गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

धारा के विपरीत तैरना साहस का काम हो सकता है, किन्तु बुद्धिमत्ता ध्येय की ओर तैरने में है

धारा के विपरीत तैरना साहस का काम हो सकता है, किन्तु बुद्धिमत्ता ध्येय की ओर तैरने में है



डॉ. विजय अग्रवाल के अनुसार, ‘धारा के विपरीत तैरना बहादुरी की बात तो हो सकती है, लेकिन समझदारी की नहीं।’ जी, हाँ! धारा के विपरीत तैरना साहस का काम अवश्य हो सकता है किन्तु विवेकवान व्यक्ति धारा के विपरीत नहीं, अपने लक्ष्य के अनुकूल तैरता है। यदि धारा के विपरीत तैरना आपको आपके लक्ष्य से दूर ले जाता है तो ऐसी स्थिति में केवल अपना साहस सिद्ध करने के लिए विपरीत तैरना बुद्धिमत्ता तो नहीं होगी। 
     अतः जो निर्णय मैंने सामाजिक बुराई के खिलाफ लिया था, उसके कारण मैं समाज से ही कट गया; जबकि यह भी विवाद का विषय है कि दहेज सामाजिक बुराई ही है? लड़कियों को सदियों से पैतृक संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जाता। उन्हें पराई संपत्ति मानकर उपेक्षा भी की जाती रही है। ऐसे में शादी के अवसर पर परंपरा के नाम पर ही सही कुछ उपहार देने की जो व्यवस्था है; दहेज के विरोध के नाम पर उससे भी वंचित करना क्या उनके साथ अन्याय नहीं हो जायेगा? पैतृक संपत्ति में व्यावहारिक रूप से उनका भाग निर्धारित किए बिना दहेज से भी वंचित करना लड़कियों के अधिकारों पर कुठाराघात करना है। समाज में जो धारा चल रही है, उस पर विचार-विमर्श की आवश्यकता हो सकती है किन्तु केवल विरोध के लिए विरोध करना तो बुद्धिमत्ता नहीं होती।
यदि हमें समुद्र में अनुसंधान कार्यो के लिए जाना है, तो धारा के साथ बहना ही उचित रहेगा। यदि धारा हमारे गंतव्य की ओर ही बह रही है, तो फिर हम धारा के विपरीत जाने के साहस का प्रयोग क्यों करें? किस समय किस संसाधन का कितनी मात्रा में प्रयोग करना है; यह तो हमें प्रबंधन के अंतर्गत नियोजन से ही पता चलेगा। 

एक टिप्पणी भेजें