बुधवार, 2 जनवरी 2019

समय प्रबन्धन-४

जब हम समय को एक संसाधन के रूप में स्वीकार करते हैं, तब हमें यह भी देखना पड़ेगा कि उस संसाधन का पर्याप्त और सही प्रयोग हो रहा है या नहीं। प्राचीन समय में लोग धन को जमीन में गाढ़कर रखते थे और कई बार यह भी भूल जाते थे कि उन्होंने धन रखा कहां है? ऐसे धन का कोई उपयोग नहीं हो पाता था। सामान्यतः ऐसा धन पड़े-पड़े ही नष्ट भी हो जाता था। आज भी इस प्रकार के उदाहरण मिल जायेंगे। जब हम काले धन की चर्चा करते हैं, उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है कि वह अनुपयोगी पड़ा रहता है और देश व समाज के लिए उसका कोई उपयोग नहीं हो पाता। इस स्थिति से बचने के लिए सरकार काले धन को बाहर लाने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं लागू करती है।
               धन को कम से कम बचाकर रखा जा सकता है, साथ ही उसका निवेश करके और भी धन कमाया जा सकता है। इसी कारण कहावत प्रचलित है कि पैसे को देखकर पैसा आता है। किंतु यह सुविधा समय के साथ उपलब्ध नहीं है। समय को बचाकर रखा नहीं जा सकता। समय को आप किसी विशेष कार्य से बचा तो सकते हैं किंतु आप समय को संरक्षित करके रख नहीं सकते। बचाये हुए समय को तुरंत अन्य क्रियाओं में निवेश करना अर्थात् उपयोग करना आवश्यक है अन्यथा वह नष्ट हो जायेगा।
              समय पर चर्चा करने के बाद आओ हम संक्षिप्त रूप से प्रबंधन पर चर्चा कर लें, तभी समय प्रबंधन शब्द को स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा। संसार में उपलब्ध संसाधनों में प्रबंधन सबसे अधिक महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता है। इसका कारण यह है कि श्रम के पश्चात् प्रबंधन ही एकमात्र ऐसा संसाधन है जो सजीव व गतिशील है। प्रबंधन अपने साथ-साथ अन्य संसाधनों के प्रयोग को भी सुनिश्चित करता है।
                प्रबंधन व्यक्ति की एक कुशलता या तकनीक है जिसके प्रयोग से वह न्यूनतम् संसाधनों के प्रयोग से गुणवत्तापूर्ण अधिकतम् परिणाम प्राप्त करने के प्रयत्न करता है। प्रबंधन मानवीय कुशलता और अन्य साधनों का प्रयोग करते हुए लक्ष्यों का निर्धारण करने तथा उन लक्ष्यों को प्राप्त करना है। संकुचित अर्थ में प्रबंधन दूसरे व्यक्तियों से काम कराने की युक्ति है, जो व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों से कार्य करा लेता है; वह प्रबंधक कहा जाता है। व्यापक अर्थ में प्रबंधन एक कला और विज्ञान है जो निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न मानवीय प्रयासों से सम्बन्ध रखता है। पीटर एफ ड्रकर के अनुसार, ‘प्रबंधन प्रत्येक क्रिया का गतिशील एवं जीवनदायक तत्व है, उसके नेतृत्व के अभाव में उत्पादन के साधन केवल साधन मात्र रह जाते हैं, कभी उत्पादन नहीं बन पाते।’

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