शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

कुशल प्रबन्धक के गुण-७

प्रतिस्पर्धा के साथ समन्वयः


प्रतिस्पर्धा विकास के लिए आवश्यक मानी जाती है किंतु इसके लिए आवश्यक है कि प्रतिस्पर्धा गलाकाट प्रतिस्पर्धा में न बदल जाय वरन् स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का आशय विकास के लिए प्रतिस्पर्धा करने से है न कि सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए या सामने वाले प्रतिस्पर्धी को अपमानित करने के लिए। सफलता के पथिक को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का महत्व समझने के लिए कछुआ व खरगोश की सुप्रसिद्ध लोक कथा उपयोगी रहेगी। इस कहानी को आपने पढ़ा या सुना तो अवश्य होगा किंतु यहाँ प्रबंधन के साथ जोड़कर प्रस्तुत की जा रही है।
 कछुआ और खरगोश की कहानी 

कार्य ही नहीं कार्य करने का तरीका या ढंग भी महत्वपूर्ण होता है। गांधी जी ने साधनों की पवित्रता पर भी जोर दिया है। स्वामी विवेकानन्द भी कहते हैं, ‘‘मनुष्य की परख उसके कर्तव्य की उच्चता या हीनता की कसौटी पर नहीं होनी चाहिए, वरन् देखना यह चाहिए कि वह कर्तव्यों का पालन किस ढंग से करता है।’’ कर्तव्य पालन का ढंग ही तो व्यक्ति को विशेष बनाता है। यह भी कहा जाता है कि सफल व्यक्ति कोई कार्य अलग नहीं करते वरन् सामान्य कार्य को ही विशिष्ट ढंग से करते हैं। इस विशिष्ट ढंग को ही तकनीकी कहा जा सकता है। भदंत आनन्द कौसल्यायन ने इसी को संस्कृति कहा है।
आप सभी ने कछुआ और खरगोश की कहानी को पढ़ा होगा। कार्य की निरंतरता के लिए अभिप्रेरित करने के लिए व आलस्य के दुष्परिणाम को बताने के लिए इस कहानी को न जाने कब से प्रयोग किया जाता रहा है। यह कहानी निःसन्देह कछुआ की निरंतरता की विजय को दिखाकर हमें निरंतर कार्य करते रहने को प्रेरित करती है किन्तु हम कछुआ की तरह धीरे चलने को आदर्श नहीं मान सकते। खरगोश और कछुआ की प्रतिस्पर्धा भी उचित नहीं कही जा सकती। यह सार्वजनिक जीवन में अवसर की समानता के सिद्धांत के खिलाफ हो जाती है। अतः बच्चों को निरंतरता के लिए अभिप्रेरित करने में यह कुछ हद तक सफल भले ही हो पाती हो किन्तु वर्तमान प्रबंधन व तकनीकी के युग में इसे आदर्श कहानी के रूप में प्रयोग करना उचित प्रतीत नहीं होता।
अतः इसी कहानी को श्री प्रमोद बत्रा ने अपनी पुस्तक ‘‘सही सेाच और सफलता’’ में कुछ आगे बढ़ाकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए अच्छी सीख दी है। मैं श्री प्रमोद बत्रा की पुस्तक से इस कहानी को आगे बढ़ाकर और अधिक उपयोगी बनाने के लिए धन्यवाद देते हुए यहाँ साभार उद्धृत कर रहा हूँ। श्री बत्रा जी ने स्पष्ट किया है कि केवल कार्य की निरंतरता ही आवश्यक नहीं समाज के लिए सहयोग व समन्वय की आवश्यकता भी है। सफलता केवल निरंतरता से ही नहीं मिलती उसके लिए सहयोग करने व प्राप्त करने के साथ ही वातावरण से समन्वय बनाकर भी चलना होगा। विज्ञान का मानव जीवन के साथ समन्वय करना ही तो तकनीक है और तकनीक के बिना सफलता की बातें करना ही बेमानी है।
प्रारंभिक कहानी को हम सभी अच्छी प्रकार जानते हैं। पाठकों को इस कहानी को पुनः पढ़ना कुछ बोरियत भरा भी प्रतीत हो सकता है किन्तु कहानी को वर्तमान संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिए उसे संक्षिप्त में ही सभी प्रारंभिक खण्ड को भी देना आवश्यक है- 
1. एक बार की बात है एक जंगल में एक कछुआ और एक खरगोश रहते थे। दोनों में मित्रता थी किन्तु एक दिन उन दोनों के बीच बहस हो गई। खरगोश ने कछुआ की मजाक उड़ाते हुए कहा कि तुम कर ही क्या सकते हो? चार कदम चल तो सकते नहीं। तुम्हारी धीमी चाल के कारण तुम्हारी हैसियत ही क्या है? कछुआ को खरगोश की बात नागबार गुजरी। उसने कहा मैं तुमसे किसी भी प्रकार कम नहीं हूँ। कछुए ने समानता के अधिकार की बात कही और वह किसी भी प्रकार झुकने के लिए तैयार नहीं हुआ। कछुआ और खरगोश के बीच गरमा-गरम बहस हुई। जंगल के अन्य प्राणी भी उनकी बहस का आनन्द लेने लगे। अन्त में श्रेष्ठता के निर्धारण के लिए खरगोश ने कछुआ को दौड़ प्रतियोगिता की चुनौती दी। क्रोध के अविवेक में कछुआ ने खरगोश की वह चुनौती स्वीकार कर ली। 
दो-चार बड़े-बुजुर्गो की निगरानी में दौड़ प्रतियोगिता की घोषणा कर दी गई। नियमों का निर्धारण हुआ।  प्रतियोगिता का लक्ष्य और मार्ग तय हो गया। निर्धारित समय पर निर्धारित स्थान से प्रमुख पंचों की उपस्थिति में जंगल के राजा शेर ने झण्डी दिखाकर दोनों की प्रतियोगिता का शुभारंभ किया। खरगोश तुरंत आगे निकल गया और कुछ समय तक तेज दौड़कर पीछे देखा तो उसे कछुआ दूर-दूर तक नजर नहीं आया। उसे अपनी विजय में कोई संदेह नहीं था। जंगल के सभी प्राणी प्रतियोगिता के परिणाम को पहले से ही जानते थे। खरगोश के लिए कछुए के साथ दौड़ना ही हास्यास्पद हो गया। खरगोश दौड़कर लक्ष्य के काफी नजदीक पहुँच गया था। कछुआ की वहाँ तक पहुँचने की घण्टों तक संभावना नहीं थी। अतः खरगोश विश्राम करने के उद्देश्य से एक पेड़ के नीचे लेट गया और नींद आ गई। कछुआ निरंतर चलता रहा और खरगोश के जागकर पहुँचने से पूर्व निर्धारित लक्ष्य तक पहुँच गया और विजय प्राप्त कर ली। परिणाम खरगोश के लिए ही अपमानजनक नहीं था वरन् जंगल के सभी प्राणियों के लिए अनपेक्षित व आश्चर्यजनक था। 
2. खरगोश का दौड़ हार जाना खरगोश के लिए अपमानजनक नहीं, अनपेक्षित व आश्चर्यजनक भी था। दौड़ हार जाने पर खरगोश ने अच्छी तरह से प्रयास, तकनीक व परिणाम का विश्लेषण किया। अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श किया। उसने निष्कर्ष निकाला कि वह इसलिए हार गया, क्योंकि उसमें अधिक आत्मविश्वास, लापरवाही और सुस्ती थी। वह यदि प्रतियोगिता को गंभीरता से लेता तो कछुआ उसे नहीं हरा सकता। निश्चित रूप से अत्यधिक आत्मविश्वास कार्य करने की गति को कम करता है और परिणाम आशानुकूल नहीं आते। उसने कछुआ को दौड़ के लिए दुबारा चुनौती दी। कछुआ तैयार हो गया। इस बार खरगोश बिना रूके तब तक दौड़ता रहा जब तक लक्ष्य तक न पहुँच गया। अपेक्षा के अनुरूप वह दौड़ जीत गया।
3. कछुआ ने पुनः विचार-विमर्श व चिन्तन किया। वह इस नतीजे पर पहुँचा कि इस बार की गई दौड़ के तरीके से वह खरगोश को नहीं हरा सकता। तरीका, संसाधन व मार्ग भी लक्ष्य तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उसने विचार करके नए मार्ग व नए लक्ष्य का निर्धारण किया और पुनः खरगोश को दौड़ के लिए चुनौती दी। खरगोश मान गया। दौड़ शुरू हो गई। खरगोश ने तय किया था कि वह लक्ष्य प्राप्ति तक दौड़ता रहेगा और विजय प्राप्त करेगा। वह दौड़ता रहा, किन्तु एक स्थान पर उसे रूकना पड़ा। सामने एक नदी थी। अंतिम रेखा नदी के पार कुछ किलोमीटर दूरी पर थी। खरगोश बैठ गया और विचार करता रहा कि अब क्या किया जाय? इसी दौरान कछुआ नदी में उतरा और तैरकर न केवल नदी पार कर गया वरन् अन्तिम रेखा पर पहुँच गया। इस प्रकार कछुआ विजयी हुआ।
4. कछुआ और खरगोश दोनों में हार व जीत हो चुकी थी। दोनों अपनी-अपनी सीमाओं और एक-दूसरे की विशेषताओं को समझ चुके थे। अब दोनों फिर से आपस में मित्र बन गए और दोनों ने मिलकर नदी पार लक्ष्य तक पहुँचने का निश्चय किया। इस बार दोनों एक टीम के रूप में थे। दोनों में सहयोग का भाव था। अतः पहले तो खरगोश ने कछुआ को अपनी पीठ पर बिठाकर दौड़ लगाई और नदी किनारे पहुँचकर कछुआ ने खरगोश को अपनी पीठ पर बिठाकर नदी पार कराई फिर खरगोश ने कछुआ को पीठ पर बिठाकर दौड़ लगाई इस प्रकार दोनों तुलनात्मक रूप से कम समय में और बिना किसी परेशानी के अन्तिम रेखा तक पहुँच गये। अपनी कुशलता का उपयोग उन्होंने नये तरीके से किया और द्रुतगति से अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। नया तरीका ही तो तकनीक है और तकनीक की सहायता से गति व प्रभावशीलता दोनों में वृद्धि होती है। तकनीक की सहायता लेकर दोनों ने ही आनन्द, संतुष्टि और सफलता की अनभूति की।


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