बुधवार, 17 मई 2017

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
"कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"

(...... आभार, हरिवंश राय बच्चन जी)

गुरुवार, 11 मई 2017

निज प्रबन्ध ना कर सके

जो चाहे जैसा करे, हम हैं प्रेम लुटात।

जहां प्रेम की चाह ना, पथ से हम ना जात॥



नर नारी को मान दे, गृह की लक्ष्मी मान।

नारी जब है समझती, पति को देव समान॥



जिस घर बसे गृह लक्ष्मी, नर है देव समान।

अधिकारों की चाह ना, देत कर्म को मान॥



अधिकारों की मांग है, न कर्तव्य का भान

गृह ही नरक बनत है, अपने शत्रु समान॥



आस्था, निष्ठा, विश्वास को, जो मारत हैं चोट।

झूठ बोल छलना करें, खुद का मिले न वोट॥



हमरी बस चाहत रही, सबकी पूरी चाह।

मित्र करें कर्तव्य को, निकले कभी न आह॥



झूठ बोल छलना करें, धन की करत तलाश।

मुखोटे लगाकर फ़िरें, ले रिशतों की लाश॥



दुख का सृजन करत हैं, सुख की करत तलाश।

दिन चैन न रात निदिया, जिन्दा हैं वो लाश॥



सुख उनको ही मिलत है, जो हैं सुख्ख लुटात।

कर्मवीर को सफ़लता, दौलत आत हटात॥



रिशतों को जो मान दें, सुख की हो बरसात।

निज प्रबन्ध ना कर सके, क्या उसकी औकात॥

रविवार, 30 अप्रैल 2017

नारी नर की प्रेरणा

नारी नर की प्रेरणा, नारी नर्क का द्वार।

धोखे दे हर लेत है, धोखे से दे मार॥



जो सोचा ना कर सके, ना सोचा वो होय।

झंझट सारे छोड़कर, कर्म बीज तू बोय॥



झूठ बोलते लोग जो, ना कोई है खास।

धन लूटन की चाह में, आना चाहें पास॥



कोई किसी का मित्र ना, सब स्वारथ के दास।

स्वारथ हित सम्बन्ध है, धोखा देते खास॥



सोचे से कुछ होत ना, करने से ही होय।

धोखे से इस जगत में, मित्र बने ना कोय॥

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

टकराने से है भला

टकराने से है भला, बदलो अपनी राह।

इच्छा पूरी न हो सके, बदलो अपनी चाह॥


वाद-विवाद में होत न, कभी किसी की जीत।

जीत-हार के ब्याज से, नष्ट होत है प्रीत॥


विवाद समय न नष्ट कर, जीवन लघु बहु काज।

अकेले ही प्रस्थान कर, राह मिलत हैं साज॥


दूर की चिन्ता छोड़ दे, निकट नजर तू डार।

सामने हैं वह काम कर, जीवन है दिन चार॥


पिछली चिन्ता छोड़ दे, आगे की ना सोच।

वर्तमान में जी सखे, सच्चा है यही कोच॥

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

कैरियर के रूप में अध्यापन


                                               
कैरियर (जीवनवृत्ति विकास) किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय होता है। जीवन-वृत्ति का चयन उसकी जीवन यात्रा में महत्वपर्ण दिशादर्शन का कार्य करता है। युवाओं के चहेते संन्यासी स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को कैरियर दिवस के रूप में मनाने की बात भी की जाती है, इससे यह ही स्पष्ट होता है कि युवाओं के लिए कैरियर का चयन व उसमें सफलता की बुलन्दियों को छूना ना केवल वैयक्तिक विकास के लिए आवश्यक है वरन् पारिवारिक, राष्ट्रीय व सामाजिक सन्दर्भो में भी महत्वपूर्ण होता है।
कैरियर अंग्रेजी का शब्द है। इसके उच्चारण को लेकर भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसका उच्चारण करियर करके करते हैं तो कुछ कैरियर; मुझे तो कैरियर कहना ही अच्छा लगता है। वैसे भी अंग्रेजी के उच्चारण को वैसे ही स्वीकार करना हिंदी की बाध्यता नहीं। अतः मैं इसी शब्द का प्रयोग करता हूँ। पारंपरिक समाज में कैरियर के सीमित विकल्प ही उपलब्ध होते थे। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के साथ सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के युग में नित नवीन क्षेत्रों का विकास हुआ है किंतु पारंपरिक जीवन-वृत्ति का महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं हुआ है।
पारंपरिक कैरियर के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण व सम्मानजनक कार्य अध्यापन का रहा है। अध्यापक को गुरू का सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया था-
गुरू-गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पायँ।
बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।
शिक्षण पेशे की आवश्यकता उस समय भी थी और आज भी है। ज्ञान के विकास के साथ-साथ इसकी आवश्यकता बढ़ी ही है। जनसंख्या वृद्धि व शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षकों की आवश्यकता भी निःसन्देह बढ़ी ही है। जी, हाँ! अध्यापन पेशे के नए-नए रूप भी सामने आये हैं। जीवन मूल्यों के क्षरण के कारण अध्यापक के मान-सम्मान में कमी आई है या यूँ भी कहा जा सकता है कि अध्यापक के मान-सम्मान में कमी होने के कारण ही जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है और समाज नैतिक मानदण्डों की पुनर्स्थापना के प्रयत्न कर रहा है।
अध्यापन के प्रति आकर्षण भले ही कम दिखाई देता हो, बहुत बड़ी संख्या में युवक-युवतियाँ अध्यापन पेशे को अपना रहे हैं। देखने में यह आता है कि प्रारंभ में अधिकांश स्नातक प्रशासक, डॉक्टर या इंजीनियर बनने के ख्वाब देखते हैं किंतु अंत में मजबूरी में अध्यापक बन जाते हैं। मजबूरी में स्वाकार किया गया कोई कार्य न तो व्यक्ति का पूरा उपयोग कर पाता है और न ही समाज के विकास में ऐसे व्यक्ति अपना शत-प्रतिशत योगदान दे पाते हैं। अध्ययन और अध्यापन का काम तो मजबूरी में बिल्कुल हो ही नहीं सकता। मजबूरी में अध्यापक बनने वाले अध्यापक न तो स्वयं प्रसन्न रह पाते हैं और न ही शिक्षा के विकास में योगदान दे पाते हैं। मजबरी में अध्यापक बनने के कारण ही वर्तमान समय में शैक्षणिक गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है।
वास्तव में अध्यापन का कार्य सभी कार्यो से श्रेष्ठ कार्य है। अन्य सभी कार्यो में हम वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन कर रहे होते हैं किंतु अध्यापक व्यक्ति का निमार्ण करके समाज का निर्माण कर रहा होता है। केवल व्यक्ति को जन्म देकर और उसके शरीर का पोषण व संरक्षण कर देने से मानव और समाज का विकास नहीं हो सकता। व्यक्ति को जीवन मूल्यों से सज्जित करके, व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करके और व्यक्ति को सर्वांगीण उन्नति का मार्ग दिखाकर अध्यापक ही उसे मानव बनाता है। अतः अध्यापन मजबूरी में अपनाने वाले पेशे के रूप में नहीं, सबसे अधिक सम्मानित पेशे के रूप में स्वीकृत किया जाना चाहिए। अध्यापन पेशे का सम्मान अध्यापक का सम्मान नहीं अपितु ज्ञान का सम्मान है। वर्तमान समय में जब हम ज्ञान आधारित समाज की रचना की बात करते हैं। अध्यापन पेशे को सम्मानित व आकर्षक बनाये बिना ज्ञान आधारित समाज की रचना किस प्रकार संभव है? अतः अध्यापन को एक ऐसे पेशे के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से ही विद्यार्थी अध्यापक बनने का लक्ष्य निर्धारित करें। 

शनिवार, 21 जनवरी 2017

शैक्षणिक पर्यवेक्षण

निरीक्षण नहीं, पर्यवेक्षण

                                                  डॉ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



व्यक्ति कितना भी स्व-अभिप्रेरित व स्व-अनुशासित क्यों न हो, उसके कार्य के अवलोकन और उसे प्रेरणा देने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकता पड़ती है। व्यक्ति शिक्षित होकर स्व-अनुशासन और स्व-अभिप्रेरण की क्षमताओं का विकास करता है। व्यक्ति कितना भी शिक्षित, शक्तिशाली और अधिकार संपन्न क्यों न हो जाय, न्यूनाधिक मात्रा में उसे स्वतंत्र प्राधिकारी के अवलोकन मूल्यांकन और अभिप्रेरण की आवश्यकता पड़ती ही है। प्रत्येक क्षेत्र में हनुमान को जामवंत की आवश्यकता पड़ती है जो कह सके, ‘का चुप साधि रहे बलवाना’ अर्थात तुम कर सकते हो। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह आवश्यकता अविरल बनी ही रहती है। ज्ञान आधारित व्यवस्था में अध्यापक को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। भारत में तो आध्यात्म का रूप देकर ज्ञान देने वाले व्यक्ति को गुरू का पद देकर उसे ईश्वर से भी अधिक अधिमानता दी गयी है। कबीर दास ने तो यहाँ तक कह दिया है-
कबिरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और। 
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।।
ध्यातव्य है कि जब भी हम गुरू के सम्मान की बात करते हैं, तब हम व्यक्ति के या किसी के पद के सम्मान की बात नहीं कर रहे होते। यह तो ज्ञान का सम्मान है। ज्ञान प्रदान करने का सम्मान है। ज्ञान के दान को महादान कहा गया है। संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण ज्ञान है और जो ज्ञान प्रदान करता है, उसके महत्व को स्वीकार करना ही गुरू के सम्मान की बात करना है। महात्मा गांधी ने भी विचार व्यक्त किये हैं कि यदि आप किसी को दो मुट्ठी चावल प्रदान करते हैं तो उसका एक दिन के लिए पेट भरेगा; यदि आप उसे चावल उगाने का कौशल प्रदान करते हैं तो वह जीवन भर के लिए न केवल अपना पेट भरेगा वरन समाज को भी अपना योगदान दे सकेगा। यही शिक्षा है। वर्तमान सरकार इसे कौशल विकास के रूप में भी ले रही है। वस्तुतः किसी भी प्रकार की सीख देना शिक्षा है। शिक्षा ही मानव व समाज के विकास का आधार है। शिक्षा जीवन का आधार है। शिक्षा देने वाला शिक्षक समाज के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है व सम्मान का हकदार है। शिक्षक कितना भी विद्वान, समर्पित व सदाचारी क्यों न हो; आखिर वह भी एक मानव है और अन्य मानवीय कमजोरियाँ उसमें भी होती हैं। अतः शिक्षण प्रक्रिया में भी अवलोकन, मूल्यांकन और अभिप्रेरण अनिवार्य तत्व है। गुरू को भी गुरू की आवश्यकता होती है, प्रेरक की आवश्यकता होती है।
प्राचीन काल में पारंपरिक रूप से निरीक्षण की व्यवस्था की गई थी। निरीक्षण(Inspection) अध्यापकों के लिए भयपूर्ण वातावरण बनाता रहा है। यह व्यवस्था औद्योगिक व व्यावसायिक क्षेत्र में प्रचलित थी। इसी को शिक्षण के क्षेत्र में भी अपना लिया गया। इस व्यवस्था को इंस्पेक्टर राज के रूप में आलोचना झेलनी पड़ी। जब भी किसी विद्यालय का निरीक्षण होता था, विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, अध्यापकों और प्रधानाचार्यो के लिए भी तनाव का कारण बनता था। निरीक्षण दल केवल छिद्रान्वेषण का कार्य करते रहे हैं। केवल कमियों को निकालना और दण्डित करने से व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा छिपाव को बढ़ावा मिलता है। निरीक्षण दल से कमियों को छिपाने और जो नहीं है वह दिखाने की कोशिश होती रही है। निरीक्षण दल के द्वारा अनुचित लाभ उठाने की बातें भी इतिहास में मिल जाती हैं। 
               वर्तमान समय में भी निरीक्षण की लगभग वही प्रणाली प्रचलित देखी जाती है। निरीक्षण में शासक तथा शासित भावना प्रबल होती है। निरीक्षक शिक्षकों की त्रुटियों को खोजने पर ही ध्यान केन्द्रित करता है, विद्यार्थियों के विकास कार्य के प्रति उसका लगाव न के बराबर होता है। निरीक्षण में सामान्यतः जनतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया जाता है। आई तथा नेटजर ने निरीक्षण के संबन्ध में अपना मत व्यक्त किया है, ‘निरीक्षण का मुख्य सम्बन्ध विद्यालय प्रशासन तथा निर्धारित पाठयक्रम के अनुसार आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये सभायें करने से अधिक होता था। शिक्षण सामग्री की उन्नति से इसका कोई संबन्ध नहीं था।’ मेरे विचार में शैक्षिक उन्नयन के लिए निरीक्षण प्रणाली बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है। सन् 1919 में सैडलर कमीशन की रिपार्ट में भी कहा गया था, ‘अधिकांश रूप में निरीक्षण द्रुत गति से किया जाता है, उसमें सौहार्द्रपूर्ण सुझावों का अभाव है। शिक्षण पद्धिति तथा संगठन सम्बन्धी सुधार की ओर लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया जाता, जो विद्यालयों के लिए अत्यावश्यक है।’ कमियों या गलतियों को छिपाने के लिए मजबूर करने वाली व्यवस्था विकासोन्मुख व्यवस्था नहीं हो सकती। कमियों या गलतियों को खुले रूप से स्वीकार कर ही हम उनके सुधार की ओर बढ़ सकते हैं। इसके लिए भयमुक्त अवलोकन, मूल्यांकन और अभिप्रेरित करने वाली व्यवस्था की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति निरीक्षण द्वारा नहीं होती। अतः वर्तमान में निरीक्षण के स्थान पर पर्यवेक्षण(Supervision) की बात की जाने लगी है। शैक्षणिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि पुरातन व पारंपरिक निरीक्षण पद्धति को हटाकर नई वैज्ञानिक व लोकतंत्रात्मक मूल्यों पर आधारित पर्यवेक्षण प्रणाली को अपनाया जाय।
पर्यवेक्षण लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित प्रणाली कही जा सकती है। पर्यवेक्षण शब्द आंग्ल भाषा के Supervision शब्द का पर्याय है। यह दो शब्दों परि¼Super½  व अवेक्षण¼Vision½  शब्दों से मिलकर बना है। सुपर का अर्थ असाधारण, अलौकिक या दिव्य होता है तथा विजन का आशय दृष्टि से लिया जाता है। इस प्रकार असाधारण अथवा सूक्ष्म दृष्टि पर्यवेक्षण के अन्तर्गत आती है। कुछ विचारक पर्यवेक्षण को परिवीक्षण भी कहते हैं। इस शब्द का अर्थ चारों और देखना है। इस प्रकार किसी संस्था का चहुँमुखी अवलोकन करना और विकास के लिए सुझाव देना ही पर्यवेक्षण है। सुझाव देने में अभिप्रेरित करना भी सम्मिलित है।
जॉन ए.बार्टकी के अनुसार-‘उत्तम पर्यवेक्षण का सदैव शिक्षकों के विकास, छात्रों की उन्नति तथा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सुधार से सम्बन्ध होता है।’*(Good Supervision is always concerned with the development of the teacher, the growth of the pupil and improvement of the teaching learning process)  पर्यवेक्षण के संबन्ध में शिक्षा आयोग(1964-66) का मत था कि शैक्षिक सुधारों में वृद्धि करने के लिए सहानुभूतिपूर्ण तथा आदर्श पर्यवेक्षण प्रणाली की अत्यन्त आवश्यकता है। यही नहीं एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली की 1966 की एक रिपोर्ट में भी उल्लेख है कि ‘पर्यवेक्षण शिक्षकों की वैयक्तिक योग्यताओं की अभिवृद्धि में सहायक होता है। यह एक ऐसी विशिष्ट सेवा है जो छात्रों को समझने तथा छात्रों का चहुँमुखी विकास करने में सहायक सिद्ध होती है।’ इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में उन्नयन के लिए निरीक्षण की नहीं वरन् प्रभावी पर्यवेक्षण प्रणाली को विकसित करने और अंगीकार करने की आवश्यकता है।
भारत सरकार द्वारा समय समय पर अनेक आयोग व समितियाँ बनाई गई हैं। विभिन्न विचारक भी इस पर विचार कर अपनी-अपनी संस्तुतियाँ देते रहे हैं। नई शिक्षा नीति बनाते समय भी यह महत्वपूर्ण पहलू रहता है। इस विषय पर शिक्षण क्षेत्र में तो अभी तक सैद्धान्तिक स्तर पर ही चर्चाएँ व विचार-विमर्श सीमित रहा है। क्रियान्वयन के स्तर पर शायद ही भारत के किसी राज्य में इसे लागू किया गया हो। राज्यों की तो बात ही क्या है? केन्द्रीय स्तर पर भी इसे लागू करना शेष है। नवोदय विद्यालय समिति जैसे अग्रगामी संगठनों में भी अभी निरीक्षण व्यवस्था ही लागू है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय पर उचित विचार- विमर्श करके पैनल निरीक्षण के स्थान पर व्यापक परिप्रेक्ष्य वाली पर्यवेक्षण व्यवस्था को लागू किया जाय। इससे विद्यालयों का व्यापक अवलोकन, मूल्यांकन व अभिप्रेरण हो सकेगा और वह विद्यार्थियों, शिक्षकों व शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के हित में होगा। ज्ञान आधारित समाज की रचना के लिए शिक्षण के क्षेत्र में पर्यवेक्षण प्रणाली का लागू करना आवश्यक है। निःसन्देह व्यवस्था में सुधार के लिए समय की आवश्यकता होती है किंतु हम प्रारंभ तो करें। 



बुधवार, 15 जून 2016

उन अज्ञात भद्र महिला को प्रणाम

सुखद अनुभव!

मित्रों! 

आज पूर्वाह्न लगभग 11 बजे बोटेनीकल मेट्रो रेलवे स्टेशन नोएडा पर काउण्टर संख्या 2 पर टोकन के लिए लाइन में लगा था। वहाँ पर ठीक मुझसे आगे एक लड़की, नहीं, लड़की कहना उचित सम्मान नहीं होगा; एक भद्र व आत्मसम्मान वाली महिला लगीं थीं। मैंने देखा हमारी पंक्ति के बगल में ही खिड़की के पास कुछ महिलाएँ भी खड़ी होकर टिकिट प्राप्त कर रही हैं। मैंने अपने आगे खड़ी महिला से कहा, ‘आप यहाँ क्यों परेशान हो रही हैं? आप महिलाओं की पंक्ति में जाकर अपना टिकिट क्यों नहीं ले लेतीं? उनके उत्तर से मुझे भारतीय महिलाओं पर गर्व हो चला। काश! अधिकांश महिलाएँ उस आत्मगौरव को प्राप्त कर लें। महिलाओं को सशक्त करने के लिए किसी कानूनी संरक्षण की आवश्यकता नहीं रह जायेगी। मुझे याद नहीं आज कितने दिनों बाद आनन्द की अनुभूति हुई।
       उन प्रेरणा प्रदान करने वाली अनुकरणीय महिला के उत्तर पर ध्यान दीजिए, ‘नहीं, वह लाइन नहीं है। वे महिलाएँ गलत ढंग से लाइन तोड़ रही हैं। किसी भी काउण्टर पर महिलाओं के लिए अलग लाइन की व्यवस्था नहीं है।’ मैंने अन्य काउण्टरों की ओर नजर दौड़ाई तो वास्तव में किसी भी काउण्टर पर अलग लाइन नहीं थी। मुझे ध्यान आया। महिलाएं समान हैं। उनके लिए अलग काउण्टर क्यों होना चाहिए? वास्तव में अलग पंक्ति की कोई व्यवस्था ही नहीं है। विशेषाधिकार व कानूनी संरक्षण किसी को सशक्त नहीं बना सकता। सशक्त बनाते हैं आत्मगौरव के योग्य आचरण व समाज हित में किए गये कर्म। जो महिलाएँ महिला होने के कारण विशेषाधिकार प्राप्त करने का प्रयास करती हैं। वे वास्तव में महिलाओं के स्तर को और भी नीचे ले जा रही होतीं हैं। 
       पुनः उन अज्ञात भद्र महिला को प्रणाम।