रविवार, 25 अगस्त 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की डिजिटल इंडिया नीति में बाधक- अध्यापकों की आशंकाएँ

अध्यापकों की आशंकाएँ

पूर्णतः आवासीय नवोदय विद्यालयों के प्रणेता भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी को भारत में कम्प्यूटर युग प्रारंभ करने का श्रेय भी दिया जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के लागू होने से पूर्व ही प्रारंभ कर दिए गए नवोदय विद्यालय, आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू होते-होते माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में अपना एक विशेष स्थान बना चुके हैं। वर्तमान में देश के 35 राज्य/केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रत्येक जिले में लगभग 653 की संख्या में फैल चुके हैं। दूसरी ओर कम्प्यूटर आज कोई विशेष उपकरण नहीं रह गया है। शायद ही कोई गाँव ऐसा हो जिसमें कम्प्यूटर पहुँच न गया हो।

वर्तमान समय में हम कम्प्यूटर की नहीं, डिजिटल इंडिया की बात करते हैं। वर्तमान में डिजिटल इंडिया केवल नारों तक सीमित नहीं रह गया है। यह धरातल पर प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई पड़ता है। उद्योग, चिकित्सा, कृषि, परिवहन, बैंकिग, वित्त, बीमा, रेलवे, शिक्षा व प्रशिक्षण ही नहीं जीवन का प्रत्येक क्षेत्र डिजिटल हो चुका है। मोबाइल व आधार के डिजिट व्यक्ति के जीवन के अनिवार्य घटक बन चुके हैं। अधिकांश क्रय/विक्रय व भुगतान मोबाइल से ही होते हैं। मोबाइल और आधार के बिना सभ्य व्यक्ति जीवन की कल्पना करने की स्थिति में नहीं है। 

शिक्षा संपूर्ण समाज का आधार होती है। शिक्षा के विकास के आधार पर ही सभी क्षेत्रों का विकास निर्भर करता है। अतः डिजिटल इंडिया का वास्तविक रूपांतरण भी शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अनुच्छेद 23 में प्रौद्योगिकी का उपयोग व एकीकरण और अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा- प्रौद्योगिकी का न्यायसम्मत उपयोग सुनिश्चित करना, के द्वारा शिक्षा में प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देते हुए शिक्षा को डिजिटल बनाने व डिजिटल इंडिया को साकार करने की नींव रखने का प्रयास किया गया है। आजीवन शिक्षा की अवधारणा को भी डिजिटल इंडिया के अन्तर्गत प्रौद्योगिकी के विस्तार व सदुदयोग के माध्यम से ही लागू करना संभव है।

प्रबंधन के क्षेत्र में एक कहावत है कि जब भी कोई नवाचार प्रारंभ करने के प्रयास किए जाते हैं। परंपरावादी, विरोध करना प्रारंभ कर देते हैं। प्रबंधन की भाषा में इसे परिवर्तन के प्रति विरोध कहा जाता है। कम्प्यूटरीकरण का भी विरोध हुआ था। उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में मोबाइल के प्रयोग का भी विरोध किया जा रहा है। जो अध्यापक हर समय अपने हाथ में मोबाइल लेकर कक्षा में जा रहा है। जो अध्यापक कक्षा में बैठकर मोबाइल से खेल रहा है, वही अध्यापक विद्यार्थियों को मोबाइल देने पर आशंका व्यक्त कर रहा है। जो पुलिस वाला ड्यूटी पर मोबाइल चला रहा है। जो व्यक्ति घर पर अपने तीन वर्ष के बच्चे को मोबाइल थमा देता है, वही व्यक्ति विद्यालय में आकर कक्षा 11 व 12 के विद्यार्थी के मोबाइल प्रयोग करने पर विरोध व्यक्त कर रहा है। माध्यमिक शिक्षा में मोबाइल व टेबलेट नहीं देंगे, तो डिजिटल इंडिया के लिए अपने विद्यार्थियों को तैयार कैसे करेंगे? मोबाइल व टेबलेट माध्यमिक व उच्च शिक्षा में एक वास्तविक आवश्यकता है। 

निःसन्देह! मोबाइल का दुरूपयोग हो सकता है। ऐसी कौन सी वस्तु है, जिसका दुरुपयोग नहीं हो सकता? अध्यापक दुरुपयोग नहीं कर रहे क्या? उन्हें कक्षा में मोबाइल क्यों ले जाना चाहिए? अधिकारी व नेता अपने कार्यस्थल पर मोबाइल व लेपटॉप का दुरुपयोग करते हुए नहीं देखे जा रहे क्या? पुलिस वालों के खिलाफ मोबाइल पर खेलते रहने के कारण कार्रवाही के उदाहरण भी सामने आए हैं। फिर उन सबको भी मोबाइल के प्रयोग से वंचित कर देना चाहिए क्या? सड़क पर चलते समय दुर्घटना हो जाती हैं। रेलवे भी दुर्घटनाओं का शिकार हो जाती है। वायु और जल परिवहन भी दुर्घटनाओं का सामना करते हैं। दुर्घटनाओं के कारण हम परिवहन का प्रयोग तो बन्द नहीं करते। हाँ! अधिक सतर्कता के साथ नियम बनाते हैं। प्रशिक्षण बढ़ाते हैं। उपकरणों को अद्यतन करते हैं। उसी प्रकार विद्यार्थियों द्वारा मोबाइल व टेबलेट के दुरुपयोग की संभावना को रोकने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं। उन उपकरणों में सुरक्षात्मक साफ्टवेयर अपलोड किए जा सकते हैं किन्तु मोबाइल और टेबलेट पर विद्यालय परिसरों, विशेषकर छात्रावासों में प्रतिबंध लगाकर केवल आशंका के कारण डिजिटल इंडिया के अभियान को क्षति पहुँचाने के कार्य से बचने की आवश्यकता है।

लेखक का व्यक्तिगत अनुभव है कि मोबाइल और टेबलेट माध्यमिक शिक्षा में अत्यन्त उपयोगी हैं। शायद ही कोई अभिभावक हो, जो अपने बच्चों को मोबाइल और टेबलेट की सुविधा से समर्थ होते हुए भी वंचित कर रहा हो। ऑनलाइल पढ़ने की सुविधा के साथ ही ऑनलाइन संसाधनों का प्रयोग करके विद्यार्थी अध्यापक के अतिरिक्त भी ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। जागरूक अभिभावक इस आवश्यकता को समझ रहे हैं। मेरे सामने कम से कम 5 ऐसे प्रकरण आए हैं, जिनमें अभिभावक विद्यालय से इसलिए अपने पाल्य/पाल्या का स्थानान्तरण करा ले गए कि विद्यालय छात्रावास में मोबाइल रखने की अनुमति नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि माध्यमिक शिक्षा में विद्यार्थी को मोबाइल/टेबलेट रखने की अनुमति मिलनी चाहिए। सरकारी स्तर पर कक्षा 12 के विद्यार्थियों को टेबलेट वितरण करने की नीतियाँ भी बनाई जा रही हैं किन्तु शिक्षक वर्ग की आशंकाओं के कारण और संस्थानों की नीतियों के कारण विद्यार्थी उनका उपयोग प्रभावशीलता के साथ अध्ययन में नहीं कर पा रहे हैं।

माध्यमिक शिक्षा के अन्तर्गत मोबाइल/टेबलेट की अनुमति न होने के कारण विद्यार्थियों में चोरी से रखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जब कोई काम चोरी से किया जाता है, तो उसके दुरुपयोग की संभावना अधिक होती है। मार्गदर्शक सिद्धांतो व नियमों का विनियमन न होने के कारण किसी भी प्रकार की नियामक प्रणाली नहीं होती। छात्रावासों में चार्जिंग पोइंट न होने के कारण विद्यार्थी बिजली की लाइनों से छेड़छाड़ करते हैं। इस कारण न केवल सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचती है, वरन् विद्यार्थियों की सुरक्षा व संरक्षा के लिए भी खतरे बढ़ते हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को सही अर्थो में लागू करने के लिए माध्यमिक शिक्षा में सभी विद्यार्थियों को टेबलेट उपलब्ध करवाते हुए उनके स्वतंत्र प्रयोग की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके बिना डिजिटल इंडिया की परिकल्पना को साकार करना संभव न हो सकेगा।


बुधवार, 7 अगस्त 2024

सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देती-

नवोदय की प्रवासन नीति

जवाहर नवोदय विद्यालय भारतीय ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभावान विद्यार्थियों के लिए अनूठे विद्यालय हैं। पूर्णतः आवासीय होने के कारण ये विद्यालय प्राचीन गुरुकुल प्रणाली की याद दिलाते हैं तो दूसरी और अत्याधुनिक शिक्षण-अधिगम पद्धितियों के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण माध्यमिक शिक्षा देने के आदर्श संस्थान कहे जा सकते हैं। नवोदय विद्यालय माध्वियमिक स्तर की विश्वस्तरीय आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के महत्वपूर्ण संस्थान हैं। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद से संबद्ध इन विद्यालयों का परीक्षा परिणाम उत्कृष्ट रहता है।

नवोदय विद्यालय की अनूठी विशेषता भारत की संस्कृति और लोगों की भाषाई विविधता, बहुलता और सामंजस्य की समझ को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष भाषाई क्षेत्र में एक नवोदय विद्यालय से एक अलग भाषाई क्षेत्र में दूसरे विद्यालय में छात्रों को प्रवास पर भेजे जाने वाली योजना है। नवोदय विद्यालय समिति की इस योजना के अन्तर्गत, प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष में कक्षा-नौवीं स्तर पर एक जवाहर नवोदय विद्यालय से 30 प्रतिशत छात्र-छात्राओं को दूसरे जवाहर नवोदय विद्यालय में एक शैक्षणिक सत्र के लिए स्थानांतरित किया जाता है। यह प्रवास योजना हिंदी भाषी क्षेत्र के एक जनपद व हिंदीतर भाषी क्षेत्र के जनपद के बीच आदान-प्रदान की योजना है। 1988-89 में केवल 2 जवाहर नवोदय विद्यालयों में केवल 31 प्रवासी छात्रों के साथ एक मामूली शुरुआत से, यह योजना पिछले 35 वर्षों में निरंतर बढ़ती गई है। 

प्रवासन और त्रिभाषा सूत्र

राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के नवोदय विद्यालय की यह प्रवासन योजना त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन का प्रावधान करती है। त्रिभाषा सूत्र का सही अर्थो में अनुपालन यह प्रवासन नीति करती है। तीन भाषाएँ हिंदी भाषी जिलों में ही नहीं देश के सभी नवोदय विद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। भाषाई और सांस्कृतिक एकीकरण को छात्रों के प्रवास से बढ़ावा मिलता है। हिंदी भाषी जिलों में, जवाहर नवोदय विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली तीसरी भाषा हिंदीतर क्षेत्रों से उस जेएनवी में चले गए 30 प्रतिशत छात्रों की ही भाषा नहीं है। यह भाषा कक्षा 6 से 9 तक के सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है। हिंदी और हिंदीतर सभी क्षेत्रों में, नवोदय विद्यालय सामान्य त्रिभाषा सूत्र अर्थात क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी का पालन करती है।

वर्तमान में देश के 35 प्रदेशों/केन्द्र शासित प्रदेशों में 653 जवाहर नवोदय विद्यालय अपनी अनुपम प्रवासन नीति के माध्यम से भाषाई व सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ाते हुए राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रहे हैं। नवोदय विद्यालय प्राचीन मूल्यों को संरक्षित करते हुए आधुनिक शिक्षा देकर ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाओं को देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार कर रहे हैं।  


बुधवार, 31 जुलाई 2024

संन्यास का अर्थ

 संन्यासी कौन?


आज मेरे पास मोबाइल पर काॅल आया। काॅल करने वाली देवी जी ने केन्द्र भारती में प्रकाशित मेरे आलेख की प्रशंसा की। अच्छा लगा। प्रशंसा किसको अच्छी नहीं लगती? जो प्रशंसा और निंदा की भावना को समान रूप से ले सकूं, वैसी स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हूँ। अभी तक प्राप्त नहीं कर सका हूँ। उनका परिचय जानना चाहा, तो उन्होंने अपना नाम बताते हुए अपने आपको संन्यासिन बताया। तभी से मेरे मस्तिष्क में प्रश्न उठा, ‘संन्यासी या संन्यासिन मतलब क्या? संन्यासी या संन्यासिन का एक पद है क्या? जिसके आधार पर अपना परिचय दिया जाना चाहिए? संन्यासी एक कैरियर है क्या? या संन्यासी एक पेशा है? आखिर यह है क्या? क्यों कोई अपने आपको संन्यासी कहता है या संन्यासी दिखने के प्रयत्न करता है?

मैं बचपन से ही संन्यास और संन्यासी के प्रति आकर्षित रहा हूँ। बचपन में मेरे पिताजी के पास गेरुआ रंग के कपड़े पहने जो भी सज्जन आते थे, उन्हें मैं संन्यासी मान लेता था। जैसे-जैसे कुछ पढ़ा-लिखा, कुछ अनुभव मिला। यह समझ आया कि कपड़ों के रंग और संन्यास में कोई संबन्ध नहीं है। यह एक मान्यता और प्रदर्शन मात्र है। हाँ! भारतीय जनमानस में यह बात बैठी हुई है कि भगवा रंग मतलब संन्यासी। बहुतायत में ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जो इस विषय पर किसी प्रकार की समालोचनात्मक चर्चा को धर्म से जोड़कर विरोध करना शुरू कर देते हैं। एक प्रकार से वितण्डावाद प्रारंभ हो जाता है।

केरल प्रदेश की एक मेरी मित्र थीं। वे स्वामी विवेकानन्द जी की बहुत चर्चा करती थीं। जब उनसे कुछ निकटता हुई तो मैंने स्वामी विवेकानन्द जी का हवाला देकर अपने आचरण में उनकी कुछ विशेषताओं को उतारने की बात कीं तो उनका स्पष्ट कहना था, ‘मैं स्वामी विवेकानन्द की संन्यासी की भूमिका की और आकर्षित थी। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं संन्यासिन बन जाऊँगी। मैं अपनी आकांक्षाओं और कामनाओं को दफन कर दूँगी!’ वास्तव में अपनी कामनाओं, इच्छाओं, अपने अहं, पद, यश, धन, और संबन्धों के लिए चाह का त्याग करना ही तो संन्यास है। वस्तुओं का त्याग नहीं, वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग। यदि कोई व्यक्ति संन्यासी के नाते यश और सम्मान की कामना करता है तो वह विरक्त कहाँ हुआ?

संन्यास के अर्थ पर विचार किया जाय तो विभिन्न प्रकार के विचार मिलते हैं। उनमें से एक है, ‘अपने ज्ञान की, अपनी संवेदनाओं की, अपने कर्म की, अपने पुरुषार्थ की, समष्टि के लिए आहुति देना संन्यास है।’ इस विचार से स्पष्ट है कि संन्यासी का अपना कुछ नहीं रह जाता। उसका व्यक्तित्व समष्टि के लिए होता है। संन्यासी के लिए विभिन्न परंपराओं का भी प्रचलन है किन्तु वास्तविकता यह है कि संन्यासी समस्त मानोपमान व सामाजिक परंपराओं से मुक्त होता है। किसी भी प्रकार का कर्मकाण्ड संन्यासी के लिए नहीं होता। वह कर्म अवश्य करता है, किन्तु निर्लिप्त होकर क्योंकि कर्म के बिना तो शरीर का अस्तित्व ही संभव नहीं है। कर्म काया का धर्म है। सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी कामनाओं से निर्लिप्त होना संन्यासी का स्वभाव है।

संन्यासी के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह घोषणा करे कि वह संन्यासी है। संन्यासी के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह अपने आपको संन्यासी प्रदर्शित करने के लिए विशेष वेशभूषा धारण करे। अपने आपको संन्यासी के रूप में प्रदर्शित करते हुए सम्मान की चाह करना ही संन्यास की मूल भावना के खिलाफ है। संन्यासी तो वह है कि संन्यासी के रूप में प्रदर्शित करने के अपने मोह से भी मुक्त हो जाए। जन सामान्य उसके आचरण से अनुभूति करे कि अरे! यह तो संन्यासी हो गया/हो गई। संन्यासी या संन्यासिन का सम्मान या इस नाते समाज से अपने निर्वाह की अपेक्षा करने से तो अच्छा है कि हम कर्म करते हुए कर्म के फल के प्रति आसक्ति का त्याग कर अपने आपके प्रति भी आसक्ति को त्याग कर योगेश्वर और प्रबन्धन गुरु श्री कृष्ण की तरह संन्यस्त हो जाएं। ऐसी स्थिति में एक विद्यार्थी, एक युवा, एक गृहस्थ भी बिना घोषणा किए स्थिति प्रज्ञ संन्यासी हो सकते हैं।


 प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, कालेवाला, मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश)

चलवार्ता 09996388169  ई-मेलः rashtrapremi@gmail.com

बेब ठिकाना : www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in



रविवार, 28 जुलाई 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषाई विविधता


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की विकास गाथा में तीव्रता लाने का इक्कीसवीं सदी का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। किसी भी देश के विकास का आधार शिक्षा ही होती है। शिक्षा से ही साहित्य, संगीत, कला, सभ्यता व संस्कारों का संरक्षण, संवर्धन व आदान-प्रदान संभव होता है। शिक्षा का आधार भाषा होती है। किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति के लिए भाषा एक अनिवार्य घटक है। बोली और लिपि दोनों ही किसी भी भाषा के अनिवार्य तत्व हैं। भाषा के बिना किसी भी सभ्यता का विकास संभव नहीं है। भाषा के माध्यम से ही साहित्य, संगीत, कला, सभ्यता व संस्कृति का संरक्षण, परिवर्धन व एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के मध्य हस्तान्तरण संभव होता है। भाषा शिक्षा के लिए अनिवार्य घटक है। शिक्षा के लिए ही क्यों? विचार के लिए किसी न किसी भाषा का अस्तित्व होना आवश्यक है।

भारतीय स्वतंत्रता के बाद से ही भारत की राजनीति में भाषा को विवाद में घसीटा जाता रहा है। भाषा विवाद के समाधान के लिए ही सन् 1956 में अखिल भारतीय शिक्षा परिषद ने त्रिभाषा सूत्र को मूल रूप में अपनी संस्तुति के रूप में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में रखा था और मुख्यमंत्रियों ने इसका अनुमोदन कर दिया था। कोठारी कमीशन 1964 ने भी इस सूत्र को प्रतिपादित किया। 1968 व 1986 की शिक्षा नीतियों में भी त्रिभाषा सूत्र पर जोर दिया गया। वास्तविकता यह है कि अभी भी देश में त्रिभाषा सूत्र को लागू नहीं किया जा सका है। 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति त्रिभाषा सूत्र के साथ भाषा विविधता और बहुभाषावाद पर जोर देती हुई भारतीय भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन की बात करती है। नीति आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं के संरक्षण के लिए प्रत्येक भाषा की अकादमी स्थापित करने की बात करती है।

नीति दस्तावेज के अनुसार पिछले 50 वर्षो में हमने 220 भाषाओं को खो दिया है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित किया है। अनेक भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं, विशेषकर वे भाषाएं जिनकी लिपि नहीं है। नीति दस्तावेज में इस प्रकार की स्थिति के लिए चिंता व्यक्त की है। नीति सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण व विकास की बात करती है।

कई बार समाचारों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर राजनीतिज्ञों द्वारा हिंदी थोपने के आरोप लगाए गए हैं। इस प्रकार के किसी भी प्रकार के संकेत नीति दस्तावेज में नहीं हैं। नीति दस्तावेज भारतीय भाषाई्र विविधता का सम्मान करती है। इसमें सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण व विकास का आधार विकसित करने की बात की गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का अनुच्छेद 22 भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति का संवर्धन शीर्षक से है। इस अनुच्छेद के 20 उप-अनुच्छेद हैं, जिनमें से 17 उप अनुच्छेद भाषाओं से संबन्धित हैं। इसी से स्पष्ट होता है कि शिक्षा नीति में भाषाओं को कितना महत्व दिया गया है।

कोई भी नीति अपने आपमें संपूर्ण नहीं होती। नीति के आधार पर उसे लागू करने के लिए कार्यक्रम बनाए जाते हैं। नियमों का निर्धारण किया जाता है। संसाधनों का आवंटन किया जाता है। आवंटित संसाधनों का इष्टतम प्रयोग करके सुविचारित लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। केवल अच्छी नीतियाँ बनाने से परिणामों की प्राप्ति नहीं हो सकती। लागू करने वाले मानव संसाधन द्वारा स्व-प्रेरित होकर लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर नीतियों को लागू करने की आवश्यकता पड़ती है। भारत में इसकी कमी देखी जाती रही है। अच्छी से अच्छी नीतियों को लालफीताशाही का शिकार बनाकर असफल सिद्ध कर दिया जाता रहा है। त्रि-भाषा सूत्र को लागू करना और शिक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत आवंटन करना कोठारी आयोग की रिपोर्ट से ही योजना व नीतियों का भाग रहा है। इतने लंबे समय के बाद भी आज तक इन दोनों को व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सका है।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को धरातल पर उतारने के लिए कार्य किया जाए। संसाधनों का पर्याप्त आवंटन किया जाए। कड़ाई के साथ लागू किया जाय और भ्रष्टाचार की बीमारी से इसे बचाया जाए। हाल ही में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के द्वारा आयोजित नीट परीक्षाओं में जिस प्रकार की शिकायतें आई हैं और उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है। इस प्रकार की कमजोर प्रणाली से शिक्षा नीति को सही अर्थो में लागू करना हो पाएगा, संदेह पैदा करता है। अतः नीति को राजनीति से दूर रखकर, केवल प्रचार-प्रसार तक सीमित न रहकर सही अर्थो में लागू किए जाने की आवश्यकता है। भाषाई विविधता के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की नीति को लागू करना निःसन्देह राष्ट्र की कला, साहित्य, संस्कृति व संगीत जैसी जीवन की आधारभूत आवश्यकता को संरक्षण करने, विकसित करने व स्थानान्तरित करने में सफलता प्रदान करेगा।


गुरुवार, 4 जुलाई 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आभासी प्रयोगशाला



शिक्षा किसी भी देश के विकास की आत्मा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में बुनियादी साक्षरता, शिक्षा व आजीविका के पहलू को मानव अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। मानव विकास के लिए शिक्षा एक घटक मात्र नहीं है, वरन शिक्षा के बिना मानव का अस्तित्व संभव ही नहीं है। शिक्षा ही वह उपकरण है, जो एक प्राणी को सुसभ्य व सुसंस्कृत मानव में परिवर्तित कर देती है। भर्तृहरिरचित नीतिशतकम् में कहा भी गया है-

साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।

तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशुनाम्।।

अर्थात् जो मनुष्य साहित्य, संगीत, कला से( तीनों ही शिक्षा के मूल तत्व हैं) वंचित होता है, वह बिना पूंछ तथा बिना सींगों वाले साक्षात् पशु के समान है। वह बिना घास खाए जीवित रहता है, यह पशुओं के लिए निःसन्देह सौभाग्य की बात है।

येषां न विद्या न तपोन् दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्य रूपेण मृगाः चरन्ति।।

जिन मनुष्यों के पास विद्या अर्थात शिक्षा नहीं है, जिनके कर्म तप और दान नहीं हैं। जिनमें ज्ञान, शील, मानवीय गुण और धर्म नहीं हैं। वे इस मृत्यु लोक में भार समान हैं और मनुष्य के रूप में विचरण करने वाले पशु हैं।

    इस प्रकार शिक्षा को मानव जीवन के आधार के रूप में या शिक्षा के अधिकार को मानव अधिकार के रूप में स्वीकार करने में दो मत नहीं हैं। शिक्षा के विकास के लिए प्रत्येक कल्याणकारी राज्य पूरे प्रयास करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी इसी दिशा में सार्थक प्रयास है। शिक्षा नीति केवल सिद्धांत की बात नहीं करती। इसमें व्यावहारिक ज्ञान पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। प्रयोगात्मक ज्ञान की आवश्यकता को समझते हुए प्रयोगशालाओं के विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया है। यही नहीं प्रयोगशालाओं की उपलब्धता व समय की सीमाओं को समझकर आभासी प्रयोगशालाओं(वर्चुअल लैब्स) को बढ़ावा देने की बात भी की है।

    ‘किसी सिद्धांत को प्रयोग द्वारा सिद्ध किया जा सकता है़।’ अल्बर्ट आइंस्टीन के इस कथन से प्रयोग और प्रयोगशालाओं का महत्व स्पष्ट होता है। यर्थार्थ यही है कि वही विचार या सिद्धांत स्वीकार योग्य है जिसका प्रयोग किया जा सकता है। जिसका प्रयोग न किया जा सकता हो, वह एक असत्य कथन मात्र है। अतः प्रयोग के लिए प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती हैं। प्रयोगशालाएँ अनुसंधानकर्ताओं या वैज्ञानिकों के लिए ही नहीं, नवाचार में लगे व्यक्तियों व ज्ञान पिपाशुओं और विद्यार्थियों के लिए भी आवश्यक हैं।

    संसाधनों की कमी के कारण बहुतायत में प्रयोगशालाओं की उपलब्धता संभव नहीं होती। कई बार जिस समय सीखने वाला आवश्यक समझता है, उस समय उपलब्ध प्रयोगशाला बंद होती है। ऐसी स्थिति में हर स्थान पर और हर समय प्रयोगशाला की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नवीनतम् तकनीकी का प्रयोग करते हुए आभासी प्रयोगशाला(वर्चुअल लैब्स) की अवधारणा सामने आती है। वर्चुअल लैब का प्रयोग कहीं भी कभी भी किया जा सकता है। इसी कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तकनीकी का प्रयोग करते हुए वर्चुअल लैब पर जोर दिया गया है।

    अनुच्छेद 24 आनलाइन और डिजिटल शिक्षा- प्रौद्यागिकी का न्यायसम्मत उपयोग सुनिश्चित करना में 24.4 के अन्तर्गत डिजिटल प्रौद्योगिकी के उद्भव और स्कूल से लेकर उच्चतर शिक्षा के सभी स्तरों तक शिक्षण-अधिगम के लिए प्रौद्योगिकी के उभरते महत्व को देखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रमुख पहलों की सिफारिश करती है। उनमें च. बिन्दु के अन्तर्गत वर्चुअल लैब्स में उल्लेख है कि वर्चुअल लैब बनाने के लिए दीक्षा, स्वयं और स्वयंप्रभा जैसे मौजूदा ई-लर्निग प्लेटफार्म का उपयोग किया जाएगा ताकि सभी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण व्यावहारिक और प्रयोग आधारित अनुभव का समान अवसर प्राप्त हो। सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) के छात्रों और शिक्षकों को पहले से लोड की गई सामग्री वाले टैबलेट जैसे डिजिटल उपकरण पर्याप्त रूप से देने की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा और विकसित किया जाएगा।

    वर्चुअल लैब का प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों व अन्य कठिनाई वाले क्षेत्रों में विद्यार्थयों व शिक्षकों की कठिनाइयों को कम करेगा। निःसन्देह यह उपयोगी व महत्वपूर्ण व उपयोगी विचार है किन्तु हमें यह देखना होगा कि वर्चुअल लैब के प्रयोग के लिए उन्नत स्तर के उपकरणों व हाईस्पीड इंटरनेट संयोजन की आवश्यकता होगी। इस प्रकार वर्चुअल प्रयोगशालाओं का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उपकरणों व इंटरनेट की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी लगातार प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप वर्चुअल लैब्स का उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।


रविवार, 23 जून 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आजीवन शिक्षा की अवधारणा


शिक्षा मानव विकास प्रक्रिया का आधारभूत घटक है। मानव विकास सूचकांक तैयार करते समय भी इसको पर्याप्त भार दिया जाता है। शिक्षा ही मानव को मानव की गरिमा प्रदान करती है। शिक्षा विहीन मनुष्य तो पशु के समान ही होता है। शिक्षा के बिना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती। भारतीय परंपरा में शिक्षा को किसी विशेष आयु तक सीमित नहीं किया गया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली मृत्युपर्यन्त सीखने की अवधारणा को प्रस्तुत करती रही है। वर्तमान समय में इसे आजीवन शिक्षा या आजीवन सीखने के रूप में स्वीकार किया जाता है।

आजीवन सीखना या आजीवन शिक्षा निरंतर सीखने का एक तरीका है, जो पेशेवर या व्यक्तिगत सन्दर्भ में हो सकता है। यह न केवल निरंतरता पर जोर देता है, वरन यह स्व-प्रेरित भी होता है। आजीवन सीखना औपचारिक या अनौपचारिक हो सकता है और यह व्यक्ति के जीवन भर मृत्युपर्यन्त चलता रहता है। यह एंड्रोगोजी या वयस्क शिक्षण सिद्धांत से निकटता से जुड़ा है। यह रचनावाद की संरचना के अन्तर्गत भी आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे प्रौढ़ शिक्षा के साथ रखा गया है।

वर्तमान वैश्वीकरण, तेजगति और ज्ञान-चालित अर्थव्यवस्था में आजीवन शिक्षा विकास की गति को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। इक्कीसवीं की अर्थव्यवस्था श्रम आधारित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था है; जिसमें शिक्षा की कमी वाले लोगों को बेरोजगारी और कम वेतन का जोखिम उठाना पड़ता है। शिक्षाविद एलन बर्टन जोन्स के विचार में, ‘‘उपभोक्ता अर्थव्यवस्था एक सीखने वाला समाज बन जाएगी। जो कंपनियाँ तेजी से सीखेंगी, वे अपनी प्रतिद्वंद्वियों को हरा देंगी। सीखना एक आजीवन प्रक्रिया बन जाएगी, ग्रह पर सबसे बड़ी गतिविधि इक्कीसवीं सदी का प्रमुख विकास बाजार बनेगा।’’ यह स्थिति वास्तव में आ चुकी है। यदि हमें समाज में अपने स्थान को बनाए रखना है, तो बाजार में अपना स्थान बनाए रखने के लिए विकास करना है। विकास पथ पर चलने के लिए आजीवन सीखने का कोई विकल्प नहीं है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के भाग 3 के उपभाग 21 में आजीवन शिक्षा की अवधारणा को स्वीकार करते हुए आजीवन सीखने के लिए संरचनात्मक ढांचा विकसित करने की बात की गई है। उपभाग 21.9 में समुदाय एवं शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए पुस्तकों तक पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक समझा गया है। यह नीति अनुशंसा करती है कि सभी समुदाय व शिक्षण संस्थान-विद्यालय, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय ऐसी पुस्तकों की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे जो कि सभी शिक्षार्थियों, जिनमें निशक्त जन व विशेष आवश्यकता वाले शिक्षार्थी भी सम्मिलित हैं की आवश्यकताओं और रुचियों को पूरा करते हों। केन्द्र व राज्य सरकारें ये सुनिश्चित करेंगी कि पूरे देश में सभी की, जिसमें सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित लोगों के साथ-साथ ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले भी शामिल हैं, पुस्तकों तक पहुँच हो और पुस्तकों का मूल्य सभी के खरीद सकने के सामर्थ्य के अन्दर हो। सार्वजनिक व निजी दोनों प्रकार की एजेंसियाँ/संस्थान पुस्तकों की गुणवत्ता व आकषर्ण बेहतर बनाने की रणनीति पर काम करेंगी। पुस्तकों की ओनलाइन उपलब्धता बढ़ाने व डिजिटल पुस्तकालयों को अधिक व्यापक बनाने हेतु कदम उठाए जाएंगे। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 समुदायों व संस्थानों में जीवंत पुस्तकालयों को बनाने व उनका सफल संचालन सुनिश्चित करने के लिए, यथोचित संख्या में पुस्तकालय स्टॉफ की उपलब्धता पर जोर देती है। उनके व्यावसायिक विकास के लिए उचित करियर मार्ग बनाने एवं करियर प्रबंधन डिजाइन करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। विद्यालयों के पुस्तकालयों को समृद्ध करना, वंचित क्षेत्रों में ग्रामीण पुस्तकालयों व पठन कक्षों की स्थापना करना, भारतीय भाषाओं में पठन सामग्री उपलब्ध करवाना, बाल पुस्तकालय व चल पुस्तकालय खोलना, पूरे भारत में सभी विषयों पर सामाजिक पुस्तक क्लबों की स्थापना व शिक्षण संस्थानों व पुस्तकालयों में आपसी सहयोग बढ़ाना; आजीवन सीखने की प्रक्रिया को तेज करने के अन्य उपायों में सम्मिलित हैं।

सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में वैदिक काल से ही स्वीकार की गई है। आज की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में तो आजीवन सीखना अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया है। सीखना दो प्रकार में वर्गीकृत किया जा सकता है- व्यावसायिक उपयोगिता के लिए सीखना और केवल सीखने के लिए सीखना। वर्तमान समय में एक बार आजीविका में लगने के बाद भी उस आजीविका में प्रभावी रूप से बने रहने के लिए भी सीखने की आवश्यकता बनी रहती है। तीव्र प्रौद्योगिकी विकास के कारण कार्य करने के तरीके भी अप्रचलित हो जाते हैं। अतः अपने आपको कार्यशील बनाए रखने के लिए निरन्तर व्यावसायिक विकास के लिए आजीवन सीखने की आवश्यकता बनी रहती है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन(OECD) के शोध में अनुमान लगाया गया है कि मौजूदा नौकरियों में से 32 प्रतिशत में उनके संचालन के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह भी अनुमान है कि 14 प्रतिशत नौकरियों को पूरी तरह से स्वचालित किया जा सकता है। फिर भी पाँच में से दो(41 प्रतिशत) वयस्क ही शिक्षा व प्रशिक्षण में भाग लेते हैं। जो कर्मचारी आजीवन सीखने को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, उनके पीछे छूटने व अप्रचलित हो जाने का जोखिम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी समस्या के निराकरण के प्रयास के रूप में आजीवन सीखने की अवधारणा पर जोर देती है। 

    आजीवन शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को न केवल व्यक्तिगत रूप से लाभ होता है, बल्कि इससे मजबूत समाज और मजबूत बाजार बनाने में भी मदद मिलती है। ओईसीडी के अनुसार, ‘एक कुशल कार्यबल फर्मो के लिए नई प्रौद्योगिकियों और कार्य संगठन प्रथाओं को विकसित करना और पेश करना आसान बनाता है, जिससे समग्र रूप से अर्थव्यवस्था में उत्पादकता और विकास को बढ़ावा मिलता है।’ 

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत को विकास की प्रक्रिया में तेजगति से आगे बढ़ाने के लिए, वैश्वीकरण के इस दौर में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में देश का विकास सुनिश्चित करने का रोड मैप आजीवन सीखने की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करती है। यही व्यक्ति और समाज का विकास सुनिश्चि त करने का एक मात्र मार्ग है।


शनिवार, 22 जून 2024

काला दिल या काला रंग?


होटल से निकलते ही ओटो रिक्शा मिल गया। रिक्शे वाले ने अपने आप ही मेरे पास आकर ओटो रोक लिया था। 

मैंने उसे पूछा, ‘बस अड्डे चलोगे?

‘हाँ, आइए बैठिए।’ ओटो वाले ने कहा।

मैंने पुनः उसको पूछा, ‘किराया कितना लगेगा?’

‘चालीस रुपए।’ ओटो वाले ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

मैं उस क्षेत्र से परिचित नहीं था। होटल से निकलने से पूर्व ही मैंने तय कर लिया था कि ओटो बुक नहीं करूँगा और सामान्य सवारी की तरह बस अड्डे के लिए यात्रा करूँगा। केवल 12 किलोमीटर की यात्रा है। वीआईपी संस्कृति मुझे कभी पसंद नहीं रही।

 सरकारी यात्रा है। सरकार के द्वारा समस्त व्ययों का भुगतान किया जाना है। फिर भी सरकारी पैसे को खर्च करते समय भी मितव्ययिता क्यों नहीं अपनाई जानी चाहिए!

सरकारी पैसा देश का पैसा है। उसका मितव्ययितापूर्ण सदुपयोग करना ही देशभक्ति है। लापरवाही से अधिव्यय करना देश के साथ गद्दारी है। जन परिवहन के साधनों का प्रयोग करना पर्यावरण व सरकारी नीति के अनुरुप है। इसका प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिए। समस्त संसार को ज्ञान देने का दंभ भरने वाला अध्यापक समूह ही इस बात का ध्यान नहीं रखे, यह किसी भी प्रकार से औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।

मेरे ओटो में बैठने के बाद कुछ आगे जाकर एक व्यक्ति और मेरे बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया। उसी समय उसी व्यक्ति के साथ एक युवती भी ओटो में आई किन्तु वह चालक से आग्रह करके आगे चालक की बगल वाली सीट पर बैठ गयी। 

युवती ने कुछ आगे चलकर ही चालक से कहा, ‘आगे श्रृंगार सामग्री की दुकान पर थोड़ी देर के लिए रोक लेना।’

उसकी बात सुनकर मेरे बगल में बैठा व्यक्ति मुस्कराने लगा और मेरी ओर मुखातिब होकर धीरे से( इस सावधानी के साथ कि युवती सुन न ले) बोला, ’इस काली भैंस को श्रृंगार सामग्री से क्या फर्क पड़ेगा? इसे कौन देखेगा!’

अब उन महापुरुष से कौन कहता, ‘वह युवती तो सांवला रंग होते हुए भी अपने आपको श्रृंगार से सुन्दर बनाने के प्रयत्न में है। उनका काला दिल तो किसी सौन्दर्य प्रसाधन से सुन्दर नहीं हो पाएगा।’

मैंने अभी तक उस व्यक्ति और युवती को देखा ही न था। अनावश्यक रूप से किसी को देखना, मैं उचित नहीं समझता। मैं अभी तक उस व्यक्ति और उस युवती को साथ-साथ समझ रहा था। वे दोनों एक ही ई-रिक्शा में से उतर कर ओटो में बैठे थे। 

उस व्यक्ति का इस प्रकार किसी महिला के लिए टिप्पणी मुझे अच्छी नहीं लगी। मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीें दिया। ऐसे लोगों की उपेक्षा ही उचित व्यवहार है।

उस व्यक्ति की टिप्पणी के बाद मेरा ध्यान उस युवती की ओर गया। मैंने उस पर नजर डाली। 20-22 वर्ष की युवती रही होगी। श्रृंगार की दुकान पर वह क्यों उतरना चाहती है? वह श्रृंगार करे या न करे? रास्ते चलते एक अपरिचित व्यक्ति को इस पर अपने विचार करने की क्या आवश्यकता है?  ये विषय महिलाओं का अपना विषय है। राह चलती महिलाओं के लिए इस प्रकार टिप्पणी करने की पुरुषों की सोच न केवल महिलाओं के स्व-निर्णय के अधिकारों का हनन हैं, वरन अपने विचारों की संकीर्णता के कारण अपने विकास को भी बाधित करना है।

महिलाओं को आजादी और सम्मान देना, संपूर्ण समाज के हित में है। इस सत्य को हम सभी को समझना होगा। हाँ! एक बात अवश्य ही उल्लेखनीय थी कि वह ओटो वाला पूर्ण पेशेवर अंदाज का परिचय देते हुए किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कर रहा था।

उस युवती ने एक स्थान पर ओटो रुकवाया और ओटो वाले से थोड़ी देर रुकने के लिए कहा।

‘नहीं, यह संभव नहीं है। मैं सवारियों को रोककर खड़ा नहीं रह सकता। आप दूसरे ओटो से आ जाइएगा।’ ओटो वाले ने विनम्रता के साथ कहा।

युवती के काले रंग को अपने काले दिल में बसाए रखने वाले सज्जन अभी भी युवती की गतिविधियों पर छिपी हुई नजर रखे हुए थे।