प्रबंध : अर्थ व परिभाषा
जब से मानव ने समूह में रहना प्रारंभ किया है, तब से किसी न किसी रूप में मानव की गतिविधियों में प्रबंध का अस्तित्व रहा है। प्रबंध एक सर्वव्यापक व अमूर्त अवधारणा है, जिसे देखा व छुआ नहीं जा सकता केवल महसूस किया जा सकता है। मेरे विचार में प्रबंध ईश्वर की तरह सर्वव्यापक है तथा विश्व का सबसे बड़ा प्रबंधक ईश्वर है, जो समस्त गतिविधियों का सुचारू प्रबंध करता है। जिस प्रकार ईश्वर व उसके कार्यो की व्याख्या सम्भव नहीं है; उसी प्रकार प्रबंध की व्याख्या भी सम्भव नहीं है। लोग अपने-अपने विचार व दृष्टी दृष्टिकोण के अनुसार जिस प्रकार ईश्वर की प्रतिमाएं व उसके बारे में विचारों का सृजन करते हैं; उसी प्रकार प्रबंध की परिभाषाएं भी विभिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न-भिन्न दी जाती रही हैं और दी जाती रहेंगी।
प्रबंध के सन्दर्भ में एक कहानी भी उद्धृत की जाती है- "एक बार कुछ अंधों को एक हाथी मिल गया। उन्होंने हाथी को छूकर, टटोल-टटोल कर महसूस किया और हाथी के बारे में अपनी अनुभूति बताई। हाथी की टांगों को पकड़ने वाले ने हाथी को किसी खम्भे या पेड़ के तने की भांति बताया, पूंछ पकड़ने वाले ने उसे रस्सी जैसा बताया, सूड़ पकड़ने वाले ने उसे सांप जैसा बताया, कान पकड़ने वाले ने हाथी को सूप जैसा बताया, दांत पकडने वाले ने भाले जैसा तो हाथी के पेट को छूने वाले ने हाथी को मशक या दीवार जैसा बताया।" स्पष्ट है कि हाथी के बारे में सही जानकारी किसी को भी न हो सकी। ठीक यही स्थिति प्रबंध के बारे में है। इसकी परिभाषाएं तो बहुतायत में हैं किन्तु एक सर्वमान्य परिभाषा का अभाव ही है। फिर भी अध्ययन के दृष्टिकोण से कुछ परिभाषाओं को ध्यान में रखना उपयोगी रहेगा।
प्रबंध की परिभाषाएं :-
1. वैज्ञानिक प्रबंध के प्रणेता श्री एफ.डब्ल्यू.टेलर के अनुसार, ´´प्रबंध यह जानने की कला है कि आप क्या करना चाहते हैं? तत्पश्चात यह सुनिश्चित करना कि वे (कर्मचारी) उस कार्य को सर्वात्तम व मितव्ययिता पूर्वक करें।´´
2. टेरी के अनुसार, ``प्रबंध एक अदृश्य शक्ति है। इसे देखा एवं छुआ नहीं जा सकता किन्तु इसके प्रयासों के परिणामों के आधार पर इसकी उपस्थिति का स्वत: अहसास हो जाता है।´´
3. प्रबंध के सिद्धान्तों के प्रणेता श्री हेनरी फेयोल के अनुसार, ``प्रबंध पूर्वानुमान एवं नियोजन करना, संगठित करना, निर्देश देना, समन्वय करना तथा नियन्त्रण करना है।´´
4. मेरी पार्कर फोलेट के अनुसार, ``प्रबंध अन्य लोगों के माध्यम से कार्य करवाने की कला है।´´
5. लारेंस एप्पले के अनुसार, ``अन्य व्यक्तियों के प्रयासों से परिणाम प्राप्त करना ही प्रबंध है।´´
6. कुंटज के अनुसार,`` औपचारिक रूप से संगठित लोगों के समूहों के साथ तथा उनके माध्यम से कार्य करवाने की कला ही प्रबंध है।´´
7. वीहरिच तथा कुण्टज के अनुसार, ``प्रबंध एक ऐसे वातावरण का निर्माण करने तथा उसे बनाये रखने की प्रक्रिया है, जिसमें लोग समूह में कार्य करते हुए चयनित उद्देश्यों को दक्षतापूर्वक प्राप्त करते हैं।´´
उपरोक्त परिभाषाओं के अध्ययन व प्रबंध के बारे में बनी अवधारणा के अनुरूप कहा जा सकता है कि ``प्रबंध मानव को अभिप्रेरित करके निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप कार्य कराने वाली एक अदृश्य शक्ति है, जिसमें नियोजन, संगठन, नियुक्तियां, निर्देशन व नियन्त्रण जैसी क्रिया-विधियों का प्रयोग किया जाता है।´´ सार रूप में लोकतन्त्र की भाषा में कहा जा सकता है, ``मानव द्वारा मानव के लिए मानव द्वारा कार्य कराना ही प्रबंध है।"
मंगलवार, 22 जून 2010
सोमवार, 21 जून 2010
मानव संसाधन प्रबंध : द्वितीय भाग
मानव संसाधन प्रबंध
मानव संसाधन प्रबंध को समझने के लिए इसके संरचनात्मक अर्थ को समझते हैं। यह तीन शब्दों से मिलकर बना है, मानव, संसाधन व प्रबंध। मानव संसाधन प्रबंध पर चर्चा करने से पूर्व इन तीनों के अलग-अलग अर्थ जानना उपयोगी होगा।
1. मानव- मानव शब्द का अर्थ बड़ा ही सामान्य है। मानव (human being) में स्त्री व पुरूष दोनों ही सम्मिलित हैं। प्राचीन समय में महिलाओं के विकास पर कोई ध्यान नहीं, दिया जाता था, यहां तक कि दास-प्रथा के समय दासों को भी मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता था। वर्तमान में मानव के अन्दर दोनों सम्मिलित हैं। यद्यपि मानव में सभी उम्र के व्यक्ति सम्मिलित किए जाते हैं, तथापि उद्योग व व्यवसाय के क्षेत्र में कार्य करने की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों को ही मानव के अर्थ में सम्मिलित करके अध्ययन में सुविधा रहेगी।
2. संसाधन(resource)- मानव आदि काल से ही विकास की ओर प्रवृत्त रहा है। प्रारंभ में उसकी आवश्यकताएं अत्यन्त सीमित थी किन्तु समय के साथ-साथ उसने उत्तरोत्तर अपने जीवन स्तर का उन्नयन किया है। उसकी आवश्यकताओं पर इच्छाएं हावी होने लगी हैं। मानव विभिन्न वस्तुओं व सेवाओं की आवश्यकता व इच्छा महसूस करता है। वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न वस्तुओं को जुटाता है, उत्पादन करता है, उपयोगिता बढ़ाता है। उसकी आवश्यकता व इच्छाओं की पूर्ति के लिए उत्पादन कार्य में योग देने वाले साधन ही संसाधन कहलाते हैं, जैसे- भूमि, पूंजी, तकनीक, श्रम, प्रबंध व उद्यम आदि।
डॉ जिमरमैन के अनुसार, "संसाधन का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति करना है, यह उद्देश्य व्यक्तिगत आवश्यकताओं तथा सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ती करना है." वास्तव मैं ऐसा कोई भी पदार्थ जिसे अधिक उपयोगी वस्तुओं में रूपांतरित किया जा सकता है, संसाधन कहलाता है. डॉ जिमरमैन ने लिखा है, "संसाधन होते नहीं, मानव के सहयोग से बन जाते हैं. " इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कोई भी प्राकृतिक संपदा तभी संसाधन का रूप ले सकती है, जब मनुष्य ने उसे प्रयोग करने की तकनीकी क्षमता प्राप्त कर ली हो.
कहा जा सकता है किसी वस्तु को संसाधन तब कहा जा सकता है, जब -
१-मानव द्वारा वस्तु का उपयोग संभव हो.
२.इस वस्तु या पदार्थ का रूपान्तरण अधिक मूल्यवान व उपयोगी वस्तु में किया जा सकता हो.
इन संसाधनों को दो वर्गो में वर्गीकृत किया जा सकता है, सजीव संसाधन व निर्जीव संसाधन। श्रम, प्रबंध व उद्यम सजीव संसाधन हैं, जो निर्जीव संसाधनों का विकास कर उनकी उपयोगिता बढ़ाते हैं।
3. प्रबंध (management)- ``पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों को सर्वोत्तम व मितव्ययिता पूर्ण ढंग से प्राप्त करने के लिए लोगों के साथ मिलकर कार्य कराने की प्रक्रिया को प्रबंध कहा जाता है।´´ एक समय था, जब लोगों से येन-केन-प्रकारेण कार्य कराने को ही प्रबंध कहा जाता था किन्तु आधुनिक समय में यह स्थापित हो चुका है कि श्रम, प्रबंध व उद्यम मानवीय साधन हैं और मानवीय साधन अन्य साधनों का उपयोग करते हैं। अत: अन्य साधनों का मितव्ययिता पूर्वक उपयोग करके अधिकतम व गुणवत्तायुक्त कार्य, मानवीय साधनों के शोषण से नहीं वरन् उनका विकास करके, उन्हें अभिप्रेरित व सन्तुष्ट करके ही, कराया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि सभी उत्पादन मानव के द्वारा मानव के लिए हैं तथा मानव संसाधन का विकास करके, न केवल मानव संसाधन अधिक उपयोगी हो जाता है, वरन् वह अन्य साधनों का भी सर्वोत्तम व मितव्ययितापूर्ण उपयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त करता है।
उपरोक्त के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है उत्पादन के क्षेत्र में मानव, न केवल भौतिक संसाधनों का प्रबंध करता है, वरन् वह स्वयं में एक महत्वपूर्ण संसाधन है, जिसके प्रबंधन के द्वारा न केवल उसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, वरन् मानव संसाधन के प्रबंधन से अन्य संसाधनों की उपयोगिता बढ़ाकर न्यूतम् लागत व प्रयासों से अधिकतम् परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। मानव संसाधन प्रबंध उत्पादन के सजीव संसाधन श्रम, प्रबंध व उद्यम का प्रबंध करता है अर्थात मानव संसाधन प्रबंध, प्रबंध का भी प्रबंध करता है तथा मानव संसाधन प्रबंध, प्रबंध का ही भाग है। अत: इसे समझने के लिए प्रबंध के अर्थ व परिभाषा को समझना भी उपयोगी रहेगा।
मानव संसाधन प्रबंध को समझने के लिए इसके संरचनात्मक अर्थ को समझते हैं। यह तीन शब्दों से मिलकर बना है, मानव, संसाधन व प्रबंध। मानव संसाधन प्रबंध पर चर्चा करने से पूर्व इन तीनों के अलग-अलग अर्थ जानना उपयोगी होगा।
1. मानव- मानव शब्द का अर्थ बड़ा ही सामान्य है। मानव (human being) में स्त्री व पुरूष दोनों ही सम्मिलित हैं। प्राचीन समय में महिलाओं के विकास पर कोई ध्यान नहीं, दिया जाता था, यहां तक कि दास-प्रथा के समय दासों को भी मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता था। वर्तमान में मानव के अन्दर दोनों सम्मिलित हैं। यद्यपि मानव में सभी उम्र के व्यक्ति सम्मिलित किए जाते हैं, तथापि उद्योग व व्यवसाय के क्षेत्र में कार्य करने की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों को ही मानव के अर्थ में सम्मिलित करके अध्ययन में सुविधा रहेगी।
2. संसाधन(resource)- मानव आदि काल से ही विकास की ओर प्रवृत्त रहा है। प्रारंभ में उसकी आवश्यकताएं अत्यन्त सीमित थी किन्तु समय के साथ-साथ उसने उत्तरोत्तर अपने जीवन स्तर का उन्नयन किया है। उसकी आवश्यकताओं पर इच्छाएं हावी होने लगी हैं। मानव विभिन्न वस्तुओं व सेवाओं की आवश्यकता व इच्छा महसूस करता है। वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न वस्तुओं को जुटाता है, उत्पादन करता है, उपयोगिता बढ़ाता है। उसकी आवश्यकता व इच्छाओं की पूर्ति के लिए उत्पादन कार्य में योग देने वाले साधन ही संसाधन कहलाते हैं, जैसे- भूमि, पूंजी, तकनीक, श्रम, प्रबंध व उद्यम आदि।
डॉ जिमरमैन के अनुसार, "संसाधन का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति करना है, यह उद्देश्य व्यक्तिगत आवश्यकताओं तथा सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ती करना है." वास्तव मैं ऐसा कोई भी पदार्थ जिसे अधिक उपयोगी वस्तुओं में रूपांतरित किया जा सकता है, संसाधन कहलाता है. डॉ जिमरमैन ने लिखा है, "संसाधन होते नहीं, मानव के सहयोग से बन जाते हैं. " इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कोई भी प्राकृतिक संपदा तभी संसाधन का रूप ले सकती है, जब मनुष्य ने उसे प्रयोग करने की तकनीकी क्षमता प्राप्त कर ली हो.
कहा जा सकता है किसी वस्तु को संसाधन तब कहा जा सकता है, जब -
१-मानव द्वारा वस्तु का उपयोग संभव हो.
२.इस वस्तु या पदार्थ का रूपान्तरण अधिक मूल्यवान व उपयोगी वस्तु में किया जा सकता हो.
इन संसाधनों को दो वर्गो में वर्गीकृत किया जा सकता है, सजीव संसाधन व निर्जीव संसाधन। श्रम, प्रबंध व उद्यम सजीव संसाधन हैं, जो निर्जीव संसाधनों का विकास कर उनकी उपयोगिता बढ़ाते हैं।
3. प्रबंध (management)- ``पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों को सर्वोत्तम व मितव्ययिता पूर्ण ढंग से प्राप्त करने के लिए लोगों के साथ मिलकर कार्य कराने की प्रक्रिया को प्रबंध कहा जाता है।´´ एक समय था, जब लोगों से येन-केन-प्रकारेण कार्य कराने को ही प्रबंध कहा जाता था किन्तु आधुनिक समय में यह स्थापित हो चुका है कि श्रम, प्रबंध व उद्यम मानवीय साधन हैं और मानवीय साधन अन्य साधनों का उपयोग करते हैं। अत: अन्य साधनों का मितव्ययिता पूर्वक उपयोग करके अधिकतम व गुणवत्तायुक्त कार्य, मानवीय साधनों के शोषण से नहीं वरन् उनका विकास करके, उन्हें अभिप्रेरित व सन्तुष्ट करके ही, कराया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि सभी उत्पादन मानव के द्वारा मानव के लिए हैं तथा मानव संसाधन का विकास करके, न केवल मानव संसाधन अधिक उपयोगी हो जाता है, वरन् वह अन्य साधनों का भी सर्वोत्तम व मितव्ययितापूर्ण उपयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त करता है।
उपरोक्त के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है उत्पादन के क्षेत्र में मानव, न केवल भौतिक संसाधनों का प्रबंध करता है, वरन् वह स्वयं में एक महत्वपूर्ण संसाधन है, जिसके प्रबंधन के द्वारा न केवल उसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, वरन् मानव संसाधन के प्रबंधन से अन्य संसाधनों की उपयोगिता बढ़ाकर न्यूतम् लागत व प्रयासों से अधिकतम् परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। मानव संसाधन प्रबंध उत्पादन के सजीव संसाधन श्रम, प्रबंध व उद्यम का प्रबंध करता है अर्थात मानव संसाधन प्रबंध, प्रबंध का भी प्रबंध करता है तथा मानव संसाधन प्रबंध, प्रबंध का ही भाग है। अत: इसे समझने के लिए प्रबंध के अर्थ व परिभाषा को समझना भी उपयोगी रहेगा।
रविवार, 20 जून 2010
मानव संसाधन प्रबंध : अवधारणा - प्रथम भाग
मानव संसाधन प्रबंध : अवधारणा - प्रथम भाग
किसी भी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया या प्रक्रिया की बात आते ही हम उसके बारे में जानने का प्रयास करते हैं. उसे देखते है, उसके बारे में पूछताछ करते है, अध्ययन करते है और विभिन्न जानकारियों के फ़लस्वरूप हमारे मस्तिष्क में उसकी एक अमूर्त छवि बनती है, जिसे अवधारणा (CONCEPT) कहा जाता है. किसी भी विषय के अध्ययन के बाद उसकी एक अवधारणा बनती है, तभी कहा जा सकता है कि वह विषय हमारी समझ में आ गया है. जब तक हमारे मस्तिष्क में अवधारणा नहीं बनती उसके बारे में हमारी जानकारी केवल रटने पर आधारित होती है. अवधारणा स्थिर प्रत्यय या संकल्पना नहीं है. अध्ययन, अनुभव, अनुभूति व चिन्तन-मनन के साथ अवधारणा में परिवर्तन आ सकता है.
आओ अवधारणा को और स्पष्ट समझने का प्रयास करते हैं-
बेबस्टर शब्दकोश के अनुसार, "अवधारणा वह अमूर्त या निराकार विचार है, जो विशिष्ट उदाहरणों या घटनाओं से सामान्यीकृत किया गया है."( "A concept is an abstract idea generalised from particular instance.")
डा.आर.एल.नौलखा के अनुसार, "प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में किसी भी वस्तु, कार्य या व्यक्ति के सम्बंध में कुछ विचार या आकृतियां उभर सकती हैं, ये विचार या आकृतियां उनके भौतिक स्वरूप या विशेषताओं के आधार पर बनती हैं. अतः ऐसा विचार या आकृति ही उस वस्तु, कार्य या व्यक्ति के बारे में अवधारणा (CONCEPT) है."
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति,कार्य या विषय के बारे में हमारी अवधारणा तुरन्त नहीं बनती वरन हमारे अवलोकन, अध्ययन, चिन्तन-मनन के परिणाम स्वरूप उभरती है और विकसित होती रहती है.
अतः मानव संसाधन प्रबंधन के बारे में कोई अवधारणा बनाने के लिये हमें न केवल इसका अर्थ, परिभाषा व इतिहास जानना होगा वरन इसके बारे में गहन चिन्तन-मनन भी करना होगा.
कल के पोस्ट में इसके अर्थ पर विचार करेंगे.
किसी भी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया या प्रक्रिया की बात आते ही हम उसके बारे में जानने का प्रयास करते हैं. उसे देखते है, उसके बारे में पूछताछ करते है, अध्ययन करते है और विभिन्न जानकारियों के फ़लस्वरूप हमारे मस्तिष्क में उसकी एक अमूर्त छवि बनती है, जिसे अवधारणा (CONCEPT) कहा जाता है. किसी भी विषय के अध्ययन के बाद उसकी एक अवधारणा बनती है, तभी कहा जा सकता है कि वह विषय हमारी समझ में आ गया है. जब तक हमारे मस्तिष्क में अवधारणा नहीं बनती उसके बारे में हमारी जानकारी केवल रटने पर आधारित होती है. अवधारणा स्थिर प्रत्यय या संकल्पना नहीं है. अध्ययन, अनुभव, अनुभूति व चिन्तन-मनन के साथ अवधारणा में परिवर्तन आ सकता है.
आओ अवधारणा को और स्पष्ट समझने का प्रयास करते हैं-
बेबस्टर शब्दकोश के अनुसार, "अवधारणा वह अमूर्त या निराकार विचार है, जो विशिष्ट उदाहरणों या घटनाओं से सामान्यीकृत किया गया है."( "A concept is an abstract idea generalised from particular instance.")
डा.आर.एल.नौलखा के अनुसार, "प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में किसी भी वस्तु, कार्य या व्यक्ति के सम्बंध में कुछ विचार या आकृतियां उभर सकती हैं, ये विचार या आकृतियां उनके भौतिक स्वरूप या विशेषताओं के आधार पर बनती हैं. अतः ऐसा विचार या आकृति ही उस वस्तु, कार्य या व्यक्ति के बारे में अवधारणा (CONCEPT) है."
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति,कार्य या विषय के बारे में हमारी अवधारणा तुरन्त नहीं बनती वरन हमारे अवलोकन, अध्ययन, चिन्तन-मनन के परिणाम स्वरूप उभरती है और विकसित होती रहती है.
अतः मानव संसाधन प्रबंधन के बारे में कोई अवधारणा बनाने के लिये हमें न केवल इसका अर्थ, परिभाषा व इतिहास जानना होगा वरन इसके बारे में गहन चिन्तन-मनन भी करना होगा.
कल के पोस्ट में इसके अर्थ पर विचार करेंगे.
शनिवार, 19 जून 2010
नेट वाणिज्य विषय का पाठयक्रम
वाणिज्य में नेट
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) का पाठयक्रम
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वर्ष में दो बार जून और दिसम्बर में आयोजित की जाने वाली यह परीक्षा महाविद्यालय स्तरीय अध्यापकों की पात्रता निर्धारित करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाने वाली एकमात्र परीक्षा है. इसकी अधिसूचना बेबसाइट और समाचार पत्र दोनों पर जारी की जाती है. इसका पाठयक्रम आयोग की बेबसाइट पर दिये हुए लिन्क पर देखा जा सकता है. यहां पर वाणिज्य के हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थिओं के लिये पाठ्यसामग्री की कमी को देखते हुए तृतीय प्रश्न-पत्र के (IIIB) तृतीय ऐच्छिक खण्ड- "मानव संसाधन प्रबन्ध" का पाठ्यक्रम दिया जा रहा है, जिस पर बिन्दुबार इस ब्लोग पर पोस्ट प्रकाशित कर चर्चा का आयोजन किया जायेगा.
मानव संसाधन प्रबन्ध-
अवधारणा; मानव संसाधन प्रबन्ध की भूमिका व कार्य
मानव संसाधन नियोजन, कार्य विश्लेषण, कार्य विवरण एवं निर्दिष्टीकरण, कार्य विश्लेषण सम्बन्धी सूचना के उपयोग, भर्ती एवं चयन, प्रशिक्षण एवं विकास, उत्तराधिकार संबन्धी नियोजन
क्षतिपूर्ति: मजदूरी एवं वेतन प्रशासन, प्रोत्साहक एवं अनुषंगी लाभ, होसला एवं उत्पादकता
निष्पादन मूल्यांकन
भारत में औद्योगिकस सम्बन्ध स्वास्थ्य, सुरक्षा, समृद्धि एवं सामाजिक बचाव, प्रबन्ध में कार्मिकों की साझेदारी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) का पाठयक्रम
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वर्ष में दो बार जून और दिसम्बर में आयोजित की जाने वाली यह परीक्षा महाविद्यालय स्तरीय अध्यापकों की पात्रता निर्धारित करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाने वाली एकमात्र परीक्षा है. इसकी अधिसूचना बेबसाइट और समाचार पत्र दोनों पर जारी की जाती है. इसका पाठयक्रम आयोग की बेबसाइट पर दिये हुए लिन्क पर देखा जा सकता है. यहां पर वाणिज्य के हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थिओं के लिये पाठ्यसामग्री की कमी को देखते हुए तृतीय प्रश्न-पत्र के (IIIB) तृतीय ऐच्छिक खण्ड- "मानव संसाधन प्रबन्ध" का पाठ्यक्रम दिया जा रहा है, जिस पर बिन्दुबार इस ब्लोग पर पोस्ट प्रकाशित कर चर्चा का आयोजन किया जायेगा.
मानव संसाधन प्रबन्ध-
अवधारणा; मानव संसाधन प्रबन्ध की भूमिका व कार्य
मानव संसाधन नियोजन, कार्य विश्लेषण, कार्य विवरण एवं निर्दिष्टीकरण, कार्य विश्लेषण सम्बन्धी सूचना के उपयोग, भर्ती एवं चयन, प्रशिक्षण एवं विकास, उत्तराधिकार संबन्धी नियोजन
क्षतिपूर्ति: मजदूरी एवं वेतन प्रशासन, प्रोत्साहक एवं अनुषंगी लाभ, होसला एवं उत्पादकता
निष्पादन मूल्यांकन
भारत में औद्योगिकस सम्बन्ध स्वास्थ्य, सुरक्षा, समृद्धि एवं सामाजिक बचाव, प्रबन्ध में कार्मिकों की साझेदारी
शुक्रवार, 18 जून 2010
तथ्यों का संकलन व अध्ययन
प्रबन्धन मानव की एक विशेषता है. मानव बिना प्रबन्धन के नहीं रह सकता. मानव की विचार करने की क्षमता ही उसे प्रबन्धन करने को अभिप्रेरित करती है. वास्तविकता यह है कि व्यक्ति के कार्य सुप्रबन्धित व कुप्रबन्धित हो सकते हैं, किन्तु प्रबन्धन के बिना कोई भी कृत्य मानव द्वारा किया जाना, सम्भव ही नहीं है. प्रबन्ध गुरू के रूप में विख्यात प्रबन्ध विद्वान पीटर ड्रकर के अनुसार, "किसी भी देश के सामाजिक विकास में प्रबन्ध निर्णायक तत्व है............ प्रबन्ध आर्थिक व सामाजिक विकास का जन्मदाता है...............विकासशील राष्ट्र अविकसित नहीं बल्कि कुप्रबन्धित हैं." श्री ड्रकर का कथन राष्ट्र के सम्बन्ध में ही नही, व्यकि के सन्दर्भ में भी सही है.
जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके आसपास या उसके जीवन में कोई समस्या है, तो वह आगे विचार करता है कि समस्या क्यों है और क्या इसका निराकरण संभव है? वास्तविकता को स्वीकार करना और उसका निराकरण करने का मार्ग खोजना ही प्रबन्धन का आधार है. उदाहरण के लिये, मेरे सामने समस्या यह है कि मैं इस ब्लोग पर नियमित नहीं लिख पा रहा. मेरे द्वारा यह स्वीकारोक्ति ही कि मैं नियमित नहीं लिख पा रहा, जबकि मुझे ऐसा करना चाहिये. मुझे यह विचार करने का मार्ग सुझाती है कि मैं नियमित क्यों नहीं लिख पा रहा? अब आवश्यकता इस बात की है कि मैं विचार करूं कि मैं नियमित क्यों नहीं लिख पा रहा? इस पर विचार करने पर अनेक कारण सामने आ सकते हैं, मसलन व्यवस्थित इन्टरनेट संयोजन का न होना, लिखने के लिये समय की कमी, लिखने के लिये ब्लोग के लिये पूर्व-निर्धारित विषय से सम्बन्धित शीर्षकों का निर्धारण न कर पाना आदि अनेक कारण हो सकते हैं, जिन्हें तथ्य कहा जा सकता है. समस्या के समाधान व निराकरण के लिये इस प्रकार के तथ्यों का संकलन, व्यवस्थितीकरण, विश्लेषण व अध्ययन करके समाधान के लिये एक योजना बनाना आवश्यक है. इस प्रकार की योजना बनाने के कार्य को ही प्रबन्धन की भाषा में नियोजन कहते हैं.
जब मैंने स्वीकार कर लिया कि मैं ब्लोग पर नियमित नहीं लिख पा रहा, तो तथ्यों का संकलन व अध्ययन किया कि समय की कमी, इन्टरनेट संयोजन की अनुपलब्धता व उप-शीर्षक निर्धारित कर पाने में कठिनाई के कारण ब्लोग की निरन्तरता में बाधा आती है, तो मैंने नियोजन किया. इन्टरनेट से नियमित जुड़ाव के लिये मोबाइल इन्टरनेट के प्रयोग, समय क्रय नहीं क्या जा सकता. अतः कार्यों का समय के साथ उचित प्रबन्धन तथा उप-शीर्षकों के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा राष्ट्रीयता पात्रता परीक्षा (NET) के लिये निर्धारित वाणिज्य (COMMERCE) विषय के लिये निर्धारित पाठयक्रम के तृतीय प्रश्नपत्र के ऐच्छिक विकल्प तीन- "मानव संसाधन प्रबन्ध" के निर्धारित उप-शीर्षकों पर नियमित लिखने का नियोजन किया. इसके लिये यू.जी.सी. की बेबसाइट पर जाकर पाठयक्रम डाउनलोड किया जिसे अगले पोस्ट में दिया जायेगा.
जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके आसपास या उसके जीवन में कोई समस्या है, तो वह आगे विचार करता है कि समस्या क्यों है और क्या इसका निराकरण संभव है? वास्तविकता को स्वीकार करना और उसका निराकरण करने का मार्ग खोजना ही प्रबन्धन का आधार है. उदाहरण के लिये, मेरे सामने समस्या यह है कि मैं इस ब्लोग पर नियमित नहीं लिख पा रहा. मेरे द्वारा यह स्वीकारोक्ति ही कि मैं नियमित नहीं लिख पा रहा, जबकि मुझे ऐसा करना चाहिये. मुझे यह विचार करने का मार्ग सुझाती है कि मैं नियमित क्यों नहीं लिख पा रहा? अब आवश्यकता इस बात की है कि मैं विचार करूं कि मैं नियमित क्यों नहीं लिख पा रहा? इस पर विचार करने पर अनेक कारण सामने आ सकते हैं, मसलन व्यवस्थित इन्टरनेट संयोजन का न होना, लिखने के लिये समय की कमी, लिखने के लिये ब्लोग के लिये पूर्व-निर्धारित विषय से सम्बन्धित शीर्षकों का निर्धारण न कर पाना आदि अनेक कारण हो सकते हैं, जिन्हें तथ्य कहा जा सकता है. समस्या के समाधान व निराकरण के लिये इस प्रकार के तथ्यों का संकलन, व्यवस्थितीकरण, विश्लेषण व अध्ययन करके समाधान के लिये एक योजना बनाना आवश्यक है. इस प्रकार की योजना बनाने के कार्य को ही प्रबन्धन की भाषा में नियोजन कहते हैं.
जब मैंने स्वीकार कर लिया कि मैं ब्लोग पर नियमित नहीं लिख पा रहा, तो तथ्यों का संकलन व अध्ययन किया कि समय की कमी, इन्टरनेट संयोजन की अनुपलब्धता व उप-शीर्षक निर्धारित कर पाने में कठिनाई के कारण ब्लोग की निरन्तरता में बाधा आती है, तो मैंने नियोजन किया. इन्टरनेट से नियमित जुड़ाव के लिये मोबाइल इन्टरनेट के प्रयोग, समय क्रय नहीं क्या जा सकता. अतः कार्यों का समय के साथ उचित प्रबन्धन तथा उप-शीर्षकों के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा राष्ट्रीयता पात्रता परीक्षा (NET) के लिये निर्धारित वाणिज्य (COMMERCE) विषय के लिये निर्धारित पाठयक्रम के तृतीय प्रश्नपत्र के ऐच्छिक विकल्प तीन- "मानव संसाधन प्रबन्ध" के निर्धारित उप-शीर्षकों पर नियमित लिखने का नियोजन किया. इसके लिये यू.जी.सी. की बेबसाइट पर जाकर पाठयक्रम डाउनलोड किया जिसे अगले पोस्ट में दिया जायेगा.
सोमवार, 7 जून 2010
सोमवार, 1 मार्च 2010
सम्ब्न्धओं का प्रबन्धन करें- होली के अवसर से
सभी मित्रो को होली की राम-राम
परिवार समाज राष्ट्र स्तर पर शान्ति व समृद्धि प्राप्त करने की शुभ कामनाएं
आओ हम संकल्प लें कि अपने लोगों को केवल कार्य व आवश्यकता के समय ही नहीं, समय-समय पर उन्हे याद करके उन्हें अहसास करायेंगे कि आपका कोई अपना है, जो आपको याद करता है और दूर रहते हुए भी आपके पास है. आज के समय में अकेले होते जा रहे मानव के लिये आवश्यक है कि वह केवल संसाधनों का ही प्रबंधन करना न सीखे वरन संबन्धों का भी प्रबन्धन करे और जीवन को आनन्द व उल्लास के साथ जीने की आदत बनाये.
इसी के साथ पुनः होली की शुभकामनाएं व राम-राम.
परिवार समाज राष्ट्र स्तर पर शान्ति व समृद्धि प्राप्त करने की शुभ कामनाएं
आओ हम संकल्प लें कि अपने लोगों को केवल कार्य व आवश्यकता के समय ही नहीं, समय-समय पर उन्हे याद करके उन्हें अहसास करायेंगे कि आपका कोई अपना है, जो आपको याद करता है और दूर रहते हुए भी आपके पास है. आज के समय में अकेले होते जा रहे मानव के लिये आवश्यक है कि वह केवल संसाधनों का ही प्रबंधन करना न सीखे वरन संबन्धों का भी प्रबन्धन करे और जीवन को आनन्द व उल्लास के साथ जीने की आदत बनाये.
इसी के साथ पुनः होली की शुभकामनाएं व राम-राम.
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