बुधवार, 29 अप्रैल 2015

जश्न मनाएँ! जश्न के नशे में डूबें नहीं


जी हाँ! मानव एक सामाजिक प्राणी है। अपने सुःख -दुखों को वह अपने परिवार व मित्र गणों के साथ बाँटकर अपने आपको हल्का महसूस करता है। निःसन्देह जिस प्रकार काम करने के लिए विश्राम व मनोरंजन करके तरोताजा होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार से अपनी उपलब्धियों के बारे में जानकारी देने के लिए अल्पकालिक जश्न मनाना भी न केवल अपने आपको बल्कि दूसरों को भी अभिप्रेरित करता है। हम मशीन तो हैं नहीं कि बिना भावनाओं के अपने कार्य में लगे रहें। अपने कार्य की प्रशंसा प्राप्त करके हमें जिस आनंद की अनुभूति होती है, वह सुस्वाद भोजन करने से भी नहीं होती।

        कार्य की स्वीकृति हमें अभिप्रेरित करती है। अभिप्रेरणा काम करने की आन्तरिक शक्ति को जगाती है। अतः अपनी उपलब्धियों पर आनन्द मनाना दूसरों को अपने आनंद में सहभागी बनाना व्यक्ति की मानसिक स्थिरता, संतुलन व समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक है। हमें अपनी छोटी-बड़ी सभी उपलब्धियों पर आनंद की अनुभूति होती है और होनी भी चाहिए। अपनी इस अनुभूति को बाँटकर हम अपने परिवारीजनों को भी आनंदित कर देते हैं। यही नहीं हम अपने आसपास के वातावरण को सुखद व प्रतिस्पर्धी बनाकर दूसरों को भी सफलता की ओर कदम बढ़ाने को अभिप्रेरित करने में भी सफल होते हैं। यह आवश्यक भी है किंतु सफलता का जश्न इतना अधिक न हो जाय कि हम आगे की सीढ़ी पर चढ़ना ही भूल जायँ। हमें अपनी प्रत्येक उपलब्धि का जश्म मनाना ही चाहिए किंतु ध्यान रहे- जश्न मनायें; उसके नशे में डूबे नहीं। अभी जीवन यात्रा में बहुत सी सफलताएँ शेष हैं।

एक टिप्पणी भेजें