बुधवार, 3 दिसंबर 2014

कुशल प्रबन्धक के गुण-६

14. जीवन मूल्यों की स्वीकार्यता:- मानव जीवन सबसे अधिक बहुमूल्य है। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि जन्म के समय सभी प्राणी एक जैसे होते हैं। यही नहीं जन्म के समय मानव प्राणी तुलनात्मक रूप से अन्य प्राणियों की अपेक्षा निरीह होता है। अन्य प्राणियों के बच्चे जहाँ जन्म लेते ही अपने आप खड़े होकर उछल कूद करने लगते हैं, मानव प्राणी अपने आप अपनी माँ के स्तन को मुँह में लेकर दूध भी नहीं पी सकता। माँ स्वयं अपना स्तन उसके मुँह में देकर उसे दूध पीना सिखाती है। 
मानव की सभी क्रियाएँ दूसरों से सीखी हुई होती हैं। उसे सभी प्राणियों की अपेक्षा सबसे अधिक शिक्षा व प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है, सुरक्षा की आवश्यकता पड़ती है, संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। अतः उसे स्वयं भी दूसरों के सहयोग के लिए तत्पर रहना चाहिए। मानवीय मूल्य ही हैं जो मानव को अन्य प्राणियों की अपेक्षा ऊपर उठाते हैं।
 मानवीय मूल्यों के अभाव में मानव में और जंगली जानवरांे में कोई भेद नहीं रह जाता । वर्तमान मानवीय मूल्यों के क्षरण के कारण मानव पशुओं के अधिक निकट होता जा रहा है। कई बार तो वह पशुओं से भी नीचे की श्रेणी में दिखाई देता है। दिन-प्रतिदिन हिंसक होता व्यवहार, बढ़ते हुए सामूहिक बलात्कार व समलैंगिकता को मान्यता देने की बढ़ती माँग आदि अनैतिक अपराध मानव को पशुओं से भी नीचे ले जा रहे हैं। मानव मानवीय मूल्यों के कारण ही मानव की उच्च गरिमा से विभूषित किया जाता रहा है, मानवीय मूल्यों के अभाव में मानव और पशुओं में कोई भेद नहीं रह जाता। कहा भी गया है-
आहार निद्रा भय मैथुनं च सर्वे समानः पशुभि नराणां।

साहित्य संगीत कला विहीना, साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीना।।
(अर्थात आहार करने, नींद लेने और मैथुन क्रिया करने की अनिवार्यता की दृष्टि से पशु और नर समान हैं। साहित्व, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति भी पूछ और सींगों से विहीन पशु ही है।)
मानव जीवन सबसे अधिक मूल्यवान है इसके लिए बहुमूल्य और अमूल्य शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है। मानव मूल्य को मुद्रा में नहीं आँका जा सकता, इसका मूल्य मानवीय मूल्यों और समाज में स्वीकार्यता पर आधारित होता है। इसको निम्न प्रेरक प्रसंग के माध्यम से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है-
राष्ट्रकिंकर(13-19 अप्रैल 2014) के पृष्ठ संख्या 5 पर सुबोध प्रसंग के अन्तर्गत रमाकान्त ‘कान्त’ द्वारा एक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। सफलता के आकांक्षी पाठकों की अभिप्रेरणा के लिए साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रसिद्ध उद्योगपति सिएटल का अमेरिका के एक शहर में भाषण था। उस विशाल जनसभा में सामान्य जन उपस्थित थे। उपस्थित जनसमुदाय ने आग्रह किया कि वे उन्हें अपनी संघर्ष गाथा और सफलता की कहानियाँ सुनाएँ। सिएटल के लिए यह धर्मसंकट वाली स्थिति थी क्योंकि किसी अन्य के बारे में कहना आसान होता है किन्तु स्वयं के जीवन के बारे में जनसामान्य के सामने कहना कठिन होता है, फिर भी सिएटल ने इस चुनौती को स्वीकार किया। भाषण देते हुए अचानक सिएटल ने अपनी जेब में हाथ डाला और पाँच सौ डॉलर का एक नोट निकाला। जनता को नोट दिखाते हुए उन्होंने पूछा, ‘अगर मैं इसे गिरा दूँ तो कितने लोग इसे उठाने के लिए आगे बढ़ेगें?’
भला एक वैध नोट को लपकने के लिए कौन तैयार नहीं होगा? सो, लगभग सारे स्रोताओं ने ही अपने हाथ खड़े कर दिए।
अब उन्होंने उस नोट को दोनों हाथों से मोड़ दिया और फिर उसे मुड़ी-तुड़ी हालात में उसे मेज पर खड़ा कर दिया और अपना प्रश्न फिर दुहराया? सब जानते थे कि उस नोट को मोड़ देने मात्र से उसकी वैधता और उसके मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, अतः सभी ने उस नोट को उठा लेने की सहमति के रूप में अपने हाथ पुनः खड़े कर दिए।
अब सिएटल ने नोट को अपनी मुट्ठी में भींचकर बुरी तरह से मसल दिया और कहा, ‘मैं सोचता हूँ कि अब तो इस नोट को शायद ही कोई लेना पसंद करेगा...? मगर आश्चर्य! उपस्थित जनसमुदाय ने अभी भी उस नोट को लेने के प्रति अपनी सहमति जताई। कुछ लोगों ने खड़े होकर कह दिया, ’श्रीमान! बेशक, यह नोट सामान्य स्थिति में नहीं है, किन्तु इसकी वैधता और बाजार मूल्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है, इसलिए इसकी स्वीकार्यता में कोई अन्तर नहीं आया है।
इस पर सिएटल ने लोगों से कहा, ‘’सच कहा आप लोगों ने। जिस तरह यह नोट दबकर कुचल कर भी अपने मूल्य और स्वीकार्यता को नहीं खोता, उसी प्रकार सफलता के लिए आपको भी जीवन में सदैव तैयार रहना पड़ेगा।’’
भीड़ में से एक स्वर उभरा, ‘क्या मतलब है आपका? कृपया स्पष्ट कहें।’
सिएटल ने स्पष्ट किया, ‘सफलता की राह में अनेक अवसर आयेंगे, जब आप पर विभिन्न प्रकार के लांछन लगेंगे। आप अपने प्रतिस्पर्धी अथवा विरोधी द्वारा दबाए या कुचले भी जा सकते हैं। संभव है आपको अपने साथी और परिस्थितियाँ हतोत्साहित करती हुई प्रतीत हों। मगर यदि आप भीतर से मजबूत और ईमानदार होंगे और हर परिस्थिति में जूझने को तत्पर रहेंगे तो इसी नोट की तरह अपने जीवन मूल्यों और स्वीकार्यता को बनाये रखते हुए कीमती बने रह सकेंगे। इस नोट की तरह आप भी अपनी वैद्यता अर्थात विश्वसनीयता को बनाये रख सकेंगे।
सिएटल के इस प्रकरण से स्पष्ट है कि जीवन में जीवन-मूल्य और सामाजिक स्वीकार्यता आवश्यक है और यह ईमानदारी पूर्वक निरंतर कार्य करने के लिए तत्पर रहकर ही बनाए रखे जा सकते हैं। यही सफलता का आधार है। यही नहीं यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वास्तव में यही सफलता है। जीवन मूल्य विहीन समृद्धि को सफलता नहीं कहा जा सकता, जबकि मूल्यों की निधि से समृद्ध आर्थिक विपन्न होते हुए भी इतिहास में दर्ज किये जाते रहे हैं। भारतीय इतिहास ऐसे महान पुरुषों और विदुषियों से समृद्ध है।

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