सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

कैरियर के रूप में अध्यापन


                                               
कैरियर (जीवनवृत्ति विकास) किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय होता है। जीवन-वृत्ति का चयन उसकी जीवन यात्रा में महत्वपर्ण दिशादर्शन का कार्य करता है। युवाओं के चहेते संन्यासी स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को कैरियर दिवस के रूप में मनाने की बात भी की जाती है, इससे यह ही स्पष्ट होता है कि युवाओं के लिए कैरियर का चयन व उसमें सफलता की बुलन्दियों को छूना ना केवल वैयक्तिक विकास के लिए आवश्यक है वरन् पारिवारिक, राष्ट्रीय व सामाजिक सन्दर्भो में भी महत्वपूर्ण होता है।
कैरियर अंग्रेजी का शब्द है। इसके उच्चारण को लेकर भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसका उच्चारण करियर करके करते हैं तो कुछ कैरियर; मुझे तो कैरियर कहना ही अच्छा लगता है। वैसे भी अंग्रेजी के उच्चारण को वैसे ही स्वीकार करना हिंदी की बाध्यता नहीं। अतः मैं इसी शब्द का प्रयोग करता हूँ। पारंपरिक समाज में कैरियर के सीमित विकल्प ही उपलब्ध होते थे। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के साथ सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के युग में नित नवीन क्षेत्रों का विकास हुआ है किंतु पारंपरिक जीवन-वृत्ति का महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं हुआ है।
पारंपरिक कैरियर के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण व सम्मानजनक कार्य अध्यापन का रहा है। अध्यापक को गुरू का सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया था-
गुरू-गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पायँ।
बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।
शिक्षण पेशे की आवश्यकता उस समय भी थी और आज भी है। ज्ञान के विकास के साथ-साथ इसकी आवश्यकता बढ़ी ही है। जनसंख्या वृद्धि व शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षकों की आवश्यकता भी निःसन्देह बढ़ी ही है। जी, हाँ! अध्यापन पेशे के नए-नए रूप भी सामने आये हैं। जीवन मूल्यों के क्षरण के कारण अध्यापक के मान-सम्मान में कमी आई है या यूँ भी कहा जा सकता है कि अध्यापक के मान-सम्मान में कमी होने के कारण ही जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है और समाज नैतिक मानदण्डों की पुनर्स्थापना के प्रयत्न कर रहा है।
अध्यापन के प्रति आकर्षण भले ही कम दिखाई देता हो, बहुत बड़ी संख्या में युवक-युवतियाँ अध्यापन पेशे को अपना रहे हैं। देखने में यह आता है कि प्रारंभ में अधिकांश स्नातक प्रशासक, डॉक्टर या इंजीनियर बनने के ख्वाब देखते हैं किंतु अंत में मजबूरी में अध्यापक बन जाते हैं। मजबूरी में स्वाकार किया गया कोई कार्य न तो व्यक्ति का पूरा उपयोग कर पाता है और न ही समाज के विकास में ऐसे व्यक्ति अपना शत-प्रतिशत योगदान दे पाते हैं। अध्ययन और अध्यापन का काम तो मजबूरी में बिल्कुल हो ही नहीं सकता। मजबूरी में अध्यापक बनने वाले अध्यापक न तो स्वयं प्रसन्न रह पाते हैं और न ही शिक्षा के विकास में योगदान दे पाते हैं। मजबरी में अध्यापक बनने के कारण ही वर्तमान समय में शैक्षणिक गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।
वास्तव में अध्यापन का कार्य सभी कार्यो से श्रेष्ठ कार्य है। अन्य सभी कार्यो में हम वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन कर रहे होते हैं किंतु अध्यापक व्यक्ति का निमार्ण करके समाज का निर्माण कर रहा होता है। केवल व्यक्ति को जन्म देकर और उसके शरीर का पोषण व संरक्षण कर देने से मानव और समाज का विकास नहीं हो सकता। व्यक्ति को जीवन मूल्यों से सज्जित करके, व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करके और व्यक्ति को सर्वांगीण उन्नति का मार्ग दिखाकर अध्यापक ही उसे मानव बनाता है। अतः अध्यापन मजबूरी में अपनाने वाले पेशे के रूप में नहीं, सबसे अधिक सम्मानित पेशे के रूप में स्वीकृत किया जाना चाहिए। अध्यापन पेशे का सम्मान अध्यापक का सम्मान नहीं अपितु ज्ञान का सम्मान है। वर्तमान समय में जब हम ज्ञान आधारित समाज की रचना की बात करते हैं। अध्यापन पेशे को सम्मानित व आकर्षक बनाये बिना ज्ञान आधारित समाज की रचना किस प्रकार संभव है? अतः अध्यापन को एक ऐसे पेशे के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से ही विद्यार्थी अध्यापक बनने का लक्ष्य निर्धारित करें। 

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