गुरुवार, 8 नवंबर 2018

कैरियर की उपलब्धता


                                
सिद्धांततः एक लोकतांत्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिलते हैं। देश का हर नागरिक अपनी अभिरूचि, अभिक्षमता, योग्यता और साधन-सम्पन्नता के अनुरूप किसी भी कैरियर का चुनाव कर सकता है। उद्योग, व्यवसाय, पेशे व सेवा के क्षेत्र में  समान रूप से विकास के अवसर सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध होते हैं। देश के सभी नागरिक अपनी वैयक्तिक भिन्नताओं के आधार पर औद्योगिक, व्यावसायिक, राजनीतिक, सामाजिक, पेशेगत या सेवा के क्षेत्र में अपना स्थान बनाते हैं। कैरियर की उपलब्धता व्यक्ति की पारिवारिक, सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है।

प्राचीन काल में कार्य के आधार पर ही वर्ग का निर्धारण किया जाता था, जिसे वर्ण व्यवस्था का नाम दिया गया। चतुर्वणीय व्यवस्था कार्य विभाजन पर ही टिकी हुई थी। जो लोग अध्ययन, अध्यापन और शोध-अनुसंधान का काम करते थे, उन्हें सबसे अधिक सम्मान दिया गया और ब्राह्मण के नाम से संबोधित किया गया। दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का था, जो समाज में रक्षा प्रणाली का संचालन करते थे और प्रथम वर्ग द्वारा स्थापित कानून व्यवस्था का पालन करवाते थे। सामान्यतः राज्य शक्ति इनके नियंत्रण में थी और प्रथम वर्ग के मार्गदर्शन व मंत्रणा के साथ ये समाज की रक्षा करते थे। आवश्यकतानुसार युद्ध के लिए तैयार रहना और आवश्यकतानुसार अपने राज्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देना, इनका चरम लक्ष्य था। युद्ध में प्राण दे देने वाले व्यक्तियों को वीर गति पाने वाले शहीद कहकर समाज के़े सम्मानित व्यक्तियों में स्थान दिया जाता था। समाज की रक्षा को अपना कर्तव्य स्वीकार करने वाले व्यक्तियों को क्षत्रिय  नाम दिया गया। 

               तृतीय वर्ग ऐसे लोगों का था जो संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखते थे। उद्योग और व्यवसाय में लगे लोग सम्पूर्ण समाज के लिए सभी आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन और आपूर्ति सुनिश्चित करने का काम करते थे। राज्य की आर्थिक व्यवस्था भी इनके द्वारा चुकाये गये कर पर ही निर्भर रहती थी। समाज में इनका भी पर्याप्त सम्मान था किंतु सम्मान की श्रंखला में ब्राह्मण और क्षत्रियों के बाद स्थान आता था। सभी वर्गो के सम्पर्क में आने और अपने व्यवसाय और उद्योग का विकास सुनिश्चित करने की आवश्यकतानुसार इनमें विनम्रता का भाव विकसित हो जाता था। इन्हें समाज में वैश्य के नाम से संबोधित किया जाता था। इसके अतिरिक्त समाज के लिए विभिन्न निर्माण कार्य लोहे, लकड़ी, पत्थर, मिट्टी, चमड़े व साफ-सफाई आदि के कार्यो को करके सम्पूर्ण समाज में विभिन्न सेवाओं को प्रदान करने का कार्य जो लोग करते थे। वे भी समाज में अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान देते थे। उन्हें भी यथोचित सम्मान मिलता था और उन्हें शूद्र के नाम से वर्गीकृत किया गया। प्रारंभ में यह कार्य विभाजन था। कोई भी व्यक्ति अपनी अभिरूचि, अभिक्षमता, योग्यता और लगन के आधार पर किसी कार्य को कर सकता था। एक ही परिवार में विभिन्न कार्यो को करने वाले व्यक्ति हो सकते थे। इस प्रकार एक भाई ब्राह्मण, दूसरा शूद्र, तीसरा क्षत्रिय तो शेष वैश्य हो सकते थे।

                   इस प्रकार वर्ण व्यवस्था के प्रारंभ में वृत्ति, आजीविका या कैरियर चुनने की पूरी स्वतंत्रता थी। कोई विद्यार्थी किसी भी कार्य को अपनी आजीविका का साधन बना सकता था। सामान्यतः अभिभावक, परिवार या समाज का कोई दबाब नहीं होता था। एक प्रकार से लोकतांत्रिक व्यवस्था की सम्पूर्ण विशेषताएं उस काल में मिल सकती हैं।

                    वर्ण परिवर्तन भी संभव था अर्थात् एक वर्ण में जीवन जीने के बाद कार्य परिवर्तन कर दूसरे वर्ण की सदस्यता भी प्राप्त की जा सकती थी। इसका प्रसिद्ध उदाहरण महर्षि विश्वामित्र का है, जिन्होंने न केवल क्षत्रिय कुल में जन्म लिया वरन क्षत्रिय कैरियर का पालन करते हुए सफलतापूर्वक कई वर्षो तक राज्य का संचालन भी किया। कालान्तर में क्षत्रिय के कर्म से अर्थात कैरियर से ऊब गये और उन्हें ब्राह्मण कर्म में कैरियर बनाने की इच्छा हुई तो उन्होंने राज्य का परित्याग करके ब्राह्मण कर्म को अपनाया। अध्ययन और लम्बी साधना के बाद तत्कालीन ब्राह्मण पेशवर संगठन के मुखिया महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि से अलंकृत कर ब्राह्मण के रूप में मान्यता प्रदान की।

                 कालान्तर में वर्ण व्यवस्था में विकृतियाँ पैदा हो गयीं। समाज के जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों ने अपने निजी स्वार्थो के कारण उच्च मानदण्डों को नजरअन्दाज कर अपनी पीढ़ियों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी और वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित बना दिया। वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित हो जाने पर कैरियर के चयन को सीमित कर दिया गया। जिससे व्यक्ति, परिवार व समाज में विभिन्न विकृतियाँ पैदा हुईं। जन्म के आधार पर वर्ण और वर्ण के आधार पर सम्मान मिलने के कारण समाज में भेदभाव को वढ़ावा मिला। भेदभाव के कारण विद्वेष बढ़ा। अभिरूचि, अभिक्षमता और योग्यता के कारण कैरियर चुनाव का अवसर न मिल पाने के कारण समाज को व्यक्ति की कुशलता से विकास के जो अवसर मिल सकते थे, उन पर विराम लग गया। नवाचार रूक गया। विभिन्न व्यवसायों में नया खून आने पर प्रतिबंध लगले के साथ ही विकास प्रक्रिया बाधित हो गई। केवल ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेने के आधार पर ब्राह्मण की मान्यता मिलने के कारण अध्ययन, अध्यापन, शोध व अनुसंधान की गुणवत्ता प्रभावित हुई बाहरी कुशल व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रतिबंध के कारण देश व समाज को हानि हुई। यही स्थिति क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के बारे में हुए शूद्रों को उपेक्षित किया गया। उन्हें कैरियर चुनने की स्वतंत्रता से वंचित कर दिये जाने के कारण उनका भी विकास रूक गया। उन्हें उनके लिए आबंटित कार्यो के लिए बाध्य किया जाने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि उन कार्यो में उनका उत्साह समाप्त हो गया। मजबूरी में किये गये कार्यो में कभी भी नवाचार और विकास नहीं होता। जब भेदभाव होता है तो उत्पीड़न को जन्म देता है। ऐसे वर्ग का समाज के विकास में जो योगदान हो सकता था, समाज उससे वंचित होने लगा। क्योंकि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से कैरियर का चुनाव करके काम करता है और उस पर काम थोप दिया जाता है। दोनों ही स्थितियों में कार्य की गुणवत्ता और मात्रा दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। कैरियर के चयन पर मध्यकाल में लगाये गये इन प्रतिबंधों का खामियाजा संपूर्ण समाज और देश को दीर्घकाल की गुलामी और आर्थिक पराश्रितता के रूप में भुगतना पड़ा।

                 स्वतंत्रता के लिए चले दीर्घकालीन संघर्ष में जाति, धर्म, भाषा व प्रदेश के बंधन कमजोर हुए। समानता के भाव का विकास हुआ और स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाकर देश के सभी नागरिकों को समानता के अवसर को मान्यता देकर पुनः सभी को अपना कैरियर चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गयी। वर्तमान समय में हमारे यहाँ व्यक्ति को अपनी अभिरूचि, अभिक्षमता, योग्यता और साधन संपन्नता के अनुरूप अपना कैरियर चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता है। हाँ! राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अभी भी आरक्षण व्यवस्था अस्तित्व में है। जिसके लिए कारण सही अर्थो में कैरियर चुनने में समानता के अवसर मिलने में बाधाएं खड़ी हो जाती है। सामाजिक न्याय के सिद्धांत के लिए आवश्यक है कि कमजोर वर्गो को संसाधन उपलब्ध कराकर सशक्त किया जाय। विभिन्न प्रकार से प्रयास कर उन्हें संसाधन उपलब्ध करवा कर सशक्त बनाया जाय ताकि वे स्वतंत्र रूप से खुली प्रतियोगिता में अपने अनुरूप कैरियर का चुनाव कर सकें। शिक्षा की विशेष व्यवस्था और विशेष आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाकर उन्हें सशक्त करके खुली प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जा सके तो व्यक्ति, परिवार, समाज व देश के लिए अच्छा रहेगा। परिवार का एक सदस्य वैज्ञानिक, दूसरा सैनिक, तीसरा लोहे का काम करने वाल और तीसरा सफाई कर्मचारी के रूप में कार्य करके अपने कैरियर में उत्तरोत्तर प्रगति करके संतुष्टिपूर्वक जीवनयापन कर सकेगा तभी वास्तव में सामाजिक समरसता का विचार सार्थक हो सकेगा।
                    इस प्रकार लोकतांत्रिक देश होने के कारण हमारे देश में कैरियर चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता है। सफाई कर्मचारी का बेटा या बेटी भी देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुँच सकते हैं। उसी प्रकार एक वैज्ञानिक या प्रोफेसर के बेटे या बेटी कोई भी व्यवसाय, पेशा या सेवा का क्षेत्र चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। यहाँ तक कि मंदिर में पुजारी के काम से आजीविका कमाते रहने वाले परिवार की संतान एक सफाई कर्मचारी के कैरियर का चुनाव कर सकती है और ऐसा होने भी लगा है। भारत में सभी को अपनी अभिरूचि, अभिक्षमता, योग्यता, निष्ठा, समर्पण, लगन व साधन संपन्नता के अनुरूप अपना कैरियर चुनकर देश के विकास में योगदान देने के पूर्ण अवसर उपलब्ध हैं। हाँ! जिस क्षेत्र का भी हम चुनाव करते हैं। उसमें कार्य और कुशलता के आधार पर अपने आपको सिद्ध करके ही आगे बढ़ना होगा। यही व्यक्ति, परिवार और समाज के दीर्घकालीन विकास के लिए उचित भी है और आवश्यक भी।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

प्रसन्न रहने का सूत्र

*प्रसन्न कैसे रहें?*
                अर्चना पाठक
प्रसन्नता मन का भाव है, हम खुशियां अपनी प्राप्त सुविधाओं में खोजते हैं। इसीलिए भौतिक सूख - सुविधाओं की ओर भागते रहते हैं। अपने भीतर झाकें। दिन में जब भी जितना भी समय
 मिले अपने दिमाग को विचार शून्य रखें। मुश्किल होगी परन्तु कोशिश जारी रखें।
हम क्या चाहते हैं ये जानें । अक्सर हम "लोग क्या कहेंगे?", "कोई क्या सोचेगा?" जैसे सवालों से परेशान रहते हैं। हमें तो यह समझना जरूरी है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है हमारे, हमारे अपनों व समाज के लिए नुकसानदाक तो नहीं है। कहीं हामारे कार्य किसी के लिए समस्या तो नहीं खड़ी करेंगे। यदि नहीं तो फिर कोई क्या सोचता है क्या समझता है का तनाव क्यों ?
सही और ग़लत की परिभाषा एकदम सरल है हर वह कार्य जिसे करके हम सबको बता सकें वह सही है तथा हर वह कार्य जिसे करके हम दूसरों से छुपाएं ग़लत है।
अपने विचार सकारात्मक रखने से खुशियां पास आती हैं। किसी ने यदि आपकी बात नहीं सुनी तो उसकी वजह सम्याभाव हो सकता है, उसकी अपनी कोई मुश्किल हो सकती है, यह भी तो हो सकता है कि उसे आपकी बात समझ ही ना आई हो। सकारात्मक सोच आपको तनावमुक्त रखती है।

बुधवार, 17 मई 2017

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
"कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"

(...... आभार, हरिवंश राय बच्चन जी)

गुरुवार, 11 मई 2017

निज प्रबन्ध ना कर सके

जो चाहे जैसा करे, हम हैं प्रेम लुटात।

जहां प्रेम की चाह ना, पथ से हम ना जात॥



नर नारी को मान दे, गृह की लक्ष्मी मान।

नारी जब है समझती, पति को देव समान॥



जिस घर बसे गृह लक्ष्मी, नर है देव समान।

अधिकारों की चाह ना, देत कर्म को मान॥



अधिकारों की मांग है, न कर्तव्य का भान

गृह ही नरक बनत है, अपने शत्रु समान॥



आस्था, निष्ठा, विश्वास को, जो मारत हैं चोट।

झूठ बोल छलना करें, खुद का मिले न वोट॥



हमरी बस चाहत रही, सबकी पूरी चाह।

मित्र करें कर्तव्य को, निकले कभी न आह॥



झूठ बोल छलना करें, धन की करत तलाश।

मुखोटे लगाकर फ़िरें, ले रिशतों की लाश॥



दुख का सृजन करत हैं, सुख की करत तलाश।

दिन चैन न रात निदिया, जिन्दा हैं वो लाश॥



सुख उनको ही मिलत है, जो हैं सुख्ख लुटात।

कर्मवीर को सफ़लता, दौलत आत हटात॥



रिशतों को जो मान दें, सुख की हो बरसात।

निज प्रबन्ध ना कर सके, क्या उसकी औकात॥

रविवार, 30 अप्रैल 2017

नारी नर की प्रेरणा

नारी नर की प्रेरणा, नारी नर्क का द्वार।

धोखे दे हर लेत है, धोखे से दे मार॥



जो सोचा ना कर सके, ना सोचा वो होय।

झंझट सारे छोड़कर, कर्म बीज तू बोय॥



झूठ बोलते लोग जो, ना कोई है खास।

धन लूटन की चाह में, आना चाहें पास॥



कोई किसी का मित्र ना, सब स्वारथ के दास।

स्वारथ हित सम्बन्ध है, धोखा देते खास॥



सोचे से कुछ होत ना, करने से ही होय।

धोखे से इस जगत में, मित्र बने ना कोय॥

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

टकराने से है भला

टकराने से है भला, बदलो अपनी राह।

इच्छा पूरी न हो सके, बदलो अपनी चाह॥


वाद-विवाद में होत न, कभी किसी की जीत।

जीत-हार के ब्याज से, नष्ट होत है प्रीत॥


विवाद समय न नष्ट कर, जीवन लघु बहु काज।

अकेले ही प्रस्थान कर, राह मिलत हैं साज॥


दूर की चिन्ता छोड़ दे, निकट नजर तू डार।

सामने हैं वह काम कर, जीवन है दिन चार॥


पिछली चिन्ता छोड़ दे, आगे की ना सोच।

वर्तमान में जी सखे, सच्चा है यही कोच॥

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

कैरियर के रूप में अध्यापन


                                               
कैरियर (जीवनवृत्ति विकास) किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय होता है। जीवन-वृत्ति का चयन उसकी जीवन यात्रा में महत्वपर्ण दिशादर्शन का कार्य करता है। युवाओं के चहेते संन्यासी स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को कैरियर दिवस के रूप में मनाने की बात भी की जाती है, इससे यह ही स्पष्ट होता है कि युवाओं के लिए कैरियर का चयन व उसमें सफलता की बुलन्दियों को छूना ना केवल वैयक्तिक विकास के लिए आवश्यक है वरन् पारिवारिक, राष्ट्रीय व सामाजिक सन्दर्भो में भी महत्वपूर्ण होता है।
कैरियर अंग्रेजी का शब्द है। इसके उच्चारण को लेकर भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसका उच्चारण करियर करके करते हैं तो कुछ कैरियर; मुझे तो कैरियर कहना ही अच्छा लगता है। वैसे भी अंग्रेजी के उच्चारण को वैसे ही स्वीकार करना हिंदी की बाध्यता नहीं। अतः मैं इसी शब्द का प्रयोग करता हूँ। पारंपरिक समाज में कैरियर के सीमित विकल्प ही उपलब्ध होते थे। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के साथ सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के युग में नित नवीन क्षेत्रों का विकास हुआ है किंतु पारंपरिक जीवन-वृत्ति का महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं हुआ है।
पारंपरिक कैरियर के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण व सम्मानजनक कार्य अध्यापन का रहा है। अध्यापक को गुरू का सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया था-
गुरू-गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पायँ।
बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।
शिक्षण पेशे की आवश्यकता उस समय भी थी और आज भी है। ज्ञान के विकास के साथ-साथ इसकी आवश्यकता बढ़ी ही है। जनसंख्या वृद्धि व शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षकों की आवश्यकता भी निःसन्देह बढ़ी ही है। जी, हाँ! अध्यापन पेशे के नए-नए रूप भी सामने आये हैं। जीवन मूल्यों के क्षरण के कारण अध्यापक के मान-सम्मान में कमी आई है या यूँ भी कहा जा सकता है कि अध्यापक के मान-सम्मान में कमी होने के कारण ही जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है और समाज नैतिक मानदण्डों की पुनर्स्थापना के प्रयत्न कर रहा है।
अध्यापन के प्रति आकर्षण भले ही कम दिखाई देता हो, बहुत बड़ी संख्या में युवक-युवतियाँ अध्यापन पेशे को अपना रहे हैं। देखने में यह आता है कि प्रारंभ में अधिकांश स्नातक प्रशासक, डॉक्टर या इंजीनियर बनने के ख्वाब देखते हैं किंतु अंत में मजबूरी में अध्यापक बन जाते हैं। मजबूरी में स्वाकार किया गया कोई कार्य न तो व्यक्ति का पूरा उपयोग कर पाता है और न ही समाज के विकास में ऐसे व्यक्ति अपना शत-प्रतिशत योगदान दे पाते हैं। अध्ययन और अध्यापन का काम तो मजबूरी में बिल्कुल हो ही नहीं सकता। मजबूरी में अध्यापक बनने वाले अध्यापक न तो स्वयं प्रसन्न रह पाते हैं और न ही शिक्षा के विकास में योगदान दे पाते हैं। मजबरी में अध्यापक बनने के कारण ही वर्तमान समय में शैक्षणिक गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।
वास्तव में अध्यापन का कार्य सभी कार्यो से श्रेष्ठ कार्य है। अन्य सभी कार्यो में हम वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन कर रहे होते हैं किंतु अध्यापक व्यक्ति का निमार्ण करके समाज का निर्माण कर रहा होता है। केवल व्यक्ति को जन्म देकर और उसके शरीर का पोषण व संरक्षण कर देने से मानव और समाज का विकास नहीं हो सकता। व्यक्ति को जीवन मूल्यों से सज्जित करके, व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करके और व्यक्ति को सर्वांगीण उन्नति का मार्ग दिखाकर अध्यापक ही उसे मानव बनाता है। अतः अध्यापन मजबूरी में अपनाने वाले पेशे के रूप में नहीं, सबसे अधिक सम्मानित पेशे के रूप में स्वीकृत किया जाना चाहिए। अध्यापन पेशे का सम्मान अध्यापक का सम्मान नहीं अपितु ज्ञान का सम्मान है। वर्तमान समय में जब हम ज्ञान आधारित समाज की रचना की बात करते हैं। अध्यापन पेशे को सम्मानित व आकर्षक बनाये बिना ज्ञान आधारित समाज की रचना किस प्रकार संभव है? अतः अध्यापन को एक ऐसे पेशे के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से ही विद्यार्थी अध्यापक बनने का लक्ष्य निर्धारित करें।