गुरुवार, 3 जुलाई 2014

सफलता की भूख ही अभिप्रेरित करती है!


मानव विकास के लिए अभिप्रेरणा एक आवश्यक तत्व है। मानव मशीन मात्र नहीं है कि जब उसे चला दिया जाय। काम करने लगेगी। मानव के पास काम करने की क्षमता व योग्यता के साथ-साथ ‘काम करने की इच्छा’ या मानसिक तत्परता होना भी आवश्यक है। इस मानसिक तत्परता को जाग्रत करने का काम करने वाली शक्ति ही अभिप्रेरक कही जाती है। मानव-शक्ति के व्यवहार को निर्देशित करने के लिए उसका सहयोग प्राप्त करने की कला व विज्ञान को ‘अभिप्रेरण’ कहते हैं। वास्तव में वह मानसिक शक्ति जो व्यक्तियों में स्वेच्छया काम करने की प्रवृत्ति को जाग्रत करती है। अभिप्रेरणा कही जाती है। अभिप्रेरण अन्तर्विषयक शब्द है। इसका प्रयोग प्रबंधन में किया जाता है किन्तु इसका मूल मनोविज्ञान में मिलता है। वस्तुतः अभिप्रेरण एक मनोवैज्ञानिक शक्ति है जो व्यक्तियों में कार्य करने की तत्परता जाग्रत करती है तथा उसे बनाये रखती है।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हर्जबर्ग ने पीट्सबर्ग में किए गये अनुसंधानों से मनुष्य की आवश्यकताओं को दो वर्गो में वर्गीकृत किया- स्वास्थ्य आवश्यकताएँ व अभिप्रेरक आवश्यकताएँ। हर्जबर्ग ने कार्य, उपलब्धियाँ, उत्तरदायित्व, मान्यता, उन्नति व विकास जैसे तत्वों को अभिप्रेरक तत्वों में गिनाया है। दूसरी ओर मास्लो ने आवश्यकता क्रमबद्धता के सिद्धांत के द्वारा यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि मानव आवश्यकताओं को क्रमबद्ध किया जा सकता है। ए.एच. मास्लो ने अपनी पुस्तक ‘^^A Theory of Human Motivation** में विभिन्न मानवीय आवश्यकताओं को क्रमबद्ध किया है-

1. जीवन-निर्वाह संबन्धी आवश्यकताएँ,


2. सुरक्षा संबन्धी आवश्यकताएँ,


3. सामाजिक आवश्यकताएँ,


4. स्वाभिमान संबन्धी आवश्यकताएँ, तथा


5. आत्मानुभूति की आवश्यकताएँ।


अभिप्रेरक शक्ति को लेकर विभिन्न प्रबंधशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न खोज की हैं, किन्तु यह एक अदृश्य शक्ति है जिसका निर्धारण करना बड़ा ही जटिल कार्य है। अभिप्रेरित करने के अनेक तरीके हो सकते हैं किन्तु सभी तरीकों का सूचीबद्ध करना संभव नहीं हो पाया है। हाँ, अभिप्रेरक क्या-क्या हो सकते हैं? इस पर काफी विचार-विमर्श हुआ है। मानव आवश्यकताएँ ही अभिप्रेरक का काम करती हैं। वास्तव में कुछ आवश्यकताएँ तो आधारभूत आवश्यकताएँ होती हैं, जैसे- भोजन, पानी, हवा, आराम आदि। इनके बिना जीवन संभव नहीं है। अतः ये मानव की इच्छा पर आधारित नहीं हैं, वरन् जीने के लिए इनकी पूर्ति करना मजबूरी है। इनकी पूर्ति के बाद अन्य आवश्यकताएँ, जिनमें सामाजिक स्वीकृति की आकांक्षा, स्वाभिमान व आत्मानुभूति की आकाक्षाएँ आती हैं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ कही जा सकती हैं। वास्वत में ये ही वे आवश्यकताएँ हैं जिनकी पूर्ति करने से मानव अभिप्रेरित होता है। ये ही अभिप्रेरक आवश्यकताएँ हैं। सफलता की भूख भी एक मानसिक अनुभूति होने के कारण एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। अतः एक शक्तिशाली अभिप्रेरक है।


बुधवार, 2 जुलाई 2014

पोस्ट का शतक

संतुष्टि और आलस्य में अन्तर


विकास के पथिक को तो संतुष्ट होकर बैठना ही नहीं है। इसका यह आशय यह भी नहीं है कि उसे संतुष्टि की अनुभूति ही नहीं करनी है। संतुष्टि की अनुभूति के बिना तो व्यक्ति जी ही नहीं पायेगा। हाँ! संतुष्टि की अनुभूति करके बैठना नहीं है। आलस्य करके बैठना नहीं है। संतुष्टि की अनुभूति तो काम करते हुए भी होती है किंतु आलस्य काम छोड़कर बैठ जाने को कहता है। अतः हमें संतुष्ठि व आलस्य के अंतर को समझकर संतुष्टि को अपने आचरण का अभिन्न अंग बनाना है तो आलस्य को अपने पास फटकने नहीं देना है। हमें अपने कार्यो के परिणामों से संतुष्टि ग्रहण कर पुनः अपने पथ पर आगे बढ़ना है। भूख एक बार में शांत होकर सदैव के लिए शांत नहीें हो जाती; ठीक उसी प्रकार सफलता की भूख भी प्रयासों के पणिामस्वरूप उपलब्धियाँ हासिल हो जाने के बाद सदैव के लिए शांत नहीं हो जाती। वह और भी तीव्रतर होकर जाग उठती है, और भी तीव्र गति से आगे बढ़ने की अभिप्रेरणा प्रदान करती है।
डॉ.एस.के.माहेश्वरी, उदयपुर के शब्दों में, ‘मित्रों! जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक अवसर मिलते हैं, पर कई लोग इन्हें बस अपने आलस्य के कारण गवाँ देते हैं। इसलिए यदि आप सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम, और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित कीजिये और जब कभी आपके मन में किसी आवश्यक काम को टालने का विचार आये तो स्वयं से एक प्रश्न कीजिए- ‘आज ही क्यों नहीं?’ मेरे विचार में इससे भी आगे बढ़कर हमें प्रश्न करना चाहिए- ‘अभी क्यों नहीं?’ हमें किसी भी संतुष्टि से आलस्य ग्रहण नहीं करना चाहिए वरन् उससे अभिप्रेरित होकर और भी अधिक स्फूर्ति से कर्मरत हो जाना चाहिए। तभी तो आप सफलता के पथ के सच्चे साधक बन सकोगे।
यहाँ हमें यह समझने की भी आवश्यकता है कि भूख और संतुष्टि सदैव विरोधाभासी नहीं होतीं, वरन् एक-दूसरे की सहयोगी होती हैं। यदि भूख है तो ही भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए कोई व्यक्ति काम करेगा और काम के परिणाम स्वरूप भूख के लिए भोजन प्राप्त कर संतुष्टि प्राप्त करेगा। यदि भूख ही नहीं है तो संतुष्टि भी नहीं मिलेगी। सफलता के आकांक्षी व्यक्ति के लिए तो यह नितांत आवश्यक है कि वह अपनी सफलता की भूख को निखारता रहे। यह भूख जितनी तेज होगी, वह उतनी ही अधिक अभिप्रेरक सिद्ध होगी।
         याद रखिए प्रत्येक सफलता प्रारंभ में कठिन जान पड़ती थी, उसे प्राप्त करने के प्रयास करने वाला सन्देह में रहता था कि वह इस काम को सफलता पूर्वक कर भी पायेगा या नहीं? किन्तु उसने अपने सन्देहवाद पर विजय पाई और आगे बढ़ा तभी तो सफलता ने आकर उसके कदमों में सिर झुकाया। गन्तव्य तक पहुँचने के लिए पहला कदम उठाकर ही प्रारंभ किया जा सकता है। यदि प्रारंभ नहीं करेंगे तो अन्त होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आप कटिबद्ध होकर आगे बढ़िये सफलता आपका स्वागत करने के लिए मुस्कराते चेहरे के साथ प्रतीक्षा कर रही है। समय नष्ट मत होने दीजिए। सफलता को अधिक इन्तजार करने की आदत नहीं है। यदि आप आलस करेंगे तो वह जो पहले पहुँचेगा, उसी का वरण कर लेगी। 


मंगलवार, 1 जुलाई 2014

स्वादिष्ट भोजन भूख की अभिवृद्धि करता है?


जी, हाँ! आपको भूख लगी हो और तभी सामने आपके 

मनोनुकूल स्वादिष्ट भोजन की थाली भी आ जाय तो 

आपकी भूख और भी 

तीव्रतर हो जाती है और मुँह में पानी आने लगता है। 

ठीक उसी प्रकार 

जैसे-जैसे आपके अपने प्रयासों से उपलब्धि मिलने लगती है। 

सफलता की भूख और भी अधिक तीव्र होकर 

हमें और भी अधिक 

प्रयास करने को अभिप्रेरित करने लगती है।

 विकास के पथिक को 

उसकी उपलब्धियाँ क्षणिक रूप से संतुष्टि तो देती हैं 

किंतु वह संतुष्टि 

और भी अधिक प्राप्त करने की आकांक्षा ही जाग्रत करती है।


रविवार, 29 जून 2014

भूख का आशयः असंतुष्टि नहीं


जी, हाँ! आपका ध्यान इस ओर खींचना चाहूँगा। जब हम भूख की बात करते हैं, खास कर सफलता की भूख की; तो हमें संतुष्ट रहने की सीख दी जाती है। जो मिले उसी में संतुष्ट रहने की सीख दी जाती है यहाँ तक कि मलूकदास तो यहाँ तक कह गए कि यदि उनकी बात मानी जाय तो मानव और मानव सभ्यता का नामोनिशान न रहे। मुझे नहीं मालुम उन्होंने यह किस सन्दर्भ में और कब लिखा:-
अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न काम।
दास मलूका कह गये,  सबके दाता राम।।
कबीरदास ने भी रूखी-सूखी खाकर ठण्डा पानी पीने व लालच न करने की सीख दी है। लालच पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से तो यह सीख ठीक है किन्तु कबीरदास जैसा जुझारू व्यक्तित्व हमें कभी भी अकर्मण्य बनने की सीख तो नहीं दे सकता। 
सन्दर्भ के बिना किसी की आलोचना करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। हाँ! यह अवश्य है कि विकास के पथिक के लिए मलूकदास का यह कथन किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। प्रसिद्ध गजलकार दुष्यंत कुमार ने ऐसे विचार को चुनौती देते हुए ठीक ही लिखा हैः
न हो  कम़ीज तो  पाँवों से  पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
निःसन्देह मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए सदैव संतुष्टि का यह विचार उपयोगी हो सकता है। लालची प्रवृत्ति का परिमार्जन करने के लिए यह विचार उपयोगी हो सकता है। गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा को लगाम देने के लिए यह विचार उपयोगी हो सकता है। हताशा में की जाने वाली आत्महत्याओं को रोकने के लिए भी इस विचार की उपयोगिता हो सकती है, किन्तु विकास के पथ के पथिक के लिए यह आत्मघाती ही होगा। व्यक्ति को विकास के चरम तक ले जाने की आकांक्षा के लिए यह वज्रपात होगा।
मानव समाज के विकास के लिए यह आवश्यक है कि वह सफलता की भूख से निरंतर प्रेरित होता रहे। सफलता की भूख ही नहीं होगी तो उसकी प्रयास करने की तत्परता, गति व कुशलता मंद पड़ जायेगी और वह वहाँ नहीं पहुँच पायेगा, जहाँ वह पहुँच सकता था। अतः सफलता की भूख को जगाये रखना और उसे तीव्रतर करते जाना आवश्यक है।


सफलता

मानव विकास के लिए आवश्यक सफलता की भूख


किसी भी कीमत पर सफलता प्राप्त करने की अंधी दौड़ न तो मानव के लिए श्रेयस्कर है और न समाज के लिए, किंतु उसके बाबजूद सफलता की भूख व सफलता के लिए ईमानदार प्रयास करने की तत्परता तो व्यक्ति व समाज के विकास के लिए जरूरी है। मानव समाज को सुन्दर व आनन्दप्रद बनाने के लिए हममें सफलता की भूख होना आवश्यक है। मानव समुदाय को विकास की और अग्रसर करने के लिए सफलता की भूख आवश्यक है। मानव कल्याण के लिए आपको सत्यं, शिवं व सुन्दरं की भूख और उपलब्धि होना आवश्यक है। इसके लिए बड़े-बड़े सपने देखना और उन सपनों को वास्तविक रूप प्रदान करने के लिए अपने सुविधापूर्ण सीमाओं से बाहर निकलकर कुछ जोखिम उठाकर नवाचार अपनाते हुए सफलता की खोज में आगे बढ़िये।


शनिवार, 28 जून 2014

सफलता की भूख


वर्तमान समय में सफलता की दरकार किसे नहीं है? कौन सफलता की भूख से पीड़ित नहीं है? सफलता की दौड़ में सभी भाग लेना चाहते हैं, यही नहीं सफलता को प्राप्त करने के लिए तड़पन बढ़ती ही जा रही है। अधिकांश लोग विशेष कर युवा सफलता के लिए कुछ भी करने को तत्पर दिखते हैं, किंतु सफलता कुछ भी करने वालों को प्राप्त नहीं होती। सफलता के लिए कुछ भी करने की तत्परता सफलता से दूर ले जा सकती है। सफलता के लिए तो सुप्रबंधित, अविरल व अनथक प्रयासों की आवश्यकता होती है। सफलता परिणाम में नहीं कार्य को श्रेष्ठतम् तरीके से पूर्ण करने में है। व्यक्ति सफलता के पीछे अंधी दौड़ लगाने को बेताब हैं। अधिकांश लोग सफलता के पीछे अंधी दौड़ लगा भी रहे हैं। सफलता की आकांक्षा में ही तो दल-बदल होते हैं, सफलता की आकांक्षा में ही बूथ कैप्चरिंग होती है, सफलता की आकांक्षा में ही तो षड़यंत्र पूर्वक विरोधियों को मौत के घाट उतरवा दिया जाता है, सफलता की आकांक्षा में ही तो फर्जी विश्वविद्यालय व फर्जी डिग्रियों की दुकानें खुली हुई है। सफलता की आकांक्षा में ही डिग्रियों को प्राप्त करने की होड़ लगी रहती है। सफलता की अंधी दौड़ के कारण ही तो शिक्षा में नित नये स्कैण्डलों का खुलासा होता है और व्यक्ति शिक्षा माफिया के चंगुल में फँसता चला जाता है। विद्यार्थी परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए ही तनाव के दौर से गुजरता है। तथाकथित सफलता के लिए ही तो हम अपने बच्चों के वर्तमान आनन्द को समाप्त करते हुए उन्हें निरन्तर प्रतिस्पर्धा में झौंक देते हैं।
सफलता की भूख प्रत्येक व्यक्ति को है और प्रत्येक व्यक्ति को होनी भी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति सफलता पाने का अधिकारी है। श्रीमद्भगवद्गीता (मर्म और संदेश-5) में दिए एक उद्धरण के अनुसार, ‘यदि आप सफलता के अलावा किसी और को विकल्प नहीं मानते हैं, तो सफलता जरूर मिलेगी।’ सफलता के प्रति यह निर्विकल्प आकांक्षा ही तो मानव को अभिप्रेरित करती है। यही वह शक्ति है जो उसे सक्रिय रखती है। व्यक्ति सफलता की भूख को शांत करने के लिए ही तो आकाश-पाताल एक कर देता है। सफलता की भूख ने ही तो मानव को चाँद और मंगल पर पहुँचाया है। सफलता की भूख ने ही पाषाण युग से तकनीकी के युग में पहुँचने में मदद की है। वास्तव में सफलता की भूख ही वह प्रेरक शक्ति है, जो प्रत्येक क्षेत्र में विकास का आधार बनती है। सफलता की भूख के बिना व्यक्ति वहाँ नहीं होता जहाँ आज है। सफलता की भूख ने ही मानव को वर्तमान स्तर पर पहुँचाया है। मानव की सफलता की यात्रा को जारी रखने के लिए सफलता की भूख को जगाये रखना व इसे तीव्रतर बनाये रखना आवश्यक है।

शुक्रवार, 27 जून 2014

छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद

मेरी छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद 

प्रकाशक महोदय ने हिन्दी निबन्ध की पुस्तक 

"आधुनिक सन्दर्भ में" २५ जून २०१४ को मुझे 

प्राप्त करा दी. 

प्रकाशक महोदय- 

अतुल गुप्ता, 

जाह्नवी प्रकाशन,  

ए-७१, विवेक विहार, फ़ेस-२, 

दिल्ली- ११००९५  

को 

बहुत-बहुत धन्यवाद.