गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

नव-वर्ष की सशर्त शुभकामनाएँ व बधाई

नव-वर्ष की सशर्त शुभकामनाएँ व बधाई!


मित्रो एक वर्ष और बीत गया, फिर चलेगा बधाइयों का दौर और फिर

 हम सब अगले वर्ष भी किसी न किसी अपराध में सम्मिलित होकर 

या अपराध का समर्थन करके या फिर अपराध को नजर अन्दाज 

करके, हम सभी अपराधों को बढ़ावा देने और कानून और सरकार को 

कोसने को तैयार हो जायेंगे। ऐसे में किस प्रकार हमारा नव वर्ष शुभ हो

 सकता है।

अतः मैं आप सबको बधाई और शुभकामनाएँ तो देना चाहता हूँ बशर्ते 

हम अपने ज्ञान, भाव व कर्म को एकरूपता प्रदान कर सबके हित में 

निरन्तर कर्मरत रहने का संकल्प करें



-हम संकल्प करें-


जो सोचें, वही बोलें और वही करें

ईश्वर को मंदिर, मस्जिद, चर्च से बाहर लाकर प्रत्येक कर्म का साक्षी 

बनायें और कर्म को धर्म में परिवर्तित कर लें।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

बस एह्सास काफ़ी है


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

काबिल बनें


सोमवार, 14 दिसंबर 2015

खुश रहने का राज

मित्रो प्रत्येक व्यक्ति खुश रहना चाहता है! 


आओ खुश रहने का राज जानें


 राष्ट्र किंकर के इस आलेख से


गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

शुभ प्रभात


मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

समय ही जीवन है


बुधवार, 2 दिसंबर 2015

लिव इन रिलेशनशिप - शादी के बन्धन के बिना शादी की सुविधाओं का प्रबन्धन

मित्रों फ़ेस-बुक के माध्यम से मेरे पास एक प्रश्न आया था कि लीवींग रिलेशन क्या और कैसे होता हैं? उस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूं। मेरे विचार में लिव इन रिलेशनशिप-
१- एक वयस्क स्त्री और पुरुष का बिना शादी के एक स्त्री और पुरुष के नाते साथ-साथ रहना ही लिव इन रिलेशनशिप कही जाती है। इसके अन्तर्गत वे एक-दूसरे के पूर्ण सहयोगी व साझेदार होते हैं। यह सामाजिक दृष्टिकोण से भले ही अच्छा नहीं माना जाता किन्तु गैर कानूनी नहीं है, क्योंकि किसी भी वयस्क स्त्री और पुरुष को यह निर्णय करने का अधिकार है कि वह कैसे और किसके साथ रहे किन्तु यह किसी के कानूनी अधिकारों को बाधित नहीं करना चाहिये।
२. यदि स्त्री और पुरुष समझदार है और एक-दूसरे के प्रति सहयोगी और समर्पित हैं तो लिव इन रिलेशन्शिप भी स्थाई हो सकती है। मुझे स्मरण नहीं आ रहा कुछ वर्षों पूर्व किसी प्रसिद्ध व सम्मानित संगीतकार का निधन हुआ था! उस समय प्रकाशित उनकी जीवनी के अनुसार वे बिना शादी के ही अपनी महिला मित्र के साथ शायद ५० वर्षों से अधिक रह रहे थे। इस प्रकार की समझदारी भरी रिलेशन्शिप वास्तविक रूप से शादी से भी अधिक स्थाई व पवित्र कही जा सकती है!
३-शादी करके भी विवाहेत्तर सम्बन्ध रखने वाले स्त्री-पुरुषों या कुआरें रहते हुए भी छिपकर कुकर्म करने वाले स्त्री-पुरुषों की अपेक्षा लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले स्त्री व पुरुष ईमानदार व साहसी हैं। वे एक दूसरे पर भार नहीं हैं, एक दूसरे की स्वतन्त्रता में बाधक नहीं हैं; उन्होनें किसी बाध्यता के अन्तर्गत नहीं बल्कि एक-दूसरे को दिल से स्वीकार किया है।
४- बिना शादी के साथ-साथ रह्ते हुए भी उनके बच्चे अवैध नहीं माने जायेंगे और बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी दोनों की ही होगी।
५- आपसी प्रेम रहते तो किसी प्रकार की समस्या ही नहीं है किन्तु विवाद होने पर किसी प्रकार का सामाजिक व कानूनी संरंक्षण उपलब्ध नहीं होता कितु अलग होने के लिये शादी शुदा व्यक्तियों के लिये दुष्कर व दर्दीली कानूनी प्रक्रिया के पालन की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।
६- सामाजिक दृष्टिकोण से लिव इन रिलेशन्शिप सामाजिक व पारिवारिक ताने-बाने को कमजोर करती है किन्तु वैयक्तिक स्वतन्त्रता के हिमायतियों के लिये यह व्यवस्था शादी के बन्धन में बंधे बिना, शादी के अधिकारों व कर्तव्यों के भार को उठाये बिना सुविधाओं का उपयोग किया जा सकता है और जब चाहे तब बिना किसी कानूनी पचड़े के अलग हुआ जा सकता है। 
७- लिव इन रिलेशन शिप समाज व परिवार के अहित में किन्तु तात्काकालिक रूप से व्यक्ति के हित में प्रतीत होती है!
८- यदि दोनो स्त्री व पुरुष आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं तो दोनों के लिये कोई समस्या नहीं, किन्तु यदि एक आत्मनिर्भर नहीं है; तो उसके लिये इस प्रकार का सम्बन्ध जोखिम भरा है, क्योंकि इसमें कोई कानूनी, पारिवारिक या सामाजिक संरंक्षण उपलब्ध नहीं होता।
९- भविष्य में इस प्रकार के सम्बन्धों में वृद्धि होने की सम्भावना हैं क्योंकि भारतीय कानून महिलाओं के पक्ष में एक-पक्षीय बनते जा रहे हैं औए वर्तमान की कुछ चालाक व शातिर दिमाग महिलायें ऐसे कानूनों का दुरुपयोग कर व्याक्ति, परिवार व समाज के लिये समस्यायें खड़ी करने लगी हैं। ऐसी स्थिति में पुरुष शादी करने से डरने लगेंगे; यही नही कुछ आधुनिक आत्मनिर्भर महिलायें शादी को अपनी स्वतन्त्रता में बाधक समझने के कारण लिव इन रिलेशन्शिप में रहना ही अधिक उपयुक्त समझने लगीं हैं।

सोमवार, 30 नवंबर 2015

मैंने सीखा


रविवार, 29 नवंबर 2015

बहुमूल्य चीजें मुफ़्त में


शनिवार, 28 नवंबर 2015

मुफ़्त नहीं मिलता कुछ जग में


शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

आओ अपनी सोच सुधारें

विकास का आधार- हमारी सोच

शनिवार, 5 सितंबर 2015

शनिवार, 15 अगस्त 2015

जीवन प्रबन्धन में उपयोगी नुस्खे

 जीवन प्रबन्धन में उपयोगी

बुधवार, 29 जुलाई 2015

मेरी मौत पर कोई छुट्टी मत करना

मेरी मौत पर कोई छुट्टी मत करना। मुझे सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो एक दिन ज्यादा काम करना। - डा.कलाम
क्या हमारी संसद व सरकार ने कलाम साहब की इच्छा का मान रखा? क्या हम कलाम साहब के सम्मान में उनके सपनों को अपने सपने बनाने को तैयार हैं?
इसके लिये हमें छुट्टेयों की प्रवृति को त्याग कर कर्म योगी बन डा कलाम साहब के पथ पर बढ़ना होगा।

The boss you would like to work with

There were about 70 scientists working on a very hectic project. All of them were really frustrated due to the pressure of work and the demands of their boss but everyone was loyal to him and did not think of quitting their job.

The boss you would like to work with

Update 28.07.2015: Dr.Abdul Kalam passed away on 27th July 2015.  Even as the entire country mourns on the sad demise of a great man who woul always be a source of inspiration to us in all the walks of life,  we could cherish reading about true incidents in the life of Mr.Kalam and try to follow his path.  Here is one such true incident during his stint at ISRO
There were about 70 scientists working on a very hectic project. All of them were really frustrated due to the pressure of work and the demands of their boss but everyone was loyal to him and did not think of quitting their job.
One day, one scientist came to his boss and told him, “Sir, I have promised my children that I will take them to the exhibition going on in our township so I want to leave the office at 5:30 pm.”
His boss replied, “OK, You’re permitted to leave the office early today.”
The Scientist started working. He continued his work after lunch. As usual, he got involved to such an extent that he looked at his watch only when he felt he was close to completion. The time was 8.30 PM.
Suddenly he remembered the promise he had made to his children.
He looked for his boss but he was not there. Having told him in the morning himself, he closed everything and left for home. Deep within himself, he was feeling guilty for having disappointed his children. He reached home. The children were not there.
His wife alone was sitting in the hall and reading magazines. The situation was explosive; any talk wouldboomerang on him. His wife asked him, “Would you like to have coffee or shall I straight away serve dinner if you are hungry?”
The man replied, “If you would like to have coffee, I too will have but what about the children?”
Hi wife replied, “You don’t know? Your boss came here at 5.15 PM and has taken the children to the exhibition.”
What had really happened was … The boss who granted him permission was observing him working seriously at 5.00 PM. He thought to himself, this person will not leave the work, but if he has promised his children they should enjoy the visit to exhibition. So he took the lead in taking them to exhibition.
The boss does not have to do it every time. But once it is done, loyalty is established. That is why all the scientists at Thumba continued to work under their boss even though the stress was tremendous.
By the way, can you hazard a guess as to who the boss was?
He was none other than the mastermind behind India ‘s successful nuclear weapons and missiles program – Dr. APJ Abdul Kalam, Former President of India.
Dr-Adbul-Kalam
This article is taken from with thanks-
http://www.gconnect.in/outdoor/lifestyle/get-ahead/the-boss-you-would-like-to-work-with.html?utm_source=feedblitz&utm_medium=FeedBlitzEmail&utm_content=408382&utm_campaign=0

शनिवार, 27 जून 2015

लम्बा व उपयोगी जीवन जीने के लिये

चाय-काफ़ी छोड़े- जीवन में कुछ वर्ष और जोड़े

राष्ट्रकिंकर से साभार

मंगलवार, 5 मई 2015

सफ़लता का राज- अन्तिम पोस्ट

जीवन का जश्न उसकी उपयोगिता में हैः


जीवन का जश्न जीवन के सदुपयोग करने में है। अपने कर्तव्यों के निर्वाह के लिए प्रयासरत रहने में है। यदि आपने प्रयास किये हैं तो जश्न मनाने के लिए परिणामों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप अपने जीवन को बिना किसी का अभाव महसूस किए और बिना किसी के दबाब में जीते हो तो आपकी बराबर सफल व्यक्ति और कौन हो सकता है? और आप जश्न मनाने के इस अवसर को क्यों गंवा रहे हो?

ना किसी के अभाव में जीओ
ना किसी के प्रभाव में जीओ
टुकड़ों-टुकड़ों में क्या जीना?
समग्रता  से जीवन  जीओ।

स्पष्ट है कि जीवन की सफलता जीवन को बिना किसी के प्रभाव के आनंदपूर्वक जीने में है। अतः जीवन को टुकड़ों में मत बाँटो और जीवन के हर क्षण का आनंद उठाओ। जीवन का हर पल जश्न मनाते हुए बीते। आपके चेहरे पर हर समय प्रसिद्ध प्रबंध गुरू श्री कृष्ण के चेहरे की तरह मुस्कराहट आपके जश्न में डूबकर कार्य करने की प्रतीक के रूप में प्रकट होती रहे। आपकी मुस्कराहट न केवल आपको सदैव आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, वरन् आपके पीछे अनुयायियों की संख्या में वृद्धि करके उनको भी सफलता की राह पर चलने को अभिप्रेरित करती है। अतः सफलता के राज़    को जानें; प्रबंधन को अपने जीवन में ढालें; सफलता हासिल करते हुए जश्न मनायें और जश्न मनाते हुए सफलता हासिल करते रहें।

शनिवार, 2 मई 2015

जश्न मनायें, किंतु रूकें नहीं!


हमें अपने कार्य करने के सामान्य प्रक्रम में दिन-प्रतिदिन अनेकों सफलता मिलतीं हैं, किन्तु हम गलती यह करते हैं कि हम सफलता को सफलता के रूप में स्वीकार नहीं करते या किसी सफलता के जश्न में डूब जाते हैं और अपने अगले कदम को भुलाकर किसी अवसर को गवाँ देते हैं। दिन-प्रतिदिन किए जाने वाले प्रयासों से हम कदम-कदम पर सफलता प्राप्त करते ही हैं। हमें इन सफलताओं की अनुभूति करते हुए इन पर जश्न मनाते हुए अपनी विकास यात्रा के अगले पड़ाव की यात्रा संपन्न करनी है। हमें प्रत्येक सफलता को स्वीकार कर उस पर जश्न मनाते हुए अगली सफलता की कहानी की रूप रेखा तैयार करनी चाहिए। ध्यान रखने की बात यह है कि सफलता का जश्न नशे में परिवर्तित नहीं होना चाहिए कि हम अपने कर्तव्य पथ से भी भटक जायँ। आइंस्टाइन के अनुसार, ‘‘खुश व्यक्ति अपने वर्तमान से इतना संतुष्ट होता है कि वह भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं सोच सकता।’’ अर्थात अधिक प्रसन्नता भी भविष्य की योजनाओं से विमुख कर सकती है। 
सामान्यतः लोग जश्न को आराम व आनंद का प्रतीक मानते हैं। आराम करो ! आराम करो ! आराम करो !  कार्य करते समय आराम करना सीखिये। मेरा आग्रह है कि आप काम करते समय ही जश्न मनाना सीखिए। जब हम रोचक और उत्साह से ओतप्रोत होकर कार्य करते हैं तो कभी नहीं थकते और कार्य करने में ही जश्न के आनंद की अनुभूति होने लगती है। जश्न हमें आगे बढ़ने के लिए अभिप्रेरित करे, न कि अवकाश लेकर समय बर्बाद करने का काम करे। हमें काम से अलग होकर जश्न मनाने की मनोवृत्ति को त्याग कर काम करके जश्न मनाने की शुरूआत करने की नवीन परंपरा डालनी होगी। हमें प्रत्येक उपलब्धि को स्वीकार कर उसका जश्न मनाना चाहिए किंतु कभी भी अपनी सफलता की यात्रा में रूकें नहीं।

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

जश्न मनाएँ! जश्न के नशे में डूबें नहीं


जी हाँ! मानव एक सामाजिक प्राणी है। अपने सुःख -दुखों को वह अपने परिवार व मित्र गणों के साथ बाँटकर अपने आपको हल्का महसूस करता है। निःसन्देह जिस प्रकार काम करने के लिए विश्राम व मनोरंजन करके तरोताजा होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार से अपनी उपलब्धियों के बारे में जानकारी देने के लिए अल्पकालिक जश्न मनाना भी न केवल अपने आपको बल्कि दूसरों को भी अभिप्रेरित करता है। हम मशीन तो हैं नहीं कि बिना भावनाओं के अपने कार्य में लगे रहें। अपने कार्य की प्रशंसा प्राप्त करके हमें जिस आनंद की अनुभूति होती है, वह सुस्वाद भोजन करने से भी नहीं होती।

        कार्य की स्वीकृति हमें अभिप्रेरित करती है। अभिप्रेरणा काम करने की आन्तरिक शक्ति को जगाती है। अतः अपनी उपलब्धियों पर आनन्द मनाना दूसरों को अपने आनंद में सहभागी बनाना व्यक्ति की मानसिक स्थिरता, संतुलन व समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक है। हमें अपनी छोटी-बड़ी सभी उपलब्धियों पर आनंद की अनुभूति होती है और होनी भी चाहिए। अपनी इस अनुभूति को बाँटकर हम अपने परिवारीजनों को भी आनंदित कर देते हैं। यही नहीं हम अपने आसपास के वातावरण को सुखद व प्रतिस्पर्धी बनाकर दूसरों को भी सफलता की ओर कदम बढ़ाने को अभिप्रेरित करने में भी सफल होते हैं। यह आवश्यक भी है किंतु सफलता का जश्न इतना अधिक न हो जाय कि हम आगे की सीढ़ी पर चढ़ना ही भूल जायँ। हमें अपनी प्रत्येक उपलब्धि का जश्म मनाना ही चाहिए किंतु ध्यान रहे- जश्न मनायें; उसके नशे में डूबे नहीं। अभी जीवन यात्रा में बहुत सी सफलताएँ शेष हैं।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

उपलब्धियों को स्वीकार करें!


जो उपलब्धि हमें हासिल हुई है। उसके स्वागत के लिए सबसे पहले आवश्यक है कि हम उसे स्वीकार करें। कई बार देखने में आता है कि हम अपनी उपलब्धियों को स्वीकार ही नहीं करते या उन्हें कमतर आँकते हैं। अरे! भाई आप ही अपनी उपलब्ध्यिों को स्वीकार नहीं करेंगे तो आपकी उपलब्धियों को और कौन स्वीकार करेगा? जश्न मनाना वास्तव में उपलब्धियों को स्वीकार करना है। उपलब्धियाँ हमें और अधिक उपलब्धियाँ हासिल करने को अभिप्रेरित करती हैं। अतः हमें अपनी प्रत्येक उपलब्धि को स्वीकार करना चाहिए। हमें जश्न मनाने के लिए बड़ी-बड़ी उपलब्धियों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि हम बड़ी उपलब्धियों की प्रतीक्षा ही करते रहे तो शायद कभी जश्न मनाने का अवसर ही न मिल पाये। 


          किसी विद्यार्थी को जश्न मनाने के लिए परीक्षाफल आने की तिथि की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता ही नहीं है। वस्तुतः परीक्षा पास करना कोई उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तो ज्ञान प्राप्त करना है। परीक्षा तो प्राप्त ज्ञान की किसी संस्था द्वारा मान्यता मात्र है। अतः जब विद्यार्थी किसी विशेष विषय में किसी समस्या को समझकर उसका समाधान करने में सफल हो जाता है तो यह उसकी उपलब्धि है और इस पर उसे जश्न मनाने का पूरा-पूरा अधिकार है। हाँ! यह अलग बात है कि वह अपनी इस उपलब्धि को अपनी माँ के साथ बाँटकर और माँ के हाथ से एक गिलास दूध का पीकर कुछ क्षणों के लिए जश्न का आनंद उठाये और अपनी इस उपलब्धि से अभिप्रेरित होकर अगली समस्या को समझने के प्रयास करना आरंभ कर दे। आपका मित्र आपसे नाराज है और आप उसे मनाने का प्रयास कर रहे हैं, आपके प्रयास सफल हुए और आप अपने मित्र की नाराजी को दूर कर लेते हैं तो आपकी महत्वपूर्ण उपलब्धि है और आप अपने मित्र के साथ इस सफलता पर जश्न मनाएँ और अपनी मित्रता को और भी अधिक घनिष्ट बनायें।


बुधवार, 22 अप्रैल 2015

जश्न मनाते हुए अपनी अगली योजना में जुट जाइये ना

जश्न मनाने के अवसर: 


आप रात को यह तय करके सोते हैं कि आप प्रातःकाल जल्दी उठेंगे और अपने कार्य निपटायेंगे। आप प्रातःकाल बिना किसी अलार्म के और बिना किसी के उठाये स्वयं उठ जाते हैं तो आपको सफलता मिली ना। आज की सबसे पहली सफलता। अब यह तो आपके ऊपर निर्भर है कि आप सफलता को स्वीकार करके प्रसन्नता की अनुभूति करें। आनन्द का उपभोग करें या यह सोचकर कि आपको कितना काम करना पड़ता है कि आप चैन से सो भी नहीं सकते। यह विचार करके अपने आप के लिए तनाव का सृजन करें। अरे भाई! दिन की पहली सफलता पर प्रसन्न होकर जश्न मनाते हुए अपनी अगली योजना में जुट जाइये ना। आपकी पहली सफलता अगली सफलता की अभिप्रेरक बन कर आपको आगे बढ़ने में मदद करेगी।
           आप रेलवे रिजर्वेशन के लिए कतार में खड़े हैं और अन्ततः आपने आरक्षण करा ही लिया। आपको कन्फर्म टिकट मिल गई। आपने सफलता प्राप्त की है और आपको इस सफलता के लिए आनन्दित होना ही चाहिए। इसी प्रकार दिनभर आप अनेकों सफलताएँ प्राप्त करते हैं फिर आप प्रत्येक सफलता पर आनन्दित क्यों नहीं होते?
आपको बस से यात्रा करनी है। आपको लग रहा है कि आपको बिलंब हो गया है बस मिलना मुश्किल है। आप शीघ्रता से बस अड्डे की ओर प्रस्थान करते हैं। आपके पहुँचने से पूर्व ही बस चल चुकी थी किंतु दौड़कर आप बस को पकड़ ही लेते हैं। आपको सफलता मिली ना! यही नहीं आपको अनपेक्षित रूप से बस में सीट भी मिल गई और वो भी खिड़की वाली। अब और क्या बाकी है आपको सफलता की अनुभूति करने में। सफलता की अनुभूति करने में कंजूसी क्यों? आप अपने सहयात्री को एक मुस्कान देकर अपने आनंद में सम्मिलित कर सकते हैं। आप और किसी के साथ अपनी प्रसन्नता को बाँट न सकें तो मन ही मन प्रसन्न तो हो ही सकते हैं। अपने चेहरे पर मुस्कराहट तो आने दीजिए। फिलहाल आपको तीन-तीन उपलब्धियाँ एक साथ मिली है, उनके आनंद को भावी आशंकाओं से प्रभावित मत होने दीजिए। 

           आपकी पत्नी ने बड़े चाव से खाना बनाया है और खाना स्वादिष्ट व पौष्टिक दोंनों ही कसौटियों पर खरा उतरता है; आपकी पत्नी बधाई की पात्र हैं, उन्हें बधाई दीजिए और उन्हें उनकी सफलता पर आनन्द का अनुभव करने दीजिए हो सके तो कुछ क्षणों के लिए ही सही उनके साथ उनकी सफलता के आनन्द में स्वयं जुड़ जाइये। यह तात्कालिक सफलता व उसकी अनुभूति आपके दांपत्य जीवन को सफलता की ओर ही अग्रसर करेगी। अपने प्रयासों की सफलता ही तो जीवन की सफलता की ओर ले जाती है। ये छोटी-छोटी सफलताएँ ही आपके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को ओर ताकत देंगी। आपको अभिप्रेरणा प्राप्त होगी और आपको अविरल कर्मरत रहने की आदत पड़ जायेगी। दूसरे शब्दों में आपको सफल होते रहने की आदत पड़ जायेगी।


सोमवार, 20 अप्रैल 2015

जश्न का मूल प्रसन्नता में हैः


किसी भी जश्न का मूल उपलब्धियों को लेकर अपनी प्रसन्नता जाहिर करना और अपने मित्र जनों को उस प्रसन्नता में सहभागी बनाना है। प्रसन्न रहना व प्रसन्न रखना व्यक्ति, परिवार व समाज सभी का ध्येय रहता है। निम्नलिखित संस्कृत के श्लोक में भी प्रसन्न रहने के महत्व को स्पष्ट किया है-

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।

अर्थात प्रसन्न रहने से सम्पूर्ण दुखों को दूर करने में सहायता मिलती है। मन प्रसन्न होने से मानसिक तनाव नहीं होता और बुद्धि भी स्थिर (स्थिरप्रज्ञ) रहती है जिससे प्रज्ञापराध नहीं हो पाते।
इस प्रकार अपने प्रयासों की सफलता पर प्रसन्नता का अनुभव करना और जश्न मनाकर उसमें अपने संबन्धियों को ही नहीं प्रतिस्पर्धियों को भी सम्मिलित करना अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

सफलता को स्वीकार करें-

जश्न मनायें


भारत में ‘सात वार नौ त्यौहार’ की कहावत प्रचलित है। इसका आशय है कि भारत उत्सवप्रिय देश है। हमारे यहाँ सप्ताह में सात दिन होते हैं तो नौ त्योहार देखने को मिलेंगे। कहने का आशय यह है कि हमें उत्सव मनाने में विशेष आनन्द की अनुभूति होती है। हमारे यहाँ जन्म उत्सव का अवसर है तो मरण का भी उत्सव मनाया जाता है। जमीन खरीदना, मकान बनबाना ही नहीं घर के लिए किसी नवीन वस्तु का क्रय करना भी प्रसन्नता का अवसर माना जाता है और लोग आपसे पार्टी माँगना प्रारंभ कर देते हैं। आपने परीक्षा पास की है तो मिठाई बाँटने का अवसर है, तो घर में किसी मेहमान के आने का अवसर भी पकवान बनाने का सबब बनता है। इस प्रकार जश्न मनाना हमें अपनी उपलब्धियों की अनुभूति कराता है तो दूसरी ओर अपने सुखों में दूसरों को सम्मिलित करने का अवसर भी मिलता है। यही नहीं दूसरों की नजर में अपने को ऊँचा दिखाने का इससे अच्छा अवसर और कौन सा मिलेगा? अपने अहं की संतुष्टि भी जश्न मनाकर अपनी उपलब्धियों के बारे में अपने निकट संबन्धियों को ही नहीं दूरस्थ परिचितों को भी सूचित करके मिलती है।
हम उत्सव मनाने का अवसर ही तलाशते रहते हैं। इस उत्सवप्रियता ने प्राचीन काल में बहुत से परिवारों को आर्थिक रूप से बर्बाद भी किया है। हाँ, एक बात अवश्य है कि उत्सव मनाकर हम अपने कष्टकर जीवन में कुछ क्षणों के लिए बनावटी सुख की अनुभूति कर सकते हैं। वास्तविक सुख तो काम करते हुए उपलब्धियाँ हासिल करके जश्न मनाने में है अर्थात उत्सव मनाने के लिए अपने काम से अलग होने या दूसरों को काम से अलग करने में किसी भी प्रकार की समझदारी नहीं है। जीवन को निरर्थक आयोजनों या अवकाशों में बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है। निरंतर सफलता के लिए अपने कार्य पर ही जश्न मनाने का आनंद उठाने की प्रवृत्ति का विकास कीजिए।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

स्मार्ट प्रबंधक बन सफलता की राह

-ःमुस्कराहट सफलता को आमत्रित करती हैः-


फेसबुक पर निम्नलिखित पंक्तियां देखने को मिली आओ आप भी इन पंक्तियों को आत्मसात कीजिए। संसार में कितने ही दुख हों किंतु कोई भी व्यक्ति दुख पसंद तो नहीं करता। संसार में रोना भले ही पड़ता हो किंतु लोग रोना तो नहीं चाहते

मुस्कराते रहो तो दुनिया
आपके कदमों में होगी।
वरना आँसुओं को तो,
आँखें भी पास नहीं रखतीं।

       अतः हमें स्मरण रखना होगा कि तकनीक हमारी मुस्कराहट को या हमारे प्रियजनों की मुस्कराहट को न चुरा ले। हमारी खिलखिलाहट हमारे अच्छे स्वास्थ्य की निशानी तो है ही, अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक भी है। यही नहीं हमारी खिलखिलाहट हमारे प्रियजनों को भी आनन्दित करती है। स्मरण रखें किसी भी तकनीक का प्रयोग तभी तक करें, जब तक वह संबन्धों को घनिष्ठता प्रदान करे। तकनीक आपके संबन्धों में बाधक न बने।  
       हाँ! तकनीक आवश्यक है। तकनीक का प्रयोग अवश्य करें। हाँ यह स्मरण रखें कि तकनीक हमारा उपयोग न करने लगे। आखिर तकनीक हमारे लिए है, हम तकनीक के लिए नहीं। तकनीक जीवन को सुविधाजनक व आनन्दपूर्ण बनाने के लिए है; वह तनाव का कारण न बने इसका ख्याल हमें रखना होगा। इसके लिए उचित व आवश्यक तकनीक के चयन, प्रयोग व प्रबंधन के द्वारा हमें तकनीकी का स्मार्ट प्रयोग करना होगा। तकनीक के उचित प्रयोग से ही हम स्मार्ट प्रबंधक बन सफलता की राह पर निरंतर बढ़ सकेंगे।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

छोटे-छोटे काम करके ही देश-दुनिया में बड़े बदलाव

कन्फ्यूशियस का जवाब

कन्फ्यूशियस के समय चीन बड़े उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा था।


 सभी के मन में अराजकता और रक्तपात फैलने का भय समाया हुआ


 था। सरकार का एक नुमाइंदा ऐसे माहोल में कन्फ्यूशियस को खोज 


रहा था। आखिर कार उसने  कन्फ्यूशियस को पा ही लिया। वे एक


 पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे थे। सरकारी प्रतिनिधि ने सम्मान सहित 


अभिवादन किया और उनके निकट बैठ गया। उसने बड़े ही अदब से


 निवेदन किया, ‘इस समय में हमें आपका मार्गदर्शन चाहिए। आप 


सरकार की सहायता करें, वरना यह देश बिखर जाएगा।’


कन्फ्यूशियस यह सुनकर कुछ बोले नहीं, सिर्फ मुस्करा दिए।


 वह व्यक्ति बोला, ‘आपने हमें सदैव कर्म करने की ही सीख दी है,


 आपने ही हमें देश और दुनिया के लिए हमारे कर्तव्यों के प्रति 


जागरूक किया है। आप देश को बचाने के लिए कुछ करें।



कन्फ्यूशियस ने कहा, ‘मैं देश के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ। उसके


 बाद में मोहल्ले के व्यक्तियों की मदद करने जाऊँगा। अपने परिवेश से


 जुड़ा रहते हुए अपनी सीमाओं के भीतर काम करके ही हम सभी का 


हित कर सकते हैं। यदि हम दुनिया को बचाने के उपाय ही खोजते


 रहेंगे तो हमारे हाथ कुछ नहीं आयेगा। राजनीति से संबद्ध होने के 


बहुत से तरीके हैं, उसके लिए मुझे सरकार का अंग बनने की 


आवश्यकता नहीं है।’



    सन्देश- हम छोटे-छोटे काम करके ही देश-दुनिया में बड़े बदलाव 


ला सकते हैं, सिर्फ बड़ा सोचने से नहीं।



स्रोतः दैनिक जागरण सप्तरंग, पानीपत, दिनांक 15 अप्रेल 2015

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

उचित प्रयोग व्यक्ति की कुशलता के ऊपर निर्भर है

इस प्रकार स्पष्ट है कि तकनीक निश्चित रूप से आवश्यक व अनिवार्य है किन्तु उसका उचित प्रयोग व्यक्ति की कुशलता के ऊपर निर्भर है। हमें सदैव यह याद रखना चाहिए कि कोई भी तरीका किसी कार्य को करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कार्य महत्वपूर्ण है तरीका नहीं, कल को इस तरीके से भी भिन्न तरीके की खोज कर ली जाय तो हम उस तरीके से काम करने लगेंगे। यही तो तकनीक का नवीनीकरण या अपडेशन है।
तकनीक अपने आप में एक उपकरण मात्र है। उसका प्रयोग तो प्रयोगकर्ता के ऊपर निर्भर होता है। यह ठीक उसी प्रकार है कि हमारे पास एक चाकू है। चाकू एक उपकरण है किंतु चाकू का उपयोग हमारे हाथ में है। हम चाहें तो उससे सब्जी काट सकते हैं। सर्जरी के काम में लेकर किसी की जान बचा सकते हैं। यदि हम चाहे तो चाकू का प्रयोग किसी की जान लेने में भी कर सकते हैं। अब उस चाकू का प्रयोग कैसे भी करें, प्राप्त परिणाम का श्रेय हमें ही मिलेगा, चाकू को नहीं। ठीक यही स्थिति तकनीक के इस्तेमाल में है। हमें ध्यान रखना होगा कि तकनीक हमें अपनों से दूर न कर दे। 
टेलीविजन व इन्टरनेट हमारे परिवार का स्थान नहीं ले सकते। हमें तकनीक का प्रयोग करना चाहिए किन्तु तकनीक के नशे में डूबने से बचना होगा। ऐसा न हो कि आप फेसबुक या ट्विटर पर लगे हों और आपकी पत्नी और बच्चे आपसे बातें करने के लिए तरश जायें। ऐसा न हो कि आप टेलीविजन देखते रहे और आपके परिवार का एक बुजुर्ग सदस्य पानी माँगता ही रह जायँ। ऐसा न हो कि आप टेलीविजन देखने में इतनी मशगूल हो जायँ कि काम से थके हारे आने वाले आपके पतिदेव आपकी मुस्काराहट भरे स्वागत से वंचित हो जायँ। तकनीकी के फेर में पड़ कर आप अपनी मुस्कराहट को मत भुला बैठिए। 

रविवार, 5 अप्रैल 2015

स्वचलन गीत

इस संबन्ध में ग्लेजर के स्वचलन गीत का हिन्दी अनुवाद दृष्टव्य है।

स्वचलन गीत
¼ Song of automation½



‘‘एक सोमवार की सुबह
मैं फैक्टरी देखने गया।
जब मैं वहाँ पहुँचा, 
वह निर्जन थी-बिल्कुल सुनसान।
न तो मुझे ‘जो’ मिला न ‘जैक’, 
न ही ‘जॉन’ न ‘जिम’,
मुझे कोई भी न दिखा-
कोई भी नहींः
हाँ, बटन, घंटिया व
(लाल,पीली,नीली,हरी) बत्तियाँ
जरूर पूरी फैक्टरी में थीं।

क्या-क्या था?-यह जानने के लिए
मैं फोरमैन के ऑफिस में
घूम-घूम कर चलता रहा।
उसके चेहरे पर सीधे देखकर
मैंने पूछा-‘‘क्या हो रहा है?’’
उत्तर जानते हैं क्या मिला?
उसकी आँखे लाल, हरी, नीली होती गयीं,
तब मुझे सहसा भान हुआ कि 
फोरमैन की कुर्सी पर रॉबोट बैठा था।
उस फैक्टरी में चारों तरफ चलता रहा-
ऊपर-नीचे, आर-पार
लोट-पोट कर मैंने वहाँ की
सभी बटनों, घंटियों और बत्तियों को देखा।
रहस्य जैसा लगा मुझे यह सब कुछ।
मैंने पुकारा-‘‘फ्रैंक, हैंक, आइस, माइक,
रॉय, राय, डॉन, डैन, बिल, फिल, फ्रैड, पीट।’’
जबाब में एक मशीन जैसी तेज आवाज आई-
‘‘ये सब तुम्हारे लोग पुराने हो चुके।’’

मैं सहम गया 
और चिंतित हो उठा,
जब फैक्टरी से निकला, मैं अस्वस्थ था।
मैंने कम्पनी के प्रेसीडेंट से मिलना चाहा;
उसके ऑफिस में पहुँचने पर देखा-
वह भौंहें चढ़ाए, मुँह बनाए
दरवाजे के बाहर दौड़ा चला आ रहा था, 
क्योंकि प्रेसीडेन्ट के स्थान पर 
मशीननुमा अधिकारी डटा था।

मैं घर चला आया,
जब पत्नी को,
हमेशा चाहने वाली पत्नी कोः
फैक्टरी के बारे में कह सुनाया,
प्रेम करती, चूमती वह रो उठी।
ये सब बटन औ’ बत्तियाँ
तो मैं नहीं समझता,
लेकिन इतना जरूर जानता हूँ-
प्यार आज भी पुराने तरीके से ही किया जाता है।’’

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

तकनीक जीवन के लिये

तकनीक के पहलू पर शिक्षा में तकनीक के प्रयोग के महत्व को स्वीकार करते हुए भी हटचन चेतावनी देते हैं, ‘‘वास्तविक खतरा यह है कि हो सकता है शिक्षा की तकनीक स्वयं शिक्षा के तरीकों एवं उद्देश्यों का निर्धारण करने लगे।’’ हटचिन ने यह चेतावनी शिक्षा के सन्दर्भ में दी है क्योंकि जब उन्होंने यह लिखा है, वे शिक्षा के सन्दर्भ में काम कर रहे थे। हटचन की यह चेतावनी समग्र रूप से जीवन के सन्दर्भ में भी सटीक बैठती है। वास्तव में तकनीक नहीं, जीवन महत्वपूर्ण है। जीवन की सफलता को टुकड़ों-टुकड़ों में मापना संभव नहीं होता, किन्तु प्रत्येक टुकड़ा महत्वपूर्ण होता है। तकनीकी जीवन को समग्रता से जीने के लिए निश्चित रूप से उपयोगी और आवश्यक है किन्तु तकनीक जीवन के लिए है, न कि जीवन तकनीक के लिए।

       आज तकनीक का युग है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र तकनीक से प्रभावित हुआ है। हमारे अंतरंग कक्ष (Bed Room) से कार्य स्थल तक तकनीक प्रभावी हो रही है। तकनीक के इस युग को स्वचलन (Auto Mode) का युग कहा जाने लगा है। स्वचलन में बिना श्रमिकों के कारखाने, बिना मनुष्यों के मशीनें तथा बिना लिपिकों के कार्यालयों की कल्पना सरकार ने अवश्य की है, परंतु इसके सामाजिक परिणाम क्या होंगे, इसे जो ग्लेजर (Joe Glazer) ने अपने स्वचलन गीत ( ैSong of automation) में भली-भाँति व्यक्त किया है। स्वचलन प्रत्येक क्षेत्र में नहीं किया जा सकता और न ही ऐसा किया जाना चाहिए। प्रत्येक कार्य की अपनी सीमाएँ भी होती हैं। हमें उन सीमाओं को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना चाहिए। स्वचलन की भी अपनी सीमाएँ हैं। उन सीमाओं को ध्यान में रखकर ही यंत्रीकरण व स्वचलन को अपनाना चाहिए। खतरनाक व मानव के लिए असुरक्षित क्रियाओं में ही संपूर्ण यंत्रीकरण व स्वचलन किया जाना उपयुक्त है। मानव हाथों को खाली रखने वाला यंत्रीकरण व्यक्ति व समाज के लिए घातक होता है। 
        अतः यंत्रीकरण व स्वचलन से पहले उन क्रियाओं का निर्धारण कर लेना चाहिए जिनमें स्वचलन आवश्यक है। अपने जीवन में तकनीक को निश्चित रूप से अपनायें किन्तु तकनीक के प्रयोग को निर्धारित करते समय हमें यह याद रखना होगा कि यंत्रीकरण इतना अधिक न हो जाय कि हमारा जीवन ही एक यंत्र बन जाय। मानवीयता के भाव सुविधाओं से अधिक आवश्यक हैं। जीवन मूल्यों को तकनीक के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस संबन्ध में ग्लेजर के स्वचलन गीत का हिन्दी अनुवाद दृष्टव्य है।

शनिवार, 28 मार्च 2015

तकनीकी का प्रयोग


तकनीक का अर्थ तरीका है। हमें प्रत्येक कार्य को किसी न किसी तरीके से तो करना ही पड़ेगा। बिना तरीके के प्रयोग किये कोई कार्य करना संभव ही नहीं है, फिर आप तकनीक को अपनाने में क्यों डरते हो? आप इस पुस्तक का अध्ययन कर रहे हैं, इसका आशय यह है कि आप सफलता की सीढ़ियों को उत्तरोत्तर चढ़ने के इच्छुक हैं। अब आप जैसे सफलता के पथ के पथिक को टेक्नोफोबिया से ग्रसित होने का तो कोई मतलब नहीं है। आप जानते हैं कि तकनीक से बचना संभव नहीं है, जब इससे बचना संभव नहीं है तो क्यों ना हम नवीनतम् तकनीक का प्रयोग करके स्मार्ट वर्कर बनें। आपने पढ़ा होगा कि सफल व्यक्ति कोई भिन्न कार्य नहीं करते, वे सामान्य कार्यो को ही अलग तरीके से करते हैं। अरे भाई! यह अलग तरीका ही तो तकनीक है। इसका आशय तो यही हुआ न कि सफल व्यक्ति तकनीक के बल पर ही सफल होते आये हैं। आप भी तकनीक का उचित उपयोग करके सफलता की ओर अग्रसर हो सकेंगे। अतः आज से, नहीं अभी से तकनीक से अपनी झिझक को दूर करके तकनीक को अपनी मित्र बनाइये। 
हाँ, यह ध्यान रखें तकनीक को मित्र ही बनायें पत्नी नहीं; क्योंकि पत्नी का स्थान तो आपकी पत्नी के सिवाय किसी को नहीं मिल सकता। मानवीय संबन्धों का स्थान कोई भी तकनीकी उपकरण नहीं ले सकते। आप कितने भी विकसित रोबोट बना लें किन्तु वह मानव का स्थान नहीं ले सकते। हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि तकनीकी या प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण नहीं। हमें उचित तकनीकी के चयन की आवश्यकता है (We need to remember that Technology is not the most important. We need to choose the right technology.½

शनिवार, 21 मार्च 2015

तकनीक का प्रयोग कर, बनें स्मार्ट प्रबंधक

तकनीक का प्रयोग कर, बनें स्मार्ट प्रबंधक


आपने बड़े-बुजुर्गो को कहते सुना होगा। कलयुग आ गया भाई! निःसन्देह उनकी बात सही है। कलयुग अर्थात कल-कारखानों का युग तो है ही, यही नहीं आज तो हम कल-कारखानों के युग से भी आगे स्वचलन के युग में आ गये हैं। आज तकनीक ने इतना विकास कर लिया है कि आपके जीवन में शायद ही कोई हिस्सा हो, जो तकनीक से अछूता बचा हो।
आप ने आग के आविष्कार का इतिहास तो अवश्य ही पढ़ा होगा। पहिए का आविष्कार और उसके प्रयोग के बारे में भी पढ़ा होगा। क्या आज भी आप पत्थरों को रगड़ कर आग जलाना पसन्द करेंगे? या आप बिना आग के अपने जीवन की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप बिना पहिए के जीवन को जी सकते हैं? नहीं ना! बिल्कुल सही बिना तकनीकी (ज्मबीदवसवहल) अर्थात प्रौद्योगिकी के बिना जीवन का निर्वाह कठिन ही नहीं वरन् लगभग असंभव प्रतीत होता है। वस्तुतः प्रौद्योगिकी, तकनीक या टेक्नोलॉजी इसे हम किसी भी नाम से जाने, यह किसी काम को करने का श्रेष्ठतम् तरीका है। किसी कार्य को ऐसे नवीनतम् तरीके से करना कि न्यूनतम् संसाधनों का प्रयोग करते हुए श्रेष्ठतम् परिणाम् प्राप्त किया जा सके वास्तव में तकनीक है। यही उद्देश्य प्रबंधन का भी होता है। अतः प्रबंधन को भी एक तकनीक कहा जा सकता है। वास्तव में प्रबंधन तकनीकों की तकनीक है।
 आग का आविष्कार, पहिए का आविष्कार, कृषि क्रांति ही नहीं आज औद्योगिक युग भी पीछे छूट गया है। आज के समाज को उद्योग प्रधान समाज नहीं, वरन् ज्ञान-आधारित समाज कहा जाने लगा है। कम्प्यूटर और इंटरनेट को कृषि क्रांति व औद्योगिक क्रांति के बाद तीसरी क्रांति की संज्ञा दी जा सकती है। कभी हम देश में जनसंख्या के विस्फोट की बात करते थे, किन्तु आज ज्ञान के विस्फोट की चर्चाएँ होती हैं। आज आपको किसी भी प्रकार की सूचना के लिए अखबार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। दूरदर्शन पर हर क्षण की खबरें हाजिर हैं। जी हाँ! दूरदर्शन पर 24 घण्टे समाचार परोसने वाले चैनल चिल्ला-चिल्लाकर खबरें परोस रहे हैं। खबरें, ताजा खबरें, चटपटी खबरें, ब्रेकिंग न्यूज बनाकर प्रस्तुत की जाने वाली खबरें। अरे हाँ! इससे भी आगे की बात तो कहना ही भूल गया। आज तो प्रत्येक नागरिक जो तकनीकी से जुड़ा है। वह स्वयं ही खबरों का स्रोत व पत्रकार है। 3जी और 4जी सेवा का कमाल है कि आज आप स्वयं भी खबरें अपलोड करके दुनिया में छा सकते हैं। यही तो नागरिक पत्रकारिता का दौर है।
आप अपने घर से दूर हैं और आप अपने घर पर संदेश भेजने के लिए डाकघर जा रहे हैं। अरे! नहीं यह गलती न कीजिएगा। बच्चे आपका मजाक उड़ायेंगे। डाकघर का पत्र भेजने का कारोबार तो लगभग बन्द होने को है। वहाँ केवल सरकारी व संस्थागत आवश्यक डाक ही जाती है। जहाँ प्रमाणों की आवश्यकता होती है। पत्र की तो बात ही क्या? गत वर्ष तार विभाग तो बन्द ही कर दिया गया है। अब तार कौन भेजे? 162 साल पुरानी टेलीग्राम सेवा को 14 जुलाई 2013 रात से बन्द कर दिया गया है। आज संदेशों के आदान-प्रदान के लिए चलवार्ता यंत्र छा गये हैं। चलवार्ता यंत्र! अरे आप भ्रम में मत पड़िये। मैं तो मोबाइल की बात कर रहा हूँ। आपके पास कितने नम्बर हैं? आपका मोबाइल हैण्डसेट स्मार्टफोन है कि नहीं? यदि नहीं है तो ले आइये कम्पनी एक्सचेंज ऑफर में सस्ता ही दे रही है। स्मार्ट तकनीक का प्रयोग करके स्मार्ट नागरिक बनिए।
डाकघर से मनीआर्डर भेजने का काम भी चला-चले का मेला है। अब मनीआर्डर करना तो पिछड़ेपन की निशानी है। डाकघर 5 रुपये सेकड़ा के हिसाब से शुल्क वसूलता है। वह शुल्क तो लेता है किन्तु मनीआर्डर अपने गन्तव्य पर कब पहुँचेगा, यह तो शायद डाक विभाग को भी पता नहीं होता। तभी तो आजकल डाक विभाग भी स्मार्ट हो रहा है और उसने भी साधारण मनीआर्डर को पीछे छोड़ ई-मनीऑर्डर की सेवा प्रारंभ की है; किन्तु आपको ई-मनीआर्डर की भी आवश्यकता नहीं है। आपका बैंक में खाता नहीं है? यदि नहीं है तो तुरन्त खुलवाइये। सरकार भी चाहती है कि हर नागरिक का बैंक में अपना खाता हो। केरल इस मामले में भी बाजी मार ले गया। वहाँ प्रत्येक परिवार का बैंक में खाता है। बैंक के मल्टीसिटी चेक से आप देश में उस बैंक की किसी भी शाखा से अपने धन की निकासी कर सकते हैं। इसके लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता। एटीएम तो और भी मजेदार है। इससे जब चाहो, जहाँ चाहो रुपया हाजिर है। यदि आप ई-बैंकिग प्रयोग करते हैं तो धन भेजने के लिए न तो प्रतीक्षा की आवश्यकता है और न ही कोई शुल्क चुकाने की आवश्यकता है। ई-बैंकिग को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार अधिकांश बैंक 1 लाख तक के धन स्थानान्तरण पर कोई शुल्क नहीं लेते। धन भी तुरन्त वहाँ पहुँच जाता है, जहाँ आप भेजना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में डाकघर जाकर मनीऑर्डर की बात करना पिछड़ेपन की निशानी नहीं कही जाय तो और क्या कही जायेगी? यदि आप इन्टरनेट का प्रयोग व्यक्तिगत रूप से कर पाने में झिझक महसूस करते हैं तो यह पिछड़ेपन की निशानी है। इसके बाबजूद आप जिस चैक बुक का प्रयोग कर रहे हैं वह मल्टीसिटी चैक बुक है। उसके द्वारा आप कहीं भी भुगतान कर सकते हैं, किसी भी शाखा से रकम निकाल सकते हैं। इसके लिए न तो किसी प्रकार का संग्रहण व्यय देना पड़ेगा और न ही कोई अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ेगा। यह भी कम्प्यूटर और इन्टरनेट तकनीक का ही कमाल है।
आपको कहीं बाहर जाना है और रेलगाड़ी में आरक्षण कराना है। आपको रेलवे काउण्टर पर लंबी लाइन में खड़े होने में डर लग रहा है। सही बात है। आरक्षण के लिए लंबी लाइनों में घण्टों खड़ा रहना कितना मुश्किल काम है? यात्रा करने का उत्साह ही मर जाता है। किन्तु अब आपको चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। तकनीकी हाजिर है। आखिर आप तकनीकी के युग में जी रहे हैं। रेलगाड़ी ही क्यो? अब बस व हवाई जहाज के टिकट के लिए भी आपको क्यू में लगने की आवश्यकता नहीं हैं। आप अपने कम्प्यूटर को ऑन कीजिए। इण्टरनेट कनेक्ट कीजिए और अपनी मनपसन्द यात्रा का टिकट हासिल कीजिए। भुगतान भी अपने बैंक एकाउंट से कर दीजिए। एक मजेदार बात और आपको रेल के टिकट का प्रिन्ट निकालने की भी आवश्यकता नहीं है। बेबसाइट द्वारा आपके मोबाइल पर भेजे गये एस.एम.एस. द्वारा ही टिकट का काम किया जायेगा।

शनिवार, 7 मार्च 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-२४

तथ्य बनाम सत्य


आपने छः अंधों और एक हाथी की कहानी सुनी या पढ़ी होगी। यह भारतीय लोक कथा जीवन की समग्रता को रेखांकित करती है और तथ्यों और सच्चाई के बीच के अन्तर को स्पष्ट करती है।
           एक बार छः अंधों में बहस छिड़ गयी कि हाथी कैसा होता है? काफी समय तक बहस के बाद बहस को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने निर्धारित किया कि यह जानने के लिए कि वास्तव में हाथी कैसा होता है? यह जानने के लिए स्वयं हाथी को छूकर जाना जाये।
       पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार वे हाथी को महसूस करने के लिए गये। उन्होंने हाथी को छूकर देखा। एक अंधे ने हाथी के पेट को छूकर कहा, ‘यह दीवार की तरह है।’ दूसरे ने उसके दाँत को सहलाते हुए कहा, ‘नहीं, यह तो तलवार की तरह है।’
        तभी तीसरा जिसके हाथ उसकी सूड़ आई थी, चिल्लाया, ‘क्या कह रहे हो, यह तो अजगर की तरह है।’ चौथे ने उसके पैर को छूते हुए कहा, ‘क्या तुम पागल हो गये हो? हाथी तो पेड़ के तने की तरह है।’ पाँचवें के हाथ हाथी के कान पर थे, ‘वह बोला तुम सब गलत हो यह तो पंखे की तरह है।’ छठे अंधे ने उसकी पूँछ पकड़ रखी थी, ‘‘वह क्रोधित होते हुए बोला, ‘‘बेबकूफो! हाथी दीवार, तलवार, अजगर, तने या पंखे की तरह नहीं यह तो एक रस्सी की तरह है।’
         उपरोक्त कहानी की तरह ही हमें समझने की जरूरत है कि जीवन समग्रता का नाम है। तथ्यों के द्वारा सच्चाई स्पष्ट हो ही जाय यह आवश्यक तो नहीं। तथ्यों की पूर्णता को देखना और फिर उनको समग्रता से परखना आवश्यक है। जीवन के किसी एक भाग में उपलब्धियाँ प्राप्त करने पर फूल कर कुप्पा होने की बात नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी को धोखा देकर कोई संपत्ति अर्जित करता है, तो वह धोखा देने के प्रयास में भले ही सफल हो गया हो किंतु जीवन मूल्यों को गँवा देने के कारण वह बुरी तरह असफल हुआ है। जीवन की सफलता के लिए किसी प्रकार का शोर्टकट मार्ग नही है। अतः जीवन को परिस्थितियों वश टुकड़ों-टुकड़ों में जीना पड़े तो भी हमें समग्रता व संतुलन के सिद्धांत को स्मरण रखना चाहिए। जीवन की सफलता का आकलन समग्रता के आधार पर ही होगा।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-२३

जीवन समग्रता का नाम हैः


निश्चित रूप से जीवन किसी एक दिन या एक वर्ष का नाम नहीं। जीवन व्यक्ति के बाल्यकाल या युवावस्था का भी नाम नहीं। जीवन व्यक्ति के आनंद के क्षणों या कष्ट के क्षणों का भी नाम नहीं। जीवन हँसने या रोने का भी नाम नहीं है। वस्तुतः जीवन व्यक्ति के संपूर्ण कार्यकलापों का नाम है जिसके अन्तर्गत अतीत, वर्तमान व भावी सभी कार्यकलाप सम्मिलित होते हैं। जीवन अच्छे दिनों का ही नाम नहीं है और न ही जीवन बुरे दिनों का ही नाम है। जीवन तो समग्रता का नाम है, जिसको पाना बहुत जटिल काम है। अतः जीवन के आनंद की अनुभूति करने के लिए जीवन की पूर्णता की प्रतीक्षा करना तो बुद्धिमानी नहीं होगी। जीवन की पूर्णता तो मृत्यु के साथ मानी जाती है। आध्यात्म तो मृत्यु के साथ भी पूर्णता की बात को स्वीकार नहीं करता। अतः प्रत्येक क्षण को समग्रता के साथ जीना ही हमें सफलता की अनुभूति व जश्न मनाने का अवसर दे सकता है।
सामान्यतः विद्यार्थियों से भावी जीवन को सुखद बनाने के लिए वर्तमान में कष्ट सहने की सीख दी जाती है किंतु हम यह भूल जाते हैं कि विद्यार्थी जीवन भी समग्र जीवन का एक भाग है। हम इसे कष्टकर क्यों बनायें? सीखना कष्टकर क्यों हो? सीखना कष्टकर होगा तो विद्यार्थी सीखेगा कैसे? सीखना अपने आप में उपलब्धियाँ पाकर सफलता की अनुभूति करके जश्न मनाने का अवसर क्यों नहीं हो सकता।
एक बार मैं अपने साथी श्री दिल बहादुर मीणा, पी.जी.टी. जीव विज्ञान; के साथ बातचीत कर रहा था। चर्चा का विषय भविष्य के लिए वर्तमान में परिश्रम करने से संबन्धित था। श्री मीणा जी ने बहुत अच्छे तरीके से स्पष्ट किया कि यदि हम जीवन भर बिस्तर ही विछाते रहेंगे तो सोयेंगे कब? मीणाजी का आशय स्पष्ट था कि भावी सुख की आकांक्षा में भविष्य को कष्टकर बनाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता। मीणाजी की बात शत-प्रतिशत सही थी, सही है और सदैव सही ही रहेगी। हमें आनंद प्राप्ति के किसी भी अवसर को गँवाना नहीं चाहिए। साथ ही यह भी स्मरण रखना है कि आनंद मनाने के लिए रुकना नहीं है। कहा जाता है कि चलती का नाम गाड़ी है। अरे भाई! जीवन भी तो एक गाड़ी ही है, सक्रियता ही जीवन है अतः जश्न मनाने के लिए भी रुकना नहीं है। कोई भी प्रसन्नता ऐसी नहीं हो सकती, जिसके लिए हमें अपनी सफलता की यात्रा को कुछ समय के लिए भी रोकना पड़े। स्मरण रखना है कि अभी तो कुछ कदम ही चले हैं अभी गंतव्य की ओर और भी तीव्र गति से चलना है।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

जीवन आनन्द पूर्वक जीने के लिए हैः



अधिकांशतः हम अपना समय जीवन क्या है? इसको सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है? सफल जीवन के लिए तैयारी कैसे करें? आदि निरर्थक प्रश्नों के उत्तर खोजने में बिता देते है‘ इस सन्दर्भ में संतायन का कथन महत्वपूर्ण है, ‘मनुष्य की सृष्टि जीने के लिए हुई है, जीवन को समझने के लिए नहीं।’’ हम जीवन को समझने की कोशिश में समय अर्थात जीवन बर्बाद क्यों करें? हम भावी आनन्दपूर्ण जीवन की तैयारी के लिए विद्यार्थी जीवन में 25 वर्षो को बर्बाद क्यों करें? क्यों न विद्यार्थी जीवन को भी आनन्दपूर्वक जीने के लिए विद्या प्राप्ति की प्रक्रिया को ही आनन्दपूर्ण बना लें। क्यों न हम विद्यार्थी जीवन में ही प्रत्येक पल को सफलता के आनन्द के साथ जीयें। 
        हमने अपने जीवन को आनन्दपूर्वक व सुव्यवस्थित रूप से जीने के लिए ही धर्म की सृष्टि की है। ईसा मसीह के अनुसार भी  ‘‘धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए।’’ वास्तव में धर्म सभी को आनन्दपूर्ण जीवन जीने के लिए ही तो बनाया गया है। व्यक्तियों में आपस में टकराव के कारण जीवन में कटुता व दुःख न आयें इसके लिए ही तो धर्म के आधार पर आचरण को सभी के अनुकूल बनाने के प्रयत्न किये गये हैं। इसी प्रकार हमें प्रत्येक कदम पर यह समझने की आवश्यकता है कि उपलब्धियों की प्राप्ति और उनका जश्न मनाये जाने को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। हम आनंद व संतुष्टि प्राप्त करने के लिए ही कर्मरत रहते हैं। आनंद व संतुष्टि जीवन के लिए आवश्यक है तो हम आनंद व संतुष्टि के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा क्यों करें? कल किसने देखा है? हम आज की उपलब्धियों व सफलताओं से ही आनंद की अनुभूति क्यों न करें?

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-२१

समय ही जीवन है!


मानव समय के साथ-साथ आदत निर्माण करते हैं। एक बार जब आदत निर्माण हो जाती है, तब वह हमारे व्यवहार का महत्वपूर्ण भाग बन जाती है। आदतों को प्रयत्नों द्वारा बदला भी जा सकता है। अतः व्यवहार भी प्रयासों द्वारा बदला जा सकता है। एक अध्येता के अनुसार नवीन व्यवहार लगभग चालीस दिनों में आदत में परिवर्तित हो जाता है। व्यवहार में होने वाला यह परिवर्तन ही तो शिक्षा या अधिगम कहलाता है। इस व्यवहार परिवर्तन को आवश्यकतानुसार नियोजित और नियंत्रित किया जा सकता है।
जब हम जीवन की बात करते हैं, तो विचार का विषय है जीवन क्या है? जीवन कितना है? के उत्तर में हम संभावित आयु के बारे में बात करते हैं। इसका आशय तो यही हुआ न कि हमें जितना समय सक्रिय रूप में मिलता है वही जीवन है। यदि कोई व्यक्ति कोमा में चला जाता है और कुछ करने की स्थिति में नहीं रहता तो हम कहते हैं कि यह भी कोई जीवन है? इससे तो मौत ही भली कई बार तो निष्क्रिय व जीवित व्यक्ति के लिए इच्छा मृत्यु की बात भी की जाती है। इस सबसे स्पष्ट होता है कि वास्तव में हमें सक्रिय अवस्था में उपलब्ध समय ही जीवन है। इसे दूसरे अर्थ में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि उपलब्ध समय का सदुपयोग करना ही तो जीवन जीना है।
जीवन की सफलता की बात की जाती है तो समय के सदुपयोग पर आकर ही टिकती है। फील्ड के अनुसार, ‘‘सफलता और असफलता के बीच की सबसे बड़ी विभाजक रेखा को इन पाँच शब्दों में बताया जा सकता है कि ‘मेरे पास समय नहीं है।’ वस्तुतः समय तो सबके पास बराबर ही होता है। प्रत्येक व्यक्ति के दिन में 24 घण्टे, माह में 30 दिन व वर्ष में 365 दिन ही होते हैं। फिर यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति तो प्रत्येक कार्य के लिए कह देता है कि मेरे पास समय नहीं है, जबकि दूसरा प्रत्येक कार्य के लिए समय निकाल लेता है और अपने जीवन में सफलता के झण्डे गाढ़ता जाता है। यह प्रबंधन कला का ही कमाल है। समय के महत्व को बेंजैमिन फ्रैंक्लिन के कथन, ‘समय ही पैसा है।’ से भी समझा जा सकता है। फ्रैंक्लिन आगे कहते हैं, ‘सामान्य आदमी समय को काटने के बारे में सोचता है, जबकि महान व्यक्ति सोचते हैं इसके उपयोग के बारे में।’
कार्ल मार्क्स ने संसार के सामने नया चिन्तन रखा। वे श्रम प्रबंधन के हामी थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा, ‘‘किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय व्यर्थ मत करो, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करो।’’ वास्तविक रूप से किसी के गुणों की प्रशंसा का कोई लाभ प्रशंसा करने वाले को नहीं मिलने वाला, जब तक कि वह उनको अपने आचरण का अंग ना बनाये। भारत में ही नहीं विदेशों में भी मूर्ति पूजा ने इसी अवगुण के कारण मानव गति को विकास के पथ पर धीमा किया है; जब हम किसी महान पुरूष के आदर्शो व आचरण के अनुकरण करने की अपेक्षा पूजा का पाखण्ड करने लगते हैं, तब हमारा आचरण असत्य पर आधारित हो जाता है। जिन लोगों को भी हम अपने आदर्शो या महान व्यक्तियों की सूची में सम्मिलित करते हैं, वे अपने समय के उपयोग के कारण ही उस स्थान पर पहुँचे हैं। अमेरिका के भूतपूर्व न्यायाधीश चार्ल्स इवान्स हग्स के अनुसार- ‘‘लोग अधिक काम से कभी नहीं मरते, वे अपनी शक्ति के अपव्यय और चिन्ता के कारण मरते हैं।’’ (Men do not die from over-work. They die from dissipation and worry.) अतः अपने समय को चिन्ता में नहीं काम करने में लगाना जीवन प्रबंधन का महत्वपूर्ण घटक है।
         प्रसिद्ध चिंतक बर्नाड शॉ ने भी अनुपयोगी समय को ही सुख-दुख का मूल कारण बताया है, ’’अपने सुख -दुख के विषय में चिन्ता करने का समय मिलना ही, आपके दुख का कारण होता है।’’ वास्तविक रूप से चिन्ता करने से कोई परिणाम नहीं निकलता, योजना बनाकर कार्य करना ही उपलब्धियाँ प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता है। अतीत और भविष्यत की चिन्ता मत करो। सदैव वर्तमान में जीओ। वर्तमान से ही भविष्यत बनता है। अतीत से सीख ली जा सकती है किन्तु अतीत को बदला नहीं जा सकता। अतः अतीत पर अधिक समय नष्ट करने का कोई मतलब नहीं है। भविष्यत का आधार वर्तमान में हमारे द्वारा समय के सदुपयोग से ही बनता है। वास्तविकता यही है कि समय का सदुपयोग करते हुए कार्य करते हुए हमें थकान कम होती है, हमारी अधिकांश थकान उस कार्य के बारे में सोचने से होती है, जिसे वास्तव में किया ही नहीं है। किसी अज्ञात चिंतक का कथन है,‘मानसिक यानि दिमागी कार्य की अपेक्षा मनुष्य उस कार्य से थकता है,जिसे वह करता ही नहीं है।
          अतः समय के महत्व को समझें। समय का सदुपयोग कर्म करने में है। चौधरी मित्रसेन आर्य के अनुसार, सच्चे मन से पुरुषार्थ करना ही सफलता का मूल मंत्र है। पुरुषार्थ समय को विस्तार दे देता है। सफलता के पथिक को समय के पल-पल का उपयोग करना होगा, क्योंकि इसका संरक्षण नहीं किया जा सकता। कार्यो का समय के साथ सच्चा तालमेल जीवन प्रबंधन में सफलता का महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होता है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ

स्वयं का जीवन प्रबंधकः किशोर


जीवन प्रबन्ध का चौथा महत्तवपूर्ण स्तम्भ किशोर-किशोरी स्वयं हैं। इस अवस्था में वे निर्णय क्षमता प्राप्त करने लगते हैं, तर्क करने लगते हैं, कार्य कारण सम्बन्ध को समझने लगते हैं। अतः समस्त निर्णय स्वयं करने की इच्छा रखते हैं। सामान्यतः किशोर-किशोरियों का चिन्तन तीन विषयों ंपर केन्द्रित रहता है-शिक्षा, आजीविका व शादी। वास्तव में ये तीनों ही किसी व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण हैं, किन्तु दुर्भाग्य से सही वातावरण न मिलने के कारण इनका चिन्तन केवल शादी पर केन्द्रित हो जाता है, जो मां-बाप व शिक्षक द्वारा सही व स्पष्ट मार्गदर्शन न मिलने के कारण होता है। इनमें से प्रत्येक पर विचार करते समय किशोर-किशोरी को कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए। 
वास्वविक बात यह है कि किशोरावस्था में समझ का विकास अवश्य होने लगता है किन्तु निर्णय करने की क्षमता पूर्णरूप से परिपक्व नहीं हो पाती। अतः किशोर-किशोरियों को निर्णयन प्रक्रिया व परिवार व समाज के प्रति उनके कर्तव्यों से परिचित करवाना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि शिक्षा व विकास प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि आजीविका व शादी उनके वयस्क होने के बाद ही उचित है और शादी केवल उनका व्यक्तिगत विषय नहीं परिवार व समाज का भी विषय है। उन्हें समझना होगा कि उनकी स्वतंत्रता उनके पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों के अधीन है। वे अपने परिवार, देश व समाज के संसाधन के रूप में परिवार, देश व समाज के द्वारा विकसित किये जा रहे हैं। अतः वे समाज की निधि हैं और उनको प्रभावित करने वाला प्रत्येक निर्णय परिवार से विचार-विमर्श व सामाजिक हित में होना चाहिए। 
        किशोर-किशोरियों को समझना चाहिए कि शिक्षा में विषय चयन, विद्यालय चयन उनकी अभिरूचि पर आधारित हो। अभिरूचि व क्षमता का आंकलन करके स्वयं विषय निर्धारण करें। माँ-बाप व शिक्षक से इस सम्बन्ध में आवश्यक सलाह अवश्य करें किंतु निर्णय करने का कार्य करने का उत्तरदायित्व उनका स्वयं का है। यदि किशोर-किशोरियों पर उनके स्वाभाविक विकास के प्रतिकूल निर्णय थोपे जायँं तो विनम्रता से दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर देना चाहिए। शिक्षा संबधी निर्णय करने में किशोर की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए। आजीविका के क्षेत्र का चयन शिक्षा स्वयं ही कर देती है।  शादी तो व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक संयुक्त उत्तरदायित्व है, जिसका निर्णय भी सभी पक्षों से विचार-विमर्श के बाद ही होना चाहिए। किशोर-किशोरियों को निर्णय करने के वैयक्तिक अधिकार व उत्तरदायित्व से भागना नहीं चाहिए। किशोर-किशोरियों का परमुखापेक्षी बनना उनके स्वयं, परिवार व समाज दोनों के लिए घातक है।
जीवन प्रबन्ध मां, बाप, शिक्षक व किशोर-किशोरी सभी के द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना अपेक्षित है। परिवार व समाज का वातावरण जीवन प्रबंधन को गंभीरता से प्रभावित करता है अर्थात परिवार पांचवा महत्तवपूर्ण स्तम्भ है जो जीवन प्रबन्ध से सम्बन्धित है। अतः जीवन प्रबन्ध के लिए वातावरण स्नेहिल, सुखद, विश्वास से परिपूर्ण व सरस होना चाहिए। जीवन प्रबन्ध की आवश्यकता को वर्तमान में इस तथ्य से और स्पष्ट किया जा सकता है कि वर्तमान में अधिसंख्यक छात्र-छात्राएं अपने विषयों, विद्यालयों व शिक्षकों से असन्तुष्ट हैं। अधिसंख्यक कार्मिक अपनी आजीविका से असन्तुष्ट है व अधिसंख्यक व्यक्ति अपने जीवन साथी व परिवार से असन्तुष्ट है। अतः कुशल जीवन प्रबन्ध ही जीवन को सुगम, आनन्दपूर्ण व सन्तुष्टिदायक बना सकता है।

शनिवार, 31 जनवरी 2015

विपरीत लिंगी आकर्षण प्राकृतिक

विपरीत लिंगी आकर्षण प्राकृतिक है, अपराध नहीं


किशोरावस्था में परिवार व विद्यालय सबसे अधिक समय किशोर-किशोरियों को आपसी मिलने-जुलने से रोकने के प्रयासों पर लगाते हैं। इसे ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानों लड़के-लड़कियों का आपस में बातचीत करना अपराध हो। किशोर-किशोरी विपरीत लिंगी आकर्षण से प्रभावित होते है, इस आकर्षण में व्यवधान उत्पन्न करने या बाधक बनने की अपेक्षा शिक्षक को चाहिए कि वह किशोर-किशोरियों को प्रेम, विश्वास, सहयोग व सम्मानपूर्ण व्यवहार करना सिखाये। उन्हें अलग-अलग करके उनका सन्तुलित विकास सम्भव नहीं। शिक्षक की जरासी लापरवाही उनके जीवन को बर्बाद कर सकती है। उन्हें स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए कि प्रेम का अर्थ शारीरिक सम्बन्ध नहीं है। 
       वास्तव में शारीरिक सम्बन्धों व प्रेम में दूर का भी सम्बन्ध नहीं हैं। सामान्य शिष्टाचार व एक-दूसरे के प्रति सम्मान व शिष्ट आचरण की सीख विद्यार्थी जीवन में नहीं मिलेगी तो कब मिलेगी? किशोर-किशोरियों में सहयोग, समन्वय व प्रेमपूर्ण व्यवहार व्यक्ति, परिवार व समाज सभी के विकास के लिए आवश्यक है। किशोर-किशोरियों को प्रत्येक जानकारी स्पष्ट रूप से देनी चाहिए, क्योंकि रोक-टोक छिपाव को जन्म देती है और छिपाव समस्त अवगुणों का पोषक है। अतः किशोर-किशोरियों को सलाह सुझाव व मार्गदर्शन देकर निर्णय करने में समर्थ बनाना चाहिए, निर्णय थोपने की प्रवृत्ति उनके विकास में बाधक होती है। यह कार्य अकेले शिक्षक के बस का भी नहीं, परिवार व समाज प्रत्येक स्तर पर समयोजन करते हुए ही किया जा सकता है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

जीवन प्रबन्ध के आधार स्तम्भ-१८

विपरीत लिंगी आकर्षण प्राकृतिक है, अपराध नहीं


किशोरावस्था में परिवार व विद्यालय सबसे अधिक समय किशोर-किशोरियों को आपसी मिलने-जुलने से रोकने के प्रयासों पर लगाते हैं। इसे ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानों लड़के-लड़कियों का आपस में बातचीत करना अपराध हो। किशोर-किशोरी विपरीत लिंगी आकर्षण से प्रभावित होते है, इस आकर्षण में व्यवधान उत्पन्न करने या बाधक बनने की अपेक्षा शिक्षक को चाहिए कि वह किशोर-किशोरियों को प्रेम, विश्वास, सहयोग व सम्मानपूर्ण व्यवहार करना सिखाये। उन्हें अलग-अलग करके उनका सन्तुलित विकास सम्भव नहीं। शिक्षक की जरासी लापरवाही उनके जीवन को बर्बाद कर सकती है। उन्हें स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए कि प्रेम का अर्थ शारीरिक सम्बन्ध नहीं है। 
         वास्तव में शारीरिक सम्बन्धों व प्रेम में दूर का भी सम्बन्ध नहीं हैं। सामान्य शिष्टाचार व एक-दूसरे के प्रति सम्मान व शिष्ट आचरण की सीख विद्यार्थी जीवन में नहीं मिलेगी तो कब मिलेगी? किशोर-किशोरियों में सहयोग, समन्वय व प्रेमपूर्ण व्यवहार व्यक्ति, परिवार व समाज सभी के विकास के लिए आवश्यक है। किशोर-किशोरियों को प्रत्येक जानकारी स्पष्ट रूप से देनी चाहिए, क्योंकि रोक-टोक छिपाव को जन्म देती है और छिपाव समस्त अवगुणों का पोषक है। अतः किशोर-किशोरियों को सलाह सुझाव व मार्गदर्शन देकर निर्णय करने में समर्थ बनाना चाहिए, निर्णय थोपने की प्रवृत्ति उनके विकास में बाधक होती है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

आगामी पुस्तक - पापा मैं तुम्हारे पास आऊँगा

आगामी पुस्तक