मंगलवार, 13 जनवरी 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-१५

मानव संसाधन के रूप में विकासः 


वर्तमान में संपूर्ण विश्व में जनसंख्या वृद्धि को एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है। तथ्यों से भी यही सिद्ध होता है कि जिन प्रदेशों की जनसंख्या अधिक है, वहाँ पिछड़ापन अधिक है। इसके साथ ही दूसरा पक्ष भी है। हमारे देश में जनसंख्या अधिक है और रोजगार की कमी भी है। रोजगार की कमी अवश्य है किंतु आप अनुसंधान कीजिए। जो रोजगार उपलब्ध हैं, उनके लिए योग्य व कुशल व्यक्ति नहीं हैं। आप किसी भी क्षेत्र में चले जाइए। चिकित्सालयों में चिकित्सकों की कमी है; विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की कमी है; सेना में अधिकारियों व सैनिकों की कमी है; प्रत्येक क्षेत्र में कुशल प्रबंधकों की कमी है; प्रशासन में कुशल प्रशासकों की कमी है; यही नहीं विकास के लिए समर्पित व अपने अनुयायियों की आशा के अनुरूप परिणाम देने वाले नेताओं की कमी है। कहने का आशय यह है कि आप जिस क्षेत्र की बात करें उसी क्षेत्र में कुशल व्यक्तियों की कमी हैं। इसका मूल कारण है कि हम व्यक्ति को मानव संसाधन के रूप में विकसित करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। हम उचित शिक्षा व प्रशिक्षण नहीं दे पा रहे हैं। हमारी संस्थाएँ शिक्षा व प्रशिक्षण देने की अपेक्षा प्रमाण पत्र बेच रही हैं।
         वास्तव में जीवन प्रबन्धन व्यक्ति व परिवार दोनों के विकास के लिए आवश्यक है। बच्चे के लालन-पालन के समय ध्यान रखना चहिए कि उसके शरीर व मस्तिष्क का सन्तुलित विकास हो। उसे स्वास्थ्यप्रद व स्वतन्त्र वातावरण मिले। मां-बाप को समझना चाहिए कि स्वास्थ्य व शिक्षा ही बच्चे के लिए अमूल्य निधि है। जीवन प्रबन्ध में यह महत्वपूर्ण पूंजी निवेश है। यदि बच्चा श्रेष्ठ मानव संसाधन के रूप में विकसित हो गया तो वह स्वयं परिवार, समाज व राष्ट्र की सम्पत्ति होगा। यदि वह समर्थ, विवेकवान व गुण सम्पन्न बन गया तो सम्पत्ति तो स्वयं कमा ही लेगा। सम्पत्ति एकत्रित करने के चक्कर में बच्चे को नाकारा बना देना उचित नहीं। यदि उसमें क्षमताएं होगीं तो अपनी आजीविका स्वयं कमा लेगा। 
ध्यातव्य है कि मनुष्य का जन्म सम्पत्ति अर्जित करने के लिए नहीं हुआ है, हाँ, जीवन के लिए संपत्ति सहायक हो सकती है किन्तु संपत्ति के लिए जीवन को होम कर देना तो किसी प्रकार की बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती। अतः मां-बाप बच्चों का जीवन प्रबन्धन करें तो स्वस्थ बच्चे का जन्म, विकासात्मक पालन-पोषण व जीवनोपयोगी शिक्षा को विशेष महत्व प्रदान करें। संतान सक्षम होगी तो धन स्वयं कमा लेगी। हमें अपनी भावी पीढ़ियों पर अविश्वास करके नाकारा नहीं बनाना चाहिए। उन्हें योग्य बनाइये, धन वे स्वयं कमा लेंगी। बच्चे को समर्थ, योग्य, विवेकशील, सकारात्मक प्रवृत्ति वाला सामाजिक व्यक्ति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए प्रेम, विश्वास, मानसम्मान व स्वतंत्रता से परिपूर्ण वातावरण का सृजन आवश्यक है। 

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