शनिवार, 7 मार्च 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-२४

तथ्य बनाम सत्य


आपने छः अंधों और एक हाथी की कहानी सुनी या पढ़ी होगी। यह भारतीय लोक कथा जीवन की समग्रता को रेखांकित करती है और तथ्यों और सच्चाई के बीच के अन्तर को स्पष्ट करती है।
           एक बार छः अंधों में बहस छिड़ गयी कि हाथी कैसा होता है? काफी समय तक बहस के बाद बहस को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने निर्धारित किया कि यह जानने के लिए कि वास्तव में हाथी कैसा होता है? यह जानने के लिए स्वयं हाथी को छूकर जाना जाये।
       पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार वे हाथी को महसूस करने के लिए गये। उन्होंने हाथी को छूकर देखा। एक अंधे ने हाथी के पेट को छूकर कहा, ‘यह दीवार की तरह है।’ दूसरे ने उसके दाँत को सहलाते हुए कहा, ‘नहीं, यह तो तलवार की तरह है।’
        तभी तीसरा जिसके हाथ उसकी सूड़ आई थी, चिल्लाया, ‘क्या कह रहे हो, यह तो अजगर की तरह है।’ चौथे ने उसके पैर को छूते हुए कहा, ‘क्या तुम पागल हो गये हो? हाथी तो पेड़ के तने की तरह है।’ पाँचवें के हाथ हाथी के कान पर थे, ‘वह बोला तुम सब गलत हो यह तो पंखे की तरह है।’ छठे अंधे ने उसकी पूँछ पकड़ रखी थी, ‘‘वह क्रोधित होते हुए बोला, ‘‘बेबकूफो! हाथी दीवार, तलवार, अजगर, तने या पंखे की तरह नहीं यह तो एक रस्सी की तरह है।’
         उपरोक्त कहानी की तरह ही हमें समझने की जरूरत है कि जीवन समग्रता का नाम है। तथ्यों के द्वारा सच्चाई स्पष्ट हो ही जाय यह आवश्यक तो नहीं। तथ्यों की पूर्णता को देखना और फिर उनको समग्रता से परखना आवश्यक है। जीवन के किसी एक भाग में उपलब्धियाँ प्राप्त करने पर फूल कर कुप्पा होने की बात नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी को धोखा देकर कोई संपत्ति अर्जित करता है, तो वह धोखा देने के प्रयास में भले ही सफल हो गया हो किंतु जीवन मूल्यों को गँवा देने के कारण वह बुरी तरह असफल हुआ है। जीवन की सफलता के लिए किसी प्रकार का शोर्टकट मार्ग नही है। अतः जीवन को परिस्थितियों वश टुकड़ों-टुकड़ों में जीना पड़े तो भी हमें समग्रता व संतुलन के सिद्धांत को स्मरण रखना चाहिए। जीवन की सफलता का आकलन समग्रता के आधार पर ही होगा।

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