शनिवार, 27 जून 2015
मंगलवार, 5 मई 2015
सफ़लता का राज- अन्तिम पोस्ट
जीवन का जश्न उसकी उपयोगिता में हैः
जीवन का जश्न जीवन के सदुपयोग करने में है। अपने कर्तव्यों के निर्वाह के लिए प्रयासरत रहने में है। यदि आपने प्रयास किये हैं तो जश्न मनाने के लिए परिणामों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप अपने जीवन को बिना किसी का अभाव महसूस किए और बिना किसी के दबाब में जीते हो तो आपकी बराबर सफल व्यक्ति और कौन हो सकता है? और आप जश्न मनाने के इस अवसर को क्यों गंवा रहे हो?
ना किसी के अभाव में जीओ
ना किसी के प्रभाव में जीओ
टुकड़ों-टुकड़ों में क्या जीना?
समग्रता से जीवन जीओ।
स्पष्ट है कि जीवन की सफलता जीवन को बिना किसी के प्रभाव के आनंदपूर्वक जीने में है। अतः जीवन को टुकड़ों में मत बाँटो और जीवन के हर क्षण का आनंद उठाओ। जीवन का हर पल जश्न मनाते हुए बीते। आपके चेहरे पर हर समय प्रसिद्ध प्रबंध गुरू श्री कृष्ण के चेहरे की तरह मुस्कराहट आपके जश्न में डूबकर कार्य करने की प्रतीक के रूप में प्रकट होती रहे। आपकी मुस्कराहट न केवल आपको सदैव आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, वरन् आपके पीछे अनुयायियों की संख्या में वृद्धि करके उनको भी सफलता की राह पर चलने को अभिप्रेरित करती है। अतः सफलता के राज़ को जानें; प्रबंधन को अपने जीवन में ढालें; सफलता हासिल करते हुए जश्न मनायें और जश्न मनाते हुए सफलता हासिल करते रहें।
शनिवार, 2 मई 2015
जश्न मनायें, किंतु रूकें नहीं!
हमें अपने कार्य करने के सामान्य प्रक्रम में दिन-प्रतिदिन अनेकों सफलता मिलतीं हैं, किन्तु हम गलती यह करते हैं कि हम सफलता को सफलता के रूप में स्वीकार नहीं करते या किसी सफलता के जश्न में डूब जाते हैं और अपने अगले कदम को भुलाकर किसी अवसर को गवाँ देते हैं। दिन-प्रतिदिन किए जाने वाले प्रयासों से हम कदम-कदम पर सफलता प्राप्त करते ही हैं। हमें इन सफलताओं की अनुभूति करते हुए इन पर जश्न मनाते हुए अपनी विकास यात्रा के अगले पड़ाव की यात्रा संपन्न करनी है। हमें प्रत्येक सफलता को स्वीकार कर उस पर जश्न मनाते हुए अगली सफलता की कहानी की रूप रेखा तैयार करनी चाहिए। ध्यान रखने की बात यह है कि सफलता का जश्न नशे में परिवर्तित नहीं होना चाहिए कि हम अपने कर्तव्य पथ से भी भटक जायँ। आइंस्टाइन के अनुसार, ‘‘खुश व्यक्ति अपने वर्तमान से इतना संतुष्ट होता है कि वह भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं सोच सकता।’’ अर्थात अधिक प्रसन्नता भी भविष्य की योजनाओं से विमुख कर सकती है।
सामान्यतः लोग जश्न को आराम व आनंद का प्रतीक मानते हैं। आराम करो ! आराम करो ! आराम करो ! कार्य करते समय आराम करना सीखिये। मेरा आग्रह है कि आप काम करते समय ही जश्न मनाना सीखिए। जब हम रोचक और उत्साह से ओतप्रोत होकर कार्य करते हैं तो कभी नहीं थकते और कार्य करने में ही जश्न के आनंद की अनुभूति होने लगती है। जश्न हमें आगे बढ़ने के लिए अभिप्रेरित करे, न कि अवकाश लेकर समय बर्बाद करने का काम करे। हमें काम से अलग होकर जश्न मनाने की मनोवृत्ति को त्याग कर काम करके जश्न मनाने की शुरूआत करने की नवीन परंपरा डालनी होगी। हमें प्रत्येक उपलब्धि को स्वीकार कर उसका जश्न मनाना चाहिए किंतु कभी भी अपनी सफलता की यात्रा में रूकें नहीं।
बुधवार, 29 अप्रैल 2015
जश्न मनाएँ! जश्न के नशे में डूबें नहीं
जी हाँ! मानव एक सामाजिक प्राणी है। अपने सुःख -दुखों को वह अपने परिवार व मित्र गणों के साथ बाँटकर अपने आपको हल्का महसूस करता है। निःसन्देह जिस प्रकार काम करने के लिए विश्राम व मनोरंजन करके तरोताजा होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार से अपनी उपलब्धियों के बारे में जानकारी देने के लिए अल्पकालिक जश्न मनाना भी न केवल अपने आपको बल्कि दूसरों को भी अभिप्रेरित करता है। हम मशीन तो हैं नहीं कि बिना भावनाओं के अपने कार्य में लगे रहें। अपने कार्य की प्रशंसा प्राप्त करके हमें जिस आनंद की अनुभूति होती है, वह सुस्वाद भोजन करने से भी नहीं होती।
कार्य की स्वीकृति हमें अभिप्रेरित करती है। अभिप्रेरणा काम करने की आन्तरिक शक्ति को जगाती है। अतः अपनी उपलब्धियों पर आनन्द मनाना दूसरों को अपने आनंद में सहभागी बनाना व्यक्ति की मानसिक स्थिरता, संतुलन व समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक है। हमें अपनी छोटी-बड़ी सभी उपलब्धियों पर आनंद की अनुभूति होती है और होनी भी चाहिए। अपनी इस अनुभूति को बाँटकर हम अपने परिवारीजनों को भी आनंदित कर देते हैं। यही नहीं हम अपने आसपास के वातावरण को सुखद व प्रतिस्पर्धी बनाकर दूसरों को भी सफलता की ओर कदम बढ़ाने को अभिप्रेरित करने में भी सफल होते हैं। यह आवश्यक भी है किंतु सफलता का जश्न इतना अधिक न हो जाय कि हम आगे की सीढ़ी पर चढ़ना ही भूल जायँ। हमें अपनी प्रत्येक उपलब्धि का जश्म मनाना ही चाहिए किंतु ध्यान रहे- जश्न मनायें; उसके नशे में डूबे नहीं। अभी जीवन यात्रा में बहुत सी सफलताएँ शेष हैं।
गुरुवार, 23 अप्रैल 2015
उपलब्धियों को स्वीकार करें!
जो उपलब्धि हमें हासिल हुई है। उसके स्वागत के लिए सबसे पहले आवश्यक है कि हम उसे स्वीकार करें। कई बार देखने में आता है कि हम अपनी उपलब्धियों को स्वीकार ही नहीं करते या उन्हें कमतर आँकते हैं। अरे! भाई आप ही अपनी उपलब्ध्यिों को स्वीकार नहीं करेंगे तो आपकी उपलब्धियों को और कौन स्वीकार करेगा? जश्न मनाना वास्तव में उपलब्धियों को स्वीकार करना है। उपलब्धियाँ हमें और अधिक उपलब्धियाँ हासिल करने को अभिप्रेरित करती हैं। अतः हमें अपनी प्रत्येक उपलब्धि को स्वीकार करना चाहिए। हमें जश्न मनाने के लिए बड़ी-बड़ी उपलब्धियों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि हम बड़ी उपलब्धियों की प्रतीक्षा ही करते रहे तो शायद कभी जश्न मनाने का अवसर ही न मिल पाये।
किसी विद्यार्थी को जश्न मनाने के लिए परीक्षाफल आने की तिथि की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता ही नहीं है। वस्तुतः परीक्षा पास करना कोई उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तो ज्ञान प्राप्त करना है। परीक्षा तो प्राप्त ज्ञान की किसी संस्था द्वारा मान्यता मात्र है। अतः जब विद्यार्थी किसी विशेष विषय में किसी समस्या को समझकर उसका समाधान करने में सफल हो जाता है तो यह उसकी उपलब्धि है और इस पर उसे जश्न मनाने का पूरा-पूरा अधिकार है। हाँ! यह अलग बात है कि वह अपनी इस उपलब्धि को अपनी माँ के साथ बाँटकर और माँ के हाथ से एक गिलास दूध का पीकर कुछ क्षणों के लिए जश्न का आनंद उठाये और अपनी इस उपलब्धि से अभिप्रेरित होकर अगली समस्या को समझने के प्रयास करना आरंभ कर दे। आपका मित्र आपसे नाराज है और आप उसे मनाने का प्रयास कर रहे हैं, आपके प्रयास सफल हुए और आप अपने मित्र की नाराजी को दूर कर लेते हैं तो आपकी महत्वपूर्ण उपलब्धि है और आप अपने मित्र के साथ इस सफलता पर जश्न मनाएँ और अपनी मित्रता को और भी अधिक घनिष्ट बनायें।
बुधवार, 22 अप्रैल 2015
जश्न मनाते हुए अपनी अगली योजना में जुट जाइये ना
जश्न मनाने के अवसर:
आप रात को यह तय करके सोते हैं कि आप प्रातःकाल जल्दी उठेंगे और अपने कार्य निपटायेंगे। आप प्रातःकाल बिना किसी अलार्म के और बिना किसी के उठाये स्वयं उठ जाते हैं तो आपको सफलता मिली ना। आज की सबसे पहली सफलता। अब यह तो आपके ऊपर निर्भर है कि आप सफलता को स्वीकार करके प्रसन्नता की अनुभूति करें। आनन्द का उपभोग करें या यह सोचकर कि आपको कितना काम करना पड़ता है कि आप चैन से सो भी नहीं सकते। यह विचार करके अपने आप के लिए तनाव का सृजन करें। अरे भाई! दिन की पहली सफलता पर प्रसन्न होकर जश्न मनाते हुए अपनी अगली योजना में जुट जाइये ना। आपकी पहली सफलता अगली सफलता की अभिप्रेरक बन कर आपको आगे बढ़ने में मदद करेगी।
आप रेलवे रिजर्वेशन के लिए कतार में खड़े हैं और अन्ततः आपने आरक्षण करा ही लिया। आपको कन्फर्म टिकट मिल गई। आपने सफलता प्राप्त की है और आपको इस सफलता के लिए आनन्दित होना ही चाहिए। इसी प्रकार दिनभर आप अनेकों सफलताएँ प्राप्त करते हैं फिर आप प्रत्येक सफलता पर आनन्दित क्यों नहीं होते?
आपको बस से यात्रा करनी है। आपको लग रहा है कि आपको बिलंब हो गया है बस मिलना मुश्किल है। आप शीघ्रता से बस अड्डे की ओर प्रस्थान करते हैं। आपके पहुँचने से पूर्व ही बस चल चुकी थी किंतु दौड़कर आप बस को पकड़ ही लेते हैं। आपको सफलता मिली ना! यही नहीं आपको अनपेक्षित रूप से बस में सीट भी मिल गई और वो भी खिड़की वाली। अब और क्या बाकी है आपको सफलता की अनुभूति करने में। सफलता की अनुभूति करने में कंजूसी क्यों? आप अपने सहयात्री को एक मुस्कान देकर अपने आनंद में सम्मिलित कर सकते हैं। आप और किसी के साथ अपनी प्रसन्नता को बाँट न सकें तो मन ही मन प्रसन्न तो हो ही सकते हैं। अपने चेहरे पर मुस्कराहट तो आने दीजिए। फिलहाल आपको तीन-तीन उपलब्धियाँ एक साथ मिली है, उनके आनंद को भावी आशंकाओं से प्रभावित मत होने दीजिए।
आपकी पत्नी ने बड़े चाव से खाना बनाया है और खाना स्वादिष्ट व पौष्टिक दोंनों ही कसौटियों पर खरा उतरता है; आपकी पत्नी बधाई की पात्र हैं, उन्हें बधाई दीजिए और उन्हें उनकी सफलता पर आनन्द का अनुभव करने दीजिए हो सके तो कुछ क्षणों के लिए ही सही उनके साथ उनकी सफलता के आनन्द में स्वयं जुड़ जाइये। यह तात्कालिक सफलता व उसकी अनुभूति आपके दांपत्य जीवन को सफलता की ओर ही अग्रसर करेगी। अपने प्रयासों की सफलता ही तो जीवन की सफलता की ओर ले जाती है। ये छोटी-छोटी सफलताएँ ही आपके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को ओर ताकत देंगी। आपको अभिप्रेरणा प्राप्त होगी और आपको अविरल कर्मरत रहने की आदत पड़ जायेगी। दूसरे शब्दों में आपको सफल होते रहने की आदत पड़ जायेगी।
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