बुधवार, 17 जून 2009

जीवन में प्रबन्धन की आवश्यकता

जीवन में प्रबन्धन की आवश्यकता



जीवन प्रबन्धन एक अप्रचलित व नई अवधारणा प्रतीत होती है। यद्यपि जीवन प्रबंधन भारतीय परिवारों में अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होता रहा है तथापि ओपचारिक रूप से इसका उल्लेख हमें नहीं मिलता। वर्तमान समय में तो परिवारों में इसका प्रयोग भी दिखाई नहीं पड़ रहा। इससे पूर्व जीवन प्रबन्धन का प्रयोग तो यदा-कदा दिखाई दे जाता किन्तु औपचारिक रूप से इसकी शिक्षा की आवश्यकता कभी महसूस नहीं की गयी। हम प्रबन्धन शब्द से भली भाँति परिचित हैं। औद्योगिक व वाणज्यिक संस्थायें , शिक्षा संस्थाएँ, चिकित्सा संस्थाएँ ही नहीं परिवार व व्यक्तिगत जीवन में भी विकास को सुनिश्चत करने के लिये प्रबंधन की आवश्यकता है।


प्रबंधन अपने आप में कोई संसाधन नहीं अपितु संसाधनों के कुशलतम प्रयोग को प्रोत्साहित करने वाली प्रेरणा है। प्रबन्धन हमें सिखाता है, कैसे न्यूनतम संसाधनों के उपयोग के द्वारा अधिकतम संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है। प्रबन्धन का आधार वाक्य है-`श्रेष्ठतम कार्य न्यूनतम आवश्यक प्रयासों व ऊर्जा का प्रयोग करते हुए संपादित किया जाना चाहिए।´ सुनने में बड़ा सुन्दर लगता है, न्यूनतम आवश्यक प्रयासों व ऊर्जा का प्रयोग करते हुए कार्य को संपादित करना। मेरे विचार में इस बात से कोई असहमत भी न होगा। वर्तमान में संस्थागत स्तर पर प्रबंधन का प्रयोग बढ़ने भी लगा है। औद्योगिक, वाणिज्यक प्रतिष्ठानों में प्रबंधन का प्रयोग किया भी जाने लगा है। प्रबंधन की शिक्षा को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सब प्रयासों के बाबजूद भारत में कुशल प्रबंधको की कमी देखने को मिलती है। जो प्रबंधक हैं, वे भी आर्थिक गतिविधियों के प्रबंधन में ही लगे हुए हैं। अनार्थिक गतिविधियों, सामाजिक, पारिवारिक व व्यक्तिगत जीवन में हम अवलोकन करेंगे तो प्रबंधन का प्रयोग नगण्य ही है। यहाँ तक देखा जा सकता है कि कुशल व्यवसायिक प्रबंधक भी प्रबंधन के सिद्धांतों का प्रयोग सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत गतिविधियों में नहीं करते। व्यक्तिगत जीवन में तो इसका बिल्कुल भी ध्यान हम लोग नहीं रखते। जो ध्यान भी रखता है, उसे कंजूस जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। ग्रामीण भारत में तो इस शब्द से भी लोग परिचित नहीं होते। इसके प्रयोग की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।


प्राचीन समय में जिस कुशल गृह प्रबंधन की बात की जाती थी, वह भी देखने को नहीं मिलता क्योंकि आधुनिकता व फैशन के प्रभाव के कारण जो श्रेष्ठ जीवन शैली थी उसका तो ह्रास हुआ है किन्तु शिक्षा के नाम पर उन्हें जो दिया गया वह केवल अक्षर-ज्ञान व अंक-ज्ञान तक सीमित रहा। उन्हें शिक्षा देते समय यह ख्याल किसी को भी नहीं आया कि उन्हें भी प्रबन्धन की शिक्षा दी जानी चाहिए, क्योंकि प्रबंधन का प्रयोग जीवन को भी उद्देश्यपरक व उपयोगी बना सकता है। प्रबंधन के सिद्धांतों का जीवन में प्रयोग ही जीवन प्रबंधन कहा जा सकता है। यह तभी संभव है, जब हम प्रबंधन को प्राथमिक शिक्षा के पाठयक्रम में ही इसे सरलतम रूप में समाहित कर दें।


प्रबंधन को समझे बिना जीवन प्रबंधन को समझा नहीं जा सकता। अत: जीवन में प्रबंधन की आवश्यकता को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक है कि पहले हम प्रबंधन को समझे। वास्तव में प्रबंधन को परिभाषित करने लगें तो यह सरल कार्य नहीं है, लेकिन इसको समझने के लिए बहुत लंबी-चौड़ी परिभाषाओं का अनुशीलन करने की आवश्यकता नहीं। प्रबंधन उद्देश्यपरक, व्यक्तिपरक, लोचपूर्ण व सर्वव्यापक प्रक्रिया है। प्रत्येक उद्देश्यपूर्ण क्रिया जो व्यक्तियों के समूह द्वारा संपन्न की जाती है, प्रबंधन के प्रयोग के द्वारा न्यूनतम प्रयासों व संसाधनों से ही श्रेष्ठ परिणाम प्रदान कर सकती है। वस्तुत: प्रबंधन मानवीय क्रियाओं से संबधित है, प्रबंधन का प्रयोग मानव द्वारा किया जाता है ताकि जीवन को सुगम, आनन्दपूर्ण व संतुष्टिदायक बनाया जा सके। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जीवन को सुगम,आनन्दपूर्ण व संतुष्टिदायक बनाने के लिए जीवन में प्रबंधन का प्रयोग ही जीवन प्रबंधन है। उन्नत, उज्ज्वल, आनन्दपूर्ण, संतुष्टिदायक व सुगम जीवन के लिए जीवन प्रबंधन का प्रयोग अनिवार्यारूप से किया जाना चाहिए। जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? जीवन का सदुपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए? किस प्रकार संपूर्ण जीवन को छोटे-छोटे कालखण्डों में बाँटकर संपूर्णता से जिया जा सकता है। इसका सुन्दरतम रूप हमारे प्राचीन ग्रन्थों में देखा जा सकता है। किन्तु कालान्तर में समय के साथ-साथ इसका आधुनिकीकरण न किये जाने के कारण यह अप्रचलित होता गया तथा हमने प्रबन्धन का उपयोग अन्य मानवीय क्रियाओं जैसे-औद्योगिक व वाणिज्यक क्षेत्रों में तो किया किन्तु जीवन को संपूर्णता से जीने के लिए अपने जीवन में प्रबंधन का स्थान सिमट कर लगभग शून्य होता गया। यही कारण है कि हमारे पास सम्पूर्ण भौतिक, मानवीय संसाधनों व अकूत संपदा के होते हुए भी संतुष्टि सुख व आनन्द का अभाव होता गया। आज समय आ गया है कि प्रबंधन का प्रयोग न केवल भौतिक विकास के लिए किया जाय बल्कि जीवन के संपूर्ण विकास के हेतु प्रबंधन का प्रयोग करने के लिए इसको व्यवहारिक व समयानुकूल बनाया जाय तथा प्राथमिक व अनिवार्य शिक्षा के द्वारा इसको जन-जन तक पहुँचाया जाय ताकि मानव संपूर्णता में विकास कर सके। आज हम व्यवहारिक धरातल पर देखें तो हमारे पास संसाधनों की इतनी कमी नहीं है कि हम अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति भी न कर सकें।

अनाज भण्डार गृहों में पड़ा सड़ता है तो दूसरी ओर लोग भूख से मरते हैं। कुछ लोग भूख और कुपोषण से परेशान हैं तो ऐसे लोगें की भी कमी नहीं है जो अधिक खाने तथा असन्तुलित खाने के कारण मोटापे जैसे गंभीर रोग से पीड़ित हैं। यह सब प्रबंधन की कमी के कारण है। प्रत्येक स्तर पर प्रबन्धन की आवश्यकता है। आज स्थिति यह है कि हमारे संसाधन प्रबंधन की कमी के कारण अप्रयुक्त रह जाते हैं तथा हम स्वास्थ्य शिक्षा व चिकित्सा जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं की उपलब्धता होते हुए भी शिक्षा, स्वास्थ्य तथा विकास के उस स्तर को प्राप्त नहीं कर पाते जो उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करके प्राप्त किया जाना चाहिए। प्रबंधन की भाषा में न्यूनतम संसाधनों से अधिकतम उपयोगिता के स्थान पर हम अधिकतम संसाधनों से न्यूनतम उपयोगिता की स्थिति में हैं। आज विद्यालयों में अध्यापक खाली बैठे रहते हैं तो उनके पास छात्र नहीं होते जबकि दूसरी ओर छात्रों की लंबी कतार होती है उनका प्रवेश विद्यालयों में नहीं हो पाता, हम खाद्य पदार्थो का प्रचुर मात्रा में सेवन करते हैं किन्तु उनके पकाने के ढंग तथा प्रयोग करने के ढंग की सही जानकारी न होने के कारण या हमारी लापरवाही के कारण उनके पोष्टिक तत्व हमारे शरीर तक नहीं पहुँच पाते। अत: जीवन प्रबंधन की शिक्षा अनौपचारिक व औपचारिक दोनों ही प्रकार से देकर ही हम विकास के अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर पायेंगे।

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