मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

कछुआ और खरगोश दोनों ही जीते


कछुआ और खरगोश की कहानी ओर प्रबन्धन 


प सभी ने कछुआ और खरगोश की कहानी को पढ़ा होगा। इसी कहानी को श्री प्रमोद बत्रा ने अपनी पुस्तक ``सही सोच और सफलता´´ में कुछ आगे बढ़ाकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए अच्छी सीख दी है। मैं श्री प्रमोद बत्रा की पुस्तक से साभार इस कथा को दे रहा हूं-

1. एक बार कछुआ और खरगोश के बीच बहस के पश्चात् दौड़ प्रतियोगिता हुई। प्रतियोगिता का लक्ष्य और मार्ग तय हो गया। खरगोश तुरन्त आगे निकल गया और कुछ समय तक तेज दौड़कर पीछे देखा तो उसे कछुआ दूर-दूर तक नज़र नहीं आया। वह विश्राम करने के उद्देश्य से एक पेड़ के नीचे लेट गया और नींद आ गई। कछुआ निरन्तर चलता रहा और खरगोश के जागकर पहुंचने से पूर्व पहुंच गया और विजय प्राप्त कर ली।
2. दौड़ हार जाने पर भी खरगोश निराश नहीं हुआ, खरगोश ने अच्छी तरह से विचार-विमर्श किया। उसने निष्कर्ष निकाला कि वह इसलिए हार गया, क्योंकि उसमें अधिक आत्मविश्वास, लापरवाही और सुस्ती थी। वह यदि प्रतियोगिता को गम्भीरता से लेता तो कछुआ उसे नहीं हरा सकता। उसने कछुआ को दौड़ के लिए दुबारा चुनौती दी। कछुआ तैयार हो गया। इस बार खरगोश बिना रूके तब तक दौड़ता रहा जब तक लक्ष्य तक न पहुंच गया। वह दौड़ जीत गया।
3. कछुआ निराश नहीं हुआ, उसने  पुन: विचार-विमर्श व चिन्तन किया। वह इस नतीजे पर पहुंचा कि इस बार की गई दौड़ के तरीके से वह खरगोश को नहीं हरा सकता। उसने विचार करके नए मार्ग व नए लक्ष्य का निर्धारण किया और पुन: खरगोश को दौड़ के लिए चुनौती दी। खरगोश मान गया। दौड़ शुरू हो गई। खरगोश ने तय किया था कि वह लक्ष्य प्राप्ति तक दौड़ता रहेगा और विजय प्राप्त करेगा। वह दौड़ता रहा, किन्तु एक स्थान पर उसे रूकना पड़ा। सामने एक नदी थी। अन्तिम रेखा नदी के पार कुछ किलोमीटर दूरी पर थी। खरगोश बैठ गया और सोचने लगा अब क्या किया जाय? इसी दौरान कछुआ नदी में उतरा और तैरकर न केवल नदी पार कर गया वरन् अन्तिम रेखा पर पहुंच गया। इस प्रकार कछुआ विजयी हुआ।
4. कछुआ और खरगोश दोनों में हार व जीत हो चुकी थी। अब दोनों आपस में मित्र बन गए और दोनों ने मिलकर नदी पार लक्ष्य तक पहुंचने का निश्चय किया। इस बार दोनों एक टीम के रूप में थे। अत: पहले तो खरगोश ने कछुआ को अपनी पीठ पर बिठाकर दौड़ लगाई और नदी किनारे पहुंचकर कछुआ ने खरगोश को अपनी पीठ पर बिठाकर नदी पार कराई फिर खरगोश ने कछुआ को पीठ पर बिठाकर दौड़ लगाई इस प्रकार दोनों तुलनात्मक रूप से कम समय में और बिना किसी परेशानी के अन्तिम रेखा तक पहुंच गये। दोनों ने ही आनन्द, सन्तुष्टि और सफलता की अनुभूति की।


                                                                -प्रबन्धन सूत्र-

1. कहानी के प्रथम भाग से निष्कर्ष निकलता है कि धीमे चलने वाला भी निरन्तर प्रयास रत रहते हुए, तेज चलने वाले अतिआत्मविश्वासी व सुस्त व्यक्ति को हरा सकता है।
2. कहानी के दूसरे अनुच्छेद से निष्कर्ष निकलता है कि तेज व निरन्तर प्रयासरत हमेशा धीमे व निरन्तर प्रयासरत को हरा देता है। लगातार काम करना अच्छा है किन्तु तेज व लगातार काम करना उससे भी अच्छा है।
3. तीसरे अनुच्छेद से निष्कर्ष  निकलता है कि कार्य करने से पूर्व अपनी वास्तविक क्षमता को पहचानो और अपनी क्षमता के अनुसार ही कार्यक्षेत्र का चुनाव करो। अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करके आपकी प्रगति के मार्ग खुलते ही जायेंगे।
4. वैयक्तिक रूप से क्षमता होना व अभिप्रेरित होना अच्छा है किन्तु सामाजिक हित में टीम के रूप में ही काम करना श्रेष्ठतम परिणाम देता है।
5. स्मरण रखें अन्त तक न तो कछुआ और न ही खरगोश असफलता के बाद निराश हुए और काम से भागे वरन् असफलता से सीख लेकर पुन: प्रयास किए और अन्तत: दोनों ने आनन्द, सन्तुष्टि और विजय प्राप्त की। ध्यान रखें असफलता एक ऐसी घटना है जो हमें मूल्यवान अनुभव देती है, हमारे मार्ग को बाधित नहीं करती



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