बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

जीवन आनन्द पूर्वक जीने के लिए हैः



अधिकांशतः हम अपना समय जीवन क्या है? इसको सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है? सफल जीवन के लिए तैयारी कैसे करें? आदि निरर्थक प्रश्नों के उत्तर खोजने में बिता देते है‘ इस सन्दर्भ में संतायन का कथन महत्वपूर्ण है, ‘मनुष्य की सृष्टि जीने के लिए हुई है, जीवन को समझने के लिए नहीं।’’ हम जीवन को समझने की कोशिश में समय अर्थात जीवन बर्बाद क्यों करें? हम भावी आनन्दपूर्ण जीवन की तैयारी के लिए विद्यार्थी जीवन में 25 वर्षो को बर्बाद क्यों करें? क्यों न विद्यार्थी जीवन को भी आनन्दपूर्वक जीने के लिए विद्या प्राप्ति की प्रक्रिया को ही आनन्दपूर्ण बना लें। क्यों न हम विद्यार्थी जीवन में ही प्रत्येक पल को सफलता के आनन्द के साथ जीयें। 
        हमने अपने जीवन को आनन्दपूर्वक व सुव्यवस्थित रूप से जीने के लिए ही धर्म की सृष्टि की है। ईसा मसीह के अनुसार भी  ‘‘धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए।’’ वास्तव में धर्म सभी को आनन्दपूर्ण जीवन जीने के लिए ही तो बनाया गया है। व्यक्तियों में आपस में टकराव के कारण जीवन में कटुता व दुःख न आयें इसके लिए ही तो धर्म के आधार पर आचरण को सभी के अनुकूल बनाने के प्रयत्न किये गये हैं। इसी प्रकार हमें प्रत्येक कदम पर यह समझने की आवश्यकता है कि उपलब्धियों की प्राप्ति और उनका जश्न मनाये जाने को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। हम आनंद व संतुष्टि प्राप्त करने के लिए ही कर्मरत रहते हैं। आनंद व संतुष्टि जीवन के लिए आवश्यक है तो हम आनंद व संतुष्टि के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा क्यों करें? कल किसने देखा है? हम आज की उपलब्धियों व सफलताओं से ही आनंद की अनुभूति क्यों न करें?

एक टिप्पणी भेजें