शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

प्रबन्धन का आधार- निर्णयन

निर्णयन 


निर्णयन प्रबंधन का ही क्यों? प्रत्येक व्यक्ति का अनिवार्य कार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में निरंतर विभिन्न निर्णय लेने पड़ते हैं। हम वैयक्तिक, पारिवारिक व सांगठनिक प्रत्येक क्षेत्र में छोटे-बड़े निर्णय लेते ही रहते हैं। वास्तव में निर्णय लेना व उसे लागू करना ही तो प्रबंधन है। 
          हम प्रातः कितने बजे उठना है? चाय पीनी है या दूध? कहाँ जाना है? क्या करना है? क्या खाना है? बच्चे का प्रवेश कौन-से विद्यालय में करवाना है?  पत्नी के लिए कौन-सी साड़ी खरीदनी है? कूलर कौन-सी कंपनी का लेना है? आदि छोटे-छोटे निर्णयों से लेकर बड़े-बड़े पूँजी व जीवन के विनियोग से संबन्धित निर्णय भी लेते हैं। जो व्यक्ति निर्णय लेने में कुशलता हासिल कर लेता है, उसी के प्रयास सफलता प्राप्त करते हैं। टैरी के शब्दों में, ‘यदि प्रबंधक की कोई सार्वभौमिक पहचान है तो वह उसका निर्णय लेना ही है।’ 
        निर्णय लेना प्रबंधन के समस्त कार्यो नियोजन, संगठन, नियुक्तियाँ, निर्देशन व नियंत्रण में निहित हैं। साइमन ने तो यहाँ तक कह दिया, ‘निर्णय लेना ही प्रबंधन है।’ निर्णयन का व्यावहारिक अर्थ तार्किक रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से है।
वेब्सटर शब्द कोष के अनुसार, ‘निर्णयन किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में एक विचार या कार्य के क्रम को निश्चित करने की क्रिया है।’ वास्तव में निर्णयन से आशय निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न विकल्पों की खोज व उन विकल्पों के विश्लेषण व मूल्यांकन के बाद सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करने से है। 
        निर्णय लेना विभिन्न अवसरों की उपलब्धता को पहचानना और उनमें से उपयुक्त अवसर का लाभ उठाने से है। निर्णय लेना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। प्रतिदिन हमें विभिन्न निर्णय लेने ही पड़ते हैं। व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक किसी भी स्तर पर सक्रिय रहने के लिए निर्णय लेना एक अनिवार्य आवश्यकता है। प्रत्येक क्षेत्र में सफलता हमारे द्वारा लिए गये निर्णयों और उनके क्रियान्वय की स्थिति पर निर्भर करता है।

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