रविवार, 2 फ़रवरी 2014

शिक्षा में प्रबन्धन - ४

शिक्षा और जीवन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा जीवन के लिए ही तो दी जाती है। जीवन को टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, समग्रता के साथ जीना सीखना होगा। शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षार्थी को कार्य से दूर ले जाने की आवश्यकता नहीं पड़े, वरन् कार्य पर ही शिक्षा प्रदान की जाय। कार्य के द्वारा ही भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। मुफ्त भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा प्रदान करना न तो संभव है और न ही उचित। मुफ्त शिक्षा देने की अवधारणा किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। खैराती प्रवृत्ति व्यक्ति को मुफ्तखोर व निठल्ला बनाती है और ये प्रवृत्तियाँ व्यक्ति और समाज दोनों के विकास में बाधक हैं। इस मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति को विद्यार्थियों में ही नहीं शिक्षकों और शैक्षिक प्रशासकों में भी फर्लो (बिना अवकाश के कार्यस्थल से गायब रहना) के रूप में देखा जा सकता है। आत्मसम्मानहीन होने के कारण बेशर्मी से इसे अधिकार की तरह प्रयोग करने में अपना गौरव समझते हैं। अब आत्मसम्मानहीन अध्यापक व शैक्षिक प्रशासक किस प्रकार विद्यार्थियों का चरित्र गठन करने में समर्थ होंगे? यह विचारणीय विषय है। यहीं से भ्रष्टाचार का उद्भव होता है। अतः मुफ्तखोरी, खैराती प्रवृत्ति व निठल्लेपन पर नियंत्रण करना अत्यन्त आवश्यक है। नियंत्रण प्रबंध प्रक्रिया का अभिन्न भाग है।

             व्यक्ति व समाज दोनों ही स्तर पर स्वीकार करना होगा कि जिस प्रकार ईश्वर को धर्मस्थलों तक सीमित करके हम आडम्बरी और भ्रष्टाचारी बनते हैं; ठीक उसी प्रकार शिक्षा को शिक्षालयों तक सीमित करके हम न केवल शिक्षा को प्रमाण पत्रों तक सीमित करते हुए विकास व सीखने की प्रक्रिया को कुंठित करते हैं वरन् विद्यालयों को जीवनमूल्यों से दूर भी कर देते हैं। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘लर्निंग टू बी’ में लिखा है- ‘‘विद्यार्थियों के स्थान की व्यवस्था, समय विभाजन चक्र, अध्यापन योजना व साधनों के वितरण आदि सभी क्षेत्रों में गत्यात्मकता की तथा विद्यालयों में अधिक लचीलेपन की आवश्यकता है ताकि वे नई सामाजिक आवश्यकताओं और तकनीकी विकास के अनुरूप  ढल सकें।’’

क्रमशः ........................................................................................................................

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