शनिवार, 13 जून 2009

आखिर मिल ही गई - पीएच.डी. की डिग्री

लालफीताशाही के जलवे- काम दो वर्ष का, प्रक्रिया में तीन वर्ष

प्रबंधन के विद्यार्थी का सामान्यतः कक्षा में प्रश्न होता है, `सर, लालफीताशाही का क्या आशय है?´
इसका उत्तर उन्हें आत्मसात कराना बड़ा जटिल होता है, किन्तु यहाँ मैं लालफीताशाही के क्या जलवे है? इसका एक सत्य उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
मुझे दिनांक १०-०६-200९ कों पीएच.डी. का प्रोवीजनल प्रमाण-पत्र प्राप्त हुआ है। इसकी यात्रा का तिथिवार विवरण निम्न है:-
निर्देशक की खोज कर उनकी स्वीकृति प्राप्त की - जुलाई २००४
अपने विद्यालय में अनुमति हेतु आवेदन प्रस्तुत किया : २७-०९-२००४
विद्यालय द्वारा अनुमति दी गई- ३०-१०-२००४
निर्देशक महोदय ने शोध सार को अनुमोदित किया : २२-१२-२००४,
( वास्तव में हस्ताक्षर ०१-०१-२००५ को हुए )
विश्वविद्यालय में पंजीकरण के लिए आवेदन व शोध-प्रारूप भेजा : ०२-०१-२००५
विश्वविद्यालय कार्यालय से नामांकन शुल्क जमा कराने के लिए पत्र प्रेशित : फरवरी २००५
नामांकन फार्म व शुल्क जमा कराया : २५ फरवरी २००५
नामांकन हुआ : १९-१०-२००५,
शोध प्रारूप विषय समिति के सामने प्रस्तुत करने का पत्र प्राप्त हुआ : अप्रेल २००५
शोध प्रारूप प्रस्तुतिकरण : ०५ अप्रेल २००६
अस्थाई पंजीयन की अनुमति व शुल्क जमा करने का निर्देश प्राप्त : जून २००६
शुल्क जमा कराकर प्रक्रिया पूर्ण की : २१-०६-२००६
शोध अनुमति पत्र प्राप्त हुआ : जुलाई के अन्त में शोध पंजकरण तिथि २१-०६-२००६
स्वीकृत शोध-ग्रन्थ जमा कराया : २५ जून २००८
खुली मौखिक परीक्षा (viva voce): ३१ मार्च २००९
परीक्षक महोदय द्वारा उसी दिन विश्वविद्यालय को रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी। औपचारिक रूप से मेरी डॉक्टरेट पूरी होने की बधाई भी दी।
विश्वविद्यालय में तीन बार जाने पर १४-०५-२००९ को पता चला कि अभी प्रोवीजनल प्रमाण-पत्र के लिए शुल्क जमा कराना है।

दिनांक १४-०५ -२००९ को शुल्क जमाकर कर प्रोवीजनल प्रमाण-पत्र के लिए प्रार्थना पत्र दिया।
२ जून २००९ तक प्रतीक्षा से परेशान होकर सूचना के अधिकार के तहत सूचना माँगने का औपचारिक पत्र पंजीकृत डाक से भेजा, तब कहीं मुझे दिनांक 10 जून २००९ को पी.एच.डी. का प्रोवीजनल प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ।

उल्लेखनीय है कि शोधकार्य निर्धारित न्यूनतम समय २ वर्ष में पूर्ण कर विश्वविद्यालय में जमा करा दिया था। जबकि पी.एच.डी में समय लगा कुल ५ वर्ष अर्थात ३ वर्ष लालफीताशाही की भेंट चढ़ गये। इसी को कहते हैं- लालफीताशाही।

2 टिप्‍पणियां:

Abhishek Mishra ने कहा…

जिस रिकॉर्ड समय में शोध करने की सराहना होनी चाहिए थी, उसे 5 साल खिंच दिया गया ! फिर भी बधाई स्वीकारें.

बेनामी ने कहा…

आपका कथन सत्य है यदी आप भष्टाचार की गाडी मेँ समयानुसार इंधन डाल देते तब आपको सायद इतना समय ना लगता आपके समान या कुछ पहल से ही मैरे से भी इंधन की चाहत है देखते है कब तक गाडी नहीँ चलेगी । आपने जो अनुभव लिखे उसके लिये धन्यावाद , अपने जैसे हाल और के ना हो यह आप भी चाहते हैँ और हम भी । आपको शुभकानायेँ