गुरुवार, 10 मार्च 2011

"कोई निर्णय न लेने का निर्णय भी एक निर्णय होता है."

सरकारी जांच प्रणाली भ्रष्टाचार प्रबंधन
               -एक उदाहरण

वर्तमान में मीडिया में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है. सरकार के तीनों अंगों- विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका में भ्रष्टाचार ही सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है. मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, इसे जोर-शोर से उठा रहा है. सत्ता पक्ष यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ गंभीर व प्रभावी कार्यवाही हो रही है, जबकि विपक्ष की पार्टियां सत्ता पक्ष पर भ्रष्टाचार में संलग्न होने व भ्रष्टाचारियों का बचाव करने का आरोप लगा रही हैं. यहां ध्यातव्य है कि कोई भी पार्टी अपने आप को भ्रष्टाचार से मुक्त रहने का दावा नहीं कर रही और न ही कोई पार्टी सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने का संकल्प लेकर कोई योजना प्रस्तुत कर रही है. अधिकांश पार्टियां केवल भ्रष्टाचार के लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनने हेतु भविष्य के लिये मत-प्रबंधन करने का प्रयत्न कर रही हैं.
                     देखने की बात है, भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आने पर पहले तो सरकार उसको असत्य बताती है, असत्य बताते-बताते कम से कम इतना समय तो अवश्य निकाल देती है कि आरोपी नेता या अधिकारी अपने पद पर रहते हुए अपने खिलाफ़ उपलब्ध साक्ष्यों को नष्ट कर सके. विपक्ष, मीडिया या न्यायपालिका के हस्तक्षेप से जब जांच करवानी ही पड़े तो जांच की अनुमति तब दी जाय, जब जांच कमेटी को कोई साक्ष्य मिलना संभव ही न रह जाय. आरोपी पर आरोप भी सरकारी एजेन्सिओं को ही लगाने होते हैं. सरकार की इच्छा न होने के कारण वे इस कार्य को सही तरीके से नहीं करतीं. ये बात पिछ्ले दिनो न्यायालयों द्वारा की गयीं टिप्पणियों से स्पष्ट हो जाती है.
            इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रबंधन के विद्यार्थी को यह समझना भी आवश्यक है कि प्रबंधन का प्रयोग केवल सकारात्मक उद्देश्यों के लिये ही नहीं नकारात्मक उद्देश्यों के लिये भी किया जा सकता है. निर्णय को लटकाना लापरवाही ही नहीं सोची समझी योजना भी हो सकती है. एक शैक्षिक प्रशासक से मैंने स्पष्ट सुना है व उन्हें प्रयोग करते हुए देखा भी है कि "कोई निर्णय न लेने का निर्णय भी एक निर्णय होता है." प्रशासन के क्षेत्र में इसका प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया जाता है किन्तु प्रबन्धन के क्षेत्र में इसका प्रयोग असफ़लता की ओर ही ले जायेगा. अतः प्रबंधन के विद्यार्थी को समझने की आवश्यकता है कि प्रबन्धन का प्रयोग सकारात्मक उद्देश्यों की कुशलता पूर्वक प्राप्ति के लिये ही किया जाना चाहिये तथा सावधन भी रहना चाहिये कि समाज के कथित शुभचिन्तक स्वार्थ-साधना के लिये प्रबंधन व प्रबंधकों का दुरुपयोग भी कर सकते हैं. उससे न केवल स्वयं बचना है, वरन उन्हें निष्प्रभावी भी करना है.


1 टिप्पणी:

सतीश सक्सेना ने कहा…

शुभकामनायें राष्ट्रप्रेमी जी !!