बुधवार, 30 जून 2010

मानव संसाधन नियोजन

मानव संसाधन नियोजन


उत्पादन के साधनों में मानव संसाधन ही एक सक्रिय साधन है, जो अन्य निष्किय साधनों का प्रयोग करके उत्पादन प्रक्रिया को सम्भव बनाता है। मानव संसाधन स्वयं ही प्रबंध प्रक्रिया को लागू करता है तथा यह प्रक्रिया स्वयं अर्थात मानव संसाधन पर भी लागू होती है। प्रंबध प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण व प्रारंभिक कदम है- नियोजन। यह महत्वपूर्ण चरण मानव संसाधन के लिए आवश्यक ही नहीं वरन् अनिवार्य है।

नियोजन का अर्थ:- नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें न केवल संस्था के उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है, वरन उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कार्यो, आवश्यक संसाधनों, उन्हें प्राप्त करने के स्रोतों, नीतियों, पद्धतियों, कार्यविधियों, कार्यक्रमों व व्यूह रचना को भी निर्धारित किया जाता है।

मानव संसाधन नियोजन या जनशक्ति नियोजन शब्द का प्रयोग विभिन्न स्तरों पर किया जाता है, जैसे- वैश्विक, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय व संस्थान के स्तर पर ही नहीं, यह परिवार व वैयक्तिक स्तर पर भी आवश्यक है। देखने में आता है कि हम भौतिक संसाधनों के पीछे तो जी-जान से पड़े रहते हैं किन्तु परिवार में व्यक्तियों का तथा स्वयं अपना प्रबंध नहीं करते और तमाम धन-संपत्ति के रहते हुए भी जीवन, जीवन नहीं रह जाता। अन्त में निराश होकर मन्दिर और मस्जिदों में शान्ति खोजते हैं। मन्दिर और मस्जिदों आदि में बढ़ती भीड़ मानव संसाधन प्रबंध की कमी की द्योतक है। सभी स्तरों पर मानव संसाधन प्रबंध की आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती हैं।

संस्थान के स्तर पर जनशक्ति आयोजन का अर्थ ऐसे कार्यक्रम से है, जिसमें नियोक्ता द्वारा संस्था के लिए आवश्यक व पर्याप्त मानव शक्ति की प्राप्ति, विकास, अनुरक्षण और उपयोग सम्भव हो। जनशक्ति का मूल्यांकन, पूर्वानुमान तथा उपलब्धि के स्रोतों की खोज तथा प्राप्त करने का कार्यक्रम भी जनशक्ति आयोजन की विषयवस्तु है। जिस प्रकार आर्थिक आयोजन का उद्देश्य भौतिक आर्थिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना है, उसी प्रकार मानव संसाधन आयोजन का अर्थ मानव संसाधन का विवेकपूर्ण उपयोग करने से है।

वर्तमान समय में जनशक्ति आयोजन में- 1.वर्तमान एवं अपेक्षित रिक्त स्थानों का विश्लेशण, जो सेवानिवृत्ति, स्थानान्तरण, पदोन्नति, बीमारी अवकाश, दुघर्टना, पदत्याग, अनुपस्थिति, अनुशासनहीनता आदि के कारण रिक्त होते हैं, 2. विभागीय विस्तार एवं कटौती का विश्लेशण तथा 3. उत्पादकीय क्षेत्र के होने वाले तकनीकी परिवर्तनों के साथ सामंजस्य सम्मिलित किया जाता है। तकनीकी परिवर्तनों के साथ सामाजिक परिवर्तन, कौशल के स्तर, जनशक्ति उपलब्धि की मात्रा, राजकीय नियमों में परिवर्तन, न्यायालयों के निर्णय, मजदूरी नीति, आरक्षण नीति, मानवीय अधिकार संबन्धी व्यवस्थाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।

एरिक डब्लयू.वेटर के अनुसार- ``मानव संसाधन नियोजन एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से प्रबंध यह निश्चय करता है कि संगठन को किस प्रकार से कदम उठाने चाहिए कि वह अपनी विद्यमान मानव संसाधन स्थिति से इच्छित मानव संसाधन स्थिति में पहुंच जाय। आयोजन के माध्यम से प्रबंध सही संख्या में, सही प्रकार के व्यक्तियों को, सही स्थानों पर, सही समय में प्राप्त करने में समर्थ होता है। इससे संगठन एवं कार्मिक दोनों को ही अधिकतम दीर्घकालीन लाभों की प्राप्ति होती है।´´

इस प्रकार मानव संसाधन नियोजन से आशय किसी उपक्रम के द्वारा कर्मचारियों की मांग व पूर्ति में सामंजस्य स्थापित करना है। यह मानवीय आवश्यकताओं का पूर्वानुमान व नियोजन है। इसके अन्तर्गत उपक्रम की मानव संसाधन आवश्यकताओं का संख्यात्मक व गुणात्मक रूप से अनुमान व व्याख्या तथा इस अनुमान पर कर्मचारियों की व्यवस्था संबन्धी नीति सम्मिलित होती है।
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