सोमवार, 11 अप्रैल 2011

स्वास्थ्य-प्रबन्धन कार्य व परिवार के लिये आवश्यक

स्वस्थ मानव संसाधन परिवार, उद्योग व राष्ट्र के लिये आवश्यक

व्यक्ति कार्य अपने व परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से करता है, दूसरी और उद्योगपति भी अपनी व परिवार की समृद्धि के उद्देश्य को लेकर चलता है. व्यक्ति व संस्था दोनों का हित राष्ट्रीय हित से भी संबद्ध होता है. राष्ट्रीय प्रगति सभी के लिये हितकर होती है. व्यक्ति, समाज, उद्योग, व्यापार, संस्था व राष्ट्र सभी की प्रगति व समृद्धि स्वस्थ व कुशल मानव संसाधन पर निर्भर करती है. देखने में आता है जिसकी आवश्यकता सबसे अधिक है, उसकी ओर हम सबसे कम ध्यान देते हैं.

          हम धन कमाते है, खूब काम करते हैं, ओवरटाइम भी करते है, मनोरंजन भी करते हैं, खूब खाते हैं और दूसरों का भी ध्यान रखते हैं किन्तु खाते समय स्वाद पर ध्यान देते है किन्तु पौष्टिकता पर ध्यान नहीं देते. काम ८,१० या १२ घण्टे करते हैं किन्तु शारीरिक व्यायाम के लिये १ घण्टा नहीं निकाल सकते. जबकि वास्तविकता यह है कि हम अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देकर न केवल स्वस्थ रह सकते हैं, वरन लाखों रुपये दवाओं पर खर्च करने से बचा सकते हैं. यहां में इसके कुछ उदाहरण देना चाहूंगा-
      १- मेरे, विद्यालय जवाहर नवोदय विद्यालय, खुंगा-कोठी, जीन्द(हरियाणा) के प्राचार्य श्री विपिन प्रकाश गुप्ता को आज अपने नेत्रों में कुछ पीड़ा महसूस हुई. वे नेत्र-चिकित्सक के पास गये तो पता चला, उनके चश्में का नंबर कम हो गया है, पहले उन्हें ०.७५ का चश्मा लगा था, जबकि अब ०.२५ हो गया है. जबकि अभी तक मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में पढ़ा था व कई चिकित्सकों ने भी बताया था कि नेत्र ज्योति का संरंक्षण किया जा सकता है किन्तु एक बार कम हो जाने पर बढ़ाया नहीं जा सकता. श्री गुप्ताजी के उदाहरण से स्पष्ठ है कि खान-पान व व्यायाम से नेत्र-ज्योति बढ़ सकती है. गुप्ताजी ने इसका श्रेय हरी सब्जियों और दूध के सेवन तथा नियमित प्रातःकालीन भ्रमण को दिया है.
२- मैं स्वयं २००१ से बीमार नहीं पड़ा और दवा सेवन की आवश्यकता नहीं पढ़ी. इसके मूल में संयमित खान-पान व नियमित व्यायाम है.
३- मेरा पुत्र दिवाकर, उम्र ९ वर्ष , कक्षा ८ का विद्यार्थी है. दो वर्ष पूर्व तक गांव में दादा-दादी के पास रहता था, अक्सर छोटी-मोटी बीमारियां हो जाया करतीं थीं. मेरे पास आने के बाद भी कुछ समस्याएं आई किन्तु मैं किसी चिकित्सक के पास नहीं ले गया केवल खान-पान और आसन-प्राणायाम से न केवल स्वस्थ कर लिया वरन पिछ्ले एक वर्ष से अब उसे भी विश्वास हो गया है कि उसे दवा लेने की आवश्यकता नहीं पढे़गी.
       निष्कर्ष यह है कि हमें धन,पद,यश व संबन्धों के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य का भी प्रबंधन करना चाहिये क्योंकि आपका स्वास्थ्य अमूल्य है और सभी पुरुषार्थों का आधार है.
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