया। चिकित्सक जितना जल्दी आ सकते थे, आ गए फिर भी चिकित्सालय पहुँचने में उन्हें लगभग आधे घण्टे का समय लगा। घायल बच्चे का पिता भड़क उठा, ‘आपको अपना कर्तव्य नहीं पता। आप अस्पताल से गायब हैं, और जब बुलाया जाता है तो इतनी देर से आते हैं.......। चिकित्सक ने कहा- ‘मैं जितनी जल्दी आ सकता था, पहुँच गया......। चिकित्सक बात पूरी कर ही न पाये थे कि बच्चे का पिता बिफर उठा- ‘अगर आपके बच्चे के साथ दुर्घटना घटी होती, तब भी आप इतनी देर से आते?’
       चिकित्सक ने कहा, ‘मुझे बातों में मत उलझाइए, ‘इस समय तुरंत आपरेशन करना होगा। सर्जन आपरेशन करने चले गए। एक घण्टे तक बच्चे के पिता बैचेन रहा। वह संशय में था कि मैंने डाक्टर को जली-कटी सुना दी......डाक्टर वैसे ही लापरवाह है, कहीं..........? वह भगवान से प्रार्थना करने लगा। एक घण्टे बाद सर्जन ने बाहर आकर कहा, बधाई हो, ऑपरेशन सफल रहा............ मुझे जल्दी जाना है, मैं निकलता हूँ, आप नर्स से दवाइयाँ समझ लें...। पिता खुश था, लेकिन वह यह भी सोच रहा था कि डाक्टर तो बड़ा घमण्डी है, दो मिनट बात भी नहीं की । सच, उसे अपना कर्तव्य पता ही नहीं है। पिता नर्स के पास गया। नर्स ने बताया- डाक्टर साहब के बच्चे की मौत एक एक्सीडेण्ट में हो गई है। जब उन्हें फोन करके यहाँ बुलाया गया, तब वे उसकी अंत्येष्टि कर रहे थे। बच्चे का पिता स्तब्ध रह गया।

कथा मर्म- पूरी बात, परिस्थितियों को बिना जाने-बूझे किसी की कर्तव्यनिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं है। हाँ, कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति प्रश्नचिह्न लगाने पर भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता और अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है।

प्रबंधन सूत्र- कभी भी परिस्थितियों की पूरी जानकारी का विश्लेषण किए किसी व्यक्ति के कार्य पर अपना दृष्टिकोण न थोपें। दृष्टिकोण गलत हो सकता है, तथ्य नहीं। दूसरे व्यक्ति के कार्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना अपने कर्तव्य का निर्वाह करें।


रविवार, 9 फ़रवरी 2014

शिक्षा में प्रबन्धन-५

सभी के लिए गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक शिक्षा संस्थान पर्याप्त नहीं हैं। हमें व्यक्ति के जीवन के सभी कार्यस्थलों को विद्यालय के अन्तर्गत लाना होगा। शिक्षा प्रबंधन इस प्रकार से करना होगा कि शयन कक्ष, रसोईघर, भोजन कक्ष, रेलवे स्टेशन, दुकान, कार्यालय, उत्पादन स्थल, यात्री गृह, विश्राम स्थल आदि सभी स्थान सीखने के स्थल बन जायँ। शिक्षा का प्रबंधन करते समय पढ़ाने पर नहीं; सीखने पर बल दिए जाने की आवश्यकता है। शैक्षिक प्रबंधकों को समझने की आवश्यकता है कि सीखने का दर्शन ‘‘गवेषणा, अन्वेषण तथा निरन्तर प्रयास है’’ जिसका अर्थ कम खर्च और अधिक लाभ के सिद्धान्त पर चलकर व्यक्ति व समाज के हित में शैक्षिक व अन्य समस्याओं को सुलझाना है। यह कार्य करने के लिए इवान इलिच का स्कूल रहित समाज (डिस्कूलिंग) तथा फ्रीरे की संवाद शिक्षा व्यवस्था मार्गदर्शन का कार्य कर सकती है। इलिच के अनुसार शिक्षा-सन्दर्भ-खोज सेवा (रेफरेन्स सर्विस) का विस्तार आवश्यक है।
               उपरोक्त प्रस्तुतीकरण के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करनी है तो शिक्षा को दान की वस्तु से मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करना होगा। पढ़ाने की जगह सीखने के दर्शन की आवश्यकता है, शिक्षक को उपदेशक की जगह कुशल प्रबंधक बनने की आवश्यकता है। शिक्षक को गुरू गोविन्द की अवधारणा से बाहर निकलना होगा। शिक्षक को स्वयं के कर्तव्यों पर, अपने समर्पण पर भी विचार कर लेना चाहिए। सांख्यिकी का स्थापित तथ्य है- ‘‘परिमाणात्मकता व गुणात्मकता में नकारात्मक सहसम्बन्ध होता हैै।’’ अतः अधिक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की माँग के साथ गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर भी ध्यान दिया जाना अत्यन्त आवश्यक है। अन्यथा विद्यालय भ्रष्टाचारी व अपराधियों का ही निर्माण करेंगे और कड़े से कड़े कानून भी समाज को भ्रष्टाचार व अपराध से मुक्त नहीं कर सकेंगे।
               अधिक शिक्षण संस्थानों की स्थापना की अपेक्षा मानव आवास व कार्यस्थल को ही अधिगम स्थल(सीखने के स्थान) के रूप में परिणत करने की आवश्यकता है और इसके लिए शिक्षा में पर्याप्त संसाधनों का आबंटन, नवीनतम तकनीकी के प्रयोग, निरंतर प्रयास व कुशल प्रबंधन की आवश्यकता है। प्रबंधन की तकनीकों (नियोजन, संगठन, कर्मचारीकरण, निर्देशन व नियंत्रण) का शिक्षा में प्रयोग करना अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षकों व शैक्षिक प्रशासकों के लिए प्रबंधन की शिक्षा अनिवार्य किए जाने की आवश्यकता है। शिक्षा के व्यवसायीकरण की नहीं, व्यवसाय के शैक्षिकीकरण की आवश्यकता है। शिक्षा व व्यवसाय दोनों का प्रबंधन साथ-साथ किए जाने की आवश्यक है। शिक्षा के प्रबंधन का केन्द्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय सरकार का ही उत्तरदायित्व नहीं, उद्योग, समाज व प्रत्येक नागरिक का उत्तरदायित्व ही नहीं अधिकार भी है। 


सन्दर्भ सूची:-
1-http://hi.wikipedia.org/wiki/fo”o,
2.hi.wikipedia.org/wiki/Hkkjr     
3-http://www.thehindu.com/news/national/out-of-school-children-and-dropout-a-
4.http://www.census2011.co.in/census/state/jammu+and+kashmir.html
5. शिक्षा के नूतन आयाम, सम्पादक- डॉ.लक्ष्मीलाल के. ओड़/अनौपचारिक शिक्षा- राजेन्द्रपाल सिंह,
 द्वारकानाथ खोसला व नीरजा शुक्ला
6. Comparative Education,M.Ed., MES-055  Block 4, IGNOU
7.भारतीय संविधान के शैक्षिक व भाषिक अनुच्छेदों में हुए संशोधनों का समालोचनात्मक अध्ययन’
(शोध प्रबंध)-डॉ. संतोष कुमार गौड़
ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com
वेब ठिकाना www.rashtrapremi.com]www.rashtrapremi.in चलवार्ता 09996388169
जवाहर नवोदय विद्यालय, खुंगा-कोठी, जीन्द-126110 हरियाणा

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

शिक्षा में प्रबन्धन - ४

शिक्षा और जीवन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा जीवन के लिए ही तो दी जाती है। जीवन को टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, समग्रता के साथ जीना सीखना होगा। शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षार्थी को कार्य से दूर ले जाने की आवश्यकता नहीं पड़े, वरन् कार्य पर ही शिक्षा प्रदान की जाय। कार्य के द्वारा ही भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। मुफ्त भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा प्रदान करना न तो संभव है और न ही उचित। मुफ्त शिक्षा देने की अवधारणा किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। खैराती प्रवृत्ति व्यक्ति को मुफ्तखोर व निठल्ला बनाती है और ये प्रवृत्तियाँ व्यक्ति और समाज दोनों के विकास में बाधक हैं। इस मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति को विद्यार्थियों में ही नहीं शिक्षकों और शैक्षिक प्रशासकों में भी फर्लो (बिना अवकाश के कार्यस्थल से गायब रहना) के रूप में देखा जा सकता है। आत्मसम्मानहीन होने के कारण बेशर्मी से इसे अधिकार की तरह प्रयोग करने में अपना गौरव समझते हैं। अब आत्मसम्मानहीन अध्यापक व शैक्षिक प्रशासक किस प्रकार विद्यार्थियों का चरित्र गठन करने में समर्थ होंगे? यह विचारणीय विषय है। यहीं से भ्रष्टाचार का उद्भव होता है। अतः मुफ्तखोरी, खैराती प्रवृत्ति व निठल्लेपन पर नियंत्रण करना अत्यन्त आवश्यक है। नियंत्रण प्रबंध प्रक्रिया का अभिन्न भाग है।

             व्यक्ति व समाज दोनों ही स्तर पर स्वीकार करना होगा कि जिस प्रकार ईश्वर को धर्मस्थलों तक सीमित करके हम आडम्बरी और भ्रष्टाचारी बनते हैं; ठीक उसी प्रकार शिक्षा को शिक्षालयों तक सीमित करके हम न केवल शिक्षा को प्रमाण पत्रों तक सीमित करते हुए विकास व सीखने की प्रक्रिया को कुंठित करते हैं वरन् विद्यालयों को जीवनमूल्यों से दूर भी कर देते हैं। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘लर्निंग टू बी’ में लिखा है- ‘‘विद्यार्थियों के स्थान की व्यवस्था, समय विभाजन चक्र, अध्यापन योजना व साधनों के वितरण आदि सभी क्षेत्रों में गत्यात्मकता की तथा विद्यालयों में अधिक लचीलेपन की आवश्यकता है ताकि वे नई सामाजिक आवश्यकताओं और तकनीकी विकास के अनुरूप  ढल सकें।’’

क्रमशः ........................................................................................................................