बुधवार, 10 सितंबर 2014

सफलता का आधार:


सफलता सुनिश्चित करने के लिए सर्वप्रथम हमें ध्येय निर्धारित करने की आवश्यकता है। ध्येय ही तो हमारी दिशा निर्धारित करेगा कि हमें जीवन में किस ओर जाना है? ध्येय के निर्धारण के पश्चात तदनुकूल उद्देश्य का निर्धारण करना होगा। उद्देश्य के निर्धारण के बाद उसे तात्कालिक रूप से लक्ष्यों में बाँटकर तात्कालिक रूप से समयबद्ध कर प्राप्त करने योग्य बनाना होगा। निश्चित रूप से ध्येय, उद्देश्यों व लक्ष्यों का निर्धारण एक महत्वपूर्ण कार्य हैं किन्तु केवल उद्देश्यों का निर्धारण कर लेना सफलता को सुनिश्चित नहीं कर देता।
         सफलता के लिए आवश्यक है कि हमने जो ध्येय, उद्देश्य व लक्ष्य निर्धारित किए हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए योजना बनाई जाय। योजना बनाना ही प्रबंधन का प्रथम कार्य है। प्रबंधन के प्रमुख पाँच कार्यो, नियोजन, संगठन, नियुक्तियाँ, निर्देशन व नियंत्रण में नियोजन को प्रथम स्थान दिया जाता है। योजना बनाने की सुविचारित प्रक्रिया को ही हम नियोजन के नाम से जानते हैं। वास्तव में  ध्येय, उद्देश्य व लक्ष्यों को कार्यरूप में परिणत करने का कार्य प्रबंधन की सहायता से ही किया जा सकता है।
उद्देश्य व लक्ष्य के निर्धारण के पश्चात् उनकी प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए हमें प्रबंधन की सहायता लेनी ही होगी। प्रबंधन के महत्वपूर्ण कार्यो में नियोजन, संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन व नियंत्रण को अत्यन्त महत्वपूर्ण व आवश्यक माना जाता है। अपने जीवन का प्रबंधन करने के लिए आओ हम प्रबंधन व उसके कार्यो का परिचय प्राप्त करें। 
वास्तव में व्यक्ति को प्रबंधन के तत्वों से परिचित कराकर ही उसके प्रभाव क्षेत्र में लाकर सफलता की ओर अग्रसर किया जा सकता है। मैं प्रबन्धन का अध्येता होने के नाते प्रबन्धन के क्षेत्र का विकास व विस्तार देखना चाहता हूँ। मै एक मानव होने के नाते मानव को सफलता के शिखरों पर निरंतर चढ़ते हुए देखना चाहता हूँ और यह तो प्रबंधन को समझकर उसके प्रयोग में कुशलता हासिल कर और फिर उसका प्रयोग करके ही संभव है। प्रबंधन के प्रयोग को सर्वव्यापक बनाने के लिए जन सामान्य को प्रबंधन के विकास व विस्तार के क्रम में प्रबंधन का अर्थ, प्रकृति व सिद्धान्तों को समझना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रबंधन का आशय व परिभाषा
प्रबंधन अत्यन्त प्राचीन विषय है। इसका उद्भव भारतीय महिलाओं के कुशल गृह प्रबंधन में खोजा जा सकता है। जब हम प्रबंधन की बात करते हैं, तो हम पश्चिमी विश्व की ओर देखने लगते हैं। हमारा मानना है कि प्रबंधन एक नया विषय है। प्रबंधन के सिद्धांतों के जन्मदाता के रूप में हेनरी फेयोल व वैज्ञानिक प्रबंध के जनक के रूप में एफ.डब्ल्यू.टेलर के नाम की चर्चा आती है। यहाँ विचार करने की बात है, क्या इनसे पूर्व प्रबंधन का अस्तित्व नहीं था? हम विचार करें तो पायेंगे कि प्रबंधन का जन्म तो मानव सभ्यता के विकास के साथ ही हो गया था। प्रबंधन का मूल उद्देश्य न्यूनतम् संसाधनों से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करना होता है। इस कार्य को हम प्रारंभ से ही करते आ रहे हैं। प्रबंधन के क्षेत्र में हमारी गृहणियों का कोई सानी नहीं है। अभावों व विरोधाभासों के बीच कितनी कुशलता के साथ महिलायें गृह-प्रबंधन करती आई है; वह क्या प्रबंधन नहीं था? 
वास्तविकता यह है कि कार्य पहले होता है, और सिद्धांत उसके बाद आते हैं। सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते, कला सिद्धांतों को जन्म देती है। प्रबंधन भी कोई नया विषय नहीं है। यह उतना ही पुराना है, जितनी मानव सभ्यता। मारकर लाये गये पशु के माँस को पकाकर घर के सारे सदस्यों को तृप्त करना व योजनानुसार उसके कुछ भाग को अतिथियों के लिए सुरक्षित रख लेना भी तत्कालीन प्रबंधन ही था। हमारे यहाँ की अशिक्षित महिलायें भी प्रबंध कला में इतनी निपुण पाई जातीं थीं कि उनके सामने बड़े-बडे़ प्रबंधशास्त्री पानी भरने लगें। आज विभिन्न वैज्ञानिक व तकनीकी विकास के कारण संसाधनों की बहुलता है। ऐसे समय में उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना बहुत अधिक जटिल कार्य नहीं है। वह भी समय था जब संसाधनों के अभाव में भी रास्ते निकालकर परिवार ही नहीं सामाजिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति भी करने के प्रयत्न किये जाते थे।
          वस्तुतः प्रबंधन विज्ञान की अपेक्षा कला अधिक है। इसी दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए कि भले ही हमारे यहाँ प्रबंधन के बड़े-बड़े सिद्धांत नहीं गढे़ गये फिर भी हमारे यहाँ पारिवारिक व्यवस्था में ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था में भी प्राचीन काल से ही प्रबंधन का प्रयोग होता रहा है। उस समय गलाकाट प्रतियोगिता व भविष्य को दाँव पर लगाकर विकास नहीं किया जाता था। उस समय वास्तव में सातत्य विकास किया जाता था। प्रकृति से जितने संसाधनों को प्राप्त किया जाता था, उतना ही उनका संरक्षण भी किया जाता था। यह सब हमारी परंपराओं के द्वारा ही होता था और इसके मूल में थी महिलायें। मेरे विचार में भारतीय नारी से अधिक कुशल प्रबंधक कोई हो ही नहीं सकता। वास्तव में प्रबंधन के जनक हेनरी फेयोल या टेलर नहीं थे। वरन भारतीय नारी ही प्रबंधन की प्राचीनतम् जननी है।
इसका आशय यह नहीं है कि मैं हेनरी फेयोल या टेलर के महत्व को कम करके आँक रहा हूँ। इनके योगदान को विश्व स्तर पर भुलाया नहीं जा सकता। इन्होंने व्यक्ति या परिवार के ढांचे से प्रबंधन को निकालकर उसका विशिष्टीकरण किया। प्रबंधशास्त्री इस कारण आदर के पात्र हैं कि इन्होंने प्रबंधन को चिंतन-मनन व विचार-विमर्श का विषय बनाया। जो प्रबंधन कार्य तक सीमित था, उसे अध्ययन का विषय बनाकर प्रबंधन में शिक्षण व प्रशिक्षण की व्यवस्था संभव बनाई। पहले प्रबंधन केवल आचरण का विषय था, इसे अध्ययन व शोध का विषय बनाया। पहले प्रबंधन केवल कला था, प्रबंधशास्त्रियों ने इसे विज्ञान के रूप में विकसित किया।
प्रबंधशास्त्री टेलर के शब्दों में, ‘प्रबंधन के सिद्धांतों को हमारे घरों का प्रबंध करने, हमारे व्यापारियों को व्यापार का प्रबंध करने, हमारी लोक हितैषी संस्थाओं, हमारे विश्वविद्यालयों, हमारे गिरजाघरों और हमारे सरकारी विभागों में लाभपूर्वक लागू किया जा सकता है। प्रबंधशास्त्री फेयोल जिस प्रबंध की आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं। आओ उस प्रबंधन को समझें।

प्रबंधन का अर्थ
किसी भी क्षेत्र में जहाँ व्यक्ति व अन्य संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। प्रबंधन एक महत्वपूर्ण संसाधन की भूमिका में होता है। कुण्टज् तथा ओ‘डोनेल के अनुसार, ‘‘मानवीय क्रियाओं में संभवतया प्रबंध से अधिक महत्वपूर्ण और कोई क्षेत्र नहीं है। सभी स्तरों पर सभी प्रकार के उद्यमों में कार्यरत सभी प्रबंधकों के लिए मूल कार्य एक ऐसे वातावरण का सृजन एवं संरक्षण करना होता है, जिसमें व्यक्ति विशेष समूह में काम करते हुए भी निश्चित लक्ष्य और उद्देश्यों को पूरा कर सके।’’
प्रबंधन से आशय  मानव कुशलता एवं साधनों का प्रयोग करते हुए लक्ष्यों का निर्धारण करने तथा उनको प्राप्त करने से सम्बन्धित कार्य निष्पत्ति से लिया जाता है। संकुचित अर्थ में , प्रबंध दूसरे व्यक्तियों से कार्य कराने की युक्ति है और जो व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों से कार्य करवाता है, उसे प्रबंधक कहा जाता है। जबकि व्यापक अर्थ में, ‘प्रबंध एक कला एवं विज्ञान है जो निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न मानवीय प्रयासों से सम्बन्ध रखता है। इसके अन्तर्गत नियोजन, संगठन, नियुक्तियाँ, निर्देशन, नियंत्रण आदि कार्यो को सम्मिलित किया जाता है।’ पीटर एफ ड्रकर के अनुसार, प्रबंधन प्रत्येक क्रिया का गतिशील एवं जीवनदायक तत्व है उसके नेतृत्व के अभाव में उत्पादन के साधन केवल साधन मात्र ही रह जाते हैं, कभी उत्पादन नहीं बन पाते।

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