मंगलवार, 10 मार्च 2020

तकनीक से आजादी

                                               

मेरे भाई के साले की मृत्यु हो गयी, मेरा भाई काफी दुःखी था। मजाक में ही सही सामान्यतः कहा जाता है कि साली और साले अपने घर वालों से भी प्रिय होते हैं। हों भी क्यों न? आखिर वे पत्नी के बहन-भाई हैं। हम अपने आपको और अपने बहन-भाइयों को नजरअंदाज कर सकते हैं किंतु पत्नी को और उसके संबन्धियों को नजरअंदाज करना हमारे तो क्या? हमारी रूह के भी वश की बात नहीं होती। अब ऐसी स्थिति में उसका दुखी होना लाजिमी था किंतु मेरे पिताजी ने उसके साले पर जो टिप्पणी की, वह कुछ हद तक दुःखी होने के साथ-साथ नाराज भी हो गया। मरे हुए आदमी की गलतियां निकालना ठीक नहीं, पिताजी से ऐसा कहकर, मैंने जैसे-तैसे बात संभाली। बात यह थी कि उसकी मृत्यु का कारण अजीबोगरीब था। उसकी मृत्यु गाने सुनने के कारण हुई थी। अब आप सोचिए गाने सुनने से भी किसी की मृत्यु हो सकती है? आप विश्वास करेंगे? किंतु आपको विश्वास करना ही होगा। सांच को आंच कहां? तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता।
जी हाँ! उसकी मृत्यु गाने सुनने के कारण ही हुई थी। हाँ! यह अलग बात है कि वह गाना, रेल की पटरी पर बैठकर मोबाइल से सुन रहा था। यही नहीं मोबाइल के गाने सुनने का मजा भी पूरा अर्थात कानों में लीड लगाकर लिया जा रहा था। मजा में सजा का मुहावरा तो आपने सुना ही होगा। मजे लेंगे तो उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ती है। वर्तमान में खोज करने से ऐसे उदाहरण बहुतायत में मिल जायेंगे। मोबाइल की गुलामी के कारण हर वर्ष अनेकों शौकीन लोग स्वर्गवासी होने का लाभ प्राप्त करते हैं। यही नहीं, मोबाइल की कृपा से अनेकों पति-पत्नी एक-दूसरे से तलाक लेकर स्वतंत्रता के आनंद की अनुभूति करने में भी सफलता प्राप्त करते हैं।
मेरी एक सहयोगी कर्मचारी श्रीमती अनामिका जी हैं। उनको मोबाइल से इतना प्यार है कि वे जब भी नजर आती हैं। मोबाइल से चिपकी नजर आती हैं। कई बार मुझे लगता है कि उन्हें मोबाइल की बैटरी दिन में कितनी बार चार्ज करनी पड़ती होगी? शायद उनके मोबाइल में कोई ऐसी तकनीक हो कि बात करने से ही वह चार्ज हो जाता हो। वे कक्षा में हों, कार्यालय में हों, अपने परिवार के साथ हों, बाजार में हों, रास्ते में हों, किसी सभा में हों या मीटिंग में हों, वे किसी के साथ नहीं होती, केवल ओर केवल अपने  मोबाइल के साथ होती हैं।
कार्यस्थल पर काम, अजी क्या बात करते हो? हर समय मोबाइल पर बिजी रहना कोई कम काम है? कितनी बड़ी उपलब्धि है? किसी की क्या मजाल है, कोई उनसे बात करने के लिए भी समय ले सके। यह किसी एक महिला की कहानी नहीं हैं। केवल काल्पनिक उदाहरण मात्र है। आप अपने आसपास नजर दौड़ाएंगे तो ऐसे तकनीकी के गुलाम अनेक-महिला पुरुष नजर आ जाएंगे। वे बेचारे दया के पात्र हैं, उनका परिवार, उनके संबन्धी व उनके मित्र उनके साहचर्यगत आनंद से वंचित रह जाते हैं। अतः वे सभी दया के पात्र हैं। ऐसे महिला और पुरुषों को तकनीकी गुलामी से आजादी मिले। इस तरह की शुभकामना व्यक्त करने के सिवाय और कोई चारा हमारे पास भी नहीं है। जब तक वे आजादी नहीं चाहते , जब तक वे उस लत को पसंद करते हैं कोई उनकी आजादी को सुनिश्चित नहीं कर सकता। अब भाई कोई सो रहा हो तो उसे जगाने का प्रयत्न आप कर सकते हैं किंतु कोई बेहोश ही हो जाए, उसे कैसे जगायेंगे? उसको तो इलाज की ही आवश्यकता होती है। तकनीक के नशे की लत एक प्रकार से नसेड़ी की कोमा में जाने जैसी स्थिति कर देती है। कोमा या कौना एक ही बात है। मोबाइल के गुलाम अक्सर कौनों में ही खड़े मिलते हैं।
मोबाइल पर बढ़ते सोशल मीडिया के प्रयोग से तो मुझे कई बार ऐसा लगता है कि अभी तक तो केवल समलिंगी शादियों की बातें उठती हैं। भविष्य में कहीं ऐसा न हो कि इंटरनेट पर पढ़ने को मिले कि फलां लड़का या लड़की ने मोबाइल के साथ शादी कर ली। उपकरणांे के साथ शादी करने के लिए कानून बनाने की मांग की जाने लगे तो भी आश्चर्य की बात नहीं होगी। हम सब लोग तकनीकी के गुलाम जो होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय को कलयुग कहा जाता है। कल युग अर्थात कल पुर्जो का युग। सरल अर्थ में कहें तो मशीनी युग। वर्तमान में मशीन मानव पर हावी होती जा रही हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि हम सब मानव रूपी मशीन ही हैं। रोबोट बनाते बनाते हम स्वयं ही रोबोट बन गए हैं। 
तकनीक प्रधान युग में मानव की प्रधानता के स्थान पर तकनीक स्थापित हो गयी है। वर्तमान समय में विद्यार्थी को अपने अध्यापकों से अधिक विश्वास गूगल गुरू पर है। हो भी क्यों न? अध्यापक भी अपने विद्यार्थियों को नजरअंदाज कर कक्षाओं में भी मोबाइल पर या लेपटाॅप पर चिपके नजर आते हैं। कई बार तो विद्यार्थी द्वारा प्रश्न पूछने पर, वे अपनी जेब से मोबाइल निकालकर स्वयं गूगल गुरू से उत्तर प्राप्त कर बताते हैं। ऐसी स्थिति में विद्यार्थी गूगल गुरू पर ही विश्वास क्यों न करे? यहाँ तक कि सार्वजनिक प्रार्थना सभाओं में जहाँ, सैकड़ों लोग खड़े हैं। वे सबको नजरअंदाज कर सभी को ठेंगे पर बिठाते हुए मोबाइल पर बिजी रहते हैं। कई बार तो ये लोग विभागीय औपचारिक बैठकों में विभागीय अधिकारी की उपस्थिति में भी उसको चुनौती देते हुए कि हम ऐसी मीटिंगों और ऐसे कर्मचारियों/अधिकारियों की कोई परवाह नहीं करते। कोई हमारा क्या उखाड़ लेगा? अरे भाई दुनिया! शालीनता, शिष्टाचार और हया की सीमाओं के कारण चलती है, कानून से नहीं। यदि आपने बेशर्मी ही ओढ़ ली है तो कोई क्या कर सकता है? कानून का काम तो अपराधी को दण्डित करना है और दण्ड देना एक नकारात्मक अवधारणा है। अब कानून से तो तकनीकी से आजादी प्राप्त नहीं की जा सकती। दुनियां को सुदंर, सहज व सुविधाजनक बनाने के लिए तकनीकी का प्रयोग किया जा सकता है किंतु हमें विश्लेषण यह करना है कि हम तकनीक के गुलाम तो नहीं हो गए हैं?
तकनीक से आजादी शीर्षक से लेखक का मतलब तकनीक को छोड़ देने से नहीं है। तकनीक से आजादी का मतलब यह है कि हम तकनीक का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार करें किंतु उसकी लत में न फंस जायं। उसके गुलाम न हो जायं। अब समझने वाली बात यह है कि प्रत्येक तकनीक का आविष्कार या अनुसंधान क्या कहा जाय? मुझे नहीं मालुम किंतु जो भी हो मानव ने मानव के लिए किया है। यदि तकनीक मानव को गुलाम बनाने लगे और हम आसानी से उसकी गुलामी स्वीकार भी कर लें तो दुनिया की सुंदरता ही समाप्त हो जाएगी ना।
अतः आओ हम सब तकनीक से आजादी हासिल करने का संकल्प करें। हम आजाद थे, और फिर से आजादी हासिल करके रहेंगे। हम मोबाइल/लेपटाॅप/टीवी का प्रयोग अपने लिए और अपने लोगों की सुविधा के लिए करेंगे। हम किसी भी स्थिति में इनके गुलाम नहीं बनेंगे और जो गुलाम बन चुके हैं। उनका आह्वान करेंगे कि वे तकनीक से आजादी के लिए संघर्ष करें हम उनके साथ हैं। उन्हें समझायेंगे कि उनका समय उनके लिए है, उनके परिवार के लिए है, संबन्धियों के लिए हैै, तकनीकी की गुलामी के लिए नहीं। हम तकनीकी उपकरणों को अपने समय को बर्बादी का कारण नहीं बनने देंगे। तकनीक को हमें नियंत्रण में रखना है, तकनीक का नियंत्रण हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे। आखिर आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तकनीकी की गुलामी से मुक्ति के लिए आओ हम मिलकर नारा लगाएं- 
गुलामों तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।
तकनीकी मुर्दाबाद। मानवता जिंदाबाद।।


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