मंगलवार, 17 दिसंबर 2013


  • अपने समय को बर्बाद करने वाले लोग ही सबसे पहले समय की कमी का रोना रोते हैं.                                                                                                                                         -जीन डी. ला. ब्रुयर 

  • समय-प्रबन्धन की कला को सीखने के बाद तुम इस सत्य को समझ सकोगे कि ज्यादातर लोग अपनी सालाना उपलब्धियों का बहुत अधिक अनुमान लगाते हैं और दस वर्षों की उपलब्धियों का कम अनुमान लगाते हैं.     -एन्थोनी रॊबिन्स

  • समय के उपयोग के बारे में समझदार बनो. जीवन में प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास समय कितना है? प्रश्न यह है कि हम इसका करते क्या हैं?    -अन्ना रॊबर्टसन ब्राउन 

महत्वपूर्ण वचन



  • बुरी खबर है कि समय उड रहा है, लेकिन अच्छी खबर यह है कि तुम इसके पायलट हो.                    -माइकेल अल्थसूलर
  • वही व्यक्ति अपने जीवन का एक घंटा बर्बाद करने का दुस्साहस कर सकता है, जिसने जीवन की कीमत नहीं जानी है. -चार्ल्स डार्विन
  • व्यक्ति समय के महत्व को पूरी तरह तब समझता है, जब इसके लिये बहुत कम समय बचा रहता है. सभी लोगों के जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति उसके उत्पादक जीवन के खत्म न होने वाले वर्ष होते हैं.        -पी.डब्ल्यू लिचफ़ील्ड

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

DREAMS ARE NOT WHICH COME DURING SLEEP, 

DREAMS ARE WHICH THOSE DON'T LET YOU SLEEP. 

                                                                    DR.A.P.J. KALAM 

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

DECISION MAKING PROCESS AND MOTIVATIONAL VIEWS

I DON'T BELIEVE IN TAKING RIGHT DECISIONS, I TAKE DECISION THEN MAKE THEM RIGHT.

                        - RATAN TATA 

गुरुवार, 3 जनवरी 2013


नेतृत्व का अर्थ

                                                            डा.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम


जो साहस का, धैर्य का, निः स्वार्थ का पर्याय हो। नेतृत्व वह जो खतरे उठाए, अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए, देश के लिए। नेतृत्व समाज की खुशी में ही अपनी खुशी देखता है। मानवीय साहस, दूरदृष्टि, उपलब्धि, धैर्य और सृजनशीनता का पर्याय है नेतृत्व। नेतृत्व, जो प्रेरित करता है, जो हमें मूल्यों की सीख देता है और दायित्व का एहसास कराता है। ऐसा ही नेतृत्व देश गढता है, इतिहास का पुर्नलेखन करता है, समाज को आगे ले जाता है।

  • नेतृत्व के पास दूरदृष्टि (विजन) अवश्य हो।
  • विजन को जमीन पर उतारने का जुनून हो।
  • नेतृत्व की नई राह बनाने, उस पर चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • उसे सफलता व विफलता दोंनो का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • उसके पास निर्णय लेने का साहस होना चाहिए।
  • उसे प्रबंधन में विनम्र होना चाहिए।
  • उसे हर कार्यवाही में पारदर्शी होना चाहिए।
  • उसे ईमानदारी के साथ काम करना चाहिए व इसी तरह सफलता पानी चाहिए।

 सभी मिशनों में सफलता के लिए नेतृत्व को रचनात्मक होना चाहिए। रचनात्मक नेतृत्व का अर्थ है, दृष्टि को इस तरह अमल में लाएँ, जिससे उसकी भूमिका परंपरागत कमांडर से बदल कर कोच के रुप में स्थापित हो। वह मैनेजर के बदले मेंटर, निदेशक के बदले डेलिगेटर व दूसरों से आदर की मांग करने वाले की जगह खुद को आदर पाने योग्य साबित करने वाला हो।
                              जन-प्रवाह (16 से 22 दिसम्बर 2012) से साभार

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

2012 की उपलब्धियों के लिए बधाई, घावों के लिए सान्त्वना व नव वर्ष 2013 की शुभयोजनाओं की सफलता के लिए शुभकामनाएँ


पृष्ठपोषण, मूल्यांकन, सुधारात्मक कार्यवाही


 व


 पुनर्नियोजन का अवसर नव वर्ष


मित्रो, आज वर्ष का अन्तिम दिन है, फिर हमारे सामने वर्षभर किए गये कार्यो, प्राप्त उपलब्धियों, की जा चुकी या घटित गलतियों, संसाधनों के उपयोग या दुरूपयोग, किए गये नियोजन व उसके क्रियान्वयन में रह गई कमियों का पुनरावलोकन करने का अवसर उपस्थित है।
       पिछले एक सप्ताह से ही नव वर्ष की चर्चा की जाने लगी हैं। नव वर्ष की बधाइयाँ या शुभ कामनाएँ आदान-प्रदान करने का दौर चल पड़ा है। यहाँ विचार करने की बात है कि बधाई के लिए हमने गतवर्ष में किया क्या है? और शुभकामनाएँ तभी फलीभूत होंगी, जब हमारे पास नववर्ष के लिए कोई नयी योजना हो जिस पर हमें कार्य करना है। बधाई उपलब्धियों पर दी जाती है। समय चक्र तो निरंतर चलता ही रहता है। हमारे सामने आने वाला प्रत्येक पल ही नया होता है, प्रत्येक दिन ही नया होता है, प्रत्येक माह ही नया होता है; इसी प्रकार नववर्ष भी है। 
       नववर्ष की बधाई स्वीकार करने या देने से पहले विचार करने की बात है कि हमारी कौन-कौन सी उपलब्धियाँ हैं जिन पर बधाइयों का आदान-प्रदान किया जा सकता है?
       शुभकामनाएँ आदान-प्रदान करने से पूर्व देखना होगा कि हमारे पास कोई शुभयोजना हो जिसकी पूर्णता के लिए शुभकामनाओं का आदान प्रदान किया जाना अपेक्षित हो, शुभयोजना, आवश्यक संसाधन, क्रियान्वयन की दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में शुभकामनाओं का आदान-प्रदान शब्दाडम्बर मात्र है। अतः हमें बीते वर्ष में क्या-क्या किया? क्या-क्या किया जा सकता था? जो नहीं कर पाये। क्या-क्या प्राप्त किया? क्या-क्या खो दिया? आदि बिन्दुओं पर विचार कर गत वर्ष का मूल्यांकन करते हुए उससे पृष्ठपोषण (Feedback) प्राप्त कर पिछली योजनाओं पर सुधारात्मक कार्यवाही (Follow-up action) करते हुए अगले वर्ष के लिए पुननिर्योजन की आवश्यकता है। हमारे पास कोई शुभयोजना हो तभी तो शुभकामनाओं के आदान-प्रदान का औचित्य बनता है। 
           वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक सभी स्तरों पर इन बिन्दुओं पर विचार करने की आवश्यकता है तभी हम वास्तव में बधाई या शुभकामनाओं के आदान-प्रदान करने के पात्र कहे जा सकते हैं। अतः सभी मित्रों का आह्वान है कि वे आज का दिन मूल्यांकन, पृष्ठपोषण, सुधारात्मक कार्यवाही व पुननिर्याजन करने में लगाएँ व प्रबंधन तकनीकों का प्रयोग नव वर्ष के शुभ होने के लिए करें। इसी के साथ 2012 की उपलब्धियों के लिए बधाई, घावों के लिए सान्त्वना व नव वर्ष 2013 की शुभयोजनाओं की सफलता के लिए शुभकामनाएँ।   


बुधवार, 6 जून 2012

क्या वह निर्णय सही था?- तृतीय भाग




3-वैकल्पिक समाधानों को खोजना :-
 दहेज की समस्या एक सामाजिक समस्या है और इसका समाधान भी सामाजिक स्तर पर ही हो सकता है। इसके समाधान का कोई एक सूत्र संभव नहीं है। कोई भी कानून इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता, क्योंकि कानून भी तभी प्रभावी होता है, जब समाज उसे स्वीकार कर ले। कानून के अन्तर्गत शिकायत करने पर ही कार्यवाही होती है और शिकायत तभी होती है, जब समाज में स्वीकार किया जाय कि  कुछ गलत हुआ है और इसके विरूद्ध कानून उपचार उपलब्ध है जिसका प्रयोग किया जाना उपयुक्त है। यदि समाज किसी व्यवस्था को स्वीकार ही नहीं करेगा तो कानून के द्वारा वह व्यवस्था लागू करना संभव नहीं है। ऐसा कानून भ्रामक व अव्यवस्था फैलाने वाला ही सिद्ध होगा। ऐसा ही दहेज विरोधी कानूनों के साथ हुआ है। दहेज के खिलाफ बनाये गए सभी कानून अतार्किक, अप्रभावी व भ्रामक सिद्ध हुए हैं। वास्तविक बात यह भी है कि वे बेतुके भी हैं। उनका उपयोग नहीं दुरूपयोग ही संभव है और ऐसा हो भी रहा है। सभी शादियाँ दहेज के लेन-देन के साथ ही संपन्न होती हैं। यदि कोई व्यक्ति बिना दहेज के शादी करना चाहे तो उसकी शादी होना ही मुश्किल हो जाता है। 
              भले ही बचपन से बच्चों को पढ़ाया जाता हो कि दहेज लेना और देना दोनों ही जुर्म है किन्तु यह जुर्म सभी करते हैं। सभी इस जुर्म के गवाह भी बनते हैं। अब ऐसे कानून का क्या मतलब है, जो सभी को जुर्म करने के लिए मजबूर करे और सभी को अपराधी का दर्जा दे दे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि दहेज के विरोध में बनाये गये कानून व्यर्थ व बेतुके हैं। हाँ, दहेज एक समस्या है किन्तु क्यों हैं? इसका समाधान क्या हो सकता है? आओ इस के विकल्प तलाशें-
1. दहेज वास्तव में बुरा नहीं है। शादी के समय अपनी बेटी या बहन को उपहारों का देना प्रेम व माधुर्य का प्रतीक है और इसे किसी भी प्रकार गलत नहीं ठहराया जा सकता और इसे कोई कानून रोक नहीं सकता, रोकना भी नहीं चाहिये और यदि कोई ऐसा कानून बन भी जाय तो उसे लोकतान्त्रिक समास में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हां,  इसके अन्तर्गत लालच, प्रदर्शन, प्रतिष्ठा, माँग व दबाब सम्मिलित हो जाने के कारण यह एक कुप्रथा बन गया है। अत: एक विकल्प तो यह हो सकता है कि इस परंपरा को सामाजिक स्तर पर जागरूकता के द्वारा परिष्कृत करके पुन: उपयोगी रूप में स्थापित किया जाय। यह व्यवस्था शताब्दियों से सफलता पूर्वक कार्य कर रही है। सैद्धान्तिक रूप से यह कुप्रथा नहीं है वरन् इसके अन्तर्गत आ गई बुराइयों को निकालने की आवश्यकता है।
2. दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि दहेज पैतृक संपत्ति में अधिकार के स्थान पर एक व्यवस्था थी जो माधुर्य व प्रेम के साथ प्रयुक्त होती थी। वर्तमान भौतिकवादी युग में भावनात्मक व नैतिक रूप से व्यक्ति कमजोर हुआ है। अत: मायके पक्ष के लोग दहेज के रूप में लड़की का हिस्सा देना नहीं चाहते और ससुराल पक्ष लालच में अधिक से अधिक प्राप्त करना चाहता है। अत: आज कानून के द्वारा लड़की को उसका हिस्सा दिया जाना ही उपयुक्त है। इस प्रकार के कानून भी बनाये गये है किन्तु सामाजिक अस्वीकार्यता के कारण वे लागू नहीं हो सके हैं। अत: सामाजिक संगठनों, सरकार, गैर-सरकारी संगठनों व धार्मिक समूहों को इस सन्दर्भ में जागरूकता फैलाकर लड़कियों को पैतृक संपत्ति में उनका हिस्सा देना स्वीकार्य बनाना चाहिए। वैधानिक स्तर पर राज्य सरकारों को इसे लागू कर देना चाहिए और पैतृक संपत्ति में माता-पिता के बाद भाइयों के साथ-साथ बहनों का नाम भी स्वत: आना चाहिए। कुछ प्रदेशों में जहाँ इस कानून को लागू किया जा रहा है, वहाँ भी लड़कियों से लिखवा लिया जाता है कि वे संपत्ति में हिस्सा नहीं चाहिए। लड़कियाँ संकोच में, शर्म के कारण या सामाजिक दबाब में लिख देती हैं और वे संपत्ति से वंचित रह जाती हैं। अत: कानून में यह भी प्रावधान कर देना चाहिए कि लड़कियाँ अपने इस अधिकार को त्यागने को मजबूर न की जायँ और बिना प्रतिफल के नामान्तरण न हो सके।
3. तीसरा विकल्प यह हो सकता है कि शादी के बाद पति-पत्नी संयुक्त व्यक्तित्व माने जायँ कोई भी अधिकार या संपत्ति दोनों की ही होनी चाहिए। पत्नी की पैतृक संपत्ति में समान रूप से दोनों का नाम आये, पति की संपत्ति में समान रूप से दोनों का नाम हो यही नहीं। दोनों की स्वअर्जित व वैयक्तिक संपत्ति में भी दोनों का ही नाम हो। कानून के अन्तर्गत `स्त्री-धन´ की अवधारणा को समाप्त कर दिया जाय। किसी को भी अकेले नाम में कोई संपत्ति अर्जित करने या बैंक में खाता खोलने की अनुमति न हो। पति-पत्नी दोनों की संपत्ति में दोनों संयुक्त धारक हों। अलग होने की स्थिति में न केवल पत्नी पति की संपत्ति में भागीदार हो वरन् पति भी पत्नी की संपत्ति में भागीदार हो, यहाँ तक कि पत्नी के मायके में उसके माता-पिता की संयुक्त संपत्ति में पत्नी के साथ पति भी भागीदार बने और अपनी ससुराल में पत्नी निर्वाह व्यय की ही अधिकारी न हो, वरन संपूर्ण संपत्ति में भागीदार हो। तभी सही मायने में नर-नारी को अवसर की समानता मिलना सुनिश्चित हो सकेगा और जीवन साझीदार(LIFE-PARTNER) कहना उपयुक्त होगा।