मंगलवार, 16 सितंबर 2014

सहमति व सहभागिता की आवश्यकताः

सहमति व सहभागिता की आवश्यकताः


वर्तमान समय में लोकतंत्र एक आदर्श शासन प्रणाली के रूप में स्थापित हो चुका है। अधिकांश देश, वे देश भी जिनमें वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो सकी है; लोकतंत्र को आदर्श शासन प्रणाली के रूप में मानते हैं और किसी न किसी स्तर पर जनता को शासन से जोड़ते हुए दिखने की कवायद करते हुए देखे जा सकते हैं। लोकतंत्र का मूल शासित लोगों की सहमति से शासन करना है। शासक वर्ग जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि या प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि होता है या ऐसा होने का दिखावा करता है। लोकतंत्र के मूल भाव में प्रबंधन का विकेंद्रीकरण व भारापर्ण का सिद्धांत है। वास्तविक कार्य करने वाले कार्यकर्ता को उस कार्य से संबन्धित निर्णय लेने का अधिकार देना ही तो विकेन्द्रीयकरण होता है। यह विकेन्द्रीयकरण या कार्य सौंपना ही तो लोकतंत्र का आधार है। जनता चुनाव के माध्यम से देश के प्रबंधन का उत्तरदायित्व सौंपती है तो इसी को लोकतांत्रिक शासन पद्धति के रूप में जाना जाता है। वास्तविक बात यही है कि सहमति और सहयोग के आधार पर ही सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। यह तथ्य प्रबंधन के क्षेत्र में भी शत-प्रतिशत लागू होता है।
इसी परिप्रेक्ष्य में मेरी पार्कर फोलेट ने ‘स्थिति के नियम’ का प्रतिपादन किया है- ‘‘एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को आदेश नहीं देना चाहिए, वरन् दोनों को परिस्थितियों से आदेश ग्रहण करने के लिए राजी होना चाहिए। यदि आदेश केवल परिस्थितियों का ही हिस्सा है तो किसी एक के द्वारा आदेश देने या दूसरे के द्वारा आदेश लेने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।’’ इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक संगठन का वातावरण और स्थिति के अनुसार ही व्यक्ति को आदेश देने और लेने चाहिए। वास्तव में जब परिस्थितियों के द्वारा ही आदेशों का निर्धारण हो जाता है, तब प्रबंधकों का आदेश देना और कर्मचारियों का आदेश लेना महज औपचारिकता मात्र है। इसका आशय यह भी है कि यदि प्रबंधक कोई आदेश देता है, तो ऐसा आदेश सर्वथा परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए, तभी उसका क्रियान्वयन संभव हो सकता है अन्यथा कर्मचारी उस आदेश को मानने से इंकार कर सकते हैं या अनुपालन करने में टाल-मटोल कर सकते हैं।
वास्तव में वर्तमान लोकतांत्रिक युग में कार्य से सत्ता निकलती है, सत्ता से कार्य नहीं। कार्य से सत्ता निकलने का आशय यह भी है कि संगठन में सदस्य की सत्ता उसके ज्ञान और अनुभव के अनुसार होनी चाहिए, न कि उसके पद या श्रेणी के अनुसार। मेरी पार्कर फोलेट के स्थिति के इस नियम की काफी आलोचना हुई किंतु इससे इसका महत्व कम नहीं हुआ। आगे चलकर चेस्टर बर्नार्ड ने इन्हीं आदर्शो को व्यावहारिकता का जामा पहनाकर सहमति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। 
सहमति के सिद्धांत के अनुसार, ‘सत्ता आदेश का ऐसा गुण है, जिसे इसलिए मंजूर किया जाता है; क्योंकि उसमें कार्य की दिशा दी हुई रहती है। वास्तव में वह दिशा ही कर्मचारी को आदेश का पालन करने के लिए अभिप्रेरित करती है। व्यक्ति आदेश की अपेक्षा स्वेच्छा से अच्छा कार्य करता है। वास्तविक रूप में सत्ता सहमति से निकलती है। लोकतंत्र का यह प्रमुख सिद्धांत है कि हम अपने द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को स्वयं ही अपने ऊपर शासन करने की सहमति प्रदान करते हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आदेशित व्यक्ति की अपेक्षा अभिप्रेरित व्यक्ति ही अधिक श्रेष्ठ परिणाम दे सकता है। 

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